03 नवंबर 2012

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य और मानवीय मूल्यों की सार्थकता

मानव का स्वभाव है. वह हर कर्म करने से पहले सोचता है और आकलन करता है अपनी लाभ-हानि का. जब मानव में चिंतन की प्रवृति जागृत होती है तोवह जीवन के हर पहलू को उसी दृष्टिकोण से सोचता है और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँच कर अपना कर्म करता है. मानव का यह कर्म उसके बुद्धि के सापेक्ष पक्ष की पहचान करवाता है. आज हम विकास के जिस पड़ाव पर हैं वह मानव की दूरदृष्टि और परिस्थितियों से हार न मानने के दृढ निश्चय के कारण है. इसी दृढ निश्चय के कारण उसने इस धरती पर रहते हुए अप्रतिम उपलब्धियां हासिल की हैं और निरंतर इस और अग्रसर है. धरती से लेकर आकाश तक उसने अपनी उपलब्धियों की गाथा लिखी है. किसी सीमा तक जब मैं  मानव के इस पक्ष पर सोचता हूँ तो एक अद्भुत सा अहसास मुझे होता है और मानवीय उपलब्धियों  पर गर्व महसूस होता है.
 
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पर अगर दृष्टिपात करें तो हम यह महसूस कर सकते हैं कि दुनिया सीमा रहित हो गयी है. सूचना और तकनीक के साधनों के विकास के कारण हमारी जीवन शैली में परिवर्तन हुआ है. परिणामस्वरूप आज विश्व की प्रत्येक हलचल से हम शीघ्र ही रुबरु हो जाते हैं. हमारे आस-पास क्या कुछ घट रहा है, उसकी जानकारी हमें तत्काल मिल जाती है. हमारे सामने ऐसा बहुत कुछ अप्रत्याशित है जिसके बारे में सोचकर हम दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाते हैं. लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं यह सब अगर संभव हुआ है तो मानव की सोच और मेहनत के कारण. वैश्विक पटल पर हम जो भी परिवर्तन देख रहे हैं वह निश्चित रूप से मानव के प्रयासों का ही परिणाम हैं. मानव ने इस धरा पर बहुत से प्रयोग किये और निरंतर कर रहा है, उन प्रयोगों के बदले उसे बहुत कुछ प्राप्त हुआ भी है, और वह प्राप्त कर भी रहा है. यह इस दौर की ही बात नहीं यह सब आदिकाल से चला आ रहा है और अनवरत रूप से चलता रहेगा, मानवीय सभ्यता और संस्कृति के अंत तक

सूचना और तकनीक के अद्भुत विकास के कारण हमारा जीवन परिवर्तित हो गया है. कठिन चीजें जिन्हें प्राप्त करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती थी वह आज हमें आसानी से प्राप्त हो जाती हैं या फिर सहज में ही मिल जाती  हैं. आज ऐसा बहुत कुछ हमारे सामने है जिसके बारे में हम सिर्फ सोच ही सकते थे लेकिन आज उसे हम प्रायोगिक तौर पर देख भी रहे हैं. जिस ढर्रे पर मानव आगे बढ़  रहा था, लक्ष्य तो आज भी उसका वही है लेकिन चाल में परिवर्तन आ गया. वह अब और तेजी से आगे बढ़ रहा है और अपने लक्ष्यों को हासिल कर रहा है. लेकिन मानव में जिस बदलाव को आज देखा जा रहा है. शायद इसके बारे में हम आगाह नहीं थे. आज जब हम 21 वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं. भौतिक रूप से तो मानव ने बहुत कुछ हासिल किया है. इस विकास के कारण समय और स्थिति के साथ-साथ हमारे सोचने समझने का तरीका बदला है. अगर हमारी सोच और समझ के स्तर में ही परिवर्तन आ गया तो यह निश्चित है कि हमारा रहन सहन बदल गया, हमारा आचारव्यवहार बदल गया. रिश्तों के प्रति हमारी सोच बदल गयी. अगर यह परिवर्तन आये हैं तो निश्चित रूप से हमें कहना चाहिए कि हमारी सोच मानवीय मूल्यों के प्रति भी बदली है. अगर नहीं बदली होती तो फिर यह परिवर्तन हमें नजर नहीं आते. कुल मिलाकर आज अगर पूरे विश्व के मानवीय पहलुओं पर अगर दृष्टिपात करें तो यह आभास होता है कि हम मानवीय मूल्यों को नजर अंदाज कर आगे तो बढ़ रहे हैं लेकिन  बहुत कुछ ऐसा भी है जिसे हम खो चुके हैं और बहुत सी चीजों से निरंतर हाथ पीछे खींच रहे हैं. एक तरफ तो हमारा लक्ष्य मानव को भौतिक रूप से सुखी करना है और दूसरी तरफ देखें तो उसके सामने उतनी ही मानवीय समस्याएं भी. एक तरफ हमने आविष्कार किया सुख के साधनों का तो दूसरी तरफ वही सुख के साधन बने हमारे लिए चिंता का सबब. मानव ने अविष्कार किया बम का अपनी सुरक्षा के लिए लेकिन आज वही उसके लिए खौफ का कारण है. ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिन्हें अगर गहराई से  देखें तो बड़ी सोचनीय स्थिति हमारे सामने पैदा होती हैऔर फिर मन कहता है क्योँ न वैराग्य ही धारण किया जाये

विश्व का कोई भी देश ऐसा नहीं जहाँ आज मानवीय मूल्यों की समस्या नहीं हो. हम अपनी आम जिन्दगी में देखते हैं कि कहीं भी अगर हमारे मनों में खौफ पैदा होता है तो वह हमारे कर्मों के कारण होता है. हम कहीं भी हैं बस में, रेल में, सड़क में या फिर घर से कहीं बाहर तो हम खुद को अगर किसी से बचाने की कोशिश करते हैं तो वह है इंसान. अक्सर डर बना रहता है. कोई मेरा पर्स न चुरा ले, मेरे हाथ की घडी ना ले जाये कोई, मेरी जेब न लूट ले कोई और हम देखते हैं कि ऐसी वारदातें अक्सर हमें हर जगह देखने-सुनने को मिल जाती हैं. यह तो हुई बाहरी दुनिया की बात. अब हम अपने परिवेश की तरफ लौटते हैं. एक घर में सास बहु की नहीं बनती, बेटा माँ-बाप के कहने से बाहर है, पति और पत्नी आपस में मिलजुल कर नहीं रह सकते. दहेज़ के लिए किसी की बेटी का क़त्ल, मानसिक प्रताड़ना, सड़क पर किसी अबला की आबरू को लूटना, किसी बच्चे का कहीं से खो जाना, ना जाने कितनी समस्याएं हैं जिनका सामना अक्सर होता रहता है. ऐसी परिस्थिति में हम क्या सोचें ? क्या करें, यह हम पर निर्भर करता है. लेकिन हम खुद ही अगर ऐसी चीजों के शिकार हैं तो हम क्या कर सकते हैं? यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है. 

विश्व के प्रत्येक देश में मानवीय मूल्यों का ह्रास और हमारा भौतिक उन्नति के लिए निरंतर प्रयासरत रहना,
दो अलग चीजें हैं. हालाँकि यह सही है कि दोनों का एक दुसरे से अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. भौतिक उन्नति जहाँ मानव जीवन के बाह्य पक्ष से सम्बंधित है, तो आध्यात्मिक उन्नति मानव जीवन के आंतरिक पक्ष से सम्बंधित है. लेकिन  अगर व्यक्ति के समझ के स्तर को ऊँचा उठाना है उसे पहले आत्मिक उन्नति के बारे में सोचना होगा और जब व्यक्ति की समझ का स्तर ऊँचा होगा तो निश्चित रूप से वह बहुत सी समस्याओं से निजात पा लेगा. लेकिन जहाँ तक आकर्षण की बात है तो वह हमारे मनों पर निर्भर करता है, और यह बात सही है कि इंसान का मन चंचल है. वह कभी भी एक सी चीजों पर केन्द्रित नहीं रह सकता. इस चंचलता के बारे में तो यह कहा जा सकता है कि किसी हद तक यह सही भी है. लेकिन अगर हम अपनी अस्मिता को भूल कर लक्ष्य से भटक जाते हैं तो फिर सारी उन्नतियाँ हमारे लिए बेकार साबित होती हैं. आज के मानव के सामने यही तो यक्ष प्रश्न है कि उसे जीवन में किस चीज को तरजीह देनी है और किस को नहीं. लेकिन जिस तरह का परिवेश उसके सामने है उससे वह अमीर और भौतिक साधनों के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है और यही कुछ आज हमारे सामने हो रहा है. आज का इंसान किसी भी हद पर अपनी सुविधा देखता है, इसलिए जिसे जहाँ मौका मिलता है वह मानवीय मूल्यों को ताक पर रख देता है अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए इसीलिए तो आज कोई ही ऐसा देश होगा जहाँ कोई घोटाला न होता हो, चोरी न होती हो, डकैती न होती हो. 

यह सब कब तक चलता रहेगा और मानव-मानव के खौफ से कब तक खौफजदा होता रहेगा. इस प्रश्न पर हमें गहराई से सोचने की आवश्यकता है. निरंकारी बाबा जी कहते हैं "कुछ भी बनो मुबारक है, लेकिन सबसे पहले इंसान बनो". इस पंक्ति को अगर गहराई से विचारते हैं तो हमें हमारे जीवन का सही लक्ष्य हासिल हो सकता है. हम जीवन में सब बनते हैं और बनने की कोशिश करते हैं, लेकिन इन्सान कभी नहीं बन पाते और ना ही प्रयास करते हैं. हम अपने घरों में देखें हम अपने बच्चों को संस्कारों की शिक्षा देने से बेहतर भौतिकता की शिक्षा देना ज्यादा उचित समझते हैं और फिर आगे चलकर वही बच्चे तो देश और दुनिया को चलाते हैं जिनके संस्कार अच्छे होते हैं वह अच्छे कर्म करते हैं और जिनमें संस्कारों की कमी होती है वह भी अपना जलबा दिखाते, और फिर लोग उन्हें किस नजर से देखते हैं यह तो हमारा अनुभव ही है. इसलिए हमें यह बात ध्यान देनी होगी "कि सिर्फ चलने का नाम प्रगति नहीं, दिशा भी देखनी पड़ती है"  और जब हमारी दिशा सही होगी तो निश्चित रूप से हमारी दशा भी बदल जायेगी. 

वर्तमान वैश्विक परिद्रश्य जो हमारे सामने है वह काफी रोचक और विविधता भरा है. और काफी हद तक बहुत सुखद भी है. लेकिन जहाँ पर मानवीय मूल्यों की बात है उनमें निरन्तर कमी होती जा रही हैबस यही एक दुखद पहलु है. हालाँकि यह सही है कि राम के साथ रावण, कृष्ण के साथ कंस हमेशा रहा है. फिर भी हमारे जो आदर्श हैं उन्हें तो हमें कायम रखना होगा. अगर हम उन्हें ऊंचाई नहीं दे सकते तो उनके मानकों को गिराने का अधिकार हमें भी नहीं है. यही कुछ हमें सोचना है और इस पहलु पर विचार कर आगे बढ़ना है. हम जितना मानवीय मूल्यों की तरफ ध्यान देंगे उतना ही हमारे जीवन उज्ज्वल और हमारा परिवेश उतना ही सुखद होगा. इसी आशा के साथ....!  यह पोस्ट यहाँ भी प्रकाशित हो चुकी है ....!

14 टिप्‍पणियां:

संध्या शर्मा ने कहा…

"सिर्फ चलने का नाम प्रगति नहीं , दिशा भी देखनी पड़ती है " और जब हमारी दिशा सही होगी तो निश्चित रूप से हमारी दशा भी बदल जायेगी"
उज्जवल जीवन और स्वच्छ, सुखद परिवेश के लिए इस ओर प्रयास करने की अत्यंत आवश्यकता है .सार्थक आलेख. शुभकामनायें...

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

मानवीय मूल्य तो सहेजने ही होंगें ..... सार्थक पोस्ट

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बढिया लेख, बहुत सुंदर
अच्छी जानकारी, संग्रहीणीय पोस्ट

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जितनी संस्कृतियाँ और विचारधारायें मिलती हैं, यह चिन्तन उतना ही आवश्यक हो जाता है।

Saras ने कहा…

बदले हुए परिवेश में ..सही गलत के मापदंड भी बदले हैं....ऐसे में पूरी बुद्धि और विवेक से तै करना है .....उचित और अनुचित के बीच के फ़र्क को समझना है ....तभी एक सुन्दर समाज की नींव हम रख सकेंगे ....और अपने आदर्शों को सहेज सकेंगे......सार्थक लेख

Amrita Tanmay ने कहा…

पुरातन मूल्यों की पौध को नव-चिंतन से पुनर्सिंचित करने में की गयी देरी कहीं महाविनाश का कारण न हो जाये .

Amrita Tanmay ने कहा…

पुरातन मूल्यों की पौध को नव-चिंतन से पुनर्सिंचित करने में की गयी देरी कहीं महाविनाश का कारण न हो जाये .

lokendra singh ने कहा…

मानवीय मूल्यों का इस दौर में जमकर ह्रास हुआ है... मुझे तो सभी बुराईयों की जड़ में यही दीखता है

Rajput ने कहा…

लाजवाब, काश हम इस बारे मे गंभीरता से सोचे तो जीवन मे बहुत से बहुमूल्य बदलाव लाये जा सकते हैं जिनहे हमे अनदेखा करते रहते हैं।

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको

संजय भास्कर ने कहा…

बदलाव लाये जा सकते हैं

संजय भास्कर ने कहा…

बदलाव लाये जा सकते हैं

Madan Mohan Saxena ने कहा…

पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब
बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपका यह पोस्ट अच्छा लगा। मेरे नए पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद।