13 अक्तूबर 2010

रावण को क्योँ जलाते हैं, जब हम राम नहीं हो पाते हैं ..!

राम और रावण इतिहास के दो प्रसिद्ध व्यक्तित्व हुए हैं। दोनों की प्रसिद्धि  एक दूसरे के समकक्ष है।
एक दृष्टि से देखा जाये तो दोनों का व्यक्तित्व विराट है। पर दोनों की प्रसिधी के क्षेत्र अलग-अलग है। एक को मर्यादा पुरशोतम कहा जाता है तो,दूसरे को मर्यादा तोड़ने के कारण याद किया जाता है। रावण कभी राम की बात नहीं मानता, पर राम फिर भी उससे आग्रह करते हैं। राम की सीता का हरण करने के पश्चात भी राम उसे समझाते हैं, परन्तु वह अपने हठ पर अड़ा रहता है अन्ततः उसका क्या हश्र होता है इस बात को आप भली भांति जानते हैं. राम और रावण को हम किस रूप में लेते हैं यह सब हमारी सोच पर निर्भर करता है। पर इतना जरुर है राम और रावण दोनों हमें जिन्दगी के वास्तविक सत्यों के काफी करीब ले जाते हैं और दोनों हमें आत्मविश्लेषण का मौका देते हैं ,अनुसरण का मौका देते हैं। हम किसका अनुसरण करते हैं यह हम पर निर्भर करता है। मैं जहाँ तक सोचता हूँ, एक समय में व्यक्ति एक का ही अनुसरण कर सकता है। दो का नहीं, व्यक्ति का आदर्श एक होता है दो नहीं। हमारे आदर्श कौन हैं ? यह हमें पता होगा ! एक पल के लिए हम रावण के व्यक्तित्व का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि, रावण लंका का राजा था। वह वेदों का प्रकांड विद्वान था। रावण भक्त भी था, और बहुत पराक्रमी योद्धा भी आखिर इतनी विशेषताएं होने के बाबजूद भी रावण को समाज में नफरत कि दृष्टि से क्योँ देखा जाता है? कोई न कोई कारण तो जरुर होगा। अपने एक निबंध मैं कुबेरनाथ राय ने रावण को अधर्म का नहीं बल्कि प्रति धर्म का प्रतीक कहा है । 

रावणअपने आप में एक प्रतीक है। जो हमें समझाता है कि ज्ञान, विद्या, पराक्रम, भक्ति आदि चाहे व्यक्ति के पास किसी भी हद तक क्योँ न हो अगर अहंकार हम में विद्यमान है तो हम शिखर पर होते हुए भी नीची सोच के कारण ऊंचाई को नहीं छु पाते, और हम इतने गिर जाते हैं कि हमारा नाम ही किसी को कष्ट देने का कारण बन जाता है। अहंकार के कारण व्यक्ति कि सकारात्मक सोच पर पर्दा गिर जाता है। और मद के नशे में चूर व्यक्ति फिर जो भी कर्म करता है उससे उसका कल्याण तो होना तो दूर , वह कर्म दूसरों के लिए भी सही नहीं होता। और फिर उसे रावण कि तरह हर साल जलना पड़ता है। जब हमारे मन में अहंकार आता है तो फिर हम भाषा के आधार पर, जाति के आधार पर, मजहब के नाम पर, उंच नीच के आधार पर, सरहदों के आधार पर, न जाने कितने भ्रम हमें अँधा कर देते हैं और हम मानवता के लिए कष्ट का कारण बन जाते हैं।
वर्तमान संदर्भों को अगर हम देखें तो स्तिथि और भी भयानक प्रतीत होती है। आज हर मोड़ पर रावण के दर्शन हो जाते हैं, किसी शायर ने क्या खूब लिखा है :-
राम वालों को इस्लाम से बू आती है ,
अहले इस्लाम को राम से बू आती है ।
क्या कहें दुनियां के हालात हैं इस कदर ,
यहाँ इंसान को इंसान से बू आती है ।
आज के परिप्रेक्ष्य में में देखा जाये तो हम बहार से राम बनने कि कोशिश करते हैं लेकिन हमारे भीतर रावण हमेशा विद्यमान रहता है। और वह इतना हाबी हो जाता है कि हम कोई भी कर्म करें, उसमें उसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। ऐसी हालात हम कहाँ सही निर्णय ले पाएंगे, और जब सही निर्णय नहीं होंगे तो वर्तमान समाज कि तस्वीर कैसे बदलेगी।

आज एक और बात भी देखी जाती है कि इन्सान का मानसिक स्तर काफी गिर चुका है। नैतिकता  तो उसके लिए कल्पना करने के सामान है । भ्रष्टाचार तो उसकी जिन्दगी का लक्ष्य बन चुका है । आये दिन चोरी, डकैती, बलात्कार, लूटपाट आदि यह सब क्या रावणत्व के कारण नहीं है । तो फिर हम किस रावण को जलाते हैं, और फिर किस राम कि हम पूजा करते हैं । किस लिए हम दशहरा मानते हैं, और क्यों हमारे घरों में दिवाली होती है, कभी इस बात पर विचार किया? नहीं आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई । अगर ख्याल आया भी तो हमने गौर नहीं किया .... और जीते रहे जिन्दगी, बस यूँ ही खत्म हो गया सांसों का सिलसिला .... ! राम हमारे आदर्श कभी नहीं बन सके इस बात का अफ़सोस जताते हुए हम संसार से विदा हो गए ।

9 टिप्‍पणियां:

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ज्ञान ,विद्या ,पराक्रम,भक्ति आदि चाहे व्यक्ति के पास किसी भी हद तक क्योँ न हो अगर अहंकार हम में विद्यमान है तो हम शिखर पर होते हुए भी नीची सोच के कारण ऊंचाई को नहीं छु पाते ....

सही कहा .....अहंकार मनुष्य को ले डूबता है .....

Patali-The-Village ने कहा…

रावण चरों वेदों का ज्ञाता था| सिर्फ अहंकार से ही उसका पतन हुआ|

मनोज कुमार ने कहा…

ठीक ही कहा भाई चोरी ,डकेती, बलात्कार , लूटपाट, यह सब क्या रावणत्व के कारन नहीं है ।
अब तो दरख़्त पर कोई पत्ता हरा नहीं
दिल तज़गी-फरोश का फिर भी भरा नहीं।

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोsस्तु ते॥
महाअष्टमी के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

स्वरोदय महिमा, “मनोज” पर!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

Bahut achhe vicharon ka prastuti kiya aapne.... itne sunder vichar sajha karne ke liye aabhar....

Parul ने कहा…

anjane hi..shirshak hi bahut kuch keh gaya..!yahi to vidambna hai!!

pragya ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आपने...हम सब अपने आप में कहीं न कहीं अहंकारी हो जाते हैं और कई बार तो इस अहंकार में रावण को जलाते हैं कि देखो हम वह कर रहे हैं जो कभी राम ने किया था, पर कभी अपने भीतर झाँककर यह नहीं देखते कि क्या वास्तव में हम वह कर रहे हैं जो राम ने किया था? क्या राम के किसी एक आदर्श को भी हमने अपने जीवन में अपनी प्रेरणा का स्त्रोत बनाया है?

pragya ने कहा…

शीर्षक बहुत ही प्रभावशाली है...

अभिन्न ने कहा…

रावण को बुराइयों का प्रतीक मान कर हर वर्ष उसे जला कर उसे सजा देने का जो रिवाज हमारे समाज में है मै अवश्य उसकी प्रशंशा करता यदि ये लोग मौहम्मद गौरी,महमूद गजनबी,तैमूर लंग,औरंगजेब,general डायर,व् उन जैसे अश्न्ख्य मानवता के दुश्मनों को ऐसे हर वर्ष गली चोराहों पर जलाते,पता नहीं किस लकीर को पिटे जा रहे है ---एक तरफ तो रावन को वेदों का ज्ञाता batate hai vah पराक्रमी था --मगर अहंकारी भी था ....क्या पूरी मानव सभ्यता में रावण ही एक मात्र अहंकारी था? क्या सीता माता के साथ रावण के अतिरिक्त किसी ओर ने अन्याय नहीं किया था ---खुद उसके पति राम जो बाद में राजा राम हो जाता है जनता का ख्याल करते हुए उसे गृह त्याग,अग्नि परीक्षा जैसे अमानवीय व्यवहार से नहीं निकलना पड़ता है....अहंकार तो राम में भी था ओर अच्छाइयां तो रावण में भी थी / जब किसी एतिहासिक या काल्पनिक, पौराणिक या साहित्यिक कथा के पात्रों के माध्यम से हम प्रतीक रूपों में मानवता के लिए आदर्श खोजते हैं तो फिर भेदभाव नहीं करना चाहिए चाहेवह रावण हो ya इन्द्र/ विश्लेष्ण न्यायिक आधार पर ओर निरपेक्षता पूर्ण होना चाहिए ...विवेक पर आधारित होनी चाहिए सदियों से चली आ रही है इस लिए ही नहीं मान लेना चाहिए ...परम्पराए ओर रिवाज़ बदलने चाहिए अगर हम में हिम्मत है उसे बदलने की ---राम या रावण का विश्लेष्ण करने से पूर्व सीता के साथ न्याय भी करना जरुरी है धर्म या अधर्म की परिभाषा गड़ना इतना जरुरी नहीं .

LAXMI NARAYAN LAHARE ने कहा…

भैया जी सप्रेम अभिवादन ..
आपका यह लेख नव भारत - सुरुचि पर प्रकाशित किया गया है ...आप का लेख प्रशंसनीय है ...
सादर
लक्ष्मी नारायण लहरे
युवा साहित्यकार ,पत्रकार
कोसीर ,छत्तीसगढ़