27 दिसंबर 2013

न काशी न काबा, बस बाबा ही बाबा ... 4

आजकल जितने भी ऐसे छुटभये तैयार हुए हैं उनके कई तरह के नकारात्मक प्रभाव हमारे समाज और देश पर पड़ रहे हैं और जिस धर्म की आड़ में वह यह सब कुछ कर रहे हैं वह वास्तव में धर्म को स्थापित करने जैसा नहीं है, बल्कि भोले-भाले लोगों को अधर्म की तरफ ले जाने वाला मार्ग है. गतांक से आगे ......

हम किसी से सहज शब्दों में पूछे कि धर्म क्या है ? तो संभवतः हमें संतुष्ट करने वाला उत्तर नहीं मिल पायेगा.
कोई कहेगा जिसमें यह सब निशानियाँ होंगी वह धर्म है, कोई कहेगा ऐसे मतों से भरा हुआ जो है वह धर्म है. धर्म के सन्दर्भ में हर किसी के अपने विचार हैं, लेकिन वह विचार स्पष्ट नहीं है. कोई कहता है हिन्दू, इस्लाम, इसाई, बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि धर्म हैं. लेकिन जब विचार करते हैं तो पाते हैं कि जितने भी नाम लिए जा रहे हैं वह वास्तविकता में धर्म नहीं हैं . हम जो नाम ले रहे हैं हमें इन नामों और इनके इतिहास पर चिंतन करने की जरुरत है, क्योँकि जब इनका उद्भव हुआ था तब यह सब नाम अध्यात्म के नाम से जाने जाते थे. सिक्खजिसे हम धर्म का नाम दे रहे हैं उस पर ही हम विचार करें तो पायेंगे कि जो इस शब्द का वास्तविक अर्थ था वह कहीं खो गया है और एक औपचारिक अर्थ हमारे सामने रह गया. कालान्तर में इसी से कई और विचारधारों का जन्म हुआ और आज हर कोई अपनी दुकान चला रहा है . ऐसी स्थिति विश्व के बाकी विचारों के साथ भी है और आज भी यही हो रहा है.

आज की स्थिति बहुत गंभीर है, धर्म और अध्यात्म बाजार भाव के आधार पर चल रहे हैं, उनके माध्यम से राजनीति की जा रही है, खरीद और फरोख्त के कामों को अंजाम दिया जा रहा है, भोले-भाले लोगों को ईश्वर के नाम का डर दिखाकर उनका सब कुछ लूटा जा रहा है, और ऐसी स्थिति में धर्म का प्रचार करने वालों की फौज खड़ी हो गयी है. हर कोई अपनी दुकान चला रहा है और हर कोई ग्राहक बनाने के चक्कर में जगह-जगह नुमाइश लगा रहा है. ऐसे में कहाँ हम धर्म की स्थापना कर पायेंगे और कहाँ हम एक अंधकार में भटक रहे मनुष्य को सही राह दिखा पायेंगे, यह सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है? ओ माय गॉड फिल्म में एक संवाद है जहाँ धर्म है वहां सत्य नहीं, और जहाँ सत्य है वहां धर्म की जरुरत नहीं”. यह संवाद सत्य और धर्म के बारे में सारा निचोड़ हमारे सामने रखता है. जहाँ सत्य है ...और सत्य सिर्फ ईश्वर को कहा गया है, बाकी जिसे हम सत्य कहते हैं उसके पैमाने तो अलग-अलग जगह पर बदलते रहते हैं, लेकिन ईश्वर एक ऐसा सत्य है जिसका पैमाना कहीं नहीं बदलता, जो आज है वह कल भी होगा और हजारों वर्षों बाद भी वैसा ही रहेगा. 

अगर हम इस सच को समझ जाते हैं तो फिर हमें कुछ करने की जरुरत ही कहाँ रह जाती है, और ऐसा नहीं है कि हमारे सामने इस बात के प्रमाण नहीं हैं हमारे सामने ऐसे अनेक प्रमाण हैं, हमारे रब्बी पुरुषों की वाणियां इस बात की गवाही हमारे सामने हमेशा देती रहती हैं, और दे रही हैं , लेकिन हम हैं कि किसी जाल में हमेशा फंस जाते हैं और इस कारण में ऐसे अवसरवादी लोगों के स्वार्थ का शिकार बन जाते हैं, जिन्हें हम बड़े अदब से बाबा कहते हैं, जिन्हें हम गुरु के सामान समझते हैं. लेकिन वास्तविकता में न तो वह गुरु हैं और न ही वह ऐसी कोई योग्यता रखते हैं. तो फिर हम क्योँ ऐसे लोगों की शरण में हैं, जिनका न तो धर्म से कोई सम्बन्ध हैं और न ही जिन्हें अध्यात्म की कोई समझ है, न ही जिन्हें इस मार्ग का कोई अनुभव है. जितने भी आज टेलीविजन पर प्रवचन करने आते हैं उनमें से तो आधे से ज्यादा सिर्फ भाषण वाजी के अलावा और कुछ नहीं करते, उनके पास उसके अलावा कुछ है भी नहीं, सिर्फ राम और कृष्ण के अलावा उन्हें कुछ आता भी नहीं और इनके बारे में भी जो जानकारी इन प्रवचन कर्ताओं के पास है वह भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं. फिर ऐसे में एक प्रश्न सहज ही उठता है कि हम जा कहाँ रहे हैं और हमारी मंजिल कहाँ है ???? यह सब तो हम सभी को विचार करना होगा न.....!!!! 

4 टिप्‍पणियां:

कालीपद प्रसाद ने कहा…

ईश्वर को बाबा लोगों ने बाजारी वस्तु बना दिया है ,पैसे दो भगवान को खरीद कर घर ले जाओ |दर असल यही बाबा लोग सबसे बड़े नास्तिक हैं |वे मानते है कि भगवन नाम के कोई व्यक्ति नहीं है |इसीलिए इनके नाम से उल्टा सीधा जो भी काम करो ,कोई फरक नहीं पड़ता | लोगो को बेवकूफ़ बनाओ और पैसा बनाओ |जनता धर्म के नाम से ख़ुशी ख़ुशी बेवकूफ़ बनते हैं |
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राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (28-12-2013) "जिन पे असर नहीं होता" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1475 पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

POOJA... ने कहा…

ये विषय वाकई चर्चा और चिंतन का विषय है, परन्तु निष्कर्ष किसी अकेले पर नहीं छोड़ा जा सकता... और मान लीजिये की किसी एक ने कोई नतीजा सुना भी दिया तो जरूरी नहीं की बाकी उसे मान ही लेंगे... और यही वजह है की इतने धर्म और इतनी बातें हैं...

Anurag Sharma ने कहा…

बाबागिरी एक धंधा बनकर रह गया है और हर किस्म के लोग आज बाबा बनकर भोले-भले धर्मभीरु लोगों को ठगने में लगे हैं। ठगे हुए भोले लोगों का दोष इतना ही है की वे आशा की किरण ढूंढ रहे हैं और जहां भी ज़रा सी उम्मीद जागती है, वहीं द्के लिए एड़ लगाते हैं।