26 दिसंबर 2010

था वाजिब

जब मुद्दत बाद अपने किसी खास दोस्त से मुलाकात होती है तो मन में कुछ इस तरह के भाव उठते हैं ........

मुद्दत बाद मिले तो कुछ बदला लगना था वाजिब
दो जान एक दिल तो अश्कों का बहना था वाजिब

गैरों के जहां में पनाह दी थी नाचीज को
अपनाया बाँहों में , गिलों का मिटना था वाजिब

सपनों का ताज टूटा था जब चंद रोज पहले
आज बस गयी बस्ती , चिड़ियों का चहकना था वाजिब


सहा जिसने हर गम को ख़ुशी का उपहार समझकर


सागर से दरिया मिला , लहरों का उठाना था वाजिब

मिलने की चाहत देखी रात के आगोश में
उतरा चाँद जमीं पर, चकोर का चहकना था वाजिब


56 टिप्‍पणियां:

नीरज जाट जी ने कहा…

क्या बात है!!

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

बिछड़े मित्र से मिलने पर उत्पन्न होने वाले भावों से सजी अच्छी कविता.

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

अति सुन्दर अभिव्यक्ति...
मित्र से मिलने की ख़ुशी को शब्दों में पिरोना आसान नहीं होता...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मिलन पर खूबसूरत अभिव्यक्ति

यहाँ आपका स्वागत है

गुननाम

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

Keval Ram ji ...Apne bahut bdhiya likha hai. padhkar mazaa aaya.

Iske liye apko shubhkaamnaayen...

सोमेश सक्सेना ने कहा…

अच्छी ग़ज़ल है. बधाई...
ज़रा मेरी इस ग़ज़ल पर भी नज़र डालें...

फिर सुनाओ यार वो लम्बी कहानी

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर!!

Kailash C Sharma ने कहा…

मित्र से मिलन की खुशी का बहुत सुन्दर भावपूर्ण चित्रण..

Pratik Maheshwari ने कहा…

बेहतरीन भाव!
सुन्दर कृति..

आभार

"एक लम्हां" पढ़ने ज़रूर आएं ब्लॉग पर..

Patali-The-Village ने कहा…

मित्र मिलन पर खूबसूरत अभिव्यक्ति|

एस.एम.मासूम ने कहा…

केवल साहब बहुत पसंद आई आप की यह कविता.

एस.एम.मासूम ने कहा…

केवल साहब बहुत पसंद आई आप की यह कविता.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर जी..... जब कभी मिला दोस्त कोई भुला बिछ्डा तो देखेगे...धन्यवाद

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

सुन्दर कविता.. सहजता से अभिव्यक्त भाव...

सुबीर रावत ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल है, वधाई!!

कविता रावत ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति|

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

केवल जी , मिलन पर बिल्कुल ऐसा ही होता है। सुन्दर गजल।

संजय भास्कर ने कहा…

क्या बात , क्या बात , क्या बात ......खुशी का भावपूर्ण चित्रण..

संजय भास्कर ने कहा…

कमाल की प्रस्तुति ....जितनी तारीफ़ करो मुझे तो कम ही लगेगी

'उदय' ने कहा…

मिलने की चाहत देखी रात के आगोश में
उतरा चाँद जमीं पर, चकोर का चहकना था वाजिब
... bahut sundar ... behatreen gajal !!!

POOJA... ने कहा…

जब इतने अरसों की बातें निकली, जस्बात निकले
तो, चाँद की चादनी को उगते सूरज में तब्दील होना वाजिब था...
वाकई जब कोई ख़ास कई दिनों बाद मिले तब मंज़र ऐसा ही होता है...

नरेश सिह राठौड़ ने कहा…

मिलन का बहुत बढ़िया वर्णन किया है | कई दिनो बाद एक बढ़िया चीज पढ़ने को मिल रही है |

daanish ने कहा…

achhee rachnaa .. !
naazuq-naazuq-si !!

boletobindas ने कहा…

बेहतर रचना. दोस्ती की बात ही ऐसी होती है

M ने कहा…

एक बार पधारें।

http://newsfromnewdelhi.blogspot.com

ZEAL ने कहा…

दोस्त से मिलने पर उठने वाले भावों की बेहतरीन अभिव्यक्ति।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

सहा जिसने हर गम को ख़ुशी का उपहार समझकर
सागर से दरिया मिला , लहरों का उठाना था वाजिब

क्या बात है केवल जी.

पुष्पा बजाज ने कहा…

आपकी रचना वाकई तारीफ के काबिल है .

* किसी ने मुझसे पूछा क्या बढ़ते हुए भ्रस्टाचार पर नियंत्रण लाया जा सकता है ?

हाँ ! क्यों नहीं !

कोई भी आदमी भ्रस्टाचारी क्यों बनता है? पहले इसके कारण को जानना पड़ेगा.

सुख वैभव की परम इच्छा ही आदमी को कपट भ्रस्टाचार की ओर ले जाने का कारण है.

इसमें भी एक अच्छी बात है.

अमुक व्यक्ति को सुख पाने की इच्छा है ?

सुख पाने कि इच्छा करना गलत नहीं.

पर गलत यहाँ हो रहा है कि सुख क्या है उसकी अनुभूति क्या है वास्तव में वो व्यक्ति जान नहीं पाया.

सुख की वास्विक अनुभूति उसे करा देने से, उस व्यक्ति के जीवन में, उसी तरह परिवर्तन आ सकता है. जैसे अंगुलिमाल और बाल्मीकि के जीवन में आया था.

आज भी ठाकुर जी के पास, ऐसे अनगिनत अंगुलीमॉल हैं, जिन्होंने अपने अपराधी जीवन को, उनके प्रेम और स्नेह भरी दृष्टी पाकर, न केवल अच्छा बनाया, बल्कि वे आज अनेकोनेक व्यक्तियों के मंगल के लिए चल पा रहे हैं.

अरविन्द जांगिड ने कहा…

सुन्दर रचना,

बिलकुल वाजिब.

साधुवाद.

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

भाई आपने बहुत ही सुकुन देने वाली गजल कहीँ ,
शानदार जज्बातोँ को सजाया है । आभार !

" नज़रेँ मिलाके ना नजरेँ झुकाओ "

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मिलने की चाहत देखी रात के आगोश में
उतरा चाँद जमीं पर, चकोर का चहकना था वाजिब
waah waah waah

Majaal ने कहा…

बिल्कुल वाजिब है साहब, हमारा समर्थन भी नोट किया जाए ;)

लिखते रहिये ...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

बहुत सुंदर,
और इसपर मेरी प्रशंसा भी वाजिब है।
---------
अंधविश्‍वासी तथा मूर्ख में फर्क।
मासिक धर्म : एक कुदरती प्रक्रिया।

प्रेम सरोवर ने कहा…

क्या बात है- आपने सब के मन की बात को बहुत ही सहज तरीके से प्रस्तुत किया है। लगता है कही न कहीं इसकी प्रतिध्वनि लौटकर मेरे अंतर्मन को भी गुंजायित कर जाती है। एक सुखद अनुभव की प्रस्तुति अच्छी लगी। सादर।

anshumala ने कहा…

वाह बहुत अच्छी लगी दोस्तों से ये मुलाकात |

Bittu Suryavanshi ने कहा…

किसी बिछड़े मित्र से मिलने की ख़ुशी को बहुत खुबसुरत अंदाज में अभिव्यक्त किया है आपने ...बहुत खूब

sada ने कहा…

बहुत ही खूबसूरती से आपने व्‍यक्‍त किया है जज्‍बातों को सुन्‍दर रचना ..।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

केवल जी ,
मिलने की चाहत देखी रात के आगोश में
उतरा चाँद जमीं पर, चकोर का चहकना था वाजिब
बहुत सुन्दर भाव !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन, पढ़कर बहुत अच्छा लगा।

मनोज कुमार ने कहा…

देर से आने के लिए क्षमा .. ग़ज़ल के भाव बेहद ख़ूबसूरत लगे।

स्वाति ने कहा…

aaj aapki tippni ke jariye pahli bar aapke blog ko padha ... aap bahut hi achha aur bhavpurna likhte hai.. sabhi kavitae achhi lagi.. keep writing..

वीना ने कहा…

सहा जिसने हर गम को ख़ुशी का उपहार समझकर
सागर से दरिया मिला , लहरों का उठाना था वाजिब

बहुत खूब ..क्या बात है...

JHAROKHA ने कहा…

Keval ji,
vaise to puri rachna hi umda hai...lekin in panktiyon ka javab nahin....
सपनों का ताज टूटा था जब चंद रोज पहले
आज बस गयी बस्ती ,चिड़ियों का चहकना था वाजिब
...........

smshindi ने कहा…

अति सुन्दर

smshindi ने कहा…

NAYA SAAL 2011 CARD 4 U
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@(________(@
@(________(@
please open it

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/”**I**”/
/ “MISS” /
/ “*U.*” /
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“LOVE”
“*IS*”
”LIFE”
@======@
/ “LIFE” /
/ “*IS*” /
/ “ROSE” /
@======@
“ROSE”
“**IS**”
“beautifl”
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/”beautifl”/
/ “**IS**”/
/ “*YOU*” /
@======@

Yad Rakhna mai ne sub se Pehle ap ko Naya Saal Card k sath Wish ki ha….
मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है !

P S Bhakuni ने कहा…

सहा जिसने हर गम को ख़ुशी का उपहार समझकर
सागर से दरिया मिला , लहरों का उठाना था वाजिब....
खूबसूरत अभिव्यक्ति .

mahendra verma ने कहा…

सपनों का ताज टूटा था जब चंद रोज पहले,
आज बस गयी बस्ती, चिड़ियों का चहकना था वाजिब।

बेहतरीन रचना...बहुत खूब।
वियोग के बाद संयोग का अलग-अलग प्रतीकों के माध्यम से सुंदर चित्रण।

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

sundar prastuti

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

संजय भास्कर ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति
आपको और आपके परिवार को मेरी और से नव वर्ष की बहुत शुभकामनाये ......

बेनामी ने कहा…

गैरों के जहां में पनाह दी थी नाचीज को
अपनाया बाँहों में भरकर , गिलों का मिटना था वाजिब
बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है ...दोस्त के साथ मिलन का सुंदर चित्र खींचा है ....

अल्पना वर्मा ने कहा…

सहा जिसने हर गम को ख़ुशी का उपहार समझकर
सागर से दरिया मिला , लहरों का उठाना था वाजिब

वाह! वाह!!क्या खूब लिखा है आप ने!
हर शेर भावों भरा लगा.

***Punam*** ने कहा…

बस चलते-चलते ही ठहर गई इस जगह....और वाजिब भी है,जबकि लिखने वाला इतना सुंदर लिखे और अपने ही दिल की बात कह जाये... यूँ तो लिखते सब दिल से ही है...पर दिल को वही छू जाता है जो अपने दिल की बात कह जाए...इसीलिए इतने प्रशंसक और आलोचक मिल जाते हैं हमें आसानी से...पहली बार में ही काफी रचनाएं पढ़ ली आपकी और शुक्रिया कि आपने कहीं से मुझे खोज निकला.. आपकी इस खोज के लिए धन्यवाद...

: केवल राम : ने कहा…

आदरणीय पूनम जी
आपका शुक्रिया किन शव्दों से करूँ ....बस दिल कह रहा है कि...आपका आशीर्वाद यूँ ही बना रहे ...यह सब नजर कि बात है ...जीवन के सफ़र में क्या कुछ हो जायेगा इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता ...आपके प्रत्येक शब्द ने मुझे प्रभावित किया है ...निश्चित है कि आपकी सोच मुझसे कहीं आगे है ....अपना आशीर्वाद यूँ ही बनाये रखना ...यही प्रार्थना है ...शुक्रिया

Harman ने कहा…

bahut sundar..
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anjana ने कहा…

आपकी इस गजल का हर शेर दोस्ती की नयी मिसाल पेश करता है ..कितना अच्छा है ..आपका दोस्ताना व्यवहार ...बहुत अच्छे

Sunita Sharma ने कहा…

मुद्दत बाद मिले तो कुछ बदला लगना था वाजिब
दो जान एक दिल तो अश्कों का बहना था वाजिब

गैरों के जहां में पनाह दी थी नाचीज को
अपनाया बाँहों में , गिलों का मिटना था वाजिब
उम्दा लेखन केवल जी .
दोस्तों के बिछड़ने का दर्द झलक रहा है .. इस रचना में .. मुद्दत के बाद जब वो मिलते हैं तो.........पर खुशनसीब हो आप ........जिन्हें बिछड़े दोस्त मिले ........वरना .........सुन्दर अभिव्यक्ति ..