26 अप्रैल 2011

क्योँ नहीं पीते हो तुम

भरी महफ़िल में , लोगों ने मुझसे पूछा
क्योँ नहीं पीते हो तुम ???
बिना पीने के भला , कैसे जीते हो तुम !!!
फिर दबी आवाज में ....
क्या तुमने देखा नहीं है मयखाना ???
या तुम नहीं चाहते पीना और पिलाना ?
बिना पीने के किसको क्या आनंद आयेगा !!
वही तो डूबेगा इसमें जो पीना सीख जायेगा ...!

बात उनकी सुनकर , कुछ सोच समझकर
मैंने दिया जबाब
हाथ जोड़ कर कहा ...मेरी बात सुनो जनाब
पीने -पीने में भी हैं  बहुत अंतर
तुम पीते मयखाने में , मैं पीता निरंतर
बोले वो मेरी बात सुनकर
आज फिर तुमने झूठ कह दिया हंसकर

मैंने समझाया उन्हें बड़ी शराफत से
बात तुम सुनना मेरी नजाकत से
वो पीना भी क्या पीना , जो पीने के बाद उतर जाये
पीना तो वह है , जो बिना मयखाने के चढ़ जाए
उन्होंने फिर कहा
मजा आ गया अहा ...!
मैंने फिर उन्हें समझाया
कुछ उनकी समझ में आया


इश्क का जाम पीता हूँ मैं….

उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार
उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना.
मुझे बेहोश करता उसका मुस्कुराना
कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!
आज अपने कॉलेज के दिनों की डायरी देख रहा था तो यह कविता किसी एक पन्ने पर  मिल गयी सोचा इसे आप सबके साथ साँझा करूँ ......!

109 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार


-हमारी लाईन पर हो..इसलिए बधाई. :)

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

युवा दिनों की कवितायेँ जीवन भर याद रहती है.. प्रभावित करने वाली कविता...

विशाल ने कहा…

आदरणीय केवल जी,बहुत सुन्दर वर्णन किया है आपने इश्क मजाज़ी का.

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार
उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना
मुझे बेहोश करता उसका मुस्कुराना
कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!

आप जो मय पीते हैं ,उसमे नशा बहुत ज़्यादा होता है.
ज़रा संभलियेगा.

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

भाई केवल राम जी दार्शनिकता का मनोरम पुट लिए बेहद सुंदर और सार्थक कविता बधाई और शुभकामनाएं |

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

केवलराम जी,
बहुत सुन्दर वर्णन किया है आपने इश्क मजाज़ी का.
प्रभावित करने वाली कविता...

OM KASHYAP ने कहा…

sir ji ram ram ji

OM KASHYAP ने कहा…

bahut accha pite hein aap humko bhi peena sikha dijiye
aapka aabhar

सतीश सक्सेना ने कहा…

"इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार "

बड़े शराबी हो भाई ....जय जय शिवशंकर ...!

मुसाफिर क्या बेईमान ने कहा…

वो पीना भी क्या पीना , जो पीने के बाद उतर जाये
पीना तो वह है , जो बिना मयखाने के चढ़ जाए
केवल जी आपकी लेखनी बिना मयखाने के कितना अद्भुत चलती है. अति सुंदर.

Atul Shrivastava ने कहा…

बेहतरीन शब्‍द संयोजन।
सच में प्‍यार के नशे से बढकर कोई नशा नही दुनिया में।
मय का नशा तो चंद घंटों का होता है पर ये वो शय है जो कभी नहीं उतरता।
चढते ही जाता है।

Learn By Watch ने कहा…

मुझे तो आपकी यह पंक्तियाँ सबसे अच्छी लगीं

वो पीना भी क्या पीना , जो पीने के बाद उतर जाये
पीना तो वह है , जो बिना मयखाने के चढ़ जाए

जानदार कविता है आपकी

Deepak Saini ने कहा…

वाह वाह और बस वाह

सच इश्क से बढकर कोई नशा नहीं

artijha ने कहा…

waah waah waah..kya baat kya baat kya baat..ati sudar ati sundar ati sundar,bahut khub bahut khub bahut khub...kebal ram ji kya kabhita likhi hai aapne...acchhe achhe pine balo ki nasha utarr jayegi...

Rahul Singh ने कहा…

पान, बीड़ी, सिगरेट, तम्‍बाकू ना शराब, हमको तो नशा है ...

Dr.Sushila Gupta ने कहा…

रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!

wah.........kya andaj hai.thanks

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

चाहत... अपनी-अपनी.

होनहार

सार्वजनिक जीवन में अनुकरणीय कार्यप्रणाली

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

पियो जी भर के पीना

इश्क में, या मयखाने में

जीवन में जो न उतरे कभी

किन्तु ध्यान रखना लुढ़क मत जाना !

संजय भास्कर ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
........वाह वाह और बस वाह

संजय भास्कर ने कहा…

अब खुलने लगे है कॉलेज की डायरी के राज़
बहुत कुछ छिपा रखा है डायरी में जनाब ने

संजय भास्कर ने कहा…

केवल जी
एक और सुन्दर कविता आपकी कलम से !
...शुभकामनाएं |

Ashish (Ashu) ने कहा…

सही कहा वो पीना भी क्या पीना जो पीने के बाद उतर जाय :)

Rajiv ने कहा…

"पीने-पीने में भी हैं बहुत अंतर
तुम पीते मयखाने में,मैं पीता निरंतर"
बस यही अंतर तो आदमी को इन्सान और हैवान बनाता है.यही रूहानी जज्बा प्यार का आगाज है.केवल जी,बहुत ही सुंदर है "पीने" का यह अंतर.

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत ही खूबसूरत अभिव्‍यक्ति ...।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

आद.केवल जी

हमे आदत थी पीने की उसने अपनी कसम देकर छुडा दी,
हम यारों की महफिल मे बैठे थे यारो ने उसी की कसम देकर पिला दी

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

शुभकामनाएं ......आद.केवल जी लगे रहिए

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह नशा हो तो ऐसा हो ... बहुत सुन्दर प्रस्तुति

वन्दना ने कहा…

इश्क का नशा हर नशे से बढ्कर होता है फिर चाहे वो इश्क इन्सानी हो या रूहानी…………मुझे लग रहा था कि आखिर मे ये रुहानी तरफ़ मुडेगी मगर रह गयी इंसानी इश्क तक्……………मगर अर्थ एक ही निकलता है।

Arunesh c dave ने कहा…

क्या नशीली बात की आपने

संध्या शर्मा ने कहा…

वो पीना भी क्या पीना , जो पीने के बाद उतर जाये
पीना तो वह है , जो बिना मयखाने के चढ़ जाए...

और एक बार चढ़ जाये तो फिर कभी नहीं उतरता... बड़ी संजीदगी से दिल के जज़्बात को शब्दों में पिरोया है...

उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना
मुझे बेहोश करता उसका मुस्कुराना
कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!

वाह... सुन्दर, खूबसूरत, शानदार, बेमिसाल.............शुभकामनाएं......

Kailash C Sharma ने कहा…

वो पीना भी क्या पीना , जो पीने के बाद उतर जाये
पीना तो वह है , जो बिना मयखाने के चढ़ जाए

.....क्या खूब! सही कहा है इश्क का नशा जीवन भर नहीं उतरता..बहुत सुन्दर

chirag ने कहा…

ultimate poem
kya likha hain
aur sahi hain jo jaam peete ho usaki to baat hi kuch aur hain

संगीता पुरी ने कहा…

वाह .. बहुत खूब !!

shikha varshney ने कहा…

वाह क्या मय है और क्या नशा...
बहुत खूबसूरत.

दर्शन कौर धनोए ने कहा…

वाह केवल राम जी क्या बात कही है :-

" इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार
उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना
मुझे बेहोश करता उसका मुस्कुराना
कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..! "

" स्वयम नही पीता ओरो को ,किन्तु पिला देता हाला
स्वयम नही छूता ओरो को पर पकड़ा देता प्याला "

बहुत सुंदर !जितनी तारीफ करू कम है ---

cmpershad ने कहा…

राह पकड तू एक चलाचल
पा जाएगा मधुशाला :)

सुबीर रावत ने कहा…

पीने पिलाने पर भाई केवल जी ग़ालिब का यह शेर याद आ गया, जो कि आम है-
" यह तो मेरे खून की शिद्धत है साकी, नशा जो होता शराब में बोतल न झूमती !"
आभार. ........शुभकामनायें.

Patali-The-Village ने कहा…

सही कहा वो पीना भी क्या पीना जो पीने के बाद उतर जाय|अति सुंदर|

नरेश सिह राठौड़ ने कहा…

इस प्रकार के नशे की वजह से ही आबकारी वाले बर्बाद हो गए है |

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत खूब !
कॉलिज के दिनों में --उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना
कॉलिज के बाद --उसकी ऑंखें बन जाती हैं भयखाना ।

Dilbag Virk ने कहा…

pine vale kya jane ishq ki may kya hai

mahendra verma ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं

अच्छी कविता है।

udaya veer singh ने कहा…

keval ram ji

apne nam ko sarthak karte huye ,apka
prayas bahut safal hai.../ sacha ishk ruhani hota hai, har-pal chetana men
rahane wala hi ishkkarta hai,anyatha to vasana hai .....

मनोज कुमार ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति। जिस नशे की बात आप कर रहें हैं, उसका नशा अगर हो जाए तो जीवन सफल हो जाए।

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhut hi accha...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार

बहुत सुंदर बात कही.... बेहतरीन अभिव्यक्ति

राज भाटिय़ा ने कहा…

उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना
मुझे बेहोश करता उसका मुस्कुराना
कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!
वाह वाह केवल जी बहुत सुंदर

रचना दीक्षित ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार
उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना.

सुरूर अभी भी बाकी है. बहुत मज़ा आया यह कविता पढकर. मासूम सी सच्चाई पर. बधाई.

minoo bhagia ने कहा…

waah kewal ..'hangama hai kyun barpa thodi si jo pee lee hai ':)

वाणी गीत ने कहा…

उस मय से नहीं मतलब दिल जिससे हो बेगाना ...
मक़सूद है उस मय से दिल ही में जो खींचती है ...
बनी रहे वह मधुशाला जो ऐसी ग़ज़ल लिखवा दे !

***Punam*** ने कहा…

"मेरी बात सुनो जनाब
पीने -पीने में भी हैं बहुत अंतर
तुम पीते मयखाने में , मैं पीता निरंतर"

"वो पीना भी क्या पीना , जो पीने के बाद उतर जाये
पीना तो वह है , जो बिना मयखाने के चढ़ जाए "

खूबसूरत शब्दों में खूबसूरत से एहसास...
और जो चढ़ के न उतरे ये ऐसा ही नशा है...
रोज़-रोज़ मयखाने जाने और पीने-पिलाने की जहमत भी न उठानी पड़ेगी !!
ईश्वर आपका नशा ऐसे ही बरकरार रखे...
ऐसे ही सदा पिलाए कि ज़िंदगी भर ये नशा न उतरे..!!

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

उनकी आँखों से बढ़कर कौन सा मयखाना है ....इश्क से बढ़कर कौन सा नशा !

सुन्दर प्रेम कविता केवलराम जी ....

JHAROKHA ने कहा…

kewal ji
bahut bahut hi achhi v pyaari postaisi ki peene walo ko bhi thodi samajh aajaaye .par unko smjhana itna aasan nhi hota .
वो पीना भी क्या पीना , जो पीने के बाद उतर जाये
पीना तो वह है , जो बिना मयखाने के चढ़ जाए
ye panktiyan man ko chho gai .bahut hi behatreen vakabile tarrif.
badhai
poonam

अमित श्रीवास्तव ने कहा…

is madira ka to nashaa hi kuchh aur hai..

Rakesh Kumar ने कहा…

इश्क के मयखाने का जाम खत्म तो नहीं होता केवल भाई.
नशे में टुन्न हो, तो नशा आपकी कविता में भी उतर आया है.क्या सभी को टुन्न करने का इरादा है.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

आज अपने कॉलेज के दिनों की डायरी देख रहा था तो यह कविता किसी एक पन्ने पर मिल ....
सरासर झूठ......

कौन है वो ......???????

: केवल राम : ने कहा…

बस एक अनुभूत सत्य जिसे जैसे मैंने जिया है हर वक़्त .....कोई नाम नहीं है "वह" .....बस एक प्रेरणा और सुंदर अहसास ....और क्या कहूँ ..!

शिक्षामित्र ने कहा…

ओशो कहते हैं,पीने वाले लोग बहुत मिलनसार होते हैं क्योंकि पीने का मज़ा ही चार लोगों के साथ है।

देवेन्द्र ने कहा…

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हो रामसाहब।साधुवाद।जी आपने सत्य व सुन्दर कहा है कि प्रेम का नशा तो आजीवन शिर चढकर बोलता है।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई।

आकाश सिंह ने कहा…

प्रिय केवल राम जी
आपकी प्रस्तुति पुरे भाव से पढ़ा मैं आपकी कॉलेज वाली डायरी को सलाम करता हूँ जिसमे ये जाम समाहित है |
बहुत ही सुन्दर और मनोरम पंक्तियों का मेल है |
आपने तो संपर्क करना ही छोड़ दिया वैसे कोई बात नही , धन्यवाद |
समय मिले तो मेरे ब्लॉग पे जरूर आयें और कृपया मेरी गलतियों से मुझे अवगत कराएँ |

निवेदिता ने कहा…

बहुत खूब.......

Rachana ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार
उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना
मुझे बेहोश करता उसका मुस्कुराना
कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!
bahut khoob aap sahi karte hain
badhai
rachana

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

मैं पीता निरंतर

सुन्दर रचना!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

नशे के इसी अन्तर से कोई भोगी होता है कोई योगी होता है।

Dr Varsha Singh ने कहा…

कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!

बहुत सुंदर ....
बहुत ही प्रभावी अभिव्यक्ति....
बधाई.

Suman ने कहा…

सही कहा है ! इश्क के नशे के आगे
सब नशा फीका है .........

Rajeev Panchhi ने कहा…

वाह ...बधाई हो! केवलराम जी मज़ा आ गया! क्या ख़ूब लिखा है आपने. तारीफ़ के लिए शब्द ही नहीं मिल रहे.

एम सिंह ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
इश्क के जाम में ही सबसे खूबसूरत नशा होता है.

दुनाली पर देखें
चलने की ख्वाहिश...

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

बहुत खूब!....कविता बहुत कुछ बयां कर रही है!

Minakshi Pant ने कहा…

बहुत खुबसूरत अंदाज़ सच कहा आपने वो पीना भी क्या पीना जो कुछ देर में ही उतर जाये पीने का मज़ा तो उसमें हैं जिसका नशा बिन पिए भी उम्र भर चढ़ा रहे |
खुबसूरत रचना |

Dr Varsha Singh ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार

भावुक...सुन्दर...मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....
Thanks for sharing.

mahendra srivastava ने कहा…

सच कहा आपने की वो पीना भी क्या पीना जो उतर जाए... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

केवल राम जी डायरी और चेक कीजिए....बड़ी काम की चीज़ें है उस डायरी में एक-एक कर के प्रस्तुत कीजिए.....पीना और पिलाना आपने कुछ समझाया..बढ़िया मजेदार रचना बधाई

Pradeep ने कहा…

केवलराम जी नमस्ते!

"वो पीना भी क्या पीना , जो पीने के बाद उतर जाये
पीना तो वह है , जो बिना मयखाने के चढ़ जाए"


भाई वाह....आपने भी क्या कमाल जवाब दिया है....

विजय रंजन ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार
उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना
मुझे बेहोश करता उसका मुस्कुराना
कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!

bahut badhiya Kewal..

प्रेम सरोवर ने कहा…

वाह,वह पीना भी क्या जो विना मयखाने के ही चढ जाए।छा गए गुरू।चलते-चलते इतने दूर चले गए कि 'प्रेम सरोवर" में डुबकी लगाना ही शायद भूल से गए हो। अच्छा लिखा है आपने।धन्यवाद।

ज्योति सिंह ने कहा…

इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार
उसकी आँखें हैं मेरी मयखाना
मुझे बेहोश करता उसका मुस्कुराना
कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!
wo din bhi kuchh ajeeb the ,main bhi atit me chali gayi ,bahut achchha kiya likhkar ,itni sundar baate hai ,nasha khoobsurat hi hona chahiye .

BrijmohanShrivastava ने कहा…

बहुत सार की बात कह दी वो पीना क्या जो पीने के बाद उतर जाये। असली नशे की पूर्ति तो वह है जिससे रोम रोम खिल गाता रहता है।

Dinesh pareek ने कहा…

आप की बहुत अच्छी प्रस्तुति. के लिए आपका बहुत बहुत आभार आपको ......... अनेकानेक शुभकामनायें.
मेरे ब्लॉग पर आने एवं अपना बहुमूल्य कमेन्ट देने के लिए धन्यवाद , ऐसे ही आशीर्वाद देते रहें
दिनेश पारीक
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
http://vangaydinesh.blogspot.com/2011/04/blog-post_26.html

veerubhai ने कहा…

beshak pahle "BLOGAACHAARYA BANENGEN AAP -hauslaa rakhiye blogiyaa bhaai -
chithhthhe kaa apnaa nashaa hai ,chithhthhaa -khori kyaa shraab -khori se kisi bhi maayne me kam Hai ?.
pahle baat aappki rachnaa ki -uspe ek shair -
JAAM KO TAKRAA RHAA HOON JAAM SE ,
KHELTAA HOON GARDISHE AIYAAM SE ,
UNKAA GAM UNKAA TASVVUR ,UNKI YAAD ARE ,KAT RAHI HAI ZINDAGI AARAAM AE ..
bachchanji hi kaun si shraab peete the -
fir bhi kahaa -jahaan kahin mil baithhe ham tum vahin rahi ho madhushaalaa ."ISHK KAA JAAM PEETAA HOON ,SARE AAM PEETAA HOON
veerubhai

दिगम्बर नासवा ने कहा…

पीते तो हम भी हैं पर बिल्कुल खालिस ... पानी पीते हैं ...
अच्छी लगी आपकी कविता ...

एम सिंह ने कहा…

सर जी नई पोस्ट दाल दीजिए...

दीप्ति शर्मा ने कहा…

kyu nhi pite ho tum
vaah

Babli ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आकर सुंदर कविता पढ़ने को मिला जिसके लिए धन्यवाद! बहुत बढ़िया लगा!

Amrita Tanmay ने कहा…

बेहतरीन,बेहद सुंदर और सार्थक कविता... बधाई

Kunwar Kusumesh ने कहा…

रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..

ये भी अच्छी रही.

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

"इश्क का जाम पीता हूँ मैं
उनके ख़्वाबों के नशे में जीता हूँ मैं
मुझे नशा है इतना बेशुमार
नहीं जिसका कोई पारावार "

waah ..............bahut sunder likha aapne .

RAJPUROHITMANURAJ ने कहा…

आपका ब्लॉग बहुत पसंद आया है!

RAJPUROHITMANURAJ ने कहा…

आपका हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

Apanatva ने कहा…

kewaljee jitne sunder aapke jajwat hai utnee hee sunder unakee abhivykti hai .

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐं.

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐं.

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

श्रंगार की अच्छी अनुभूति..बधाई! मैंने श्रंगार जब भी लिखा वह गड़बड़ा गया। गड़बड़ श्रंगार का एक मुक्तक प्रस्तुत है।
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प्यार का मौसम सुहाना हूँ।
रोज मिलने का बहाना चाहता हूँ॥
नल में पानी कई दिन से था नहीं-
आज आया है नहाना चाहता हूँ॥
--------------------------
सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

Rakesh Kumar ने कहा…

रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!

केवल भाई 'रूप लावण्य' में सुग्रीव बन ज्यादा मस्त मत हों,वर्ना रामजी को 'लक्ष्मण'जी को भेजना पड़ेगा.आखिर 'सीता'जी की खोज करनी है.

बड़ी गलत बात है,आप ओरों के ब्लॉग पर जा रहें हैं,पर मेरे ब्लॉग पर नहीं आ रहें हैं.ये बहुत नाइंसाफी है.जो 'राम' जी ही सुग्रीव बन रहें हैं.

एस.एम.मासूम ने कहा…

केवल जी अवकाश से लौटा तो आप कि सुंदर कविता पढ़ के सारी थकान उतर गयी.

एम सिंह ने कहा…

दुनाली पर आएं-
कहानी हॉरर न्यूज़ चैनल्स की

एम सिंह ने कहा…

पीने से किडनी खराब हो जाती है...
पता है कि नहीं???

एम सिंह ने कहा…

नशे में रहना छोडिये अब तो होश में आईये...

एम सिंह ने कहा…

पियो और जियो का नियम अब कारगर नहीं...

एम सिंह ने कहा…

मुझे पता है आप तंग आ चुके हैं मेरे कमेंट्स से...

पर.... क्या करूँ....

एम सिंह ने कहा…

100वें कमेन्ट तक इंतज़ार नहीं कर सकता था ना... इसलिए 4-5 कमेन्ट कर दिए... एक साथ...
और हाँ शतक की बधाई...
आप हो गए ब्लोगिंग के सहवाग.

दुनाली पर आएं-
कहानी हॉरर न्यूज़ चैनल्स की

संजय भास्कर ने कहा…

100 ke comment ke liye bdhai kewal bhai

Rakesh Kumar ने कहा…

सौ में दो मेरी भी है,और आपकी ?
कहाँ हों 'सुग्रीव'जी,होश में आओ
सुग्रीव से राम ही नहीं 'केवल राम'बन जाओ.
'keval ram' ban kar hi aage badengen aap.

निर्मला कपिला ने कहा…

रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो ..!
अच्छा तो आजकल नशा करने लगे हो रूप का बेटा सुधर जाओ नही तो पछताओगे। शुभकामनायें।

विशाल ने कहा…

keval ram ji,kahan hain aap.
nayee post ka intzaar hai.
jaam pila ke chhup gaye ho.

: केवल राम : ने कहा…

लगता है आप सबने अब बहुत जाम पी लिया अब पोस्ट डाल देता हूँ ....अब इन्तजार खत्म...आप सबका शुक्रिया इस स्नेह और सम्मान के लिए ...!

Surendrashukla" Bhramar" ने कहा…

प्रिय केवल राम जी -आप का इश्किया जाम मदहोश करने वाला प्यारी रचना खूबसूरत -आइये लोगों को इसी तरह मदमस्त करते बढ़ें -निम्न प्यारी पंक्तियाँ

कोयल सा मधुर कंठ , जब उसका गूंजता
मेरा रोम - रोम गाता खिलता
रूप लावण्य की मूर्ति है वो
इसलिए मेरी नशे की पूर्ति है वो
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

बेनामी ने कहा…

अच्छा है यह इश्क का जाम पीना ...!

anju(anu) choudhary ने कहा…

एक जाम हम भी पीते हैं
जिसे हम भक्ति का नाम देते हैं
ना मैं सीता ,ना राधा ,ना मीरा हूँ
फिर भी उस श्याम के नाम का
जाम सुबह शाम पीते हैं .....अनु