31 जुलाई 2012

तन्हाई

संख्या का महत्व ..इस श्रृंखला की अगली कड़ी फिर कभी ......क्योँकि आजकल हम हैं तन्हा और यह हाल है हमारा ....लीजये प्रस्तुत है आज बहुत दिनों बाद आपके लिए यह कविता .....!

तन्हाई के आलम में
अन्धेरा आँखों के सामने होता है
दुखी दिल तुम्हारे वियोग में
टूट - टूट कर , न जागता न सोता है !

तुम्हारी चुलबुली अदाएं
एक - एक कर जब याद आती हैं
क्या हालत होती कैसे करूँ वयां
अधर बंद, आँखें सो जाती हैं !

मिले थे तुम तो कुछ सकूँ मिला था
अरमानों की थी मैंने बस्ती बसाई 

इस कदर जुदा हुए हम
तुम्हें मेरी वफ़ा रास नहीं आई 

अब अश्क नहीं , रक्त टपकता दृगों से
रुई का तकिया सब सोख लेता
हिज्र में तुम्हारे कैसे कटती रातें
पलंग भी सोने नहीं देता ...!

29 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत बढिया
क्या कहने

संध्या शर्मा ने कहा…

वियोग के पीड़ा से भरे शब्द... शुभकामनायें

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बड़ी ज़बरदस्त तन्हाई है ...

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

दुखी दिल तुम्हारे वियोग में
टूट - टूट कर , न जागता न सोता है !

...............:))

मुझे तो नहीं लगता .....:))

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

बहुत बढिया

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

मन पीड़ा कहतीं पंक्तियाँ..... बहुत बढ़िया

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

ये प्यार में हमेशा जुदाई और तड़प ही क्यों मिलती हैं ???

Maheshwari kaneri ने कहा…

वियोग की पीड़ा खट्टी-मीठी दोनो ही..शुभकामनायें केवल जी..

Dr Varsha Singh ने कहा…

nice.....

Amrita Tanmay ने कहा…

रास आई आपकी तन्हाई...

sushma 'आहुति' ने कहा…

तन्हाई के आलम में
अन्धेरा आँखों के सामने होता है
दुखी दिल तुम्हारे वियोग में
टूट - टूट कर , न जागता न सोता है ! भावो को शब्दों में उतार दिया आपने.............

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अकेलापन काटता है

संजय भास्कर ने कहा…

तुम्हारी चुलबुली अदाएं
एक - एक कर जब याद आती हैं
क्या हालत होती कैसे करूँ वयां
अधर बंद, आँखें सो जाती हैं !
.......अरे!!क्या बात है!!जबरदस्त लिखा है! :):)

संजय भास्कर ने कहा…

इस कदर जुदा हुए हम
तुम्हें मेरी वफ़ा रास नहीं आई
....क्या कहूँ इस अन्दाज़ पर्।

lokendra singh ने कहा…

सुन्दर रचना....

डॉ टी एस दराल ने कहा…

कुछ दिन तन्हाई का भी मज़ा लीजिये .
सुन्दर उदगार .

Reena Maurya ने कहा…

ह्रदयस्पर्शी वियोग व्यथा
लाजवाब... :-)

Mahi S ने कहा…

very nice...

***Punam*** ने कहा…

ये तन्हाई का आलम देखा न जाए....!!

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

वियोग kकुछ अधिक ही बढ़ गया है !!!! उर्दू के शब्दों की अधिकता उत्पन्न करती है

वाणी गीत ने कहा…

ये तन्हाई का आलम !

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

कवि को क्या चाहिए?
एक अदद तनहाई!
बधाई हो बधाई
आपने कर ली
कविताई।:)

रचना दीक्षित ने कहा…

तनहाई भी अजीब ख्यालों से रूबरू कराती है.

बहुत सुंदर.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अब अश्क नहीं , रक्त टपकता दृगों से
रुई का तकिया सब सोख लेता
हिज्र में तुम्हारे कैसे कटती रातें
पलंग भी सोने नहीं देता ...

विरह की स्थिति को शब्दों में ढाल दिया है आपने ... बहुत ही बढ़िया ...

"पलाश" ने कहा…

very beautifully u described the emotions

आशा बिष्ट ने कहा…

BAHUT BAHUT SUNDAR RACHNA...ANTIM PANKTIYAN JHANJHOR KARTI HAIN...

योगेश चन्द्र उप्रेती ने कहा…

बहुत सुंदर रचना है तन्हाई का आलम ही कुछ और होता है बहुत खूब . . .

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

अब अश्क नहीं , रक्त टपकता दृगों से
रुई का तकिया सब सोख लेता
हिज्र में तुम्हारे कैसे कटती रातें
पलंग भी सोने नहीं देता ...!

wah keval ji .....gajab ka likha hai ...badhai ke satha abhar bhi

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

अब अश्क नहीं , रक्त टपकता दृगों से
रुई का तकिया सब सोख लेता
हिज्र में तुम्हारे कैसे कटती रातें
पलंग भी सोने नहीं देता ...!
वियोगी दिल की दास्ताँ .....बहुत खूब ...