27 नवंबर 2011

चतुर्वर्ग फल प्राप्ति और वर्तमान मानव जीवन...2

42 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे.... भारतीय जीवन सन्दर्भों को जब हम गहराई से विश्लेशित करते हैं तो हम पाते हैं कि यहाँ जीवन के विषय में बहुत व्यापक और गहन विचार किया गया है. जीवन की सार्थकता को निर्धारित करने के लिए वर्षों से ऋषि मुनियों ने गहन चिन्तन किया और जो भी निष्कर्ष निकला उसे सभी के साथ साँझा किया और भी उसी आधार पर अपनी धारणा समाज के सामने रखी. चिरकाल में उसने सिद्धांत का रूप ले लिया और सिद्धांत में फिर समय और स्थिति के अनुरूप आंशिक परिवर्तन तो हो सकते हैं, लेकिन सिद्धांत पूरी तरह से नहीं बदल सकता. चतुर्वर्ग फल प्राप्ति के विषय में यह बात सटीक बैठती है. हमारे यहाँ ही नहीं बल्कि विश्व का कोई भी देश ऐसा नहीं जहाँ मानवीय मूल्य निर्धारित ना किये गए होंजीवन का कोई लक्ष्य ना निर्धारित किया गया हो. अब हमें देखना है कि जिस चतुर्वर्ग (धर्मअर्थकाम और मोक्ष) को यहाँ जीवन का साध्य माना गया हैउन चतुर्वर्ग की क्या प्रासंगिकता है.
सबसे पहले आता है धर्मधर्म क्या है? इसका आधार क्या हैधर्म मानव को जीवन जीने की शिक्षा देता है. यब बात स्वीकार्य है. धर्म की परिभाषा को लेकर बहुत समय से चिन्तन किया जाता रहा है. समय और स्थिति के अनुसार जिसे जो सही लगा उसने वह अभिव्यक्त कर दिया. लेकिन फिर भी एक बात तो स्वीकार्य है कि धर्म का मूल भाव व्यक्ति को जीवन जीने की कला सिखाना है. उसे क्या करना हैक्या नहीं? इन सब बातों का विषद विवेचन धार्मिक ग्रंथों में हुआ है. आज जिन्हें हम धर्म कहते हैं वास्तविकता में वह धर्म नहीं वह तो जीवन जीने की पद्धतियाँ हैंवह वास्तविकता में एक विचार है और जब बहुत से लोगों ने उस विचार का अनुसरण करना शुरू कर दिया और वह विचार पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के मार्गदर्शन का कारण बनता रहा तो वह विचारधारा हो गया. विचार एक व्यक्ति का हो सकता है और जब उसी विचार को बहुत से लोगों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी अपनाया जाता है तो वह विचारधारा कहलाती है. यही कुछ जिन्हें आज हम धर्म कहते हैं उनकी स्थिति भी है. जहाँ तक ज्ञात है ‘सनातन धर्म’ को सबसे प्राचीन धर्म कहा जाता है. थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि सनातन धर्म विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है. लेकिन अगर सनातन शब्द को देखें तो सना+तन सना मतलब सटा हुआबिलकुल पासबहुत नजदीकजितना समझ सकते हैं उतनाजितना महसूस कर सकते हैं उतना. यानि जो सना हुआ है जो हमारे सबसे नजदीक हैऔर तन का मतलब शरीर यानि सनातन वह हुआ और शरीर के सबसे नजदीक है और वह है ईश्वर. यानि ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने वाला सनातनी हुआजिसने सनातन को स्वीकार कर लिया जिसने जीवन जीने की इस पद्धति को अपना लियाजो ईश्वर को हाजिर-नाजर कर अपने जीवन को जीना चाहता है. वह सनातनी हुआऔर उसके द्वारा अपनाया जाने वाला धर्म हुआ है सनातनजो सदा रहने वाला हैजो कभी परिवर्तित होने वाला नहीं है. दूसरे शब्दों वही सनातन है. इसलिए सनातन धर्म सबसे पुराना धर्म हुआऔर इसे हमें पुराना नहीं बल्कि पहला धर्म कहना चाहिएदुसरे शब्दों में इस यूँ भी कहा जा सकता है कि जो ईश्वरीय नियमों के अनुकूल जीवन जीता है वह सनातनी हुआ क्योंकि वह ईश्वर को अंग-संग महसूस करते हुए जीवन को जी रहा है. उसके सामने जीवन का कोई भ्रम नहीं. कोई दुविधा नहीं अगर कुछ है तो वह है ईश्वर की सत्ता और यह ईश्वर सत्ता उसे जीवन दर्शन देती है. जीवन को जीने की प्रेरणा देती है.
धर्म का मूल भाव तो यह है इनसान को जीवन जीने की समझ देना. लेकिन आज हमारे सामने ना जाने कितने धर्म हैं, कितने दर्शन हैं. किसी परिप्रेक्ष्य में अगर हम दखें तो यह सही भी लगता है लेकिन जहाँ पर हमारे जहन में संकीर्णताएं पैदा हो जाती हैं तो वहां धर्म-धर्म नहीं रह जाता वह बन्धन बन जाता है, और बन्धनों में जकड़ा हुआ इनसान फिर क्या प्रगति करेगा और क्या सोचेगायह विचारणीय प्रश्न है.
अब बात आती है अर्थ की: अर्थ से अभिप्राय है धनअजीविका-जीवन जीने का साधन. तन के सुख के लिए जिस माध्यम से हम धन अर्जित करते हैं वह है हमारा कर्म. हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही हम पाते भी हैं. अर्थ का प्रयोजन सिर्फ जीवन जीने की सुविधा है. जिस कर्म को करने से हमारे जीने की जरूरतें पूरी हो जाएँ उतने तक ही वह सही है. हमारे देश में यह परिकल्पना की गयी है कि ‘मैं भी भूखा ना रहूँसाधू भी भूखा ना जाये’, बस यहाँ तक ही धन की प्रासंगिकता है. अपने से पहले अपने अतिथि के बारे में सोचना. खुद से पहले किसी दुसरे को तरजीह देना यह अर्थ का उद्देश्य बताया गया है. अर्थ किस तरह अर्जित किया जाए यह भी बहुत विचार हुआ है यहाँ. अर्थ की क्या महता है.कौन-कौन सी चीजें अर्थ के तहत आती हैं और कौन सी नहीं यह सब बखूबी अभिव्यक्त हुआ है. हालाँकि पैस के प्रचलन से पहले यहाँ वस्तु के बदले वस्तु का सिद्धांत प्रचलित था वैसी स्थिति में व्यक्ति की निर्भरता व्यक्ति पर अधिक थी और समाज के ज्यादा एक दुसरे पर आश्रित थे. उस स्थिति में धन नहीं वस्तु मायने रखती थी और वस्तु के बदले वस्तु दी जाती थी तो गुणवता बनी रहती थी.
लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य को देखें तो सब कुछ उल्टा -पुल्टा नजर आता है. आज तो स्थिति यह हो गयी है कि हमारे पास धन आये चाहे हमें उसके लिए किसी भी हद तक गिरना पड़े. हमें अपनी अस्मिता से समझौता करना पड़ेऐसा परिद्रश्य आज हमारे सामने है. जहाँ तक व्यक्ति को धन की जरुरत जीवन जीने के लिए थी लेकिन आज वह अपनी लालसाओं की पूर्ति के लिए धन का उपयोग कर रहा है और इस बात को भूल गया है कि ‘तृष्णा ना जीर्णःवयमेव जीर्णः’ शेष अगले अंक में....!!! 

22 नवंबर 2011

मृत्यु से पहले

55 टिप्‍पणियां:
कुछ आवश्यक कारणों से  " चतुर्वर्ग फल प्राप्ति और वर्तमान मानव जीवन " वाली  इस पोस्ट का अगला भाग पोस्ट नहीं कर सका हूँ ....आप सबसे क्षमा याचना सहित यह कविता पोस्ट कर रहा हूँ ......!


मनुष्य जो मुक्ति की,
सुख,शांति की चाह रखता है
उसे मौत से डर लगता है?
मन और बुद्धि
आत्मा से अलग नहीं...!
योग्यताएं है आत्मा की
और इस देह का भान
अर्थात देहाभिमान...!

काम, क्रोध,
लोभ, मोह, अहंकार
विकार हैं इस देह के
तो जब तक हम
स्वयं को
देह की बजाय
आत्मा नहीं मानते
छूट नहीं सकते
ये विकार ...!

तो त्याग कर इन विकारों को
और तोड़कर
इस देहाभिमान को
जी लो कुछ क्षण
मृत्यु से पहले........!                                                  

07 नवंबर 2011

चतुर्वर्ग फल प्राप्ति और वर्तमान मानव जीवन...1

33 टिप्‍पणियां:
जीवन की नियति और परिणति क्या है,  इस बात से सभी भली भांति अवगत हैं. लेकिन फिर भी हम सब कुछ जानते हुए अनजान बने रहते हैं. सब कुछ हमारे सामने घटित होता है.  फिर भी हम मूकदर्शक की भूमिका निभाते हैं. हमारे सामने ना जाने कितने ऐसे अवसर आते हैं जब हम जीवन और इसकी महता को नजर अंदाज करते हैंऔर बहुत कम बार ऐसा होता है कि हम जीवन को महता दें और फिर कोई निर्णय लेंजहाँ तक मानव जीवन का सम्बन्ध है, उसे परमात्मा ने चेतना बख्शी है. उसके जीवन का लक्ष्य निर्धारित किया है. लेकिन इनसान है कि वह सबसे पहले तो भौतिकता में रमना चाहते हैं. खूब सारा यश अर्जित करना चाहते हैंधन-दौलतमहल-माड़ियांकुटुम्ब-कबीला न जाने कितने भ्रम हमारे सामने हैं. हालाँकि यह भी हमारे जीवन के साथ गहरा ताल्लुक रखते हैं, और इन सभी का सृजन मानव ने अपने आपको सुखी करने के लिए किया है. लेकिन जब अपने वास्तविक लक्ष्य को भुला दिया जाता है और सब कुछ अर्जित किया जाता है तो फिर क्या उसे हम समझदारी कहेंगे?
किसी से पूछो कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या हैआप जीवन में क्या हासिल करना चाहते हैंकभी आपने यह सोचा कि आपको यह जीवन क्योँ मिला हैतो हर व्यक्ति का जबाब अलग-अलग होता है. ऐसा जबाब सुनकर कभी मन हर्षित हो जाता है तो कभी निराशा हाथ लगती है और फिर सहज ही ध्यान जाता है, हमारे पास उपलब्ध जो धर्म ग्रन्थ है, उनकी तरफ या फिर संतों की जो रचनाएं और उनमें वर्णित जो जीवन दर्शन हमारे पास है उनमें हम जीवन का सार ढूंढते हैं. लेकिन फिर भी हमारी समस्या का समाधान नहीं होता, वह वैसी की वैसी बनी रहती है और हमारा जीवन सफ़र चलता रहता है. ना जाने कब से हम इस विचार को अपने मन में धारण करते आये हैं कि इस जीवन का कुछ तो लक्ष्य है. लेकिन फिर भी हमारा अनजान बना रहना कष्ट का कारण बनता है हमारे लिएजबकि हमारे धर्म ग्रन्थ हमें बार-बार चेतन करते हैं कि ‘मानुष जन्म दुर्लभ हैहोत ना बारम्बार’ जो है ही दुर्लभजो फिर दुबारा नहीं हो सकता जिसकी प्राप्ति सौभाग्य से हुई है हम ऐसे जीवन का लक्ष्य क्या निर्धारित करें? यह यक्ष प्रश्न हमें बैचेन करता रहता है. जिनकी बैचेनी बढ़ जाती है वह तो इसका हल तलाशने की कोशिश करते हैं, और जो इस बैचेनी को महसूस नहीं कर पाते वह गुमनाम जीवन जी कर काल का ग्रास बनते हैं. जन्म तो लिया था आत्मा का मिलन परमात्मा से हो इसके लिएआवागमन के चक्कर से मुक्ति मिले इसके लिएलेकिन हुआ इसके विपरीत ‘ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम’ ना संसार में सही ढंग से जी सके और ना कुछ कर सके. ‘ना माया मिली ना राम’ और बिना कुछ किये पहुंच गए शमशान. जीवन को जब गहराई से सोचा जाता है तो इसकी महता का पता चलता है. लेकिन हमारे पास ऐसा अवसर कम ही बन पाता है जब हम गहराई से इसके बारे में सोचें. लेकिन हमारे धर्म-ग्रन्थऋषि-मुनिहमेशा जीवन की वास्तविकता को समझने की कोशिश करते रहेऔर जो कुछ उन्होंने अनुभूत किया उसे हम सभी के साथ सांझा करने का प्रयत्न करते रहे. आज भी उनके द्वारा रचे गए ग्रन्थ हमारा मार्गदर्शन करते हैं.
हमारे धर्म ग्रंथों में जीवन का लक्ष्य चतुर्वर्ग फल प्राप्ति बताया है और वह चतुर्वर्ग हैं, धर्मअर्थकाममोक्ष. यहाँ तक कि हमारे साहित्य शास्त्रियों ने भी जब साहित्य के प्रयोजन पर विचार किया तो उन्होंने ने भी इस चतुर्वर्ग फल प्राप्ति को साहित्य का प्रयोजन निर्धारित किया. अलंकार सिद्धांत के उदभावक आचार्य भामह का कथन ध्यान देने योग्य है:-
धर्मार्थकाममोक्षाणां वैचक्ष्व्यं कलासु च.
प्रीतिं करोति कीर्ति च साधुकाव्यनिबन्धनम्.
हमारे साहित्य में जीवन सन्दर्भों को बखूबी उद्घाटित किया गया है. पहले तो जीवन को चार भागों में बांटा गया (ब्रह्मचर्यगृहस्थवानप्रस्थ और संन्यासऔर उन्हें जीवन की चार अवस्थाएं भी कहा जाता है. जीवन की चार अवस्थाएं और जीवन के चार पुरुषार्थ (धर्मअर्थकाममोक्ष) कुल मिलाकर जीवन को अपने लक्ष्य की तरफ जन्म से ही अग्रसर रखते हैं. लेकिन मनुष्य फिर भी ध्यान नहीं दे पाता. सब कुछ व्यवस्थित होते हुए भी वह अव्यवस्था का शिकार बना रहता है. सब कुछ स्पष्ट होते हुए भी वह भ्रम में रहता है. इसे हम क्या कहेंमानव की नादानी या फिरमानव की अज्ञानता? कारण कुछ भी हो हमें जीवन सन्दर्भों की तरफ अपन ध्यान लगाना चाहिए. हम जीवन को जितना समझने की कोशिश करेंगे उतनी ही हमें इसकी महता का अहसास होगा. शेष अगले अंक में........!