12 अक्तूबर 2010

मेरा जन्मदिन...मेरे विचार


आज सुबह जब मैं जागा तो मेरे फोन पर लगभग दस सन्देश थे जिनमें मेरे जन्मदिन पर मुझे शुभकामनायें संप्रेषित की गयी थी । मैं बड़ा खुश था ,मुझे लगा मुझे चाहने वाले कितने अछे हैं हर सन्देश को पढने के बाद मेरा मन काफी प्रफुलित हुआ तथा मैंने मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया । कुछ पल सोचता रहा कि ईश्वर ने कितने सुंदर ढंग से इस सृष्टि का निर्माण किया है और हमें यह मानव तन मिला है । बस ऐसे ही विचारों का सिलसिला आगे बढ़ता गया और मैंने आत्मविश्लेषण करना शुरू कर दिया ।

मेरे सामने काफी प्रश्न उपस्थित हुए मैने अपने आप को एक असमंजस कि स्तिथि में पाया , इधर मेरे फोन कि घंटी बार बार बज रही थी और उधर मेरा मन मुझसे बार बार प्रश्न कर रहा था । खेर यह सिलसिला काफी देर चलता रहा , मैं ऐसी स्थिति में भी सबकी शुभकामनाओं को सहर्ष स्वीकार करता रहा ।

थोड़ी देर के बाद शुभकामनाओं का सिलसिला ख़त्म हुआ , और अगले कार्य की योजना बनने लगी । बस फिर क्या था । एक के बाद एक प्रश्न ?........? कुल मिलाकर मुझे अपनी जिन्दगी का हर लम्हा याद आया और फिर मैंने खुद से पूछा..आखिर इस जिन्दगी का मकसद क्या है ? क्या तुम जो कुछ कर रहे हो यह इस जिन्दगी का मकसद है ? फिर कहीं याद आया " मानुष जन्म दुर्लभ है होत न बारम्बार " जो दुर्लभ है जो बड़ी से मुश्किल से मिला है आखिर उसका लक्ष्य क्या हो सकता है । एक बार अपने वर्तमान परिदृश्य की तरफ झाँका , महसूस किया ,क्या आज जो कुछ संसार में हो रहा है में भी उसका हिस्सा तो नहीं हूँ ? आज के समय के सन्दर्भ में मुझे किसी शायर की पंक्तियाँ याद आ गयी :

आदमी की शक्ल से डर रहा है आदमी
अपनों को लुट कर ,घर भर रहा है आदमी ।
मर रहा है आदमी ,और मार रहा है आदमी
समझ में नहीं आता , क्या कर रहा है आदमी ।

ऐसी हालत में मुझे कुछ नहीं सुझा , बस एक प्रार्थना के सिवा " ईश्वर मेरे सरे गुनाहों को माफ़ कर दे " ।

इंसान धरती पर आकर क्या किसी को दे जाता है ,और क्या ले जाता है ? हम अपनी जिन्दगी का अधिकांश समय बेकार की बातों में गुजार देते है । कितनी बड़ी है दुनियां हम इसका कभी एहसास ही नहीं कर पाते । जब तक हमें महसूस होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । इसलिए यह निर्णय लिया की जितना हो सके हम मानवीय भावनाएं अपने हृदय में बसाकर मानवता कर कल्याण के लिए कार्य कर पायें । जितना हो सके हम इस धरती पर शांति का वातावरण कायम करने में सहायक बन पायें । अपने पराये का भेद समाप्त कर पूरी मानव जाति में इस ईश्वर के दर्शन कर सकें । तभी इस मानव जीवन की सार्थकता होगी ।

9 टिप्‍पणियां:

  1. जन्म दिन का मजा लीजिए..अच्छा अच्छा सोचिए..बुरा-बुरा भूल जाइए। अच्छा आप एक काम कीजिए..दो मिनट के लिए अपनी पलकें बंद कर जीवन में घटी अच्छी-अच्छी बातों का याद कीजिए..सिर्फ अच्छी-अच्छी बातों को..आपको सकून मिलेगा..और आप पाएंगे कि जिंदगी बहुत खूबसूरत है।
    ..जन्म दिन की ढेरों बधाई।

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  2. जन्म दिन की अशेष शुभकामनाएं।
    (word verification हटा दीजिए।)

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  3. जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई ...

    मेरे ब्लॉग पर आने का शुक्रिया


    कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .

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  4. आपको जन्म दिन की बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनायें....आपके पोस्टों को पढ़कर अच्छा लगा और यह भी महसूस हुआ की आपकी सोच सही और स्पष्टता लिए हुए है ....
    टिप्पणियों से शब्द पुष्टिकरण हटा दें तो अच्छा रहेगा ...

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  5. Aap sabhi ka aabhar ,jo aapne itna sneh diya mujh Jaise Nachij ko
    Aage bhi aapse sneh or margadarshan ki aasha karta hun ........!

    (word verification ko hata diya hai)
    Asuvidha ke liye khed hai

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    साहित्यकार-6
    सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  7. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  8. इंसान धरती पर आकर क्या किसी को दे जाता है ,और क्या ले जाता है ? हम अपनी जिन्दगी का अधिकांश समय बेकार की बातों में गुजार देते है । कितनी बड़ी है दुनियां हम इसका कभी एहसास ही नहीं कर पाते । जब तक हमें महसूस होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है
    hi Ramji.......bilkul sahee kaha aapne....jo anubhav log umra gujar jaane par nahee paate.wah god ne aapko gift roop me de diya.tabhi to aap itani jinadilee se jeete hai...aap sabke lie preranasrot hai.thanks.

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जब भी आप आओ , मुझे सुझाब जरुर दो.
कुछ कह कर बात ऐसी,मुझे ख्वाब जरुर दो.
ताकि मैं आगे बढ सकूँ........केवल राम.