02 अगस्त 2011

सृजन और समाज

मानव अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए चिरकाल से नए-नए माध्यमों को अपनाता रहा है. सृष्टि के प्रारम्भिक दिनों में ही उसे अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए कुछ साधनों की तलाश करनी पड़ी होगी. जिनमें से भाषा का विकास और उसे भावनाओं से जोड़ने का उसका प्रयत्न पहला कार्य रहा होगा. भाषा को स्थायी  रूप देने के लिए उसे लिपि की आवश्यकता महसूस हुई और लिपि को सुरक्षित रखने और उसके प्रचार के लिए उसे साहित्य की आवश्यकता महसूस हुई होगी. यह क्रम रहा होगा इनसान की भाषा, लिपि और साहित्य के विकास का. लेकिन समय सदा एक सा नहीं रहता उसमें परिवर्तन आने लाजमी हैं और यह प्रकृति का नियम भी है. जब तक कुछ परिवर्तित नहीं होता तब तक कुछ नया भी नहीं आता, और जब कुछ नया आता  है तो उससे मानव के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है. चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, लेकिन प्रभाव का पड़ना लाजमी है. हालाँकि हमारा भाषा विज्ञान और व्याकरण इस विषय में तथ्यपरक जानकारी उपलब्ध करवाते हैं, लेकिन किसी एक मत तक वह भी नहीं पहुँच पाते और जहाँ तक मुझे लगता है किसी एक मत तक पहुंचना सम्भव भी नहीं है. लेकिन सृजन का यह क्रम अनवरत रूप से जारी है, यह संतोष की बात है. आज भी हम सृजन के नए-नए  आयामों को सामने लाते हैं, और उन्हें समाज के लिए उपयोगी बनाने का प्रयत्न करते हैं. सृजन के मूल में मानवीय पहलु अधिक रहा है. तभी तो सृजन के मायने बहुत अधिक हैं और सर्जक के भी. अगर सृजन नहीं होगा तो सर्जक कैसा और सर्जक नहीं होगा तो सृजन कैसा? दोनों का एक दूसरे के साथ अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं. इसलिए जब कोई व्यक्ति सृजन करता है तो वह मात्र अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त ही नहीं करता, बल्कि उसके सृजन के दायरे में सम्पूर्ण मानव होता है. क्योँकि सर्जक भी उस समाज का अंग होता है जिस समाज के लिए वह साहित्य रच रहा है, किसी नयी वस्तु का अविष्कार  कर रहा है.
सृजन का एक पहलू यह भी है कि हम कितने उदात भावों  को लेकर सृजन कर्म में रत हैं. भावों की उदातता रचनाकार के संवेदना पक्ष से सम्बन्धित है. जिस रचनाकार की संवेदना जितनी गहरी होगी उसका रचनाकर्म उतना ही मार्मिक और समाजोपयोगी होगा. सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के माध्यमों की तलाश करता रहा है, और इस दिशा में उसने काफी प्रगति भी की है. चाहे कला हो या साहित्य इन दोनों माध्यमों से उसने अपनी संवेदनाओं को समाज की संवेदनाओं के साथ जोड़ने की भरपूर कोशिश की है. और काफी हद तक उसे सफलता प्राप्त भी हुई है. मानव विकास के चरम सोपान तक बेशक पहुच गया है, लेकिन जहाँ तक सृजन की बात है उसे इस दिशा में अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है. आज भी मानव मन की कई ऐसी भावनाएं हैं जिन्हें शब्द नहीं दिए जा सके हैं, कुछ ऐसे अनुभव हैं जिन्हें शब्दबद्ध नहीं किया जा सका है, और उन्हें हम सिर्फ संकेत मात्र से किसी व्यक्ति या समाज तक पहुँचाने का कार्य करते हैं. हमारे अंतर्मन में चलने वाली हलचल और उससे होने वाले अनुभव कहाँ पूरी तरह से अभिव्यक्त हो पाते हैं. लेकिन फिर भी जो कुछ भी आज सृजन के रूप में हमारे सामने हैं वह काफी हद तक संतोषजनक हैं और हम अपनी अभिव्यक्ति की क्षमता को बढ़ाने का निरन्तर प्रयास कर भी रहे हैं.
सृजन मानव जीवन का महत्वपूर्ण कर्म है. हालाँकि हमारे धर्म ग्रन्थ यह मानते हैं कि इस सृष्टि का सृजन परमात्मा ने किया है. यह बात तो सही है और उसने सृजन के इतने आयाम हमारे सामने रखें हैं कि हम उसकी सृजन शक्ति और कला की विविधता को देखकर दांतों तले अंगुली दबाने  को मजबूर हो जाते हैं, और काफी हद तक हमने सृजन को इस प्रकृति से ही सीखा है. दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि सृजन की मूल प्रेरणा प्रकृति है और हम उसका अनुकरण करते हैं. पाश्चात्य विचारक प्लूटो ने सृजन पर विचार करते हुए लिखा है कि "सृजन प्रकृति का हुबहू अनुकरण है". लेकिन उनकी इस बात को उनके शिष्य अरस्तु नकार देते हैं वह कहते हैं कि हम सृजन करते वक़्त किसी चीज का हुबहू अनुकरण नहीं कर सकते, बस उसकी अनुकृति बनाने का प्रयास करते हैं . यहाँ पर अगर हम देखें तो प्लूटो और अरस्तु के शब्द बेशक अलग-अलग हों, लेकिन अनुकरण शब्द यह प्रमाणित करता है कि हम सृजन के लिए प्रकृति का अनुकरण करते हैं. लेकिन किसी भी परिस्थिति में हुबहू अनुकरण नहीं कर सकते. अगर हम प्रकृति का हुबहू अनुकरण नहीं कर सकते तो फिर हम कहाँ अपनी भावनाओं को जैसे हमने महसूस की हैं वैसे ही अभिव्यक्त भी कर सकते हैं. तभी तो वेद भी ईश्वर को "नेति-नेति" कहता है.
हालाँकि सृजन के मूल में व्यक्ति की  भावनाएं हैं, लेकिन जब तक भावनाएं व्यक्ति सापेक्ष और समाज निरपेक्ष बनी रहती हैं तो सृजन का उद्देश्य सिद्ध नहीं होता. सृजन का उद्देश्य है समाज को दिशा देना, समाज के लिए वह करना जिससे व्यक्ति की सोच और समझ का स्तर बढ़ पाए और वह मानवीय जीवन मूल्यों को पहचान कर अपने हित का कार्य कर सके. सृजन और समाज का गहरा नाता है. सृजनकर्ता समाज का जिम्मेवार व्यक्ति है उसके जीवन दर्शन और कर्म का प्रभाव व्यक्ति के जीवन को गहरे तक प्रभावित करता है. इसलिए सर्जक को बहुत सम्भल कर कार्य करना होता है, उसे एक-एक शब्द गहरे से सोच समझ कर कहना होता है और उसका कहा हुआ शब्द अगर उसके कर्म में उतरा है तो निश्चित रूप से वह कालजयी है वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है, और ऐसी स्थिति में सर्जक समाज के लिए पथप्रदर्शक बन जाता है. 

51 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सृजन में ईश्वर बसता है।

chaudhry akshr jyotish ने कहा…

बहुत अच्छे केवल राम आपके शब्द बहुत ही अनमोल है

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

bahut khoob kaha aapne

वाणी गीत ने कहा…

सर्जक को बहुत संभल कर कार्य करना होता है उसे एक एक शब्द गहरे से सोच समझ कर कहना होता है और उसका कहा हुआ शब्द अगर उसके कर्म में उतरा है तो निश्चित रूप से वह कालजयी है...
बहुत पते की बात की है आपने , शब्द के साथ कर्म भी आवश्यक है , सिर्फ उपदेशक की भूमिका पर्याप्त नहीं है !

रविकर ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति महोदय ||

बधाई स्वीकार करें ||

kumar ने कहा…

खूबसुरत प्रस्तुति....
सादर

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

सर्जक को सर्जन जैसी कुशलता से कार्य करना चाहिए,जैसे सर्जन चाकू का प्रयोग कर गंभीर बीमारी को दूर कर देता है। वैसे ही सर्जक को कलम का उपयोग करना चाहिए।

शानदार पोस्ट के लिए सैल्युट
देर आयद, दुरुस्त आयद

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।

http://tetalaa.blogspot.com/

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

एक रचनात्मक आलेख... बहुत सुन्दर !

POOJA... ने कहा…

bahut hi gahrai ke saath likha hai aapne...
wakai kitna sambhalne ki jaroorat hai... kalam ko chalate waqt... bhavanaon ko sanjote waqt...
bahut hi khoob...
laajawab...

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सृजनकर्ता समाज का जिम्मेवार व्यक्ति है उसके जीवन दर्शन और कर्म का प्रभाव व्यक्ति के जीवन को गहरे तक प्रभावित करता है . इसलिए सर्जक को बहुत संभल कर कार्य करना होता है उसे एक एक शब्द गहरे से सोच समझ कर कहना होता है और उसका कहा हुआ शब्द अगर उसके कर्म में उतरा है तो निश्चित रूप से वह कालजयी है ..


सृजनकर्ता को जागरूक करता लेख ...अच्छी पोस्ट

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत ही गहरी बातें, शानदार प्रस्तुति

संध्या शर्मा ने कहा…

"उसका कहा हुआ शब्द अगर उसके कर्म में उतरा है तो निश्चित रूप से वह कालजयी है वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है , और ऐसी स्थिति में सर्जक पथप्रदर्शक बन जाता है"

बिलकुल सही बात लिखी है आपने... कथनी के साथ करनी भी होना चाहिए... सिर्फ उपदेशक देना ही काफी नहीं होता...

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

कर्म की प्रधानता ही सृजन की उत्पत्ति करता है

mahendra srivastava ने कहा…

क्या कहूं, पढना शुरू किया, तो खत्म करके ही चैन मिला।
एक बार फिर बहुत सुंदर प्रस्तुति।

vidhya ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति महोदय ||

बधाई स्वीकार करें |

smshindi By Sonu ने कहा…

सुन्दर सन्देश देती पोस्ट

smshindi By Sonu ने कहा…

पोस्ट पर आपका स्वागत है
दोस्ती - एक प्रतियोगिता हैं

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut hi badhiyaa aalekh

sushma 'आहुति' ने कहा…

सार्थक प्रस्तुती....

Arunesh c dave ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी है! सूचनार्थ निवेदन है!

Dr Varsha Singh ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सृजन जीवन का हर रंग समेटे है..... सार्थक विचार

anu ने कहा…

इस शानदार प्रस्तुति के लिए आभार आपका

Dr. shyam gupta ने कहा…

शानदार प्रस्तुति.....एक मूल बात ..कि सृजन में सदा समष्टि हित की बात होनी चाहिए....को विस्तृत रूप से व्याख्यायित किया गया है...बधाई |

--कहा गया कि --- कथनी के साथ करनी भी होना चाहिए... सिर्फ उपदेशक देना ही काफी नहीं होता.(जो कथ्य का दूसरा मूल भाव है)

..परन्तु निश्चय ही यह सर्वदा मान्य तथ्य नहीं ..उपदेशक अनुभव के आधार पर भी उपदेश देता है आवश्यक नहीं कि उसने उस कर्म में स्वयं भाग लिया हो या वर्तमान में ले रहा हो ...यह उपदेशक के ज्ञान के ऊपर निश्चित करता है, किसी क्रिया/कृतित्व को दूर से देखने पर अधिक स्पष्ट दिखाई देता है ..स्वयं उसमें लिप्त होने पर इतना नहीं क्योंकि उसमें अपनेपन की लिप्तता आड़े आने लगती है ...इसीलिये उदाहरणार्थ.. आवश्यक नहीं कि साहित्य-समीक्षक स्वयं बहुत समर्थ साहित्यकार हो ...वह कालदर्शी ज्ञानी भी हो सकता है..स्वयं पाठक भी .

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

बहुत ही चिंतनपरक , सारगर्भित लेख ...

'सृजन करो ब्रह्मा बन जाओ '......सर्जक की समाज के प्रति बहुत बड़ी भूमिका होती है

रेखा ने कहा…

सृजन करनेवाला हमेशा महान और पूजनीय होता है ....रचनात्मक आलेख ,बधाई

मुसाफिर क्या बेईमान ने कहा…

सर्जन तो जीवन का इक हिस्सा है. वो अपने ऊपर है हम किस सर्जनता मे बिश्वास करतें है.

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत खूब केवल राम ....
शुभकामनायें आपको !

संजय भास्कर ने कहा…

सृजनकर्ता समाज का जिम्मेवार व्यक्ति है
बिलकुल सही बात लिखी है आपने...शानदार प्रस्तुति...

Atul Shrivastava ने कहा…

बेहतरीन प्रस्‍तुति।
शब्‍दों का बखूबी इस्‍तेमाल।
शुभकामनाएं.......

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

.



प्रियवर केवलराम जी

बहुत विद्वतापूर्ण आलेख के लिए साधुवाद !

सृजन की सार्थकता तब ही है जब व्यष्टि समष्टि का रूप ले ले ।

आपका लेखन दिशा दिखाने वाले महत्वपूर्ण प्रकाशस्तंभ के समान है । आपके विचारों पर प्रतिक्रिया की अपेक्षा इन्हें जीवन में ढालने में अधिक सार्थकता महसूस करता हूं …

पिछली पोस्ट्स की पद्य रचनाओं के लिए भी हार्दिक बधाई !

शुभकामनाओं मंगलकामनाओं सहित…
-राजेन्द्र स्वर्णकार

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

आपने इस लेख के द्वारा सृजन की सार्थकता सिद्ध कर दी है,एक गंभीर और आवश्यक सुझाव !

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

सार्थक सृजन हमेशा याद रखने योग्य होता है |अच्छी पोस्ट के लिए बधाई |

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

सार्थक सृजन हमेशा याद रखने योग्य होता है |अच्छी पोस्ट के लिए बधाई |

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

सार्थक सृजन हमेशा याद रखने योग्य होता है |अच्छी पोस्ट के लिए बधाई |

Babli ने कहा…

गहरे भाव के साथ बहुत सुन्दर लिखा है आपने ! शानदार प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

๑♥!!अक्षय-मन!!♥๑, ने कहा…

bahut bahut sahi satik
baat ki hai sach
jis tarhan se paribhashit
kiya hai aapne aapki lekhni
aur aapki kalam bol uthi
hai ummid hai jaldi
nai post padne ko milgi akshay-man

ज्योति सिंह ने कहा…

agar baat shabdo tak thahar jaati to karm ki pradhanta nahi rah jaati ,pravin ji ne sahi kaha ,bahut hi badhiya bishya raha aur padhna bhi achchha laga .

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

आपकी किसी पोस्ट की हलचल है ६-८-११ शनिवार को नयी-पुरानी हलचल पर ..कृपया अवश्य पधारें..!!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत अच्छे विचार दिये हैं सर।


सादर

Dorothy ने कहा…

सार्थक एवं सारगर्भित प्रस्तुति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

संजय भास्कर ने कहा…

मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये

smshindi By Sonu ने कहा…

आपके पास दोस्तो का ख़ज़ाना है,
पर ये दोस्त आपका पुराना है,
इस दोस्त को भुला ना देना कभी,
क्यू की ये दोस्त आपकी दोस्ती का दीवाना है

⁀‵⁀) ✫ ✫ ✫.
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☻/ღ˚ •。* ˚ ˚✰˚ ˛★* 。 ღ˛° 。* °♥ ˚ • ★ *˚ .ღ 。.................
/▌*˛˚ღ •˚HAPPY FRIENDSHIP DAY MY FRENDS ˚ ✰* ★
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!!मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये!!

फ्रेंडशिप डे स्पेशल पोस्ट पर आपका स्वागत है!
मित्रता एक वरदान

शुभकामनायें

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 08/08/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Ehsaas ने कहा…

gambheer soch....gambheer shabd...



humara bhi hausla badhaaye:
http://teri-galatfahmi.blogspot.com/

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

इस चिंतनपरक,सारगर्भित प्रस्तुति के लिए आभार आपका

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

सृजन की परिभाषा विस्तार से आपने प्रस्तुति की। बेहतरीन पोस्ट।

बेनामी ने कहा…

सृजन के सन्दर्भ में दी गयी आपकी यह परिभाषा कि "जिस रचनाकार की संवेदना जितनी गहरी होगी उसका रचना कर्म उतना ही मार्मिक और समाजोपयोगी होगा " एकदम विचार करने योग्य है . आपने बहुत गंभीरता से सृजन के हर एक पक्ष पर विचार किया है .

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये सच है की पहला सर्जन परमात्मा ने किया ... फिर उसने दिमाग का सर्जन किया जिससे और नए सर्जन हो सकें ... और ये एक ऐसी प्रक्रिया है जो सतत है ...