31 जनवरी 2014

आत्महत्या पर आत्मचिन्तन...3

अक्सर जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसे हम कहते हैं कि उसने देह त्याग दी. लेकिन यह सच नहीं है, देह का साथ आत्मा छोड़ देती है और शरीर निर्जीव हो जाता है, उसकी सारी इन्द्रियाँ काम करना बंद कर देती हैं और ऐसी स्थिति में हम उस शरीर को निर्जीव कह देते हैं, जो कि स्वाभाविक भी है. लेकिन किसी भी स्थिति में उसे देह त्याग नहीं कह सकते. गतांक से आगे .....!!! 

देह त्याग का सीधा सा मतलब यह भी है कि हम उसे अपनी इच्छा से त्यागें, उसे अपनी इच्छा से छोड़ें. लेकिन क्या हम उसके बाद की स्थितियों को समझते हैं कि इस देह को छोड़ने के बाद मेरी स्थिति क्या होगी, मुझे कहाँ जाना है, इस शरीर को छोड़ने के बाद मेरी हालत क्या होगी, जिस शरीर को छोड़ा या त्यागा जा रहा है उसमें निहित जीव तत्व का क्या होगा? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो अभी तक हमारे सामने खड़े हैं. हालाँकि हमारे देश और पूरे विश्व में बहुत प्राचीन समय से इन प्रश्नों के उत्तरों की खोज की जाती रही है, लेकिन अभी तक हम किसी एक निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाए हैं और संभवतः किसी एक निष्कर्ष तक पहुंचना मुश्किल भी है. दुनिया के तमाम दार्शनिकों, अध्यात्मिक व्यक्तियों, गुरुओं, पीर-पैगम्बरों के विचारों और अनुभवों पर जब हम गहराई और सापेक्ष दृष्टि से चिन्तन करते हैं तो सबके विचारों का निष्कर्ष यह निकलता है कि जिस जीव की स्वाभाविक मृत्यु होती है, तो वह अपने कर्मों के अनुसार नया जीवन धारण करता है और जो जीव अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह तब तक कोई नया शरीर धारण नहीं कर सकता जब तक कि उस विशेष शरीर में उसके होने का समय पूरा न हो. अकालमृत्यु की स्थिति में “जीव” या आत्मा शरीर को छोड़ तो देती है, लेकिन वह तब तक भटकती रहती है जब तक कि उसका समय पूरा न हो, उस शरीर का समय पूरा होने के पश्चात वह जीव भी अपने कर्मों के अनुसार किसी नए शरीर में प्रवेश करता है और यह क्रम निरंतर चलता रहता है. 

‘कालमृत्यु’ और ‘अकालमृत्यु’ में भेद है. अगर हम सतही दृष्टिकोण से विचार करते हैं तो सभी प्रकार की मृत्युओं को हम ‘मृत्यु’ कह सकते हैं और कहते भी हैं. अगर हम काल मृत्यु पर ध्यान देते हैं तो पाते हैं कि काल को पूर्ण किये बिना मृत्यु हो ही नहीं सकती. परन्तु यह बहुत ही सूक्ष्म और अति उच्च दृष्टि की बात है, लेकिन स्थूल दृष्टि से कालमृत्यु और अकालमृत्यु में सर्वत्र भेद स्वीकार किया जाता है. इसके अनेक कारण भी हैं. बौद्ध धर्म ग्रंथों को जब हम देखते हैं तो पाते हैं कि वहां पर मृत्यु के चार कारण स्वीकार किये गए हैं. इनमें पहला कारण है आयुक्षय, दूसरा है कर्मक्षय, तीसरा है आयु और कर्म दोनों का क्षय और चौथा कारण है उपच्छेदक कर्म. इन सब में पहले कारण आयुक्षय पर जब हम विचार करते हैं तो पाते हैं कि जीव की अपने स्तर की दीर्घतम आयु के परिणाम की आयु अतिक्रांत हो चुकी है, और इसी कारण उसकी मृत्यु हुई है. इससे यह बात स्पष्ट होती है कि दीर्घतम आयु ही पूर्ण आयु के रूप में मानी जाती है. परन्तु यदि जनक कर्म से संजात शक्ति के हासवश देहपात होता है तो इसे हम कर्मक्षय के कारण हुई मृत्यु मान सकते हैं. परन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मनुष्योचित दीर्घतम आयु और जनक कर्म-संजात शक्ति का परिणाम एक ही होता है. इस कारण ऐसी अवस्था में कहा जाएगा कि एक साथ दोनों कारणों के संयोग से मृत्यु हुई और इसे हम आयु और कर्म दोनों का एक साथ क्षय होना मान सकते हैं और इसी कारण हुई मृत्यु को हम मृत्यु का तीसरा कारण स्वीकार करते हैं. लेकिन कभी-कभी आयु और कर्मशक्ति के रहते  हुए भी विरुद्ध शक्ति के प्रभाव से देहपात होता है तो उसे हम उपच्छेदक कर्म का फल कहते हैं और इसी को साधारणतः ‘अकालमृत्यु’ कहा जाता है. प्राचीन आचार्यों ने इसे अकाल मृत्यु की अपेक्षा ‘उपच्छेदक मृत्यु’ कहा है, और यह जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है और इसे हम जीव के लिए और खासकर मनुष्य के घोर निराशा, अन्धकार और पतन का समय कह सकते हैं. क्योँकि मनुष्य को इस धरती के जितने भी जीव हैं उनमें से सर्वश्रेष्ठ माना गया है.
 
इस विषय में जितना चिन्तन आज तक किया गया है उसका एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि जीव की
लगभग 84 लाख योनियाँ हैं और इन सब में मनुष्य योनि को सर्वश्रेष्ठ माना गया है. मनुष्य की सर्वश्रेष्ठता के पीछे कई कारण हैं, एक तो यह पूरे पांच तत्वों के मिश्रण से बना है, दूसरी इसमें चेतना चरम स्तर की है, तीसरा कारण यह भी माना जा सकता है कि इसे ईश्वर प्रदत बुद्धि को अपने तरीके से प्रयोग करने की शक्ति प्राप्त है इसलिए मनुष्य को कर्म योनि भी कहा जाता है, और इस मनुष्य के सर्वश्रेष्ठ होने का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारण यह भी हैं कि इस शरीर के माध्यम से वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, अपनी चेतना (जिसे हम आत्मा भी कहते हैं) को परमात्मा के साथ साक्षात्कार करके जीवन मरण के चक्कर से मुक्त हो सकता है और यही इस जीवन का ध्येय भी है. यजुर्वेद में मनुष्य जीवन और उसके उद्देश्य की व्याख्या इस प्रकार की गयी है :- “अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता/गोभाजऽइत् किलासाथ यत् सनवथ पुरुषम्. (12/76) अर्थात हे जीव तेरा कल रहे न रहे, ऐसे शरीर में निवास है और तुम्हारा कमल के पत्ते पर पानी की बूंद के समान संसार में निवास है. अतः तू शीघ्र ही परमेश्वर को प्राप्त करके मोक्ष के सुख को प्राप्त हो, और यदि विषय-विकार के विरुद्ध होकर सब कामनाओं का नाश का करने की वृति जीव के मन में आ जाये, तब जीव वेद एवं योगसाधना गृहाश्रम में ही करता हुआ मोक्ष को प्राप्त करके अमर हो जाता है तथा ब्रह्मानन्द का सुख भोगता है. 

जीवन, मृत्यु और उसके विभिन्न पक्षों पर अनके प्रकार से विचार किया जा सकता है, हालाँकि इस विषय पर अभी और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है, लेकिन फिर किसी सन्दर्भ में इसकी चर्चा करेंगे. यह विषय अनन्त है और अति गूढ़ और आनंदायक भी, लेकिन हर क्षेत्र की एक सीमा भी होती है, उसकी अनुपालना भी जरुरी है. लेकिन निष्कर्ष के रूप में इतना कहा जा सकता है कि मनुष्य जीवन अति महत्वपूर्ण है, यह कर्म योनि है और इसे हमें यूं ही नहीं गवाना चाहिए. जीवन में कई अवसर आते हैं जब हमें ऐसा महसूस होता है कि अब सब कुछ समाप्त हो गया और इस जीवन को जीना अब बेकार है, लेकिन हम थोड़ा ऊपर उठकर देखें, थोड़ा चिन्तन करके देखें अपने आस-पास नजर दौड़ाकर देखें तो पता चल जाएगा कि जीवन क्या है, मैंने अक्सर शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को समझने की कोशिश करता हूँ, उनको बहुत करीब से देखने की कोशिश करता हूँ तो मुझे यह समझ आता है कि ऐसे व्यक्तियों में किसी एक दिशा में बढ़ने की क्षमता सामान्य व्यक्तियों से अधिक होती है और इनमें जिजीविषा का स्तर भी सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा अधिक होता है, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का किसी भी स्तर पर कोई भी अभाव नहीं होता. तो फिर हम क्योँ नहीं आकलन करते अपना और क्योँ नहीं समझते अपने जीवन की महता. बहुत गहरे में उतर कर देखते हैं तो यह भी पाया जाता है कि आत्महत्या के कारण भी बहुत छोटे और नगण्य होते हैं. कारण कुछ भी हो जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान यह नहीं है, और आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है यह सिर्फ हमारे लिए मनुष्य के पतन का कारण है, हमारी न समझी का प्रतिफल है....!!!

8 टिप्‍पणियां:

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सकारात्मक सोच की राह सुझाती पोस्ट..... बहुत उम्दा विचार

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (1-2-2014) "मधुमास" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1510 पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जब तक वर्तमान को उसके निष्कर्ष तक नहीं पहुँचायेंगे, वह किसी न किसी रूप में साथ बना रहेगा।

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सारगर्भित और विचारणीय प्रस्तुति...

richa shukla ने कहा…

बहुत ही सुंदर और सारगर्भित प्रस्तुति.. के साथ उम्दा विचार..
http://prathamprayaas.blogspot.in/2014/01/journey-of-pitcher-it-is-motivational.htmlघड़ा-

richa shukla ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Digamber Naswa ने कहा…

गंभीर लेख .. सकारात्मक पक्ष जरूरी है ...

संध्या शर्मा ने कहा…

सचमुच विषय अनन्त है और अति गूढ़ भी, कभी इसके अन्य पक्षों पर भी अवश्य प्रकाश डालें। सुन्दर, सकारात्मक ऊर्जा युक्त सार्थक आलेख.....