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12 अक्टूबर 2015

जन्मदिन और जीवन की प्रासंगिकता

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जीवन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है. मनुष्य जीवन के विषय में शायद तब भी कोई विचार नहीं करता जब वह बहुत गहरे संकट में होता है. यहाँ तक कि मनुष्य जब मृत्यु शैय्या पर होता है तब भी वह जीवन की प्रासंगिकता के विषय में नहीं, बल्कि अपनी बनी-बनायी दुनिया के विषय में सोचता है. उसका मन इस पहलू पर भी विचार करता है कि उसके न होने से कई लोगों का जीवन किस तरह से प्रभावित हो सकता है. मनुष्य जीवन भर कुछ ‘बेहतर’ करने की आशा से जीता है. लेकिन इस बेहतर में उसके अपने जीवन पहलू, उसकी अपनी जरूरतें, अपनी इच्छाएं और लालसाएं ज्यादा जुडी होती हैं. इन सबकी पूर्ति के लिए वह निरन्तर सोचता है, विचारता है और ऐसा प्रयास भी करता है कि उसे कम से कम समय में अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो और वह अपना जीवन सुखपूर्वक जी सके. अधिकतर लोगों का जीवन के प्रति यही नजरिया होता है और वह इसी तरह जीवनयापन करते हुए आगे बढ़ते हैं.
जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण कैसा भी हो, हम जीवन में कुछ भी अर्जित करना चाहते हों. लेकिन एक बात तो तय है कि जीवन अपनी गति से चलता है. हम न तो उसकी समय सीमा बढ़ा सकते हैं और न ही यह हमारे वश में है कि हम उस गति को कम कर सकते हैं. जीवन तो साँसों के सफ़र का उत्सव है. साँसों की यह लड़ी जब तक चल रही है, तब तक जीवन है और जैसे ही इस लड़ी का क्रम टूटा जीवन-जीवन नहीं रह जाता. हम ‘काल’ से बंधे हुए हैं और ‘साँसों की पूंजी’ हमारे पास सीमित है. अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसका उपयोग कैसे करते हैं. क्योँकि मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसके पास यह अधिकार है कि वह अपने जीवन के लिए क्या लक्ष्य निर्धारित करता है और किस तरह से वह जीवन को जीता है. इसलिए अध्यात्म की भाषा में मनुष्य जीवन को ‘कर्म योनि’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता है, और यह भी बताया जाता है कि मनुष्य जन्म इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त चर अचर प्रकृति में सर्वश्रेष्ठ है. इसकी सर्वश्रेष्ठता के कई पहलू हमारे सामने हैं और ऋषि-मुनियों, गुरु-पीर-पैगम्बरों ने मनुष्य जीवन की सर्वश्रेष्ठता के इन पहलूओं को हमारे सामने लाने का प्रयास भी किया है. साथ ही मनुष्य को यह भी निर्देश दिया है कि वह जीवन को किस तरह से जिए और किस तरह के लक्ष्य वह अपने लिए निर्धारित करे.
मनुष्य जीवन की महत्ता और उसके जीवन लक्ष्यों के निर्धारण पर लम्बे समय से विचार किया जाता रहा है. लेकिन अभी तक कोई ऐसा निष्कर्ष हमारे सामने नहीं है कि मनुष्य को जीवन सिर्फ इसी कार्य के मिला है. मनुष्य के जीवन के लक्ष्य देश, काल और समय के अनुसार बदलते रहे हैं. इसलिए हम देखते हैं कि पूरे विश्व में मानव जीवन के लक्ष्यों में एकरूपता देखने को नहीं मिलती. लेकिन एक बात तो तय है कि मनुष्य का जन्म और जीवन के विकास की प्रक्रिया पूरे विश्व में लगभग एक जैसी ही है. इसीलिए तो महापुरुषों ने एक नूर ते सब जग उपज्या  कह कर जीवन और जगत की एकरूपता को समझाने का प्रयास किया है. लेकिन फिर भी मनुष्य अपनी बुद्धि-विवेक और परिस्थिति के हिसाब से अपनी प्राथमिकताएं खुद तय करता है. जीवन में उसके अपने लक्ष्य हैं और यह होने भी चाहिए. जहाँ तक दार्शनिकों और गुरु-पीर-पैगम्बरों का सवाल है वह तो मनुष्य को यह बात समझाने का प्रयास करते हैं कि मनुष्य को जीवन किस मकसद के लिए मिला है और उसी मकसद की और वह उसका ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास करते हैं. गुरु-पीर-पैगम्बर मनुष्य को जीवन जीने की पद्धति सिखाते रहे हैं और उसके जीवन में उच्च आदर्शों की स्थापना हेतु प्रेरित करते रहे हैं. लेकिन यहाँ यह जरुरी नहीं कि हर व्यक्ति गुरु-पीर-पैगम्बरों के बताये हुए मार्ग का अनुसरण करे और उसी अनुसार अपने जीवन के लक्ष्य निर्धारित करे. यह सब कुछ मनुष्य की अपनी सोच पर निर्भर करता है और जहाँ तक जीवन लक्ष्य का प्रश्न है वह मनुष्य को अपनी सोच से ही निर्धारित करना होता है. दूसरों के बताये हुए मार्ग का अनुसरण करते हुए मनुष्य कभी भी महानता की सीमा तक नहीं पहुँच सकता. हाँ इतना जरुर है कि वह अगर किसी आदर्श का अनुसरण करते हुए जीवन जी रहा है तो अपने मनुष्य होने का प्रमाण दे सकता है. मानवीय आदर्शों की स्थापना में उसका योगदान गिना जा सकता है. लेकिन यहाँ इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि हम किसी का भी अनुसरण कर रहे हों वहां हम अपनी वुद्धि का जरुर प्रयोग करें. अगर हम ऐसा करते हैं तो हम अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व कायम कर सकते हैं.
जीवन और जीवन की प्रासंगिकता मनुष्य के सामने यक्ष प्रश्न की तरह है, और इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य को अपने विवेक से खोजने का प्रयास करना चाहिए. क्योँकि मनुष्य जीवन भर बाहर की दुनिया को विश्लेषित करने का प्रयास करता रहता है और यह होना भी चाहिए. लेकिन जितना वह बाहर की दुनिया पर ध्यान केन्द्रित करता है उतना ही वह अपने भीतर भी ध्यान केन्द्रित करे तो परिणाम उत्साहजनक हो सकते हैं. क्योँकि जीवन की वास्तविक यात्रा भीतर से शुरू होती है और उसका कोई अन्त नहीं है. मनुष्य भीतर से जितना बेहतर होगा बाहर की दुनिया वह उतनी ही बेहतर बनाने का प्रयास करेगा. हम व्यावहारिक जीवन में देखते हैं कि मनुष्य की सोच किस कदर उसके और उसके सम्पर्क में आने वाले मनुष्यों के जीवन को प्रभावित करती है. इसलिए जीवन में हर कर्म का महत्व अधिक बढ़ जाता है. हमारे जीवन की प्रासंगिकता का निर्धारण किसी जीवन के किसी एक पहलू से नहीं होता, इसके लिए हमें सतत अभ्यास करते हुए, मानवीय मूल्यों को जीवन में धारण करते हुए जीवन के सफ़र को तय करना होता है. अगर हम ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं तो निश्चित रूप से हमारे जन्म का लक्ष्य तय हो जाता है और जीवन की प्रासंगिकता का निर्धारण भी, लेकिन अन्तिम निर्णय फिर भी हमें अपने ही विवेक के अनुसार लेना होगा.

26 जून 2014

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

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जीवन का क्रम है ही कुछ ऐसा कि आपको कहीं भी किसी भी परिस्थिति का सामना कर पड़ सकता है. लेकिन अगर आप अपने दृढ निश्चय के साथ आगे बढ़ रहे हैं तो फिर आपके लिए हर परिस्थिति एक नया जोश, एक नयी ऊर्जा पैदा करती है. हालाँकि जीवन का यह क्रम भी है कि गिरते वही हैं जो चढ़ने की कोशिश करते हैं, और जब आप गिर रहे हों तो जिसने आपको उठाया है वह आपके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है. जब आप चढ़ने का प्रयास कर रहे हैं तब भी अगर कोई आपको आपके लक्ष्य तक पहुंचाने का सहभागी बनता है तो वह भी आपके लिए किसी ईश्वर से कम नहीं होता.

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और यही इसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है. यह अपनी बुद्धि के बल पर पूरी सृष्टि के रहस्यों को समझने की चेष्टा करता है और ऐसा प्रयास उसने आज तक किया भी है. लेकिन समय के साथ-साथ उसकी रुचियाँ और जीवन की प्राथमिकतायें बदलती रही हैं. फिर भी उसके जीवन का आधार नहीं बदला है और न ही वह बदल सकता है. क्योँकि जीवन तो प्रकृति का हिस्सा है और जब तक जीवन है तब तक हमें प्रकृति से जुड़े रहना होगा. हमारे जीवन का निर्माण ही प्रकृति के अनुकूल हुआ है तो फिर हम किस तरह से प्रकृति से अलग रह सकते हैं. लेकिन आज का मनुष्य इस बात को समझने की चेष्टा नहीं कर रहा है. उपभोगतावादी संस्कृति ने उसे बहुत संकुचित बना दिया है. अब वह समाज के लिए नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ अपने लिए कार्य करने में विश्वास करता है. मनुष्य की इस संकुचित सोच ने कई बार इस सृष्टि में भयंकर तहस-नहस मचाई है और अनेक निर्दोष लोगों का ही नहीं बल्कि प्रकृति के अनेक जीवों के जीवन के लिए भी संकट पैदा किया है.

व्यावहारिक स्तर पर हम सोचें तो यह बात हमें समझ आ जाएगी कि जीवन की वास्तविकता क्या है? मैं
इस प्रश्न का उत्तर वर्षों से खोज रहा हूँ और अब तक के अनुभव के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जीवन एक क्षण है. हम जीवन को बेशक दिन, सप्ताह, महीने और साल के आधार पर गिनते हैं. लेकिन वास्तविकता यह है कि जीवन एक क्षण है. हमारे एक क्षण में लिए गए निर्णय कई बार सिर्फ हमें प्रभावित करते हैं, लेकिन बहुत बार ऐसा होता है कि वह निर्णय हम पर प्रभाव कम डालते हैं और किसी दूसरे को अधिक प्रभावित करते हैं. उसके पीछे एक स्पष्ट सिद्धांत है कि व्यक्ति समाज की एक इकाई होता है, और उसका प्रत्यक्ष और परोक्ष सम्बन्ध समाज के प्रत्येक प्राणी से होता है. इसी कारण एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने हर निर्णय को सोच समझ कर लेता है. ताकि समाज में उसके किसी निर्णय का कोई विपरीत असर न पड़े. जहाँ तक मुझे लगता है व्यक्ति को इसी तरह का जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि समाज का एक सुन्दर और स्वस्थ रूप सामने आ सके.

हमारे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं कि हम कितने वर्ष जीवन जीते हैं, बल्कि इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम जीवन को किस तरह से जीते हैं. हमारे देश में ही नहीं बल्कि विश्व में अनेक ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिनकी जीवन यात्रा बहुत थोड़ी सी है लेकिन कर्म इतना ऊँचा कर गए हैं कि कोई सौ वर्षों तक भी जी ले उनके स्तर तक नहीं पहुँच सकता. इसलिए मुझे लगता है जीवन वर्षों से नहीं बल्कि कर्मों से समझा जाता है. एक बात और जिसे में कुछ वर्षों से गहरे से अनुभव करता हूँ कि बुद्धिमता का उम्र से कोई लेना देना नहीं है. हालाँकि हमारे देश में ऐसी परम्परा है कि हमें अपने से बड़ों का आदर सम्मान करना चाहिए, लेकिन इसका कोई ठोस आधार नहीं है कि किस आधार पर करना चाहिए. उम्र के किसी भी पढाव तक जरुरी नहीं है कि व्यक्ति बुद्धिमान हो, बुद्धिमता का गुण किसी बालक में भी हो सकता है और किसी बुजुर्ग में उसी बुद्धिमता का अभाव देखा जा सकता है. शायद बुद्धिमता और श्रेष्ठ कर्म का उम्र से कोई लेना देना नहीं होता. इसलिए हमें जीवन में बहुत सोच समझ कर कदम उठाने की आवश्यकता होती है. आदर्श जीवन लम्बे समय जीने का मोहताज नहीं होता, वह श्रेष्ठ कर्म का मोहताज होता है. हम जीवन में जितना अपने लिए सोचते और करते हैं उसका एक हिस्सा भी दूसरों के लिए सोचें और करें तो हमारे जीवन और समाज की स्थिति ही बदल जायेगी, और यही मनुष्यता की सबसे बड़ी पहचान है.

जीवन में एक और सिद्धांत बहुत मायने रखता है वह है दूसरों को आगे बढ़ाना. अगर हम दूसरों को आगे बढ़ा रहे होते हैं तो हम खुद भी आगे बढ़ रहे होते हैं. इसके पीछे एक स्पष्ट मान्यता है कि मनुष्य की सामाजिकता और उसकी बुद्धिमता उसे यह सब करने के लिए प्रेरित करती है. जब मनुष्य खुद पीछे रहकर किसी दूसरे को आगे बढ़ाने का कार्य करता है तो वह खुद भी आगे बढ़ रहा होता है. लेकिन ऐसी स्थिति में मनुष्य के स्वार्थ का क्या होगा? यह एक यक्ष प्रश्न है. लेकिन उसके लिए कोई प्रश्न नहीं है जिसे यह पता है कि जीवन एक क्षण है, जब हम जीवन की क्षण भंगुरता को समझ जायेंगे तो अपने आप इन भौतिक स्वार्थों से से ऊपर उठ जायेंगे और जीवन के हर पल को किसी दूसरे की भलाई के लिए लगाने का प्रयास करेंगे. लेकिन ऐसा होता बहुत कम है और आज तक का इतिहास ऐसा ही कहता है. एक मछली कई बार पूरे तालाब को गंदा कर देती है, लेकिन फिर भी हमें व्यक्तिगत स्तर पर एक सुन्दर और स्वस्थ जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए. हमारा पुरुषार्थ तो यही है कि हम एक बार जो भी निर्णय लें उसे किसी भी परिस्थिति में नहीं बदलें, और जो बार-बार अपने निर्णयों को बदलते हैं उनकी बुद्धिमता पर हमें भी चिन्तन करना चाहिए.  

मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह अपनी असीम लालसाओं के लिए दिन रात प्रयास करता है, लेकिन अंत में उसे क्या हासिल होता है यह सबके सामने है. कल मोनिका शर्मा जी ने अपनी फेसबुक वाल पर एक चिंतन करने योग्य बात लिखी थी “कभी कभी इस विषय में सोचकर डर लगता है कि हमारा कमाया पैसा, धन दौलत, प्रोपर्टीज इस दुनिया से जाते समय भी हम अपने साथ ले जा सकते तो क्या होता ...? जानते समझते हैं कि सब कुछ यहीं छूट जाना है तो ये हाल है ... कमाए गए धन को जन्मजन्मांतर तक साथ रख सकते तो ...? तो शायद इंसानियत कहीं ढूंढें ना मिलती” हमें भी इस प्रश्न पर गहरे से विचार करना चाहिए और जीवन को सकारात्मक दिशा में जीने का स्वस्थ और सुन्दर प्रयास करना चाहिए.  

08 अप्रैल 2012

दीवारें नहीं, पुल चाहिए .. 1

35 टिप्‍पणियां:
मानव सभ्यता के विकास में दीवारों और पुलों की बहुत महती भूमिका है. उसने अपने आश्रय के लिए दीवारों का निर्माण किया और खुद को सुरक्षित महसूस किया, और पुलों का निर्माण कर उसने एक सीमा से दूसरी सीमा में प्रवेश किया. कभी-कभी तो मानव के यह अभिनव प्रयास सोचने पर विवश करते हैं. ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण पांच तत्वों से किया है. पूरी कायनात इन पांच तत्वों का ही मिश्रण है. जड़ से लेकर चेतन तक हम प्रकृति के विभिन्न रूपों को निहारते हैं और इस सृष्टा की बनाई हुई कायनात के रहस्यों को जानने की चेष्टा करते हैं. यह क्रम मानव विकास के इतिहास और उसकी प्रकृति विषयक जिज्ञासा की पूरी जानकारी हमें देता है, और हमें अवगत करवाता है कि किस तरह से मानव पहले इस खुले आकाश के नीचे अपना जीवन व्यतीत करता था. प्रकृति का एक अभिन्न अंग मानव स्वयं भी प्रकृति से जुड़कर इसके विभिन्न रूपों का आनंद लेता था. लेकिन समय के साथ-साथ उसकी चेतना ने उसके जीवन जीने के तौर तरीकों में अंतर ला दिया. आग के आविष्कार ने उसकी जिन्दगी को बदल दिया. धीरे-धीरे मानव खेती करने लगा, उसने अपना आश्रय एक जगह बना लिया और फिर एक नया अध्याय शुरू हुआ. यह क्रम अनवरत चल रहा है और मानव जीवन के रहते तक यह चलता रहेगा. क्योँकि इस सृष्टि के जितने भी जीव है उनमें से सृजन की शक्ति ईश्वर ने सिर्फ और सिर्फ मानव को ही प्रदान की है. चेतना और बुद्धि की तमाम शक्तियां खुदा ने मानव को प्रदान की हैं. इसलिए मानव स्वभाववश सृजन की तरफ प्रवृत होता है. मानवीय सभ्यता के विकास में सृजन का यह पहलू उसे ईश्वर के समकक्ष ला देता है. पूरी प्रकृति में मानव का परचम छाया है और इसके अनेकों उदहारण हमारे सामने हैं. 

ईश्वर ने मानव को सृजन की शक्ति प्रदान कर उसके स्वरूप को और सुन्दर बनाने का प्रयास किया. हम
मानव विकास के प्रारंभिक इतिहास से लेकर आज तक के इतिहास को देखें तो ऐसी बहुत सी घटनाएँ हमारे सामने आती हैं. जिनमें मानव की सोच और समझ के प्रमाण हमें मिलते हैं. लेकिन यह प्रमाण दोनों तरह के हैं, कहीं पर मानव ने अपनी बुद्धि के बल पर सभी प्राणियों के विषय में सोचा तो कहीं वह इतना स्वार्थी हो गया कि उसे अपने हित के सिवाय कुछ भी नजर नहीं आया, कहीं वह अपने शरीर को दावं पर लगाकर प्राणी मात्र की रक्षा हेतु आगे बढ़ा तो, कहीं उसने अपनी एक इच्छा पूर्ति के लिए कई प्राणियों की जान ले ली. यह क्रम सदियों से चल रहा है और ना जाने कब तक चलता रहेगा. लेकिन मानव को मानव से जोड़ने के जितने भी प्रयास हो सकें उन पर गंभीरता से विचार करने की महती आवश्यकता है. क्योँकि चिरकाल से हम देखते आ रहे हैं कि जितनी भी हमने भौतिक उन्नति की है, उसने मानव की सुख सुविधाओं को तो बढ़ाया है. उसे शारीरिक सुख तो प्रदान किये हैं. लेकिन जितना-जितना वह इन सुखों को प्राप्त करता गया है उतना ही उसका चरित्र गिरता जा रहा है. 

विश्व के सभी प्राणियों को बनाने वाला खुदा अब जुदा हो गया है. उसके नामों पर लड़ाईयां जारी हैं, धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग एक दुसरे को नीचा दिखा रहे हैं, वह वास्तविकता को समझे बिना झूठ को प्रश्रय देकर आम व्यक्ति को मुर्ख बना रहे हैं, उनके सामने चिंतन कोई मायने नहीं रखता. बस उनका अपना स्वार्थ सिद्ध जिस तरह से होता है उनके लिए वह महत्वपूर्ण हो गया है. मैं एक बात से हतप्रभ हूँ कि कभी राजनीति को दिशा धर्म देता था. लेकिन आज जितने भी धर्म  का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति हैं. वह सब इन राजनीति के लोगों को पीछे घूमते रहते हैं. सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं और ऐसी हालत में आम व्यक्ति पिसता जा रहा है उसका जीना दूभर हो गया है. एक और महत्वपूर्ण बात जो मुझे अखरती है. वह यह कि आज धर्म और अध्यात्म ने एक संस्था का रूप ले लिया है. जिस संस्था के जितने सदस्य होंगे वह उतनी ही सफल संस्था मानी जायेगी, वह छदम गुरु उतना ही प्रमाणिक. ऐसी हालत में लोग गुटों में बंट रहे हैं. एक ही परिवार के विभिन्न सदस्य कई गुरुओं के भक्त बनकर अपने परिवार में ही वैचारिक भेद पैदा कर रहे हैं. इससे बड़ी और धर्म की क्या दुर्गति हो सकती है? यह विचारणीय है.

राजनीति की ही अगर बात करें तो हाल और भी बुरा है कोई भी नेता ऐसा नहीं जिसे जनता का सेवक समझा जाए. बल्कि जो लोग राजनीति में हैं उनकी सेवा करने के लिए देश के महत्वपूर्ण व्यक्ति तैनात किये जाते हैं, उनके निजी सचिव उच्च शिक्षा प्राप्त  व्यक्ति होते हैं, लेकिन नेता तो अनपढ़ भी हो सकता है. इससे बड़ी और विडंबना क्या हो सकती है? विदेश  में पढ़ा एक व्यक्ति यहाँ की स्थितियों को समझे बगैर किसी महत्वपूर्ण ओहदे पर बिठाया जाता है. ऐसे कई नेता आज हमरी संसद में हैं जो देश की वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं. लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण दायित्व संभाले हुए हैं. ऐसी स्थिति में क्या नीतियाँ बन सकती हैं, और कैसे उनको क्रियान्वित किया जा सकता है. यह सबसे बड़ा प्रश्न है? ऐसा अनुभव रहा है कि कोई भी नीति यहाँ ज्यादा समय तक नहीं चल सकती. जैसे ही सरकारें बदलती हैं वैसे ही नीतियाँ भी बदल जाती है, और आज तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि देश की राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है. जो आने वाले समय के लिए यह सबसे अन्धकारमय और खतरनाक पहलू है. शेष अगले अंक में....!!!  

05 फ़रवरी 2012

उपलब्धि का आधार...2

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गतांक से आगे...अब तो यह निश्चित हो गया कि उपलब्धि को हासिल करने के लिए साधन से महत्वपूर्ण है साध्य. साधक का लक्ष्य क्या है? जिसे वह हासिल करना चाह रहा है. उसके पीछे उसका मन्तव्य क्या है? उसकी भावना क्या है? जिसकी भावना जैसी होगी उसे उसके कर्म का वैसा ही फल मिलेगा. जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूर्त तिन देखि तैसी. जिसका जैसा भाव होता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है. जैसे कि किसी भी जीव कि ह्त्या करना अपराध है, लेकिन किसी शत्रु को जब हम अपनी सीमा पर मारते हैं तो उसे क्या कहते हैं? वहां एक भावना काम कर रही है. हालाँकि ऐसा किसी भी स्तर पर  होना तो नहीं चाहिए, लेकिन फिर भी दुनिया का दस्तूर है, संसार के नियम हैं और उन नियमों  के तहत हम जो कुछ भी हासिल कर रहे हैं वह किसी हद तक हमें प्रासंगिक लगता है. क्योँकि किसी ऐसे व्यक्ति का कर्म बाकी इनसानों के लिए चिन्ता का सबब बन सकता है, इसलिए हम उसे किनारे लगा देते हैं.
जीवन में कर्म से पहले भाव का महत्व है. भाव बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है हमारे जीवन में, हमारे कर्म में और निश्चित रूप से हमारी उपलब्धि का कारण भी वही है. भाव हालाँकि किसी को दिखाई नहीं देता, लेकिन वह कर्म के माध्यम से बाहर आता है, प्रकट होता है. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कीमती मोतियों की माला एक साधारण से धागे में पिरोई जाती है. लेकिन वह धागा दिखाई नहीं देता, और जब तक मोती उस धागे में बंधें हैं तब तक वह सुन्दर दिख रहे हैं, उनकी कीमत है. हालाँकि मोती कीमती हैं, और धागे की कीमत और मोतियों की कीमत में जमीन-आसमान का अन्तर है, लेकिन फिर भी मोतियों का संग पाकर धागा कीमती हो गया और जब तक धागा उन मोतियों में लगा है तब तक धागा भी उतना ही कीमती है, जितने की मोती. भाव का यही महत्व है. उपलब्धि का भी यही कारण है. अब थोडा सा पीछे झांकते हैं अपने इतिहास की तरफ . विवेकानंद ने एक बार कहा था ‘अगर आपके पास दुनिया को देने के लिए सर्वश्रेष्ठ विचार है तो उसे बेशक आप किसी पत्थर की शिला की गुफा में सोच रहे हो, अभिव्यक्त कर रहे हो, वह विचार बाहर आएगा और अपना प्रभाव जरुर छोड़ेगा’. यह विचार और भाव की शक्ति है.
जिस फूल को में देख रहा था, उस फूल ने मुझे एक भाव दिया. उसने मेरे जहन में करुणा, प्रेम, दया, समदृष्टि आदि भावों का संचार किया. लेकिन किसी व्यक्ति के जहन में ऐसे भावों का संचार यूं ही नहीं हो जाता. जिससे हम प्रेरित हो रहे हैं, उसमें वह भाव होना चाहिए. वह प्रेरक होना चाहिए, और प्रेरणा भी ऐसी जिससे सभी प्रेरित हों. दुनिया में ऐसा तो बहुत बार देखने को मिलता है कि किसी विशेष व्यक्ति के व्यक्तित्व का अनुसरण कुछ विशेष लोग ही करते हैं, और कुछ के लिए वह आँखों की किरकिरी बना रहता है. लेकिन जब हम सम्पूर्ण मानवता के लिए दया, करुणा, प्रेम, उदारता, सहिष्णुता जैसे मानवीय भावों को धारण कर कार्य करते हैं तो हमारा जीवन सबके लिए प्रेरक बन जाता है उस फूल की तरह. जिसका किसी से कोई वैर नहीं,कोई द्वेष नहीं, जिसे किसी से नफरत नहीं. वह तो हर किसी की तरफ अपनी सुगन्ध, अपनी कोमलता, सहजता, शालीनता सब कुछ अर्पित कर रहा है. उसका यह निश्छल भाव ही उसकी उपयोगिता का निर्धारण करता है.
मानवीय धरातल पर अगर सोचें तो हम पाते हैं कि जीवन में हम सब कुछ बनने की चेष्ठा करते हैं और ऐसा प्रयास करना कोई बुरी बात नहीं है. मानवीय प्रगति के लिए यह आवश्यक भी है, आज जितना भी भौतिक विकास हम देख रहे हैं यह मानव की जिज्ञासा और उसके निरन्तर क्रियाशील रहने के कारण ही सम्भव हो पाया है. लेकिन इस भौतिक उन्नति ने हमसे बहुत कुछ छीन भी लिया, यहाँ तक कि हमारा सुख-चैन भी. आज जो त्राहि-त्राहि चारों और मची है उसके पीछे कारण अगर देखें तो इनसानी ही नजर आते हैं, लेकिन इनसान है कि अपने बजूद को मिटाने पर ही तुला है, उसे अपने स्वार्थ के सिवा कुछ सूझता ही नहीं और जब ऐसी सोच इनसान की है तो फिर प्रगति तो कर ली, लेकिन मूल लक्ष्य से भटक जाना सही नहीं. इसलिए आवश्यक है कि हम अपने परिवेश को देखें, वहां की विसंगतियों को महसूस करें, अच्छाइयों का प्रचार करें. बुराइयों का त्याग करें और इस धरती पर एक सुन्दर से वातावरण का निर्माण करने में अपनी भूमिका अदा करें. ताकि आने वाली पीढियां इस वातावरण को कायम रखकर एक अद्भुत प्रेम, अमन, भाईचारे वाली दुनिया का निर्माण कर सके. ऐसी दुनिया में हर कोई हर किसी से प्यार करेगा उस फूल की तरह जैसा उसने मुझसे किया है.

30 जनवरी 2012

उपलब्धि का आधार...1

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कल दोपहर कुर्सी पर बैठा मैं किसी विचार में मगन था. अचानक मेरी नजर सामने खिल रहे फूलों के गमलों पर पड़ी. अनायास ही मेरे चेहरे पर रौनक छा गयी. लगभग 300 गमलों पर दृष्टिपात करने के बाद अचानक मेरी दृष्टि एक सुन्दर से खिले फूल पर टिक गयी. बहुत देर निहारा मैंने उसे, उसकी सुन्दरता, शालीनता, भोलापन सब कुछ. एक जीवन्त अहसास कुछ देर ऐसा लगा कि मैं उस फूल में समा गया हूँ. बहुत आत्मीयता से उसने मुझे गले लगाया है, और अपना कोमल और निश्छल प्रेम अनवरत मुझ पर बरसा रहा है, कुछ पल तक मैं विस्मृत कर गया खुद को और शामिल हो गया उस फूल के माध्यम से इस अनन्त प्रकृति में और प्रकृति से परमात्मा में. मैंने शरीर की सत्ता से बाहर कई बार खुद को महसूस किया है और आज फिर उसकी पुनरावृति इस फूल के माध्यम से हुई. इतने में किसी ने मुझे कहा सर कैसे हैं?? मुझे सुना नहीं. उन्हें लगा कि शायद मुझे कोई समस्या है, इसलिए आत्मीयता से पास आये और कहने लगे, सर आप ठीक तो हैं ना? एकाएक मेरा ध्यान भंग हुआ और मेरे चहरे को देखकर वह चुप हो गए, बिना कुछ कहे वह वहां से चले गए और शाम को जब मुझे मिले तो अपनी अनुभूति बताने लगे और मुझे कहने लगे तुम सच में धन्य हो......बस इतना कह कर फिर रुक गए. मैंने कुछ जानना नहीं चाहा लेकिन जब वह कुछ बोलने लगे तो फिर रुके नहीं और मैं सुनता रहा, और बार-बार मैं कृतज्ञ हो रहा था उस फूल के लिए. याद आया मुझे वह शे'र और सुना दिया उसे ‘क्या खूब है जीना फूलों का, हँसते आते हैं और हँसते चले जाते हैं’. काश मैं भी यही सोचता इस जीवन के बारे में और करता वह सब कुछ जो उस फूल ने मुझे दिया है.
जीवन भी क्या है ? अभी मैंने अस्तित्व की तलाश पर भी कुछ लिखने का एक छोटा सा प्रयास किया और उस वक़्त में सोच भी इसी बारे में रहा था. लेकिन एक फूल ने जिस तरह मुझे अपने आगोश में लिया वह अनुभव जीवन में बहुत कुछ दे गया. उस फूल की उपलब्धि उसकी सुन्दरता नहीं, उसकी पंखुड़ियां नहीं, किसी हद तक उसकी सुगन्ध भी नहीं. उसकी उपलब्धि का आधार है उसका अपनापन, वह हमेशा हर परिस्थिति में मुस्कुराता है, उसके मन में किसी के लिए वैर नहीं, कोई विरोध नहीं, कोई ईर्ष्या नहीं. वह तो निश्छल रूप से लुटा रहा है खुद को, और वह किसी एक के लिए नहीं, बल्कि पूरी कायनात के लिए हैं. तितली भी उस पर बैठती है , भवंरा उस पर गुंजन करता है, व्यक्ति उसे ईश्वर के चरणों में समर्पित करके अपनी मनोकामना पूरी करता है, और फूल को देखिये हम उसे उसके बजूद से अलग करते हैं, लेकिन फिर भी वह हँसते-हँसते हमारी ख़ुशी में शामिल हो जाता है. यहाँ मुझे अज्ञेय जी द्वारा रचित कविता सत्य तो बहुत मिले एकदम आँखों के सामने घूम गयी और फिर एक बार मैं उस फूल के प्रति नतमस्तक हुआ.
हमारे जीवन में हमारी उपलब्धि का आधार क्या है? हम जीवन में किसे उपलब्धि मानते हैं. उपलब्ध और उपलब्धि में सिर्फ एक मात्रा का अन्तर है. ‘ई’ की मात्रा उपलब्धि में है और उपलब्ध में नहीं. अंग्रेजी में इन दोनों के लिए जो शब्द प्रयोग किये जाते हैं एक को हम Achievement कहते हैं और दूसरे को Available  कहते हैं. जो आज उपलब्ध है कल वह समाप्त हो सकता है, फिर वह आ सकता है. लेकिन उपलब्धि के मामले में ऐसा नहीं. वह एक बार आती है, फिर आती है, फिर आती है लेकिन उसके रूप अलग अलग होते हैं, वह निरंतरता बनाये रखती है. वह हमारे जीवन को मूल्यवान बनाती है. लेकिन एक सहज सा प्रश्न उठता है कि उपलब्धि का आधार क्या हो ? उसके मानक क्या हैं ? कौन सी हद है उपलब्धि की और कौन पात्र है उपलब्धि का ? अनायास ही यह प्रश्न उठ सकते हैं और इन प्रश्नों का उठना हमें अपनी वास्तविक उपलब्धि की तरफ अग्रसर करेगा.
बात मूल बिन्दु की करते हैं. वेदों से लेकर आज तक हमारे पास जितने भी ग्रन्थ हैं सबके निष्कर्ष लगभग एक जैसे हैं. अगर निष्कर्ष एक जैसे हैं तो निश्चित रूप से आधार भी एक जैसा होगा. हमें जो उपरी भिन्नताएं नजर आती हैं, अगर हम भिन्नताओं के इस आधार को पहचान लें तो किसी हद तक  हम भी उपलब्धि के करीब पहुँच सकते हैं. उस फूल की तरह जिसे देखने मात्र से ही हमें ईश्वर का अहसास होने लगता है, हम खुद की अस्मिता को भूल कर उस फूल में खो जाते हैं. हमारा खुद को भूलकर उस फूल के प्रेमपाश में बंध जाना उस फूल की उपलब्धि को निर्धारित करता है, और उस फूल में सिर्फ हम ही नहीं, बल्कि इस कायनात का हर जीव समा सकता है. अब हम खुद को ही देखें, इस इनसानी जन्म को कहा तो सर्वश्रेष्ठ जाता है. निश्चित रूप से यह ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है. ईश्वर ने इसे अपने रूप में उतारा है और खुद जब ईश्वर ने धरती पर अवतार लिया तो मानव तन का ही सहारा लिया और दुनिया का मार्गदर्शन किया खासकर इनसानों का. उसे अवतरित होना पड़ा इनसानों को समझाने के लिए, उन्हें जीवन की सार्थकता की पहचान करवाने के लिए. तैतरीय उपनिषद में इसे यूँ अभिव्यक्त किया गया है : 
                             यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्तिI
                            यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्तिI तद्विजिज्ञासस्वI तद्ब्रह्मेतिI (तै०उ0 312)
 यह सब प्रत्यक्ष दिखने वाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं, तथा अन्त में प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको जानने की इच्छा कर और वही ब्रह्म है. अब जब सृष्टि का आधार ही ब्रह्म है तो उसे जानना आवश्यक है और मानव जीवन का लक्ष्य भी वही है. यानि उपलब्धि का आधार ईश्वर है हम सब इससे पैदा हुए हैं और इसी में समायेंगे. शेष अगले अंकों में ....!

24 जनवरी 2012

तुम्हारी तस्वीर

44 टिप्‍पणियां:
मेरे मेज पर सजी 
तुम्हारी उस खुबसूरत 
तस्वीर ने 
कल मुझसे एक सवाल किया 
" बहुत दिन हो गए 
तुमने मुझसे कुछ कहा नहीं " 
मैं स्तब्ध ... सोचता रहा 
उस सवाल को ......!

मुझे निरुतर देख 
फिर उसने कहा 
" बहुत दिन हो गए 
आईना देखे हुए " 

फिर उसी लहजे में 
" अब नहीं रही 
जिन्दगी में 
मोहब्बत की खुशबू  ? 
अब नहीं रहा 
प्यार का वह पागलपन 
नहीं रही वह दीवानगी 
रहा नहीं वह अपनापन " 

एक सांस में ऐसे कहा 
मेरी जिन्दगी , 
अब .......!
जिन्दगी नहीं रही 
और तुम्हारी  
तु  म्हा  री 
जि....न्द....गी 
प्रश्न चिन्ह ?????? हो गयी .                                           

09 जनवरी 2012

खुश जमाना रहेगा

36 टिप्‍पणियां:

उम्मीद है, वक्त यूँ ही सुहाना रहेगा 
हमारी दुआ से खुश जमाना रहेगा 
भुला देना गम जिन्दगी के सब
यही बात आज हर दीवाना कहेगा   
बदल दो सोच सब बदल जाएगा 
आशा में ख़ुशी का खजाना रहेगा
यूँ तो जुदा नहीं है कोई, किसी से 
जब तक है शमा, परवाना रहेगा 

27 नवंबर 2011

चतुर्वर्ग फल प्राप्ति और वर्तमान मानव जीवन...2

41 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे.... भारतीय जीवन सन्दर्भों को जब हम गहराई से विश्लेशित करते हैं तो हम पाते हैं कि यहाँ जीवन के विषय में बहुत व्यापक और गहन विचार किया गया है. जीवन की सार्थकता को निर्धारित करने के लिए वर्षों से ऋषि मुनियों ने गहन चिन्तन किया और जो भी निष्कर्ष निकला उसे सभी के साथ साँझा किया और भी उसी आधार पर अपनी धारणा समाज के सामने रखी. चिरकाल में उसने सिद्धांत का रूप ले लिया और सिद्धांत में फिर समय और स्थिति के अनुरूप आंशिक परिवर्तन तो हो सकते हैं, लेकिन सिद्धांत पूरी तरह से नहीं बदल सकता. चतुर्वर्ग फल प्राप्ति के विषय में यह बात सटीक बैठती है. हमारे यहाँ ही नहीं बल्कि विश्व का कोई भी देश ऐसा नहीं जहाँ मानवीय मूल्य निर्धारित ना किये गए हों, जीवन का कोई लक्ष्य ना निर्धारित किया गया हो. अब हमें देखना है कि जिस चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) को यहाँ जीवन का साध्य माना गया है, उन चतुर्वर्ग की क्या प्रासंगिकता है.
सबसे पहले आता है धर्म: धर्म क्या है? इसका आधार क्या है? धर्म मानव को जीवन जीने की शिक्षा देता है. यब बात स्वीकार्य है. धर्म की परिभाषा को लेकर बहुत समय से चिन्तन किया जाता रहा है. समय और स्थिति के अनुसार जिसे जो सही लगा उसने वह अभिव्यक्त कर दिया. लेकिन फिर भी एक बात तो स्वीकार्य है कि धर्म का मूल भाव व्यक्ति को जीवन जीने की कला सिखाना है. उसे क्या करना है, क्या नहीं? इन सब बातों का विषद विवेचन धार्मिक ग्रंथों में हुआ है. आज जिन्हें हम धर्म कहते हैं वास्तविकता में वह धर्म नहीं वह तो जीवन जीने की पद्धतियाँ हैं, वह वास्तविकता में एक विचार है और जब बहुत से लोगों ने उस विचार का अनुसरण करना शुरू कर दिया और वह विचार पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के मार्गदर्शन का कारण बनता रहा तो वह विचारधारा हो गया. विचार एक व्यक्ति का हो सकता है और जब उसी विचार को बहुत से लोगों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी अपनाया जाता है तो वह विचारधारा कहलाती है. यही कुछ जिन्हें आज हम धर्म कहते हैं उनकी स्थिति भी है. जहाँ तक ज्ञात है ‘सनातन धर्म’ को सबसे प्राचीन धर्म कहा जाता है. थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि सनातन धर्म विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है. लेकिन अगर सनातन शब्द को देखें तो सना+तन . सना मतलब सटा हुआ, बिलकुल पास, बहुत नजदीक, जितना समझ सकते हैं उतना, जितना महसूस कर सकते हैं उतना. यानि जो सना हुआ है जो हमारे सबसे नजदीक है. और तन का मतलब शरीर यानि सनातन वह हुआ और शरीर के सबसे नजदीक है और वह है ईश्वर. यानि ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने वाला सनातनी हुआ, जिसने सनातन को स्वीकार कर लिया जिसने जीवन जीने की इस पद्धति को अपना लिया. जो ईश्वर को हाजिर-नाजर कर अपने जीवन को जीना चाहता है. वह सनातनी हुआ, और उसके द्वारा अपनाया जाने वाला धर्म हुआ है सनातन. जो सदा रहने वाला है, जो कभी परिवर्तित होने वाला नहीं है. दूसरे शब्दों वही सनातन है. इसलिए सनातन धर्म सबसे पुराना धर्म हुआ, और इसे हमें पुराना नहीं बल्कि पहला धर्म कहना चाहिए, दुसरे शब्दों में इस यूँ भी कहा जा सकता है कि जो ईश्वरीय नियमों के अनुकूल जीवन जीता है वह सनातनी हुआ क्योंकि वह ईश्वर को अंग-संग महसूस करते हुए जीवन को जी रहा है. उसके सामने जीवन का कोई भ्रम नहीं. कोई दुविधा नहीं अगर कुछ है तो वह है ईश्वर की सत्ता और यह ईश्वर सत्ता उसे जीवन दर्शन देती है. जीवन को जीने की प्रेरणा देती है.
धर्म का मूल भाव तो यह है इनसान को जीवन जीने की समझ देना. लेकिन आज हमारे सामने ना जाने कितने धर्म हैं, कितने दर्शन हैं. किसी परिप्रेक्ष्य में अगर हम दखें तो यह सही भी लगता है लेकिन जहाँ पर हमारे जहन में संकीर्णताएं पैदा हो जाती हैं तो वहां धर्म-धर्म नहीं रह जाता वह बन्धन बन जाता है, और बन्धनों में जकड़ा हुआ इनसान फिर क्या प्रगति करेगा और क्या सोचेगा? यह विचारणीय प्रश्न है.
अब बात आती है अर्थ की: अर्थ से अभिप्राय है धन, अजीविका-जीवन जीने का साधन. तन के सुख के लिए जिस माध्यम से हम धन अर्जित करते हैं वह है हमारा कर्म. हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही हम पाते भी हैं. अर्थ का प्रयोजन सिर्फ जीवन जीने की सुविधा है. जिस कर्म को करने से हमारे जीने की जरूरतें पूरी हो जाएँ उतने तक ही वह सही है. हमारे देश में यह परिकल्पना की गयी है कि ‘मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू भी भूखा ना जाये’, बस यहाँ तक ही धन की प्रासंगिकता है. अपने से पहले अपने अतिथि के बारे में सोचना. खुद से पहले किसी दुसरे को तरजीह देना यह अर्थ का उद्देश्य बताया गया है. अर्थ किस तरह अर्जित किया जाए यह भी बहुत विचार हुआ है यहाँ. अर्थ की क्या महता है.कौन-कौन सी चीजें अर्थ के तहत आती हैं और कौन सी नहीं यह सब बखूबी अभिव्यक्त हुआ है. हालाँकि पैस के प्रचलन से पहले यहाँ वस्तु के बदले वस्तु का सिद्धांत प्रचलित था वैसी स्थिति में व्यक्ति की निर्भरता व्यक्ति पर अधिक थी और समाज के ज्यादा एक दुसरे पर आश्रित थे. उस स्थिति में धन नहीं वस्तु मायने रखती थी और वस्तु के बदले वस्तु दी जाती थी तो गुणवता बनी रहती थी.
लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य को देखें तो सब कुछ उल्टा -पुल्टा नजर आता है. आज तो स्थिति यह हो गयी है कि हमारे पास धन आये चाहे हमें उसके लिए किसी भी हद तक गिरना पड़े. हमें अपनी अस्मिता से समझौता करना पड़े, ऐसा परिद्रश्य आज हमारे सामने है. जहाँ तक व्यक्ति को धन की जरुरत जीवन जीने के लिए थी लेकिन आज वह अपनी लालसाओं की पूर्ति के लिए धन का उपयोग कर रहा है और इस बात को भूल गया है कि ‘तृष्णा ना जीर्णः, वयमेव जीर्णः’ शेष अगले अंक में....!!!