25 मई 2011

यादें जो आज भी

कॉलेज से पास आउट होने के बाद मैं कभी उस कॉलेज में नहीं गया जहाँ मैंने जिन्दगी के तीन महत्वपूर्ण वर्ष बहुत कुछ सीखने में गुजारे थे. मेरा कॉलेज एक नदी के किनारे स्थित था. कॉलेज के बाहर एक बड़ा मैदान था. मैदान तथा कॉलेज दोनों ऐतिहासिक थे. कभी-कभी मुझे कॉलेज की भव्यता तथा नक्काशी पर सोचने का मौका मिलता तो मैं सहज ही उस अदृश्य सत्ता के प्रति आस्थाबोध से समर्पित हो जाता. मेरा सोचना सिर्फ सोचना होता! परन्तु मेरे जहन में कई प्रश्न जरुर पैदा करता. कभी-कभी तो मेरा मन एक कल्पना लोक तक जा पहुँचता. मैं सब बर्दाश्त कर लेता.....बस यही संतोष था.
कॉलेज से पूर्व जब मैं स्कूल में पढता था तो यहाँ आकर स्कूल की यादें रह रहकर जब भी मेरे जहन में उमड़ती तो मैं रोमांचित हो जाता. मेरे स्कूल का भवन बहुत ही दयनीय हालत में था लेकिन कॉलेज एकदम भव्यसुन्दर तथा व्यवस्थित. मेरे गाँव के लोग बहुत भोले-भाले मेहनती न्यायप्रिय तथा ईमान्दार थे. वहां का वातावरण तथा आबोहवा इस वातावरण से भिन्न थी. जहां मेरे गाँव में हर किसी को एक दुसरे की चिंता रहती थी, वहीँ पर मेरे कॉलेज में किसी का किसी से कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं था. सबको अपनी-अपनी पड़ी होती यहाँ पर हर किसी को अपने काम से मतलब होता. बेबजह वक़्त बर्बाद करने की प्रवृति किसी में नहीं थी. मेरे कॉलेज के प्राध्यापकों के पास डिग्रियांउपाधियाँ और उपलब्धियां सब कुछ था. हर कोई अपने उपर गर्व  करता थाहर कोई खुद को दुसरे से श्रेष्ठ समझता. खैर!! मुझे इन बातों से कोई लेना देना नहीं था, लेकिन इन सबसे मेरा वास्ता पड़ता था तो एक उत्सुकता सी बनी रहती इन सबसे बात करने की और इनसे कुछ सीखने की. मुझे कॉलेज की हर चीज अच्छी लगती प्राध्यापकव्यवस्था और छात्र.
सबसे अच्छे  मुझे मेरे दोस्त लगते जिनमें संजीव और शालिनी को मैं बहुत पसंद करता. मेरे दोस्तों की और मेरी एक अलग पहचान थी. मैं उन सबसे भिन्न प्रवृति का था. लेकिन दोस्त तो आखिर दोस्त ही हैं ना. संजीव और शालिनी से मेरी खूब बनती थी. दोनों का बात करने का लहजा तथा ज्ञान का स्तर काफी ऊँचा था. संजीव हमेशा कल्पनापूर्ण बातें करता तथा भविष्य के लिए नयी योजनायें बनाने की इच्छा उसकी होती. वह व्यक्तिगतसामाजिक तथा राजनीतिक सुधार तथा बदलाव की बातें हमेशा किया करता था. शालिनी एक शान्त स्वभाव की लड़की थी. प्यार  से बात करना और सलीके से पेश आना उसकी खूबी थी. ऐसे लगता था कि वह काफी सुलझी हुई हो, परन्तु मैंने कभी उसे जानने की कोशिश ही नहीं की.
संजीव से जब भी मिलना होता मैं हमेशा उससे कुछ सामयिक मुद्दों पर बात करता. मेरी इच्छा हमेशा नए-नए विषयों पर चर्चा करने की होती. एक दिन मैंने और संजीव ने समाज की विसंगतियों पर चर्चा करना शुरू कर दिया. परत दर परत हम कई पहलुओं को खोलते गए. मैं आध्यात्मिक प्रवृति का व्यक्ति हूँ, इसलिए मैं प्रत्येक वस्तु को बहुत बड़े नजरिये और समग्र परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास करता और संजीव भौतिकवादी दृष्टिकोण लेकर हमेशा अपने मत की स्थापना में बड़े से बड़ा तर्क  देता. पर अंततः वह मेरी कई बातों से सहमति जताता. इसका मुझे भी संतोष था.
मुझे इतिहास का ज्यादा ज्ञान नहीं परन्तु दर्शन पर मेरी अच्छी पकड़ हैइसलिए हम दोनों जब किसी घटना पर विचार करते तो वह घटना का इतिहास-दर्शन हो जाता. संजीव किसी भी घटित घटना के कारणों तथा उसके किसी ऐतिहासिक पक्ष को खोजने की कोशिश जरुर करता. आज की बहस में हमने कई मुद्दों पर चर्चा की लेकिन शहर के एक  प्रतिष्ठित  व्यक्ति द्वारा प्रताड़ित ‘रामदीन’ द्वारा की गयी  आत्महत्या की चर्चा पर हम जयादा केन्द्रित रहे.
खैर समय यूँ बीतता गया और हम अपने लक्ष्यों की तरफ बढ़ते रहे अब वह समय नजदीक था जब हमें इस कॉलेज से विदा लेनी थी. जब हम एक दूसरे से जुदाई के बारे में सोचते तो आँखें भर आती. लेकिन जब हम किसी से भी मिलते हैं तो जिन्दगी के किसी मोड़ पर बिछुड़ना स्वाभाविक है. जीवन का यह क्रम है इसलिए ज्यादा दुःख नहीं होता. अब वह दिन हमारे सामने था जब हमें कॉलेज से विदा किया गया, मैं संजीव और शालिनी एक दूसरे के आसपास ही बैठे थे और सारा समय हमने इन तीन वर्षों में बिताये हर एक क्षण को याद किया और भविष्य की योजनाओं के बारे में चर्चा की. हम तीनो का लक्ष्य स्पष्ट था. हम तीनो एक दूसरे के प्रेरणास्रोत थे लेकिन आगे की पढाई के लिए शायद ही अब साथ रह पातेकोशिश थी कि एक दुसरे से सम्पर्क बनाये रखा जाए लेकिन वक़्त की मार के साथ यह भी सम्भव नहीं हो पाया.
संजीव और शालिनी से कभी कोई सम्पर्क नहीं हुआ कॉलेज से पास आउट होने के बाद. मैंने कुछ सपने सजाये थे, उन्हें पूरा करने में लगा रहा कई वर्ष और काफी हद तक मुझे सफलता भी मिली. जब भी संजीव और  शालिनी के बारे में सोचता तो ऑंखें भर आती. मैंने उन्हें अपनी हर सफलता पर बहुत याद किया और हमेशा सोचा काश! आज वह मेरे साथ होते तो मेरी उपलब्धियों पर उन्हें मुझसे ज्यादा ख़ुशी होती.
जीवन आगे बढ़ता गया. मुझे पता है धरती गोल है तो कहीं न कहीं किसी न किसी मोड़ पर कुछ न कुछ घटित होता है, जो आपको अचम्भित कर देता है. अब जब मैं कुछ समय पहले अपने कॉलेज के आसपास वाली गलियों में घूम रहा था तो अचानक मुझे संजीव दिख गया. वह मेरे सामने था और मैं उसके. लेकिन वह मुझे पहचान नहीं पाया. मैं जब कॉलेज में पढता था तो बहुत साधारण तरीके से रहता था. लेकिन अब थोडा बदलाब मुझ में भी आ चुका था हर एक चीज को लेकर. संजीव थोड़ी देर किसी अपरिचित की तरह मुझे देखता रहा, लेकिन मैंने जब उसे उसके नाम के साथ पुकारा तो वह सोच में पड़ गया. मैंने ज्यादा देर किये बिना उसे गले से लगा लिया, वह और भी हतप्रभ! फिर मैंने उसे अपना नाम बताया और वह रो पड़ा.
देखने वाले सब देखते रहे मैं और संजीव ख़ुशी के आंसुओं से भीग गए. हालाँकि संजीव का घर उस शहर में नहीं था. फिर भी हम दोनों ने साथ रहने का मन बना लिया. संजीव ने शालिनी के बारे में बताया मैंने बिना देर किये उससे मिलने की इच्छा जाहिर की. शालिनी से सम्पर्क साधा गया. बात संजीव ने कीकि आज आपके यहाँ आ रहा हूँ. जब हम वहां पहुंचे तो मुझे देखकर शालिनी एकदम पहचान गयी और गले लग गयी. दो दिन तक मैं संजीव और शालिनी एक साथ रहे. खूब सारी बातें की और एक दूसरे के बारे में जाना.
जीवन भी क्या हैएक यक्ष प्रश्न. लेकिन हमें हमेशा संजीदा रहना चाहिए, जीवन में मानवीय भावनाओं के प्रतिहमारी जिन्दगी में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आने वाला हर एक व्यक्ति महत्वपूर्ण है. बस हम उसकी कदर कर पायें. यह जिन्दगी कितनी है यह किसी को पता नहीं. लेकिन जितने लम्हें हम जियें जीवन को खूबसूरती प्रदान करते हुए जियें.

75 टिप्‍पणियां:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

college life...sach puchho to anmol hoti hai....har wo pal yaad aa gaya....agar pura likhun to sayad ek post mera bhi ban jaye...:)
masti ki ...peete...khele...aur padhe bhi..:)
bahut achchha laga kewal aaj kee post dekh kar...dhanyawad

G.N.SHAW ने कहा…

बहुत ही सुन्दर संस्मरण और रोचक विचार ! बधाई

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कॉलेज के दिन और यह संस्मरण ..अच्छा लगा

Rakesh Kumar ने कहा…

केवल जी बहुत भावुक हैं आप.आपके संस्मरण आपकी भावुकता को बखूबी बयान करते हैं.मिलना बिछुडना जीवन का एक अविभाज्य अंग है.
आपकी यह बात बहुत अच्छी लगी कि
' हमारी जिन्दगी में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आने वाला हर एक व्यक्ति महत्वपूर्ण है.'

Sawai SIingh Rajpurohit ने कहा…

आदरणीय श्री केवल जी
सही है भाई मेरी भी ऐसी काफ़ी यादे है और टीकम मेरा स्कुल के दिनों की सबसे अच्छा मित्र का नाम था पर वो मित्रता स्कुल तक ही सिमित रह गई और अब कॉलेज दिनों में शालिनी शर्मा मेरी सबसे अच्छी मित्र का नाम है और बहुत अच्छा संस्मरण है भाई जी आपका

chirag ने कहा…

college days were the golden days for me
i learnt a lot there from my friends ,faculties
nice post
i also wrote about my college life at my blog ...
check it out in some old posts

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

स्मृतियों से साझा कराने के लिए आभार...

वन्दना ने कहा…

सुन्दर संस्मरण्।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

बीते दिनों की याद दिला दी केवल राम जी। शायद हम जैसे लोगों की मानसिकता ही ऐसी होती है कि एक बार छूट गया तो शीशे की तरह टूट गया। कुछ लोग तो अल्युमिनी के नाम से अपनी पुरानी संस्था से जुडे रहते हैं॥

सदा ने कहा…

बहुत ही अच्‍छा संस्‍मरण ...स्‍मृति पटल पर आज भी सब वैसा ही है ...बहुत बढि़या ।

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...कालेज जीवन की बहुत बातें उम्र भर याद रहती हैं...बहुत से बिछड़े साथी अभी भी याद आते हैं..बहुत भावपूर्ण संस्मरण..

विशाल ने कहा…

केवल राम जी,बीते दिनों की याद करवा दी आपने.
बहुत ही ख़ूबसूरती से संस्मरण लिखा है .
तसवीरें भी खूबसूरत हैं.
पुराने मित्रों से मिलना बहुत सुखद अनुभव होता है.
बहुत बार कहानी बनते बनते रह जाती है.बस कोहनियाँ मिलने में अंगुल भर का फासला रह जाता है.

न हाथ थाम सके न पकड़ सके दामन,
बड़े करीब से उठ कर चला गया कोई.

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

संस्मरण पढ़कर बहुत सारी यादें ताज़ा हो गयीं !
केवल राम जी,आपने संस्मरण भी इतनी खूबसूरती से लिखा है कि जैसे सब कुछ चलचित्र की तरह सामने चल रहा हो !
आभार !

संध्या शर्मा ने कहा…

हमारी जिन्दगी में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आने वाला हर एक व्यक्ति महत्वपूर्ण है . बस हम उसकी कदर कर पायें . यह जिन्दगी कितनी है यह किसी को पता नहीं . लेकिन जितने लम्हें हम जियें जीवन को खूबसूरती प्रदान करते हुए जियें ...........

आपके संस्मरण से हमारी भी स्कूल और कॉलेज के दिनों की यादें ताज़ा हो गईं, उन दिनों के दोस्त तो भुलाये नहीं भूल सकते हैं, हम .... सुनहरे दिनों की सुनहरी यादें.........
फोटो भी बहुत सुन्दर हैं...

एम सिंह ने कहा…

थ्री इडियट्स!!!!!!!!!!
अगर शालिनी की शादी नहीं हुई है तो आप उससे शादी कर लें. और अपनी यादों के साथ अपनापन भी संजोकर रख लें. आपने बेहतरीन लिखा.

एम सिंह ने कहा…

मेरे कमेंट पर कोई प्रतिक्रिया हो तो कृपया मेरे ब्‍लॉग पर आकर भी दें. ताकि मैं जान सकूं.

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

बहुत ही सुन्दर संस्मरण और रोचक विचार ! बधाई

शिवकुमार ( शिवा) ने कहा…

केवल जी,
बहुत ही सुन्दर संस्मरण और रोचक विचार ! बधाई

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

सुन्दर संस्मरण

संजय भास्कर ने कहा…

इतना सुंदर लिखा है आखिर पुरानी यादें ताजा कर ही दी

Maheshwari kaneri ने कहा…

कॉलेज के दिन और यह संस्मरण बहुत ही सुन्दर हैं...बधाई

वाणी गीत ने कहा…

सुन्दर संस्मरण !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्मृतियों के सिन्धु में गोता लगाने से हर बार कुछ न कुछ रत्न निकल आते हैं।

***Punam*** ने कहा…

केवल...

कुछ यादें जिन्दगी जीने के लिए काफी होती हैं...
आपने बहुत कुछ भूला-बिसरा याद दिला दिया!!
शुक्रिया..

अमित श्रीवास्तव ने कहा…

स्मरणीय संस्मरण....

कविता रावत ने कहा…

जब भी ब्लॉग पर कोई संस्मरण पढ़ती हूँ तो उससे सम्बंधित यादें ताज़ी हो जाती हैं. कॉलेज का यह संस्मरण पढ़ कॉलेज के दिन की याद ताज़ी हो चली, सच क्या दिन थे वे! अब तो घर गृहस्थी में कभी कभार साल ६ महीने में कोई दोस्त मिल गया तो थोड़ी हाय हेल्लो ही हो पाती है ....आपका यह संस्मरण बहुत अच्छा लगा... धन्यवाद

डॉ टी एस दराल ने कहा…

पुराने दोस्तों से मिलना हमेशा सुखद रहता है ।

वीना ने कहा…

बहुत सारी यादें ताजा कर दीं आपके संस्मरण ने...

संजय भास्कर ने कहा…

क्या खूब लिखते हैं आप कॉलेज के दिनों की याद दिला दी आपने भाई सुन्दर संस्मरण

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही सुन्दर संस्मरण...
आप तो बड़े लकी निकले...पुराने दोस्त यूँ अचानक मिल गए...
तस्वीर पर दोस्तों का परिचय भी लिखना था,ना :)

संजय भास्कर ने कहा…

केवलराम जी ये पोस्ट बेहद पसंद आई आपको ढेरों शुभकामनाएँ.

Rahul Singh ने कहा…

जीना इसीका नाम है.

MANOJ KUMAR ने कहा…

बहुत ही उम्दा व शानदार प्रस्तुति!

स्मरणीय!

धन्यवाद एवं बधाई.

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही सुन्दर संस्मरण और रोचक विचार| बधाई|

ehsas ने कहा…

बहुत खुब। बिछड़कर मिलने का मजा ही कुछ और होता है। खासकर उनसे जिनसे हम बेहद प्यार करते है।

Vivek Jain ने कहा…

बहुत सुन्दर संस्मरण
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

रचना दीक्षित ने कहा…

संस्मरण तो बहुत सुंदर था ही परन्तु ये पंक्तियाँ तो दिल को छू गयी:

"हमारी जिन्दगी में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आने वाला हर एक व्यक्ति महत्वपूर्ण है . बस हम उसकी कदर कर पायें . यह जिन्दगी कितनी है यह किसी को पता नहीं . लेकिन जितने लम्हें हम जियें जीवन को खूबसूरती प्रदान करते हुए जियें."

शुभकामनायें.

ज्योति सिंह ने कहा…

aaj main padhne nahi aai yaad dilane aai hoon ,kyonki aapke blog par lagataar aa rahi hoon aur aap is blog ko bisar gaye shayad apni pareshani me .

Rakesh Kumar ने कहा…

केवल भाई क्या आपने मेरे ब्लॉग पर टिपण्णी करने की कोशिश की ?
ये आपने क्या गडबड की है कि आपके ब्लॉग पर टिपण्णी हो रही है,ओरों के ब्लॉग पर नहीं हो पा रही.
विशाल जी के ब्लॉग पर कई बार कोशिश की ,हो ही नहीं रही है.
शालिनी जी आपकी बगल में बैठी हैं क्या,जिनकी तरफ आपकी बाई बाजु की कोहनी निकल रही है?

sushma 'आहुति' ने कहा…

college life is the golden days in life... jinhe kabhi nhi bhul sakte hai... bhut hi accha likha hai apne...

Babli ने कहा…

मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिप्पणी देकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
बहुत सुन्दर, शानदार और रोचक संस्मरण! आपका पोस्ट पढ़कर मुझे कॉलेज के दिन याद आ गए! उम्दा प्रस्तुती!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बीती बातें हमेशा खैंच कर दूसरी दुनिया में ले जाती हैं ... किसी न किसी बात से हर किसी का कोई न कोई कोना खुल जाता है ... आपकी पोस्ट से भी कई कोने अतीत के खुल गये ... शायद यही सफलता है अच्छे लेख की ....

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

भावनाओं से ओत प्रोत संस्मरण हमें भी भावुक कर गया

नूतन .. ने कहा…

शुरू से लेकर अंत तक रोचकता बरकरार है ...बेहतरीन संस्‍मरण ।

shikha varshney ने कहा…

बहुत से बिछुडे हुए दोस्त याद आ गए आपके इस संस्मरण से .
वाकई दुनिया गोल है.
बहुत सुन्दर संस्मरण.

prerna argal ने कहा…

bahut hi achcha sansmaran.sach college aur school ki yaaden anmol hi hoti hain.aur agar poorane dost phir mil jaayen ye to bade nasib ki baat hai.badhaai aapko.please mera blog main bhi aaiye.

सुबीर रावत ने कहा…

बीते हुए को याद कर और बार-बार चुभला कर वैसा ही स्वाद पाने की अभिलाषा हमेशा बनी रहती है.
सार्थक व भावनात्मक पोस्ट के लिए आभार.
बारामासा पर आपसे टिपण्णी अपेक्षित है.

सुबीर रावत ने कहा…

बीते हुए को याद कर और बार-बार चुभला कर वैसा ही स्वाद पाने की अभिलाषा हमेशा बनी रहती है.
सार्थक व भावनात्मक पोस्ट के लिए आभार.
बारामासा पर आपसे टिपण्णी अपेक्षित है.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर संस्मरण..... कुछ यादें सदैव दिल के करीब रहती हैं.....

ललित शर्मा ने कहा…

संबंधों की असि धारा पर चलना बहुत कठिन है
पग धरने से पहले अपने विश्वासों को तोलो.....
जीवन ऐसे चलता रहता जैसे सरिता का पानी
यक्ष प्रश्न है बहुत बड़ा तुम सागर जैसे होलो

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

बीते दिनों की याद करवा दी आपने.
बहुत ही सुन्दर संस्मरण ...........

आचार्य परशुराम राय ने कहा…

संस्मरण काफी रोचक और प्रेरक लगा। आभार।

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

सुन्दर संस्मरण

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

सुन्दर संस्मरण...
हमारे इस इन्दौर शहर में दो स्कूल व कालेज ऐसे हैं जो समय-समय पर अपने 25-25 वर्ष पुराने छात्रों को निमंत्रित कर सेमिनार आयोजित करते हैं जिसमें शामिल होने के लिये विदेशों से भी अनेकों पूर्व छात्र वहाँ आते हैं । अब आपकी पोस्ट के दायरे में ही हम यह महसूस करने की कोशिश करें कि कैसा भावप्रवण परिदृश्य बन जाता होगा वो उस ऐतिहासिक मिलन का जहाँ गुरु-शिष्य सभी मिलकर अपने अतीत के बारे में बतियाते हुए वर्तमान के ज्ञान व उपलब्धियों को आपस में बांटते होंगे । आभार सहित...

BrijmohanShrivastava ने कहा…

संस्मरण पढा धन्यवाद

मनोज कुमार ने कहा…

भावपूरित इस संस्मरण को पढ़कर अपने भी दिन याद आ गए।

Jyoti Mishra ने कहा…

wow this post was really really beautiful in so many ways
1. it talks about friends.
2.it talks about college life.
but most importantly it talks about the memories and that untold pleasure we feel when we meet with our old friends.
Nice post !!

amrendra "amar" ने कहा…

बहुत ही सुन्दर संस्मरण

Ravi Rajbhar ने कहा…

Der se ane ke liye mafi chahungaa.
aapne hamare bhi din yad kara diye aur ankhe bhar gai.

Bahut hi sunder prastuti ki hai aapne.
aaj ki duniya me agar sachche dost mil jaye to jindagi khubsurat ban jati hai.

krati ने कहा…

बहुत खूबसूरत | सच है ज़िन्दगी मे कुछ पल हमेशा याद रहते हैं फिर चाहे वो स्कूल के दिन हो या कॉलेज के दिन | खुशकिस्मती से 2004 में कॉलेज से पासआउट होने के बाद मैं आज भी अपने दोस्तों के टच मे हूँ | लेकिन जिससे नहीं मिल पाती तो कुछ तो मलाल रहता ही है | पिछले दिनों एक बहुत पुराने दोस्त से फेसबुक पर फिर से मुलाकात हो गयी | तकनीकी विकास का और कोई फायदा हुआ हो या नहीं पर इतना तो हुआ ही है | कुछ ऐसी ही है ज़िन्दगी |

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

कॉलेज से ज़्यादा मुझे आत्मीय प्राथमिक-शिक्षा का माहौल लगता है नजदीकी के लिए,हालाँकि कॉलेज में आकर हम संबंधों और भावनाओं के प्रति ज़्यादा सचेत हो जाते हैं.
आपके पुराने साथियों से आपका मिलन हुआ ,बधाई!वैसे साथी कभी पुराना नहीं होता,दूर होने के बावजूद वह हमारी स्मृतियों में तो रहता ही है !

Suman ने कहा…

bahut sunder sansmaran, ke sath aapki bhavanaye bhi sunder hai .....

Sunil Kumar ने कहा…

कॉलेज के दिन और यह संस्मरण ..अच्छा लगा
चलते चलते आप कहीं दूर निकल गए इस लिए हमें भूल गए .

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

शालिनी एक शांत स्वभाव की लड़की थी . प्यार से बात करना और सलीके से पेश आना उसकी खूबी थी ......

:))

JHAROKHA ने कहा…

kewal ji
bahut bahut hi achha laga aapka sansmaran .
waqi saathito chhut jaate hain par yaade haesha hi dil me basi rahti hain .aise hi jivan ke kisi mod par achanak hi hamara sabse ajij dost mil jaata hai ti dil khushi se ro padta hai .
sachhe saathi bahut hi kam v soubhag se mil paate hain .
is mamle me main bhi bhagy shali hun .meri ek sabse priy dost ne satrah salo baad jaane kaise kaise
kis tarah se mujhe dhundh nikala .aur ham ab aaj bhi phon ke jariye ek-dusare ka hal lete rahte hain .main kabhi phon na kar paun par uska phon barabar hi aata hai .sach hai sachchi dosti me barabari ki koi jagah hi nahi hoti.
bahut hi achha laga .aapne purane dino ki yaad dila di
bahut bahut badhai
poonam

Udan Tashtari ने कहा…

वाकई डूब कर लिखा है यह संस्मरण.....भावनाओं से भरपूर.

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

वर्तमान परिवेश ने हमें मशीन बना दिया है.संवेदनाएं मृत तो नहीं हुई हैं किन्तु दब जरूर गयी हैं.जैसे राख के ढेर में कोई चिंगारी.आपने बहुत ही भावुक होकर यह पोस्ट लिखी है.स्मृतियाँ ही दबी संवेदनाओं को उभारती हैं .चाहे स्वयं याद करे या कोई याद दिला जाये.इन्हीं क्षणों में वास्तविक जीवन जी लेते हैं.स्मृतियों को कुरेदने के लिए ही मैंने भी एक श्रंखला शुरू की है.नई पीढ़ी को कुछ पुराने रीति रिवाजों का ज्ञान मिलता है और पुरानी पीढ़ी की स्मृतियाँ जाग उठती हैं .मेरी श्रृंखला से जुड़े रहिएगा.

Sachin Malhotra ने कहा…

बहुत ही बढ़िया !
जिंदगी में प्रेम का स्थान सब से ऊँचा है, और आपकी पोस्ट में भी प्रेम बाखूबी झलक रहा है !
पढ़ कर अच्छा लगा !

बेनामी ने कहा…

अपने मित्रों से मिलना और पुराना वक़्त याद करना भी एक नया आनंद देता है ....बहुत भावपूर्ण पोस्ट के लिए आपको बधाई ..!

अनिल अत्री ने कहा…

अच्छा है हमें भी पुरानी यादों में ले गया ये तो ..अभी आधा पढ़ा है बाकी बाद में .........

Mariolino ने कहा…

credo che tutto il passato, la scuola, gli amori, il lavoro, gli amici siano in noi e siano parte di noi. Contaminazioni della nostra stessa essenza e noi siamo in loro. cosa sia la vita non so ma è certo una parte delle memorie di chi abbiamo incontrato. La vita può essere spirituale ma deve anche essere quello che veramente è nel presente, anche materia. Anche unione con una persona che amiamo e che ci ama.

Mani Singh ने कहा…

जिंदगी में कोइ ना कोई ऐसा जरूर मिल जाता है जो हमारे साथ ना रहते हुए भी जिंदगी भर साथ निभाते है , बधाई हो आपको !

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

कालेज के दिनों का संस्मरण .......बहुत अच्छा लगा

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

यादों में खोना और यादों के सुनहरे पल सजीव होते देखना अनोखे एहसास हैं। बचपन के मित्र जब यकबयक मिल जाते हैं तो अपार हर्ष होता है।
..अच्छा लगा आपकी यादों से जुड़ना।

वीना ने कहा…

बहुत ही खूबसूरती से सजाया है यादों को....