19 अक्तूबर 2010

वो लहर

सागर के तट पर जाते ही
देखा
पानी की एक लहर
हो रही है, अलग प्रतीत


देखते ही नयनों का निशाना लग गया
मानो मैं उस लहर में खो गया
तलाश मोतियों की थी
पर कला अधूरी थी......।

सीखना चाहा उस लहर से
जो सागर से मोती उभार रही थी
नजर -नजर में, मैं निहार रहा था
अंग -अंग फड़क रहा था

चूम लूँ , छू लूँ , बना लूँ इसे अपना

ताकि सिखा दे मुझे
इस तरह लहरना
लहर कर फिर ठहरना
मोती उभारना
हंस को आकर्षित करना
पर कला अधूरी थी......।
पहुंचा वहां
जहाँ वो लहर थी बड़ी करीब
उसे पाने की सोच रहा था तरकीब
मन में लेकर विश्वास
उसे पाने का किया प्रयास
बढ़ाते ही कदम



उसमें उठने लगा अहम
लगी वो सागर से और उठने
तोड़ देना चाहती थी, सीमा.......।

हटना पड़ा पीछे
इसलिए
कहीं बहा न दे बहाब में
या मैं घिर न जाऊं ,उसके शबाब में
देखता रहा ,रहा सोचता
उसांस भरकर , किनारे पर लोटता
लेटकर घास नोचता
मानो.......
भाव की चढ़ रही हो बलि
कैसे बनाऊ उसे अलि।

6 टिप्‍पणियां:

विवेक सिंह ने कहा…

कविता और चित्रों में काँटे का मुकाबला है । दोनों ही बढ़िया ।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत ही सुंदर शब्दों को समेटे एक प्यारी कविता ...... विवेक जी बात से भी सहमत .... सच में मुकाबला है....

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर शब्दों में पिरोई गई कविता| चित्रण भी बहुत सुन्दर है|

कविता रावत ने कहा…

anuthe andaanj mein sundar chitran ke saath piroee bahut sundar kavita....

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पड़ने को मिली.... गजब का लिखा है

Dr.Sushila Gupta ने कहा…

Aadarneeya Ramji!
ye kavita sirf kavita nahee balki jeevan me uthate hue manobhavon ka gahan chintan hai.so so nice.thanks.