15 जून 2013

मीडिया का प्रधानमन्त्री

साल 2013 जैसे ही शुरू हुआ या उससे कुछ दिन पहले ही मीडिया ने देश के प्रधानमन्त्री को लेकर एक बहस छेड़ दी, और आज तक यह बहस अनवरत रूप से जारी है. संभवतः 2014 में जब तक चुनाव नहीं हो जाते तब तक यह जारी रहेगी. इसे बहस कहना तो सही नहीं है, आप कहेंगे क्योँ? तो मेरा सीधा सा जबाब है, बहस से कुछ सार्थक निष्कर्ष निकलते हैं, कुछ निर्णय लिए जाते हैं, कुछ बातें तय की जाती हैं और सबसे बड़ी बात बहस में ऐसे सब लोगों की भागीदारी होती है जिनका प्रत्यक्ष सम्बन्ध उन सब चीजों से होता है. लेकिन आज की किसी भी बहस में ऐसा नहीं होता चाहे मुद्दा कोई भी हो, वैसे आज के मीडिया के पास कोई ख़ास मुद्दा हो जिससे राष्ट्रीय स्तर पर कोई परिवर्तन हुआ हो या ऐसी कोई बहस हुई हो जिससे कोई व्यापक सन्देश जनमानस में गया हो. वर्षों से यही देख रहा हूँ हर बार कोई मुद्दा उछाला जाता है लोग टकटकी लगाकर देखते रहेते हैं और फिर तीन ढ़ाक के पात वाली बात ही सामने आती है. यह बात भी मुझे बराबर पता है कि मीडिया एक सशक्त माध्यम है और उससे ऐसे कई अपेक्षाएं की जा सकती हैं जो हमारे वश में नहीं है, और ऐसा कई बार हुआ भी है जब मीडिया ने धारा का प्रवाह बदला है और कुछ परिणाम भी दिए हैं, लेकिन आज ऐसा कम ही देखने को मिलता है. इस सारे परिदृश्य में मेरे जहन में एक सवाल स्वाभाविक रूप से इन बहसों के बीच उठता रहा और आज तक भी मुझे वह सवाल परेशान किये जा रहा है और संभवतः जब तक इस देश की हालत सही नहीं होती तब तक यह सवाल मुझे परेशान करता रहेगा. 
 
देश की हालत के सही होने से मेरा तात्पर्य समझ लीजिये, सबसे पहले बात इसी पर करना चाहूंगा. कुछ
दिन पहले गाँधी जी की पुस्तक हिन्द स्वराजको पुनः पढ़ना शुरू किया तो मेरे दृष्टिकोण में एक व्यापक अंतर आ गया और मैं सोचता रहा कि शायद में गलत सोच रहा हूँ. लेकिन हर बार मुझे मेरी सोच सही लगी. देश की हालत दिन प्रति दिन बिगडती जा रही है और हम हैं कि विकास के नाम पर मात्र आंकड़ों का खेल ही खेल रहे हैं, वास्तविक स्थिति का किसी को भी भान नहीं. हम अपने आस पास के जन जीवन को देखें हम कितना परिवर्तित हुए हैं आजादी के 66 वर्षों में, कितना विकास किया है हमने (जिसे हम आज के दौर में विकास कह रहे हैं, क्या सच में यही पैमाना है विकास का या कुछ और) और क्या उपलब्धियां हैं हमारी, यह एक गहन प्रश्न है. महात्मा गाँधी अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज में लिखते हैं कि ‘आज हिन्दुस्तान की रंक दशा है. यह आपसे कहते हुए मेरी आँखों में पानी भर आता है और गला सुख जाता है. यह बात मैं आपको पूरी तरह समझा सकूंगा या नहीं, इस बारे में मुझे शक है. मेरी पक्की राय है कि हिन्दुस्तान अंग्रेजों से नहीं, बल्कि आजकल की सभ्यता से कुचला जा रहा है, उसकी चपेट में वह फंस गया है, उसमें से बचने का अभी भी उपाय है, लेकिन दिन- ब-दिन समय बीतता जा रहा है . मुझे तो धर्म प्यारा है ; इसलिए पहला दुःख मुझे यह है कि हिन्दुस्तान धर्मभ्रष्ट होता जा रहा है. धर्म का अर्थ मैं यहाँ हिन्दू, मुसलमान या जरथोस्ती धर्म नहीं करता. लेकिन इन सब धर्मों के अंदर जो धर्महै वह हिन्दुस्तान से जा रहा है; हम ईश्वर से विमुख होते जा रहे हैं’[1]  गाँधी जी द्वारा कही गयी इन पंक्तियों पर अगर विचार करें तो आज भी हम वहीँ खड़े हैं, जहाँ से गाँधी जी ने इस देश की स्थिति को देखा, समझा और परखा था.

आजादी के इन 66 वर्षों में भारत देश ने बहुत कुछ देखा. भारत की आजादी के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने वाले लगभग 6 लाख लोगों ने यह तो नहीं सोचा होगा कि आजादी के बाद भारत का स्वरूप ऐसा होगा और यहाँ की शासन और सत्ता मीडिया, पूंजीपतियों, कारोबारियों और उससे बड़ी बात कुछ अंतर्राष्ट्रीय संधियों हाथों की कठपुतली बन कर रह जायेगी. आजादी के पूरे आन्दोलन के दौरान महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक जैसे नेता स्वदेशी की बात करते रहे लेकिन जैसे ही सत्ता का हस्तांतरण हुआ (जिस भारत को हम आजाद कह रहे हैं वास्तव में ऐसा नहीं है क्योँकि हमें जो आजादी मिली है वह एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए इसे सत्ता का हस्तांतरण कहना सही रहेगा) वैसे ही हम कुछ वर्षों के दौरान फिर उसी गिरफ्त में आ गए, हमने आजादी के आन्दोलन के दौरान विदेशी कम्पनियों के खिलाफ जंग लड़ी, हमने उन्हें कहा भारत छोडो, लेकिन कुछ वर्षों बाद हमने कहना शुरू किया वापिस आओ. हमने अंग्रेजों को भगा, दिया लेकिन अंग्रेजी को अपना लिया. हम इस बात को भूल गए कि भाषा किसी भी देश के प्रत्येक पहलू का आधार होती है, लेकिन हम मूल बात को ही भूल गए और आज भी उसी मोहपाश में बंधे आगे बढ़ रहे हैं. अब तो स्थिति यह है कि हम अपना कोई निर्णय अपनी जरुरत या अपनी सहूलियत के मुताबिक नहीं लेते बल्कि विज्ञापन और मीडिया के प्रचार के आधार पर इस उक्ति (जो दिखता है, वह बिकता है) को चरितार्थ करते हुए बिना सोचे समझे लेते हैं. संभवतः यही बात अब प्रधानमन्त्री के चुनाव को लेकर की जा रही है, इसलिए तो कहना पड़ रहा है मीडिया का प्रधानमंत्री’. 

मुझे इस बात को कहने में कोई हिचक नहीं है कि न्यू मीडिया के ज्यादातर पुरोधा भी उसी इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया के आधार पर अपना मंतव्य प्रकट करते हैं और अपनी राय हम सबके साथ सांझा करते है.  इसीलिए तो फेसबुक, ब्लॉग और अन्य जनमाध्यम उसी मुहीम में आगे बढ़ते नजर आते हैं. कुछ लोग अभिव्यक्ति का साहस भी दिखाते हैं और वस्तुस्थिति को सबके सामने लाने का प्रयास भी करते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की आवाज ज्यादा दूर तक नहीं जाती और फिर दूसरी तरफ विचारधाराओं के बंधन में फंसे बुद्धिजीवी कोई विचार करने की अपेक्षा उसे नजरअंदाज करना ही अपनी श्रेष्ठता समझते हैं. इसी कारण जब भी कोई बहस होती है तो तथ्य सही ढंग से न तो प्रस्तुत किये जाते हैं न ही उन पर गौर करने की कोई जरुरत ही समझी जाती है. इसलिए आज हमारे देश में स्वस्थ विचारों की अभिव्यक्ति का कोई माहौल नजर नहीं आता और इसका खामियाजा हम आये दिन भुगत रहे हैं और आने वाले दिनों में इसके परिणाम और भी भयंकर होंगे इस बात में कोई दो राय नहीं है.

[1] गाँधी जी : हिन्द स्वराज : नवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदावाद ; जनवरी 2010: पृष्ठ 24

7 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन सार्थक सामयिक आलेख,बेहतरीन प्रस्तुती।

दीर्घतमा ने कहा…

पढने योग्य बहुत अच्छा आलेख बहस का मुद्दा बनाने जैसा है बहुत धन्यवाद .गाधीका ग्राम स्वराज कौन पढता है अब कांग्रेस ने ही उसे भुला दिया.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रश्न बड़े गहरे हैं,
हम पड़े बहरे हैं।

रचना दीक्षित ने कहा…

मीडिया में बहस का स्तर बहुत घटिया होता जा रहा है विशेषकर जहाँ नेता लोगो को बुलाया जा रहा है. उनके पास शब्द और विचार दोनों का आभाव है. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि आज का युवा वर्ग जो देश की जनसँख्या का आधे से भी अधिक है अपने साथ स्पष्ट विचारधारा रखता है. इसलिए जो व्यवस्था चल रही है वह अधिक दिन चलती रहेगी, ऐसा नहीं लगता.

vandana ने कहा…

सार्थक एवं सामयिक लेख

sumeet "satya" ने कहा…

बढ़िया लेख

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

आज मीडि‍या, बंदर के हाथ उस्‍तरे सा है.