16 सितंबर 2010

तन्हा रहना


तन्हा रहना गर आसां होता,  मिलन  को  कहता क्यों ?
हिज्र-ए-गम तुम्हारा न होता, मौन फिर रहता क्योँ ?

पलक झपकते, आँख खुलते, याद आती तुम्हारी
ख्वाब तुम्हारा न होता, अकेला रोता रहता क्योँ?

दिल की हर धड़कन में अजीब हलचल समाई
सांसे बेचैन न होती, तो तडपता रहता क्योँ ?

कैसे कहूँ तुम्हारे बिना, हालात क्या हैं मेरे
गर इश्क बयां-ए-जुबां होता, तो चुप रहता क्योँ ?

2 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

कैसे कहूँ तुम्हारे बिना, हालात क्या हैं मेरे
गर इश्क बयां-ए-जुबां होता, तो चुप रहता क्योँ ?
एकदम से दिल को छूने वाली पंक्तियां। बहुत आभार।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस कुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातें और दो क्षणिकाएं, मनोज कुमार, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

Suman ने कहा…

दिल की हर धड़कन में अजीब हलचल समाई
सांसे बेचैन न होती, तो तडपता रहता क्योँ ?nice