05 अप्रैल 2011

कविता का दर्द


कागज की धरा पर
कवि की कलम से अवतरित
चार छ : शब्दों की वह पंक्ति
जब मेरे सामने , प्रस्तुत हुई
सहसा ....!
विषय तथा भाव पर मेरी नजर टिक गयी
विषय को समझने की कोशिश में
मेरी सोच की सारी सीमाएं टूट गयी 
जाने कवि ने उस कविता को
कितनी समस्याओं से सजा रखा था....!

इतने उलझे प्रश्न ???
इतनी उलझी समस्याएँ
आज के चमक के इस बाज़ार से
उस कविता में समाई थी
मैं थोड़ी देर.... उस कविता को निहारता रहा
बड़ी मुश्किल से
परिचय मैंने उस कविता का जाना ....!
बस उसी क्षण
उसने रुन्धते स्वर में
क .....ह ....ना ...शुरू किया

कवि था कभी
समाज का दर्पण
थी कविता समाज की पूंजी
वही कवि आज पुरस्कार की होड़ में
छदम नेता की चाटुकारिता में
मुझे माध्यम बनाकर
क्षतिग्रस्त कर रहा है , मेरी अस्मिता को

मुझे कर रहा है , शर्मिंदा ...
आज समाज की समस्या को , दुःख को
कवि कर रहा है नजर अंदाज
आज समाज  में
भ्रष्टाचार , बलात्कार , स्वार्थ
क्षेत्रवाद , जातिवाद , भाई भतीजावाद
साथ में घोर अपराध
कौन करेगा सतर्क , इस  समाज को
जहां ...!
नंगे बदन की नुमाइश लगी है
स्वर्ग की परियों के तन पर
कपडा सिकुड़ता जा रहा है
अंधी श्रद्धा के नाद पर
भक्त झूमता जा रहा है

भूल गयी वो राम की मर्यादा
कहाँ गया वो संतों का जीवन सादा
रह गयी मात्र शब्दों की पंक्ति
गांधी की 'सत्य और आहिंसा

अब थोथा लगने लगा है
"सत्यमेव जयते " 
टूट गए हैं ईमान
बहुत नीचे गिर चुका है इन्सान ..!
कर ली है उसने बहुत भौतिक तरक्की
लेकिन फिर भी नहीं है आत्मिक शांति
बहुत वीभत्स हो गया है संसार
क्या कहूँ ...?
यहाँ है सब ओर हाहाकार ...


फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!

71 टिप्‍पणियां:

Rakesh Kumar ने कहा…

'फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!'

कितना सार्थक है कविता का कहना और कविता का मौन.केवल राम जी आपके पास पवित्र दिल है कविता के दर्द को समझने का और उस दर्द को हम तक पहुचाने का.
शानदार प्रस्तुति के लिए आभार.नवसंवत्सर पर हार्दिक शुभ कामनाएँ .

Rahul Singh ने कहा…

मौन न होने दें कविता को.

sushma 'आहुति' ने कहा…

इतने उलझे प्रश्न ???
इतनी उलझी समस्याएँ
आज के चमक के इस बाज़ार से
उस कविता में समाई थी... bhut sarthak hai kavita ka dard.. ek kavita me jisme hamne dil ka har dard kah diya...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

समाज की तरह ही कविता भी पीड़ित है।

रचना दीक्षित ने कहा…

बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान.

कविता का दर्द आखिर छलक ही पडा. इस कविता के माध्यम से कई गम्भीर विषय छुए हैं. सार्थक प्रस्तुति.

सतीश सक्सेना ने कहा…

हम इंसान बने रहें ...यह प्रयत्न ही होता रहे तो काफी है ! शुभकामनायें केवल राम !

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

kevalram ji namaskaar,

aapki kavitayen bahut hi prabhavshali hoti hain ,

ek ek panktiyan bahut sundar

दर्शन कौर धनोए ने कहा…

अब थोथा लगने लगा है
"सत्यमेव जयते "
टूट गए हैं ईमान
बहुत नीचे गिर चूका है इन्सान ..!
कर ली है उसने बहुत भौतिक तरक्की
लेकिन फिर भी नहीं है आत्मिक शांति
बहुत वीभत्स हो गया है संसार
क्या कहूँ ...?
यहाँ है सब ओर हाहाकार ...
इतने मार्मिक शब्द मानो जला ही देगे इस भ्रष्टाचार को !केवलराम जी बहुत सुन्दर ! मन इन बातो को सोच कर बेहाल हो जाता है पर कु छ कर नही पता ?

Dinesh pareek ने कहा…

Nahut Acchi rachna ki hai apne bahut darad bhar diya apne is kavita me ati sunder

सदा ने कहा…

तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!

बहुत ही प्रेरक संदेश देती पंक्तियां ...अनुपम प्रस्‍तुति ।

anshumala ने कहा…

क्या करे कविता खुद इसके खिलाफ कुछ नहीं कर सकती उसके लिए तो कवियों को ही आगे आना होगा |

मुसाफिर क्या बेईमान ने कहा…

यही है सच्चाई आज के भोतिक जीवन की
जहाँ कविता और कवितावली को सिर्फ वस्तु बना कर बाजारीकरण का जरिया बना लिया है.

Atul Shrivastava ने कहा…

बस इतना कह कर कविता मौन है ....!
मौजूदा दौर की हकीकत को बयां करती रचना।
गहरे भाव।
राहुल जी की बातें महत्‍वपूर्ण।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

अब थोथा लगने लगा है
"सत्यमेव जयते "
टूट गए हैं ईमान
बहुत नीचे गिर चुका है इन्सान ..!
कर ली है उसने बहुत भौतिक तरक्की
लेकिन फिर भी नहीं है आत्मिक शांति
बहुत वीभत्स हो गया है संसार
क्या कहूँ ...?
यहाँ है सब ओर हाहाकार ...


shaandaar!!
marmik rachna..

शिवकुमार ( शिवा) ने कहा…

बहुत सुंदर कविता ..

जीवन का उद्देश ने कहा…

( समाज में
भ्रष्टाचार , बलात्कार , स्वार्थ
क्षेत्रवाद , जातिवाद , भाई भतीजावाद
साथ में घोर अपराध
कौन करेगा सतर्क , इस समाज को
जहां ...!
नंगे बदन की नुमाइश लगी है
स्वर्ग की परियों के तन पर
कपडा सिकुड़ता जा रहा है
अंधी श्रद्धा के नाद पर
भक्त झूमता जा रहा है

भूल गयी वो राम की मर्यादा
कहाँ गया वो संतों का जीवन सादा
रह गयी मात्र शब्दों की पंक्ति )

हृदय को छू गया आप का सुन्दर विचार
जनता पर हो गया आप का बहुत आभार ।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'फिर कविता ने मुझसे कहा

तुम मत करना कभी

जीवन की वास्तविकताओं से समझौता

बस खुद को बनाये रखना इंसान'

***************************

यथार्थ को मुखर करती ....सार्थक सन्देश देती..... कविता की कविता

Kunwar Kusumesh ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान

वाह वाह बहुत खूब.

वन्दना ने कहा…

आपकी कविता ने निशब्द कर दिया………………वास्तविकता पर गहरा प्रहार्।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!


कविता और कवि का यह संवाद अंतस को छू गया...
इस मर्मस्पर्शी रचना के लिए साधुवाद !

ZEAL ने कहा…

समझौता किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए। कविता का मौन टूटे तो शायद कुछ और भी हल मिलें ।

shikha varshney ने कहा…

सभी आहत हैं तो कविता भी....

संध्या शर्मा ने कहा…

'फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!'

केवल राम जी आपके पास पवित्र दिल और सबसे बड़ी बात एक पवित्र आत्मा है, तभी तो कविता ने इतनी उम्मीद से आपसे अपने दर्द को व्यक्त किया.. अब वह मौन नहीं रहेगी बोलेगी आपकी रचनाओं के माध्यम से... उसके दर्द को समझने और उसे हम तक पहुचाने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार....

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

कविता के मौन को मुखरता दीजिये ।
उसकी कामना को आप पूर्ण कीजिये ।

शुभकामनाओं सहित..

आकाश सिंह ने कहा…

आप को और आपके पुरे परिवार जनों को नवसंवत्सर की शुभ कामनाये|
उम्दा शब्दों का इस्तेमाल कियें हैं आप धन्यवाद|

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

समाज के घात प्रतिघात से आहत है कवि और कविता.

Dilbag Virk ने कहा…

kavita ke madhym se kvi karm aur insaniyt ka sandesh deti rachna
sunder kvita ke lie bdhaai

cmpershad ने कहा…

असली कवि तो आज भी समाज को दिशा और दर्पण दिखाता है। पुरस्कार की होड में कवि नही चापलूस है जी :)

cmpershad ने कहा…

असली कवि तो आज भी समाज को दिशा और दर्पण दिखाता है। पुरस्कार की होड में कवि नही चापलूस है जी :)

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सचमुच कविता में बहुत दम है ।

शशांक मेहता ने कहा…

बहुत ही सार्थक और मर्मस्पर्शी रचना है .................धन्यवाद

BrijmohanShrivastava ने कहा…

ये चाटुकारिता तो न जाने कब स ेचल रही है रे भैया ।धनबन्ता के व्दार मे खडो रहत गुण बंता ,पहले एक दो कवि चारण भाट आदि हुआ करते थे आज तो कवियों को चालीसा लिखने से ही फुरसत नहीं है।मुझे कर रहा शर्मिन्दा वाला पद ,और इसके बाद का नुमाइश वाला पद बहुत बेहतर लिखा है आपने । सीधी बात खरी बात

आकाश सिंह ने कहा…

कविता की अटूट दास्तान को अच्छे और सरल ढंग से संकलित किये हैं | आप जैसे लोगों के माध्यम से ही इसकी पराकास्ठा बनी हुई है| अच्छी कविता के लिए आभार |

Kailash C Sharma ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!

बहुत सटीक चोट आज के हालात पर..बहुत सार्थक और भावपूर्ण प्रस्तुति..बहुत सुन्दर

सुबीर रावत ने कहा…

इस भौतिकवादी युग में सभी कुछ तो बिक रहा है भाई केवल जी, क्या कविता, क्या कहानी ...... सत्य, आदर्श, मर्यादा, नैतिकता, मूल्य, सिद्धांत ... और क्या क्या नहीं. ... इस अंधड़ में कुछ बचा रह पायेगा क्या ?....... इस सुन्दर पोस्ट के लिए आभार .... शुभकामनायें.

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

बहुत ही सार्थक कविता है । आभार केवल राम भाई !

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

अब थोथा लगने लगा है
"सत्यमेव जयते "
टूट गए हैं ईमान
बहुत नीचे गिर चुका है इन्सान

बहुत सटीक प्रासंगिक पंक्तियाँ हैं...... सच को सामने रखतीं....

अरविन्द जांगिड ने कहा…

कविता में पीड़ा साफ़ दिखाई दे रही है, इंसान ही रहते तो क्या बात थी.

आभार.

विशाल ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!

आदरणीय केवल जी,जब कविता कवि से संवाद करने लग जाये तो सार्थक हो जाती है.
आपकी कविता अब मौन नहीं होगी,अब तो और मुखरित हो जायेगी.
कविता का दर्द बाटने के लिए आभार.

उसने रुन्धते स्वर में
क .....ह ....ना ...शुरू किया

आपकी इस लाइन ने दिल छू लिया .

Dr Varsha Singh ने कहा…

तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान....

सार्थक कविता...
सार्थक प्रस्तुति..
हार्दिक शुभकामनाएँ .

राजीव थेपड़ा ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना.....

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही सार्थक और मर्मस्पर्शी रचना है| धन्यवाद|

Pratik Maheshwari ने कहा…

यह बात तो सत्य है कि कविता समाज का प्रतिबिम्ब हुआ करता था और आज इस अंतर्जालिक युग में लोग अपनी रचनाओं को होड़ में शामिल करने से ज्यादा नहीं मान रहे हैं..
पर फिर भी कुछ लोग केवल अपनी दिल की बात कहने के लिए लिखते हैं तो मेरे ख्याल से उन्हें वो आज़ादी देने में कोई हर्ज़ नहीं है..

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान

बहुत खूब

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान

बहुत खूब

nivedita ने कहा…

बेहतरीन ...

ज्योति सिंह ने कहा…

अब थोथा लगने लगा है
"सत्यमेव जयते "
टूट गए हैं ईमान
बहुत नीचे गिर चुका है इन्सान ..!
कर ली है उसने बहुत भौतिक तरक्की
लेकिन फिर भी नहीं है आत्मिक शांति
बहुत वीभत्स हो गया है संसार
क्या कहूँ ...?
यहाँ है सब ओर हाहाकार ...


फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!
behtrin rachna ,har cheej ke do pahloo hote hai aur shayad iske bhi hai .

mahendra verma ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान

कविता इसी तरह हमें सजग करती रहे।

AREEBA ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
bahut khub sundar

तरुण भारतीय ने कहा…

कर ली है उसने भौतिक तरक्की लेकिम फिर भी नहीं आत्मिक शांति बहुत खूब .......................

chirag ने कहा…

bahut khoob...kya likhate ho yar tum

प्रेम सरोवर ने कहा…

वहुत ही सुंदर प्रस्तुति। कविता तो कविता ही रहेगी -यह तो हम हैं जो उसे हर रूप में शोषित करते रहते हैं।कोई न को बहाना बना कर।

रचना दीक्षित ने कहा…

कवि था कभी
समाज का दर्पण
थी कविता समाज की पूंजी
वही कवि आज पुरस्कार की होड़ में
छदम नेता की चाटुकारिता में
मुझे माध्यम बनाकर
क्षतिग्रस्त कर रहा है , मेरी अस्मिता को

वाह आज तो कविता के दर्द को बखूबी बयां किया है आपने. बहुत ही बढ़ीया लगी यह सोच. सोच में बदलाव आना जरूरी है.

Suman ने कहा…

keval ji,
bahut sunder hai rachna ...
katu satya hai.....

Anand Dwivedi ने कहा…

कौन करेगा सतर्क , इस समाज को
जहां ...!
नंगे बदन की नुमाइश लगी है
स्वर्ग की परियों के तन पर
कपडा सिकुड़ता जा रहा है
अंधी श्रद्धा के नाद पर
भक्त झूमता जा रहा है
..
..
केवल जी चाँद पंक्तियाँ पढ़ कर ही पता चल गया कि आप जुगाडू कवी नही हो...अब आपके दर्शन आपके दर्शन के लिया आता रहूँगा धन्यवाद बंधुवर !

मेरे भाव ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!


lekin samaj ko jaga rahi hai.

Amrita Tanmay ने कहा…

कविता का दर्द और आपके शब्द एकाकार होकर एक ऐसा चित्र खींच रहे है कि देखकर दर्द हो रहा है ..बहुत प्रभावी रचना

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

इतने उलझे प्रश्न ???
इतनी उलझी समस्याएँ
आज के चमक के इस बाज़ार से
उस कविता में समाई थी
मैं थोड़ी देर.... उस कविता को निहारता रहा
बड़ी मुश्किल से
परिचय मैंने उस कविता का जाना ....!
बस उसी क्षण
उसने रुन्धते स्वर में
क .....ह ....ना ...शुरू किया
बहुत सुंदर कविता भाई केवल राम जी बधाई |

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

इतने उलझे प्रश्न ???
इतनी उलझी समस्याएँ
आज के चमक के इस बाज़ार से
उस कविता में समाई थी
मैं थोड़ी देर.... उस कविता को निहारता रहा
बड़ी मुश्किल से
परिचय मैंने उस कविता का जाना ....!
बस उसी क्षण
उसने रुन्धते स्वर में
क .....ह ....ना ...शुरू किया
बहुत सुंदर कविता भाई केवल राम जी बधाई |

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

aap jab apni asmita ka sauda nahi kar paye to aap jaise aneko kavi hain jo kabhi bhi sauda nahi karenge....vishwas rakhiye.ham aapke sath hain.

bahut bahut shaandar, prabhavshali prastuti.

ashish ने कहा…

कविता की पीड़ा भाव विह्वल कर गयी . .सुँदर रचना .

संजय भास्कर ने कहा…

केवलराम जी
इतने उलझे प्रश्न ???
इतनी उलझी समस्याएँ
आज के चमक के इस बाज़ार से
उस कविता में समाई थी
मैं थोड़ी देर.... उस कविता को निहारता रहा
बड़ी मुश्किल से
परिचय मैंने उस कविता का जाना ....!
...........बहुत सुन्दर
सार्थक सन्देश देती...........कविता

संजय भास्कर ने कहा…

भूल गयी वो राम की मर्यादा
कहाँ गया वो संतों का जीवन सादा
रह गयी मात्र शब्दों की पंक्ति
गांधी की 'सत्य और आहिंसा'

बहुत सुन्दर लगी आपकी कविता- सुंदर, सटीक और सधी हुई।
मेरे पास शब्द नहीं हैं!!!!तारीफ़ के लिए....केवलराम जी

राजेश सिंह ने कहा…

कविता की चुप भी दहाड़ से कम नहीं.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

खूब कविता का दर्द उकेरा है आपने.

VIJUY RONJAN ने कहा…

bahut acchaa kewal ji.kavita khud hi kayi prashn karti hai hamse.Meri kavitayein to kbhi kabhi vidroh bhi kar deti hain...
aapko padhna accha lagta hai....likhte rahiye.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

फिर कविता ने मुझसे कहा
तुम मत करना कभी
जीवन की वास्तविकताओं से समझौता
बस खुद को बनाये रखना इंसान
तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान
बस इतना कह कर कविता मौन है ....!

कविता ने कह दिया जो कहना था ..अब कवि के मुखर होने का इंतज़ार कर रही है ..बहुत सार्थक प्रस्तुति ..

kase kahun?by kavita. ने कहा…

बस इतना कह कर कविता मौन है ..kavita ki vyatha dil ko vyathit kar gayee....usske moun ki chitkar ko sunana jaroori hai...

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

कविता वाही होती है जिसमें अंतर्मन छलक कर बाहर आता है,आज की व्यावसायिक-युग में जो कविता बाज़ार का हिस्सा हो गयी है,उसे कविता तो नहीं कह सकते !

udaya veer singh ने कहा…

priy keval ram ji
aapki kavita padhane ke bad apne ko ak tipaani karne se rok nahin paya .rachana ki sarthakata uski maulikata par aadharit hoti hai ,jisko aapne puri siddat ke sath sanjoya hai . bahut sunder kavy -shilp . badhayi .

Rajey Sha राजे_शा ने कहा…

ठीक है।