14 सितंबर 2010

सागर के उस पार प्यार


इस पार से उस पार
विशाल है जिसका संसार
यहाँ जरुरत, वहां चाहत
इसकी महिमा बेशुमार
ना कोई किनारा ना दीवार
ना पता गहराई का ना आकार
सागर के उस पार प्यार।

कोशिश करते हैं लोग
इससे पाने की
सोचते हैं ..................?
पा जाएँ इसका अंत बनके दोस्त यार ॥
सागर से गहरा है यह
डूबने वाले बहुत डूबे हैं
कुछ कर सामना मछ्लियौं का , मगरमच्छों का
अपना लक्ष्य चूके हैं.....!
 
मैं भी कर रहा हूँ कोशिश
इस पार से, उस पार जाने की

साहिल का है इन्तजार
अंधी राह है मेरी
साहिल मद्दद्गर
आएगा जब ज्वार -भाटा
नौका लग जाये उस पार
आएगा तूफ़ान अगर
तो समां लेगी मंझधार
पर, विश्वास के साथ बढ़ना होगा
अपना लक्ष्य पूर्ण करना होगा
सागर के उस पार प्यार।

इस सागर के उस पार
आनंद है बेशुमार ................
मेरे साहिल मुझे ले चलना
जहाँ बैठा है मेरा दोस्त यार
सागर के उस पार प्यार ॥

4 टिप्‍पणियां:

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता...बधाई.
______________

'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें
अभिलाषा की तीव्रता एक समीक्षा आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

कविता रावत ने कहा…

Sundar pyarbhare ahsas

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

नौका मे लगा हो जब
आत्मबल का मजबूत पाल
नही होगी वह कभी
भीषण तूफ़ानों से बेहाल
मौत से भी ऊंची लहरों से जूझकर
वह जाएगी महासागर पार
वक्त धैर्यवान नाविक का
करता है इंतजार और सत्कार