31 जुलाई 2015

वैज्ञानिक उन्नति और मानवीय पहलू...2

गतांक से आगे उपरी तौर पर देखा जाए तो पूरे विश्व में मानवीय पहलुओं की दुहाई देने वालों की कमी नहीं है. लेकिन यथार्थ में जो कुछ भी घटित हो रहा है उसका चेहरा बड़ा विद्रूप है. कई बार तो ऐसा लगता है कि मनुष्य जो कुछ कह रहा है या जो कुछ उसके द्वारा किया जा रहा है वह एक झूठ का पुलिन्दा होने के सिवा कुछ भी नहीं, आज के हालातों पर गौर करें तो स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाती है और वह बहुत ही भयावह नजर आती है. एक तरफ तो वैज्ञानिक उन्नति हो रही है और दूसरी तरफ मानव उतना ही पूर्वाग्रहों में फंसता नजर आ रहा है. होना तो यह चाहिए थी कि वैज्ञानिक उन्नति के साथ-साथ मनुष्य भी तार्किक सोच रखता, और उन सब भ्रमों और भ्रांतियों से मुक्त होता, जो उसके लिए दुःख का कारण हैं. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है. जो कुछ भी हो रहा है, वह सब कुछ वैज्ञानिक उन्नति के विपरीत है. आज भी मनुष्य जाति, धर्म, भाषा, रंग आदि के आधार पर लड़ाई-झगडे कर रहा है और दिनों-दिन यह सब कुछ बढ़ रहा है. फिर कैसी वैज्ञानिक उन्नति और कैसे मानवीय पहलू. गम्भीरता से सोचने की जरुरत है. एक बात बड़ी विचित्र है, जितना-जितना मनुष्य का वैज्ञानिक (भौतिक) विकास होता जा रहा है, उतनी-उतनी मानवीय पहलुओं में कमी होती जा रही है. अगर ऐसी ही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं, जब मनुष्य ही मनुष्य के खून का प्यासा बनकर, अपने बजूद को मिटा देगा. लेकिन यह सब कुछ किसी विशेष उद्देश्य के कारण नहीं होगा, बल्कि कूछ लोग अपने अहम् की तुष्टि के लिए यह सब कुछ करेंगे, रहेंगे तो वह भी नहीं, लेकिन कुछ बेहतर इनसान भी इनकी नासमझियों के शिकार होंगे और मानवता चीत्कार कर अपने अस्तित्व की भीख मांगने पर मजबूर होगी.                     
अगर हम मनुष्य के प्रारम्भिक जीवन को देखें तो हमें मालूम होता है कि प्रारम्भ से उसका संघर्ष अपने अस्तित्व को बनाये रखने का रहा है. इसे यूं भी कह सकते हैं कि, अपने अहम् की तुष्टि का रहा है. क्योँकि मनुष्य अपनी चेतना के कारण खुद को सबसे विशिष्ट मानता रहा है. किसी हद तक यह बात सही है. लेकिन जब यह चेतना विध्वंस का रूप धारण कर लेती है तो फिर उसके परिणाम बहुत दुखदाई होते हैं. हालाँकि मनुष्य को इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि वह इस प्रकृति का अभिन्न अंग है. जिस तरह से वह आज प्रकृति का दोहन कर रहा है, उसके साथ खिलवाड़ कर रहा है उससे तो यही लगता है कि आने वाला समय मनुष्य के लिए बहुत दर्दनाक होगा. एक कटु सत्य यह भी है कि मनुष्य विकास के नाम पर जो कुछ कर रहा है उसके परिणाम बहुत ही वीभत्स होंगे और मनुष्य की चेतना तब जागेगी जब सब कुछ उसके पास से लुट चूका होगा.
आज जो वैज्ञानिक विकास हो रहा है वह किसी हद तक मनुष्य के लिए सुखदायी है. इस वैज्ञानिक विकास को हम मनुष्य का भौतिक विकास होना भी कह सकते हैं. विज्ञान जिस अवधारणा पर काम करता है अगर हम उसे अपने  जीवन में भी लागू करें तो जीवन की स्थिति और भी सुखद तथा प्रासंगिक हो सकती है. विज्ञान की कार्य अवधारणा ज्ञात से अज्ञात की और बढ़ने की है, तर्क से तथ्य को जानने की है, अव्यवस्थित को व्यवस्थित करने की है, संहार के बजाय नव निर्माण की है, परम्परा पर चलने के बजाय नवीन प्रयोग की है. विज्ञान जिन आयामों को लेकर काम करता है उसका एक ही मकसद है ‘सही तथा सटीक’ जानकारी. जिस विषय में जो बिलकुल सार्थक है उसे जानने की कोशिश विज्ञान की है, और विज्ञान अगर ऐसा नहीं कर पाता तो वह कभी आगे नहीं बढ़ पायेगा. विज्ञान नवीनता का परिचायक है. इसके माध्यम से हम अपने आसपास के रहस्यों को समझने की कोशिश कर रहे हैं और जो कुछ हमारे लाभ के अनुकूल है उसे नया रूप देकर अपने जीवन का हिस्सा बना रहे हैं. मनुष्य को एक बार कभी नहीं भूलनी चाहिए कि जो कुछ उसने वैज्ञानिक विकास किया है उसके लिए सब कुछ उसने प्रकृति से अर्जित किया है. काफी हद तक विचार और तकनीक भी. उसी विचार और तकनीक के आधार पर वह निरन्तर आगे बढ़ रहा है और अपने जीवन में कुछ परिवर्तन कर पा रहा है. इन परिवर्तनों की फेरहिस्त बहुत लम्बी है. शुरू से लेकर आज तक जो कुछ भी उसने अर्जित किया है, उसमें प्रकृति की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. लेकिन दुःख इस बात का है कि मनुष्य इतना सब कुछ होने के बाबजूद भी वास्तविक स्थिति को नहीं समझ पा रहा है. मानवीय पहलुओं के कुछ बिन्दु ऐसे हैं, जो वैज्ञानिक उन्नति के बाबजूद भी नहीं बदले हैं, जबकि यथार्थ के धरातल पर उनका कोई ख़ास बजूद नहीं है. 

दुनिया के आज तक के उपलब्ध इतिहास का जब हम गहन अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि मनुष्य के अस्तित्व में आने के साथ ही उसके संघर्षों का दौर भी शुरू हो गया. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोगों की तादाद बढती गयी, विश्व की कई सभ्यताओं ने जन्म लिया और अपने चरम को हासिल किया. लेकिन आज उन महान सभ्यताओं के कहीं कोई ख़ास चिन्ह हमें देखने को नहीं मिलते. सभ्यताएं बनी और फिर चरम पर पहुँचने के बाद अपने अस्तित्व को खो बैठी. आखिर ऐसा क्योँ हुआ? अगर हम इस प्रश्न पर विचार करें तो हमें बात समझ में आती है कि यह सब कुछ मनुष्य की भूलों के कारण हुआ. प्रकृति का आज तक जितना नुक्सान मनुष्य ने किया है, उससे कहीं अधिक नुक्सान मनुष्य ने मनुष्य का किया है. किसी भी सभ्यता के पनपने के साथ ही संघर्ष भी साथ ही शुरू हुए हैं और जैसे-जैसे मनुष्य आगे बढ़ता जा रहा है उसके संघर्षों का दौर और ज्यादा विकराल रूप धारण करता जा रहा है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन संघर्षों में मनुष्य ने कुछ ख़ास हासिल नहीं किया, बल्कि सब कुछ खोया ही है. दुनिया में जितने भी युद्ध हुए हैं उनके कारणों को और परिणामों को जब हम देखते हैं तो बात एकदम स्पष्ट हो जाती है.

3 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सहमत !

Kavita Rawat ने कहा…

जिस अनुपात में वैज्ञानिक उन्नति हो उसी अनुपात में मनुष्य का बौद्धिक विकास भी हो तो सोने पे सुहागा ...
मानवता के लिए मनुष्यता आज की महती आवश्यकता है ...

रचना दीक्षित ने कहा…

जो आया है सो जायेगा. यही शाश्वत सत्य है. फिर चाहें मानव या संस्कृति.

सुंदर आलेख.