18 सितंबर 2015

ज्ञान-विज्ञान और मानवीय संघर्ष...2

गत अंक से आगे.. अधिकतर यह देखा गया है कि जो व्यक्ति जितने विराट व्यक्तित्व का स्वामी होगा, उसमें ज्ञान की सम्भावना  उतनी ही अधिक होगी. उस व्यक्ति के लिए हमारा दृष्टिकोण अध्यात्म के आधार पर विकसित होता है. कई बार तो हम ऐसा भी सोच-समझ लेते हैं कि अमुक व्यक्ति में कोई अदृश्य या दैवीय शक्ति काम कर रही है, जिससे इस व्यक्ति का व्यक्तित्व इतना चुम्बकीय है, लेकिन अधिकतर ऐसा नहीं होता. महान चरित्र वाले अधिकतर व्यक्ति परिस्थितियों की उपज होते हैं, जीवन के यथार्थ को समझने वाले होते हैं. जीवन का यह यथार्थ किसी को एक पल में समझ आता है और कोई इसे लाख कोशिश करने के बाद भी नहीं समझ पाता. कुछ ऐसे भी होते हैं जो इसे जानते तो हैं, लेकिन समझते नहीं. कुछ ऐसे भी होते हैं जिनका इस यथार्थ से हर पल वास्ता पड़ता है, मगर यह उनके अहसास का हिस्सा नहीं बन पाता. जीवन के यथार्थ के विषय में हम जितना चिन्तन करेंगे, उतना ही हम पायेंगे.       
अब यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हम जीवन में किसे यथार्थ माने और किसे नहीं? यह एक गम्भीर  प्रश्न है और इसी प्रश्न को सुलझाने के लिए मनुष्य चिरकाल से प्रयत्नशील है. जीवन की वास्तविक स्थिति और यथार्थ पर उसने आज तक जितना चिन्तन किया है उसके आधार पर उसने अपनी कुछ अवधारणायें भी बनायीं हैं और काफी हद तक मनुष्य के जीवन को उन अवधारणाओं ने प्रभावित भी किया है. लेकिन बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम नजरअंदाज कर रहे हैं, और इसी कारण हमारे मानवीय चिन्तन का उत्कृष्ट पहलू कभी सामने ही नहीं आ पाया है. बल्कि वक़्त की नजाकत को समझने की अगर हम कोशिश करें तो पता चलता है कि जो कुछ किया जाना चाहिए था, या होना चाहिए था, सब कुछ उसके विपरीत किया जा रहा है. ऐसी स्थिति में हम यह निर्धारित नहीं कर पा रहे हैं कि वास्तविकता क्या है?
जीवन की वास्तविकता को समझने का जहाँ तक प्रश्न है उसके विषय में भी अनेक मत प्रचलित हैं और हर कोई मत अपने को दूसरे से श्रेष्ठ बताने की फिराक में है. वह भी बिना किसी तर्क के. जीवन का यथार्थ और उससे जुड़े हुए पहलूओं को समझने की दिशा में कदम बढ़ाना एक विशद बहस का हिस्सा हो सकते हैं और होना भी ऐसा ही चाहिए. कुछ लोगों ने कोशिश भी की है, लेकिन अब तक कोई ऐसा सिद्धान्त या दर्शन प्रचलित नहीं हो पाया जिसमें हम जीवन की वास्तविकता को समझते हुए आगे बढ़ने का प्रयास कर सकें. हाँ जो कुछ हमारे पास उपलब्ध है वह हमें सकून देता है, कुछ हद तक हमें जीवन को सहज बनाने की तरफ ले जाता है, लेकिन उस सीमा तक नहीं, जिसकी अपेक्षा की जाती है. यह भी एक सत्य है कि ज्ञान और विज्ञान आज तक इस पहलू को सुलझाने की कोशिश करते रहे हैं और उन्हें आंशिक रूप से सफलता भी इसमें प्राप्त हुई है.
जीवन के वास्तविक पहलूँओं को समझने के लिए हम ‘ज्ञान’ और ‘विज्ञान’ में से एक का चुनाव करते हैं. सतही तौर पर देखा जाए तो दोनों हमें जीवन के लक्ष्य तक ले जाने के साधन हैं. हालाँकि ‘ज्ञान’ यह दावा करता है कि मनुष्य का जीवन एक विशेष मकसद के लिए मिला है और मनुष्य जन्म के बाद उसे ‘मोक्ष’ की प्राप्ति करनी है. मोक्ष की प्राप्ति के लिए उसे इस जीवन में अच्छे कर्म करने हैं और फिर जब उसके ‘प्राण’ इस शरीर से निकलेंगे तो उसे ‘मोक्ष’ की प्राप्ति होगी. लेकिन ‘विज्ञान’ ने अब तक ऐसी कोई रूपरेखा मनुष्य के समक्ष नहीं रखी, हाँ इतना जरुर है कि विज्ञान भी इस सृष्टि के संचालन के लिए ‘उर्जा’ को जिम्मेवार मानता है और यह भी मानता है की यह सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है. विज्ञान जिसे ‘ऊर्जा’ कह रहा है, ज्ञान उसे ‘ईश्वर’ का दर्जा दे रहा है. विज्ञान इस उर्जा को समझने की कोशिश कर रहा है तो ज्ञान का दावा है कि यह ऊर्जा ‘ईश्वर’ है और उसने इसे समझ लिया है.  यह भी एक विचित्र तथ्य है कि विज्ञान जिसे ‘ऊर्जा’ और ज्ञान जिसे ‘ईश्वर’ कह रहा है उसके आधार पर देखा जाए तो दोनों का मानना है कि इस सृष्टि का निर्माण इसी से हुआ है. ज्ञान कई बार इसे ‘परमतत्व’ कहता है तो विज्ञान इसे ‘तत्व’ की संज्ञा से अभिहित कर रहा है. ज्ञान कहता है कि यह ‘परमतत्व’ न तो पैदा किया जा सकता है और न ही यह ख़त्म होता है, यह अजर, अमर अविनाशी है, जिसे अध्यात्म ‘स्वयंभू’ भी कहता है. अब जरा इसी आधार पर विज्ञान को देखने की कोशिश करें तो, विज्ञान जिसे ‘तत्व या पदार्थ’ कह रहा है उसके विषय में भी विज्ञान की लगभग ऐसी ही मान्यता है. विज्ञान कहता है कि इस सृष्टि का मूल कारण पदार्थ है, और पदार्थ को न तो पैदा किया जा सकता है और न ही उसे समाप्त किया जा सकता है. इससे तो ज्ञान की वह धारणा भी बलबती हो जाती है जो उसने ‘परमतत्व’ के ‘स्वयंभू’ होने के सन्दर्भ में कहा है, क्योँकि विज्ञान का मानना है कि पूरी सृष्टि इसी तत्व के आधार पर संचालित हो रही है. विज्ञान तो काफी हद तक इस बात से भी सहमत है कि अगर पदार्थ की ऊर्जा को समझ लिया जाए तो उससे मनचाहे कार्य करवाए जा सकते हैं. ज्ञान भी इसी का दावा करता है और कहता है कि अगर हम दैवीय शक्तियों को सिद्ध कर लेते हैं तो हम मनचाही उपलब्धियां प्राप्त कर सकते हैं.
ज्ञान और विज्ञान के दृष्टिकोण से हम सृष्टि की उत्पति के विषय को समझने का प्रयास करें तो बात एकदम स्पष्ट हो जाती है. मात्र शब्दों के हेर-फेर के कारण हमें यह दोनों लगा लगते हैं. यह बात अलग है कि ‘ज्ञान’ को समझने के लिए हमें ‘विज्ञानसम्मत’ चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है. जब तक हम ज्ञान को समझने के लिए विज्ञान सहारा नहीं लेते तब तक ज्ञान हमारे लिए लाभदायक नहीं हो सकता. हम जीवन में सबसे बड़ी भूल ही यह करते हैं कि हम ज्ञान और विज्ञान को एक दूसरे का विरोधी मानते हैं. लेकिन हमें समझना तो यह चाहिए कि विज्ञान ही वह माध्यम है जो हमें ज्ञान की पराकाष्ठा तक ले जाता है. इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि विज्ञान एक पद्धति है जिसके माध्यम से हम ज्ञान तक पहुँचते हैं. विज्ञान ही ज्ञान तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करता है. शेष अगले अंक में. 

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर आलेख ।

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छा गंभीर चिंतनशील प्रस्तुति
श्री गणेश जन्मोत्सव की हार्दिक मंगलकामनाएं!

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सारगर्भित आलेख...

रचना दीक्षित ने कहा…

रुचिकर सोचने पर मजबूर करती बेहतरीन
आभार