05 मई 2012

'बाबा' मुझे 'निर्मल' कर दो .. 2

ज के सन्दर्भ में अगर हम देखें तो लोगों पर विज्ञापन बहुत हावी हो गया है . कुछ लोगों के लिए यह व्यक्तिगत प्रचार का साधन है तो कुछ के लिए यह अपनी वस्तुओं को आम लोगों तक पहुँचाने का  . यहाँ तक तो ठीक है , लेकिन जब जीवन सन्दर्भों को विज्ञापन के माध्यम से भुनाने की कोशिश की जाती है तो यह बहुत अटपटा लगता है और लोगों को देखिये जो ऐसी चीजों/ बातों / विचारों को प्रश्रय देते हैं और बाकी के लोगों के लिए भी ऐसा ही मार्ग प्रशस्त करते हैं , और यहाँ लोग भी ऐसे हैं जो बिना जांचे परखे किसी के मत/बात पर विश्वास कर लेते हैं , और फिर सब कुछ खोने के बाद खुद को ही कोसते हैं . लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है . आज के दौर में अध्यात्म की जहाँ तक बात है यह भी विज्ञापन से अछुता नहीं . आज विभिन्न तरह के ताबीज , यंत्र और ना जाने क्या -क्या विज्ञापन के माध्यम से हमें देखने को मिलता है . एक तरफ तो यह चीजें और दूसरी तरफ छदम गुरुओं की चर्चा , धर्म और अध्यात्म पर उनके विचार और उपदेश और उन उपदेशों को सुनकर झूमते भक्त सब सपने की तरह गुजरता है आँखों के सामने से और मैं सोचता हूँ अपने उज्ज्वल अतीत, अंधकारमय भविष्य को ?

से में कई प्रश्न मेरे सामने यकायक खड़े हो जाते हैं , मैं भी किसी गुरु का नाम लेता हूँ और कहता हूँ " बाबा मुझे निर्मल कर दो , और वहां से कोई उत्तर नहीं आता सिवा इसके कि अभी कृपा प्राप्त होने में वक़्त लगेगा या फिर उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए मुझे उनसे व्यापार करना होगा . मुझे उनके द्वारा बताई गयी धनराशि किसी माध्यम से उन तक पहुंचानी होगी और तब जाकर कहीं कृपा प्राप्त होगी . यह तो बात हुई पैसा फैंको तमाशा देखो , मैं भी किसी स्थिति से निकलना चाहता हूँ इसलिए मुझे उस धनराशि को उनके श्रीचरणों में समर्पित करने से कोई गुरेज नहीं , और बाबा हैं कि उस धनराशि से उनको कोई ख़ास संतुष्टि नहीं उनकी लालसा और बढ़ रही है और मेरा जीवन बेहाल होता है जा रहा है , एक बार फंस चूका हूँ और बार - बार वही प्रक्रिया दोहराई जा रही है , बाबा की कृपा को प्राप्त करने के लिए यही कुछ करना पड़ रहा है और मेरी चिंता कम होने की बजाय बढ़ रही है ओर मैं ऐसी स्थिति में किसी से कुछ कहने की हालत में नहीं हूँअब क्या करूँ ? ? ऐसी हालत मैंने कि लोगों की देखी है , और निर्मल बाबा प्रकरण में ऐसे कई लोग सामने आये . निश्चित रूप से ऐसे कई उदहारण हमारे सामने हैं जिसमें व्यक्ति को इन छदम गुरुओं द्वारा लूटा जाता रहा है और हम हैं कि कृपा, आशीर्वाद आदि के नाम पर सब लुटाये जाते रहे हैं . हद तो तब होती है जब शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग भी इनके चुंगल में फंस जाता है .  
विज्ञापन के इस दौर में मैंने एक बात बहुत करीब से महसूस की है , वह यह कि इस दौड़ में वह सब शामिल हैं जो खुद को भुनाना चाहते हैं . इनका एक नया तरीका है , यह सब अपना विज्ञापन करते वक़्त किसी व्यक्ति का मत जरुर शामिल करते हैं जिसमें इनके द्वारा उस व्यक्ति को पहुंचे लाभ की चर्चा होती है . बस फिर क्या है धीरे - धीरे इनका बाजार जमना शुरू हो जाता है , फिर एक समय ऐसा आता है जब यह अपना अर्थशास्त्र खुद तय करते हैं . मांग अधिक और आपूर्ति कम ऐसी हालत में एक तरफ लोगों की भीड़ है और कोई ऐसा नहीं जिसकी मनोकामना इनके दर पर जाकर पूरी न हुई हो . समाज का बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा व्यक्ति भी इनकी शरण में है और इनकी कृपा प्राप्त करके सबके चेहरे पर आलौकिक उर्जा का संचार हो रहा है . बस यही से खेल शुरू होता है , जो पकड़ा गया वह चोर है और जो नहीं पकड़ा गया वह अपना धंधा अनवरत चलाये रखता है . जब सब तरफ भ्रष्टाचार व्याप्त है तो फिर हर जगह यही होना है और निश्चित रूप से हो भी रहा है . निर्मल बाबा हमारे सामने एक उदहारण मात्र हैं , और उनका यह सच भी सामने नहीं आता अगर वह कुछ चैनलों के साथ अपना करार कर लेते . लेकिन विडंबना यह है कि बाबा पर तो कार्यवाही हुई लेकिन उन चैनलों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई जिन्होंने बाबा के विज्ञापन को दिखाया या फिर उनके शो आयोजित किये . मुझे लगता है कि इस दिशा में भी सोचा जाना चाहिए , अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से जनता का भला होगा .  

निर्मल बाबा प्रकरण से पहले भी ऐसे कई प्रकरण हो चुके हैं , लेकिन फिर भी हम हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं , आज जितनी भी समस्याएं हमारे सामने हैं उनमें आम जनता की भागीदारी भी कम नहीं है . लेकिन हर बार हम उसी को निशाना बनाते हैं जो इस जाल में फंस जाता है , और हमारा मीडिया तो ऐसा है जब कोई किसी एक के पक्ष में बोलता है तो सभी वही राग अलापते हैं और अगर विपक्ष में बोलता है तो तब भी यही हाल होता है . मैं कई वर्षों से देख रहा हूँ कि हमारे देश में खोजी और विश्लेष्णात्मक पत्रकारिता लगभग समाप्त हो गयी है . सिर्फ सूचनात्मक पत्रकारिता ने हमारे देश और समाज को भीतर से खोखला कर दिया है . ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का हर स्तम्भ ढहता जा रहा है . हम किस पर विश्वास करें , कैसा विश्वास करें . अजीब सी स्थिति है एक तरफ हम विकास और सूचना तकनीक की बात करते हैं वहीँ दूसरी और हम अंधविश्वासों में फंसते जा रहे हैं . व्यक्तिवादी राजनीति और देश में पूंजीपतियों की बढती साख ने आज देश को गुलामी के कगार पर ला दिया है . ऐसी स्थिति में हर किसी का यही कहना है " बाबा मुझे निर्मल कर दो " अब जब बाबा ही नार्मल नहीं हैं तो फिर किस तरफ देखें . हमारा देश विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं का देश है , और यही समन्वय का भाव हमें पूरे विश्व को एक घर मानने की समझ देता है .  लेकिन जब इस दिशा से हम भटक जाएँ तो क्या आशा की जा सकती है ?

30 टिप्‍पणियां:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

सोच विचार कर |
बड़ी खूबसूरती से किया गया विश्लेषण |
बड़ा प्रभावी |
आभार |

Rakesh Kumar ने कहा…

मैं भी किसी गुरु का नाम लेता हूँ और कहता हूँ " बाबा मुझे निर्मल कर दो , और वहां से कोई उत्तर नहीं आता सिवा इसके कि अभी कृपा प्राप्त होने में वक़्त लगेगा या फिर उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए मुझे उनसे व्यापार करना होगा . मुझे उनके द्वारा बताई गयी धनराशि किसी माध्यम से उन तक पहुंचानी होगी और तब जाकर कहीं कृपा प्राप्त होगी . यह तो बात हुई पैसा फैंको तमाशा देखो ,

बहुत अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है आपने,केवल जी. सार्थक लेखन के लिए आभार.

dheerendra ने कहा…

न जाने कब तक ये बाबा और चैनल वाले जनता
की भावनाओं का शोषण करते रहेगें,..

बहुत सुंदर सार्थक विश्लेषण //

MY RECENT POST ....काव्यान्जलि ....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

MY RECENT POST .....फुहार....: प्रिया तुम चली आना.....

Anupama Tripathi ने कहा…

सार्थक ,सारगर्भित आलेख .....इसी प्रकार जन मानस में जागरूकता लानी चाहिए ....पढ़ा लिखा होना काफी नहीं है ....पढ़ा लिखा बनना भी चाहिए ....!!
सुंदर आलेख .शुभकामनायें ...!!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सटीक विवेचन ...जनसाधारण को सजग, सचेत होना होगा ....अंधभक्ति की धारणा से बचने की आवश्यकता है.....

संध्या शर्मा ने कहा…

बिलकुल सही लिखा है आपने मीडिया भी उतना ही दोषी है जितने ये ढोंगी बाबा. जनता इनकी बढ़ा-चढ़ा कर दिखाई सुनाई बातों में फंस जाती है, सजा इन्हें भी मिलनी चाहिए, लेकिन आज जरुरत है जनता को स्वयं जागरूक और सचेत होने की... सार्थक आलेख

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

मीडिया से जुडा हूं, जानता हूं कि गलत हो रहा है, उपयुक्त मंचों पर अपनी बात मजबूती से रखता भी हूं,...
पर आप जानते हैं कि विज्ञापन के नाम पर सबकुछ चलता रहता है।
सार्थक लेख

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज जितनी भी समस्याएं हमारे सामने हैं उनमें आम जनता की भागीदारी भी कम नहीं है . लेकिन हर बार हम उसी को निशाना बनाते हैं जो इस जाल में फंस जाता है ,

सटीक कहा है .... जिनको खुद पर भरोसा नहीं होता वो ही फँसते हैं बाबाओं के जाल में .... विचारणीय

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अच्छा विश्लेषण है ... दरअसल आज हर कोई सब कुछ जल्दी बिना मेहनत के पाना चाहता है तभी ऐसे बाअर चल निकले हैं ...

वन्दना ने कहा…

विचारणीय आलेख ………सटीक विश्लेषण

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रचार प्रसार में व्यर्थ जीवन का सत्य..

JHAROKHA ने कहा…

solah aane sahi baat likhi hai aapne
bahut hi achhi lagi sachchai se bharpur prastuti
ponam

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

भोली भाली जनता कहने का मन करता है । लेकिन अफ़सोस जनता का स्तर उससे ज्यादा निम्न नज़र आता है ।
जनता की इसी लो आई क्यू का फायदा उठा रहे हैं ये विलक्षण बुद्धि बाबा लोग ।
आज तक पर आज एक और बाबा के चमत्कार देखे ।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

बढ़िया विश्लेषण

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

उत्कृष्ट रचना के लिए आभार -- सूचनार्थ: ब्लॉग4वार्ता के पाठकों के लिए खुशखबरी है कि वार्ता का प्रकाशन नित्य प्रिंट मीडिया में भी किया जा रहा है, जिससे चिट्ठाकारों को अधिक पाठक उपलब्ध हो सकें। 

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत अच्छा लगा पढकर ! मेरे नए पोस्ट पर आपकी प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

रचना दीक्षित ने कहा…

सच है मीडिया भी कृपा उन्ही पर करता है जो मीडिया पर कृपा करने को तैयार हैं.

lokendra singh rajput ने कहा…

सार्थक चिंता....

mahendra verma ने कहा…

भारत बाबा संस्कृति से गुजर रहा है।
एब्नार्मल भक्त लोग एब्नार्मल बाबाओं के पास आंख मूंदकर झूमते नजर आते हैं।
जागरूक करने वाला आलेख।

Amrita Tanmay ने कहा…

बड़े बाबाओं की बड़ी-बड़ी महिमा से हम वाकिफ होते ही रहते है पर मेरे देखे स्थानीय या पिछड़े जगहों पर ऐसे बाबा जिस तरह से चांदी काट रहे है कि उसका आकलन करना भी मुश्किल है..बस शोषित और शोषक मानसिकता पर दुःख करने के अलावा कोई उपाय नजर नहीं आता है..

कविता रावत ने कहा…

'बाबा' मुझे 'निर्मल' कर दो .. 2"
बहुत बढ़िया मासूम सवाल ...
सार्थक प्रस्तुति

shikha varshney ने कहा…

अच्छा विश्लेषण किया है. गलती किसी एक नहीं बहुतों की है.मिडिया की भी, जनता की भी, अंधविश्वासों की भी और शिक्षा व्यवस्था की भी.
सार्थक लेखन.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

आपका यह आलेख विचार करने का आग्रह करता है.. बढ़िया लेख...

SKT ने कहा…

बहुत ही बढ़िया पोस्ट और उस से भी बढ़िया बोलते, झकझोरते चित्र! मज़ा आ गया।

Santosh Kumar ने कहा…

बहुत सुन्दर विश्लेषण .. जानकारी परक आलेख.

आभार.

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

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बाबा मुझे निर्मल कर दो शृंखला की दोनों कड़ियों के लिए आभार और साधुवाद स्वीकार करें केवल राम जी !

मुझे हैरत होती है देख कर कि जगह जगह हज़ारों-लाखों की संख्या में एक साथ अंधविश्वासी मूर्ख लोग कैसे इकट्ठे हो जाते हैं हमेशा ?

यही जन बल एकजुट हो'कर देश की समस्याओं , घृणित राजनीति , महंगाई , अशिक्षा , आतंकवाद आदि के उन्मूलन के लिए कार्य करे तो चमत्कारिक सुपरिणाम सामने आ सकते हैं …

आप अपना लेखकीय दायित्व निभा रहे हैं … आभार !

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