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01 जून 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...3

21 टिप्‍पणियां:
हम तो मायावी संसार को देखकर इसमें इतने रम जाते हैं कि अपनी वास्तविक स्थिति को ही भूल जाते हैं, और अगर ऐसा नहीं होता तो आज संसार के यह हालात नहीं होते. गतांक से आगे...! जीव जैसे ही इस दृश्यमान जगत में विचरता है तो यह दृश्यमान जगत उसे अपनी और आकर्षित करता है, क्योँकि सृष्टा ने इसे बनाया ही आकर्षक है, और इस दृश्यमान जगत की तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक और नैसर्गिक प्रक्रिया का हिस्सा है. लाख कोशिश करने के बाद भी जीव का कोई वश नहीं चलता कि वह इस जगत से मुंह मोड़ ले, वह चाह कर भी इस मायावी जगत से अपना नाता नहीं तोड़ सकता. इस दृश्यमान जगत की प्रत्येक वस्तु (जड़-चेतन) उसे बेहद आकृष्ट करती है. इसीलिए वह इस मायावी संसार रमना चाहता है, सब कुछ भूलकर. वह इस भौतिक जगत का आनंद लेना चाहता है. तभी तो इरविन एडमिन ने लिखा है "जब तक मनुष्य साँस लेता रहेगा और उसकी आँखों में देखने की शक्ति रहेगी, तब तक जीवन के ऐसे अंतिम प्रतिमानों की खोज होती रहेगी और जिनको हृदय और मस्तिष्क दोनों की स्वीकृति प्राप्त होती रहेगी ". निश्चित रूप से मनुष्य की जिजीविषा और जिज्ञासा उसे हमेशा प्रयत्नशील बनाये रखते हैं और जब तक उसका मन और मस्तिष्क किसी अंतिम निर्णय को स्वीकार नहीं करता तब तक मनुष्य प्रयास करता रहता है. इस दृश्यमान जगत की उत्पति से लेकर निर्वाण तक का विचार मनुष्य ने किया है. जब हम गहराई से विचार करते हैं तो इस सृष्टि की तीन स्थितियों से अवगत होते हैं 1. सृष्टि की उत्पति 2. स्थिति 3. और प्रलय. हमारे धर्म ग्रंथों में इन सब स्थितियों के विषय में बहुत कुछ जानने को मिलता है और यह स्वीकार किया जाता है कि इस सृष्टि की उत्पति से लेकर विनाश तक के क्रम को ईश्वर द्वारा नियोजित किया जाता है, और यह बात सर्वमान्य है. यह भी माना जाता है कि इस सृष्टि की उत्पति ईश्वर ने की है, इसके पालन का आधार भी ईश्वर ही है और अंततः यह सृष्टि इस ईश्वर में ही समा जाएगी. गीता में भगवान् श्रीकृष्ण जी अर्जुन को इस विषय में समझाते हुए कहते हैं कि:- अहं सर्वस्य प्रभवो मतः सर्वं प्रवर्तते/ इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसविन्ताः (10 /08 /338.) "अर्थात मैं सब आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का कारण हूँ, प्रत्येक वस्तु मुझसे ही उद्भूत है. जो बुद्धिमान यह भली भांति जानते हैं, वह मेरी प्रेमाभक्ति में लगते हैं तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में अपना सर्वस्व अर्पित करते हैं. अब जब यह निष्कर्ष मनुष्य के सामने आता है तो वह किसी हद तक इसे स्वीकार करने से कतराता है. लेकिन जैसे ही उसकी बुद्धि और शक्ति उसे जबाब दे जाती है तो वह इस अदृश्य सत्ता के प्रति स्वतः ही नतमस्तक होता है", और फिर क्रम शुरू होता है इबादत का.
 
मनुष्य अक्सर जब जिन्दगी की जंग हारने के कगार पर होता है तो वह दुआ और इबादत का सहारा लेता है.
हालाँकि हम दुआ और इबादत में अंतर करने में सक्षम नहीं होते, लेकिन इन दोनों शब्दों पर गहराई से विचार करते हैं तो दोनों शब्दों में स्वाभाविक अंतर जाना पड़ता है. "कहीं पर दुआ का एक लफ्ज भी असर कर जाता है, तो कहीं पर वर्षों की इबादत हार जाती है". निश्चित रूप से ऐसा होता भी है. मनुष्य पहले व्यक्तिगत स्तर पर इबादत करता है. जिसमें उसका अपना कोई न कोई मंतव्य छुपा होता है. लेकिन दुआ वह है जिसे किसी दुसरे के लिए कोई और करे, और इबादत वह है जिसे व्यक्ति खुद के लिए करे. इसलिए दुआ का एक लफ्ज असर कर जाता है और उस असर के पीछे दुआ करने वाले की भावना बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. हमारे यहाँ तो यह बातें प्रचलन में है ही कि "दुआ भी तक़दीर बदल सकती है " या फिर "जो काम दुआ कर सकती है, वह दवा नहीं" इसलिए दुआ की महता है. दुआ में भाव आ गया किसी की भलाई का, किसी की ख़ुशी का, किसी के सपने साकार करने का अब जब दुआ की जा रही है तो दुआ करने वाले ने खुद को मिटा दिया, वह खुद से उपर उठ गया, उसने अपने स्वार्थ को त्याग दिया, उसके लिए परिचित-अपरिचित, अपना-पराया, उंचा-नीचा कुछ भी मायने नहीं रखता उसके लिए तो मानवीय भाव बहुत महत्वपूर्ण है. सामने वाले की ख़ुशी महत्वपूर्ण है. लेकिन इसके साथ ही एक और बात भी महत्वपूर्ण है, क्या सच में जिसके लिए दुआ की जा रही है और जिस आवश्यकता के लिए की जा रही है उसमें उसका और मानवता का कितना भला होता है, यह बात महत्वपूर्ण है. क्योँकि ईश्वर से तो कुछ भी छुपा नहीं है, वह दुआ को तभी कबूल करेगा जब सामने वाले के हृदय में मानवीय हित का भाव प्रबल हो, और ऐसे भाव को लेकर की गयी दुआ का एक लफ्ज भी असर कर जाता है.

हालाँकि यह बात भी सही है कि प्रत्येक व्यक्ति द्वारा की गयी दुआ भी असरकारक नहीं होती, कोई विशेष ही इस दिशा में महारत रखता है. इसलिए तो हम बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं, उनके सामने अपने मन के भाव रखते हैं और मनोकामना करते हैं कि उनका कहा हुआ वचन सच निकले, इसी क्रम में गुरुओं-पीरों-पैगम्बरों आदि की महता बहुत बढ़ जाती है, हमारा विश्वास जितना दृढ होगा उतना ही हमें किसी की दुआ का लाभ मिलेगा. लेकिन इसका लाभ तभी लिया जा सकता है जब हम मानव और सृष्टि के अस्तित्व को समझते हैं और फिर इस बात को भली भांति समझते हैं कि इन सबमें ईश्वर या अदृश्य सत्ता की भूमिका क्या है? हम यह तो स्वीकार करते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की व्यापकता में परमात्मा की बहुत बड़ी भूमिका है, यह इसका ही प्रतिबिम्ब है और इस व्यापकता को अनेक प्रकार से अभिव्यक्त किया गया है. 
जिस प्रकार ईश्वर के अस्तित्व को समझने के लिए हमें मशक्कत करनी पड़ती है उसी प्रकार मानव के अस्तित्व को भी समझा जाना चाहिए. जिस तरह सृष्टि के तीन रूप हैं उसी प्रकार मानव अस्तित्व को भी तीन रूपों में समझा जा सकता है. 1. आधि भौतिक  2. आधि दैविक  3. आध्यात्मिक. इसे यूं भी समझा जा सकता है. रक्त, मांस, मज्जा से बना यह शरीर मनुष्य का अधिभौतिक रूप है, जिसे हम दुसरे शब्दों में स्थूल काया भी कहते हैं. यह स्थूल काया अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों का माध्यम है. आम व्यक्ति इसे ही सब कुछ समझ लेता है और जितने भी भ्रम आज हमारे सामने हैं वह इस आधिभौतिक रूप से जुड़े हैं. इसी के कारण एक से पंचभौतिक तत्वों से बना शरीर हिन्दू हो गया, मुसलमान हो गया, सिक्ख हो गया, ईसाई हो गया. आधार तो समझ का था लेकिन सब कुछ बदल गया, कहीं पर जाति हावी हो गयी, तो कहीं पर भाषा, कहीं पर धर्म तो कहीं पर क्षेत्र हावी हो गया. यह सब भिन्नताएं इस आधिभौतिक शरीर को सब कुछ मान लेने के कारण हैं. मनुष्य के आधिदैविक स्वरूप पर अगर विचार करें तो यह जीवात्मा की सत्ता से सम्बंधित है, और यह जीवात्मा भौतिक चेतना की नियामक और संचालक है. मनुष्य के इसी आधिदैविक रूप के कारण ही उसे सुख-दुःख, शुभ-अशुभ, बुरा-भला आदि कर्मों की प्रतीति होती है. भोग और अनुभूति से सम्बंधित जितने भी अनुभव हैं वह मनुष्य को उसके आधिदैविक रूप के कारण अनुभूत होते हैं. मानव जीवन की चरम उपलब्धि अगर ईश्वर से साक्षात्कार है तो इस शरीर में समाहित आत्मा की चरम परिणति परमात्मा में स्थापित हो जाने में है. आध्यात्मिक बोध का अनुभव आत्मा की व्यापकता में है और यह व्यापकता तब बढती है जब मनुष्य खुद को अपने पहले दो रूपों से उपर उठा कर आत्मिक स्वरूप में स्थापित करता है. अब इस स्तर पर कोई भेद नहीं, कोई भ्रम नहीं, कोई बंधन नहीं अगर कुछ है तो वह है सिर्फ और सिर्फ ईश्वर का बोध और आत्मिक स्तर का जीवन. हालाँकि इस स्तर को हासिल करना कठिन लगता है लेकिन यह नामुमकिन नहीं...”जिन ढूंढा तिन पाईया, गहरे पानी पैठ” जिसने पा लिया उसने समझ लिया, जान लिया, अपना लिया. उसका प्रत्येक कर्म दुआ बन गया, इबादत हो गया...! कुछ बिन्दु अगले अंक में....!

12 मार्च 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...4

24 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे.....रचनाकर्म में स्पष्टता का अपना महत्व है. हम कुछ भी सृजन कर रहे हैं लेकिन जितनी हमारी विषय और विचार के प्रति स्पष्टता होगी उतना ही हमारा सृजन बेहतर होगा. कालजयी सृजन निश्चित रूप से विषय के प्रति स्पष्टता का ही परिणाम होता है . पूर्वाग्रहों और पक्षपातों से भरा सृजन कभी भी कालजयी नहीं हो सकता. ऐसा सृजन थोड़ी देर के लिए चर्चा का विषय तो बन सकता है. लेकिन एक सच्चे और समझदार पाठक के लिए उसके कोई मायने नहीं. कुछ एक प्रतिक्रियाओं के आधार पर हम यह सोच लें कि हमारा सृजन उत्तम है तो यह हमारे लिए भी भ्रम ही होगा. अच्छे चिंतन और बेहतर लेखन के परिणाम तो वर्षों बाद ही प्राप्त होते हैं. इसलिए बेशक हमें आलोचनाओं का सामना करना पड़े लेकिन सृजन के मूल्यों को बरकरार रखने के लिए हमें अगर यह भी सहना पड़े तो कोई हर्ज नहीं. 

बोधगम्यता : विषय प्रतिपादन में जितना महत्व स्पष्टता का है. उससे कहीं ज्यादा महत्व विषय की बोधगम्यता का है. विषय प्रतिपादन बहुत कठिन कार्य हो सकता है, जब विषय के प्रति सोच स्पष्ट न हो. लेकिन अगर हम किसी तरह विषय प्रतिपादन में सफल हो जाते हैं तो सबसे बड़ा मुद्दा उसकी बोधगम्यता का बना रहता है. हमारी दृष्टि विषय के प्रति मौलिक भी है, जानकारी भी हमें पूरी है और हम उस विषय के प्रति पूरी तरह से स्पष्ट भी हैं. लेकिन हमने उसे इस तरह से प्रस्तुत किया है कि वह समझ से बाहर की वस्तु बना रहता है तो हमारे अच्छे तर्कों और तथ्यों का कोई लाभ पाठक को नहीं होने वाला. पाठक की अपनी समझ और सोच है किसी विषय के प्रति और उसी समझ और सोच के आधार पर वह आपके लेखन का मूल्यांकन करता है. इसलिए यह जरुरी है कि जब हम किसी विषय को अभिव्यक्ति का माध्यम बनायें तो उसके प्रत्येक पहलू पर गहराई से चिंतन करें. जब तक हम विषय की बोधगम्यता पर ध्यान नहीं दे पायेंगे तो अच्छे से अच्छे तर्क और तथ्य भी समझ के स्तर पर टेढ़ी खीर बने रहेंगे. कई बार यह देखने में आता है कि रचनाकार ने बहुत अच्छे विषय का चुनाव किया है, लेकिन उसकी विषय प्रतिपादन शैली इतनी असमंजस भरी होती है कि सब कुछ पढने के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता. हालाँकि पाठक उस विषय में जानना चाहता है, लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी वह समझ नहीं पाता कि क्या कहा गया है. हालाँकि तथ्य और तर्क वहां पर पूरी तरह से अभिव्यक्त किए गए होते हैं. मेरा अपना निजी अनुभव है कि कई अच्छे रचनाकारों की पुस्तकों को सिर्फ और सिर्फ बोधगम्यता की कमी के कारण ही नहीं पढ़ा गया. हालाँकि यह हो सकता है कि मेरे लिए जो कुछ कठिन रहा हो वह किसी के लिए सरल भी तो हो सकता है. लेकिन विषय को ग्राह्य बनाने में विषय की बोधगम्यता निश्चित रूप से महती भूमिका निभाती है और बोधगम्य विषय अपेक्षा से अधिक लाभ पाठक को दे जाता है.

विषय अनुकूल भाषा : भाषा भावों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है. भाव अव्यक्त रह जाता अगर भाषा नहीं होती. हालाँकि बहुत से माध्यम हैं भावों को अभिव्यक्त करने के, लेकिन भाषा से सशक्त माध्यम कोई नहीं हो सकता. मानव ने जितना भी विकास किया है उसमें भाषा की महता को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. विकास के हर एक मानक में भाषा की महता बहुत महत्वपूर्ण है. यह भी सच है कि आज भाषा ने विषय के अनुकूल अपना विकास किया है . हर विषय की अपनी शब्दावली है और उसी शब्दाबली के आधार पर उस विषय ने भी नए आयाम स्थापित किए हैं. विषय के प्रतिपादन में भाषा महती भूमिका निभाती है. जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जिसे भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता. अनुभूति को अभिव्यक्त करना, दृश्य को अभिव्यक्त करना, सोच को अभिव्यक्त करना, समझ को अभिव्यक्त करना, भाषा के ना जाने कितने आयाम है अभिव्यक्ति के स्तर पर, और इन सभी आयामों ने भाषा को बहुत व्यापक विस्तार दिया है. जितनी-जितनी हमारी आवश्यकता और समझ बढ़ी भाषा ने उसी अनुरूप अपना विकास किया और यह निरंतर विकास की राह पर अग्रसर है. 

विश्व की प्रत्येक भाषा का मंतव्य तो स्वस्थ संवाद के माध्यम से जीवन को आनंदमय बनाना रहा है,
सभ्यता-संस्कृति का विकास करना रहा है और इन मंतव्यों को पूरा करने में हर भाषा सक्षम भी है. लेखन के स्तर पर जब हम भाषा की बात करते हैं तो इसका प्रयोग करना और भी सजगता का विषय बन जाता है. क्योँकि हम जो कुछ भी अनुभूत करते हैं वह अभिव्यक्त तो भाषा के माध्यम से ही होता है. भाषा के दृष्टिकोण से अगर हिंदी ब्लॉगिंग की बात करें तो यहाँ एक नयी शब्दावली का विकास होता नजर आ रहा है. लेकिन अभी तक इसको अंतिम स्वरूप मान लिया जाये यह कहना तर्कसंगत नहीं लगता. या कोई यह कह दे कि हिंदी ब्लॉगिंग अपनी शब्दावली में भावों को अभिव्यक्ति देती है तो यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी. हालाँकि इस दिशा में सम्भावना देखी जा सकती है, लेकिन भाषा का विकास या शब्दों का निर्माण करना कोई आसान प्रक्रिया नहीं है, यह एक विज्ञान है और विज्ञान हमेशा तर्क और तथ्य के आधार पर  कार्य करता हुआ किसी निष्कर्ष तक पहुँचता है. लेकिन भाषा, विज्ञान से भी आगे की चीज है, विज्ञान से भी दो कदम आगे का आविष्कार है, इस कथन के पीछे मेरी यह मान्यता है कि भाषा अक्षरों से बनती बेशक है लेकिन उन अक्षरों के निर्माण और संयोजन से जो शब्द बनते हैं उनमें भाव और अनुभूति भी समाहित होती है. हिंदी भाषा में ऐसे अनेकों शब्द हैं जहाँ पर यह तथ्य पूरी तरह से उभरकर सामने आता है कि जब हम किसी भाव को अभिव्यक्त करना चाह रहे हैं और हमने शब्द का उच्चारण कर दिया तो एक बिम्ब स्वतः ही उभर आता है जो कि भाषा के वैज्ञानिक पक्ष को उभार कर सामने लाता है. इसलिए किसी भी विषय को अभिव्यक्ति देते समय भाषा और शब्दों का चयन बहुत चुनौती भरा कार्य होता है . लेकिन जब हमें विषय पूरी तरह से स्पष्ट है तो फिर भाषा कोई चुनौती नहीं. जैसे कबीर द्वारा अपने उपदेशों के लिए प्रयुक्त की गयी भाषा के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है  ‘कबीर वाणी के डिक्टेटर थे, भाषा पर उनका जबरदस्त अधिकार था’ निश्चित रूप से कबीर ने अपने विषय को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भाषा को सशक्त माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया. लेकिन ब्लॉगिंग में कई बार टिप्पणी या पोस्ट में अभद्र शब्दों का प्रयोग अखरता है, और जब कहीं भी ऐसा कुछ देखता हूँ तो उस व्यक्ति की भाषा के प्रति नासमझी पर दया का भाव पैदा हो जाता है.  

शैली की रोचकता : भाषा अगर भावों को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है तो शैली उन भावों को रोचकता से पाठकों तक पहुंचाने का माध्यम है. हालाँकि सामान्य तौर पर पाठक शैली पर ध्यान नहीं देते. लेकिन जैसे ही हम रचनाकार की शैली को पहचान जाते हैं तो उस रचनाकार को समझना हमारे लिए आसान होता है. भारतीय काव्यशास्त्र में शैली पर व्यापक चर्चा की गयी है और पाश्चात्य समीक्षा जगत में तो यह कहा जाता है कि ‘शैली ही व्यक्तित्व है’ यानि शैली के माध्यम से ही रचनाकार के विचार पाठक तक पहुंचते हैं और पाठक उन विचारों को शैली के माध्यम से ही समझने का प्रयास करता है. शैलियाँ के भी कई प्रकार हैं. जैसे वर्णात्मक, विवरणात्मक, विश्लेषणात्मक, आत्मकथात्मक आदि और इसी तरह निबंध में समास शैली, व्यास शैली, धारा प्रवाह शैली और तरंग आदि शैलियाँ  प्रयोग की जाती हैं. कविता का तो अपना एक अलग से शास्त्र है ही जहाँ पर कविता के सभी पक्षों पर विचार किया गया है. रस, अलंकार, रीति,  ध्वनि आदि पर बहुत व्यापक रूप से विचार किया गया है, और यह विचार रचना की शैली के रूप को समृद्ध करने के लिए किया गया है. हालाँकि भावों को किसी नियम या सीमा में बांधना मुश्किल होता है लेकिन फिर भी अगर हम ऐसा प्रयास नहीं करेंगे तो सब कुछ बिखर जाएगा. ब्लॉगिंग में शैली का एक अपना महत्व है. हालाँकि यहाँ सब कुछ साहित्य के सिद्धांतों के अनुरूप रचा जा रहा है. इसलिए हर कोई ब्लॉगर होने के बजाये लेखक होने का भ्रम पाले है. लेकिन एक बात ध्यान देने वाली है. 

लेखन और ब्लॉगिंग के सृजन में व्यापक अंतर है. ब्लॉगर अपने आप में सृजन से लेकर प्रकाशन और विज्ञापन तक एक संस्था है. लेकिन लेखक के साथ ऐसा नहीं है. इसलिए निश्चित रूप से हमें ब्लॉगिंग और साहित्य सृजन के सम्बन्ध में ध्यान देना होगा. अगर हम इस अंतर को समझ जाते हैं तो निश्चित  रूप से किसी भी पोस्ट को शैली के स्तर पर रोचक बनाने का प्रयास कर सकते हैं. ब्लॉगिंग में ब्लॉगर किसी भी विषय को त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में अभिव्यक्त कर सकता है, लेकिन लेखन का अपना स्तर है. यहाँ पाठक की प्रतिक्रिया तुरंत मिलती है और दूसरी तरफ साहित्य में ऐसा नहीं है. ब्लॉगिंग में हर कोई टिप्पणी करने की लालसा रखता है, लेकिन साहित्य में ऐसा प्रयास कोई-कोई ही करता है, और वहां की गयी समीक्षा निश्चित  रूप से बहुत उतरदायी भरा कार्य होता है. शैली की रोचकता निश्चित रूप से लेखक के व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करती है और ब्लॉगिंग में ब्लॉगर की अंतरात्मा उसकी पोस्ट के माध्यम से अभिव्यक्त होती है. ब्लॉगिंग का स्वभाव ही है स्पष्ट, त्वरित और उन्मुक्त अभिव्यक्ति और निश्चित रूप से इस आधार पर देखें तो ब्लॉगिंग की शैली भिन्न होनी ही स्वाभाविक है. 

ब्लॉगिंग का अद्भुत संसार विविधताओं भरा है. किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं. मैंने एक छोटा सा प्रयास किया अपनी समझ के आधार पर...आपकी सकारात्मक टिप्पणियाँ और प्रोत्साहन इस दिशा में और गंभीरता से सोचने को प्रेरित करेगा...!

04 मार्च 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...3

19 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे.....जीवन का मंतव्य जब कला की साधना बन जाता है तो फिर जीवन उस कला में रम जाता है. फिर कला ही जीवन बन जाता है और ऐसा सर्जक निश्चित रूप से कला को नया आयाम देते हुए जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर देता है. ब्लॉगिंग की जहाँ तक बात है यह तकनीक और कला का अद्भुत संगम है. आपके पास सृजन के इतने आयाम हैं कि आप किसी भी विषय को किसी भी तरह से लोगों तक पहुंचा सकते हैं, बेशर्त कि आप रोचकता और संजीदगी से सृजन को प्राथमिकता देते हों. अगर आप सृजन की प्राथमिकता और महता को समझते हैं तो आपके लिए ब्लॉगिंग रोचक और गंभीर होने के साथ-साथ जिम्मेवारी भरा कार्य हो सकता है. अगर ब्लॉगिंग के प्रति ऐसा दृष्टिकोण है तो निसंदेह आप आने वाली पीढ़ियों के लिए नए आयाम स्थापित कर रहे हैं, और सृजन को एक नया क्षितिज प्रदान कर रहे हैं.

मौलिकता : आपने अपने सृजन की प्राथमिकता को तय कर लिया. आप किसी भी विषय पर गहन चिंतन के
लिए तैयार हैं तो आपके समक्ष मौलिकता एक बड़ा प्रश्न हो सकता है. मौलिकता से अभिप्राय विषय के प्रति आपका दृष्टिकोण है, आपकी उस विषय के प्रति दृष्टि है. यूं तो हर विषय पर वर्षों से बहुत कुछ लिखा जाता रहा है और हो सकता है कि आपके समय में भी ऐसे विषयों पर बहुत कुछ लिखा जा रहा हो, लेकिन हर विषय में नवीनता और मौलिकता की सम्भावना सदा से छिपी रहती है. किसी भी विषय के अनेकों आयाम हो सकते हैं, हम किस आयाम पर केन्द्रित होकर विचार करते हैं यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है. एक ही विषय पर दो अलग-अलग विशेषज्ञ अपनी अलग - अलग मान्यताएं रख सकते हैं. यह मान्यातएं उनके चिंतन को हमारे सामने लाती हैं और यही मान्यताएं आगे चलकर उस विषय की नवीनता और मौलिकता को बनाये रखती हैं. ब्लॉगिंग की जो प्रकृति है यहाँ कोई भी विषय, अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकता है. इसकी प्रकृति को समझते हुए हम उस विषय को किस तरह और कितने मौलिक तरीके से सांझा करते हैं यह हम पर निर्भर करता है. जितना मौलिक चिंतन करते हुए हम किसी विषय को सांझा करते हैं निश्चित रूप से वह विषय अपन प्रभाव छोड़ने में सक्षम होता है, और उसी विषय का प्रस्तुतीकरण  हमारे चिंतन और दर्शन को पाठकों तक पहुंचाने में कारगर सिद्ध होता है. मौलिकता विषय को नयी जान देती है और नए आयाम देती है. अगर हम किसी शुष्क विषय पर भी लिख रहे हैं तो हमारी मौलिक सोच और प्रस्तुतीकरण उस विषय को ग्राह्य और पठन के योग्य बनाता है. अनुभव के आधार  पर कह सकता हूँ कि ब्लॉगिंग में विषय को मौलिकता प्रदान करने की अनेकों संभावनाएं हैं और उन संभावनाओं का बेहतर उपयोग इस विधा को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.  

सम्बंधित विषय की पूर्ण जानकारी : यूं तो जब कोई किसी सृजन की तरफ अग्रसर होता है तो उसकी अपनी मानसिकता होती है, प्रारंभ में हो सकता है कि सृजन की तरफ आकृष्ट होना एक शौक हो, लेकिन जब हम उस विधा में रम जाते हैं तो यह हमारा स्वभाव बन जाता है और किसी चीज का स्वभाव होना उसकी गहराई और महता को समझते हुए उसका हो जाना है. यह मानवीय स्वभाव है कि जब वह अपने भावानुकूल विषय की तरफ बढ़ता है तो उसे आनंद आने लगता है और वही आनंद हमारी निरंतरता को बनाये रखता है. किसी विधा की तरफ बढ़ने से पहले उसकी जानकारी होना आवश्यक है और जब हम जानकारी के साथ आगे बढ़ते हैं तो परिपक्वता की तरफ अग्रसर होते हैं. जैसे अगर हम कविता लिखना चाहते हैं तो हमें यह जानकारी तो होनी ही चाहिए कि छंद क्या है? अलंकार क्या है? प्रतीक क्या होता है? बिम्ब किसे कहते हैं? आदि-आदि. साहित्य की विधाओं का अपना एक शास्त्र है इसी तरह ग़ज़ल, कहानी, निबंध आदि विधाओं के विषय में बात की जा सकती है. हालाँकि ब्लॉगिंग एक ऐसा मंच है जहाँ साहित्य, कला, इतिहास, रंगमंच, संगीत, संस्कृति, समाज आदि ना जाने कितने आयाम हैं जिनमें निरंतर बेहतर अभिव्यक्ति हो रही है और काफी हद तक संतोषजनक भी. लेकिन फिर भी हर आयाम का अपना एक शास्त्र है, अपने नियम हैं और अगर हमें उन नियमों की जानकारी है तो हम बेहतर तरीके से आगे बढ़ सकते हैं. सम्बन्धित विषय की पूर्ण जानकारी होना नितांत आवश्यक है जिस विषय पर आप लिख रहे हैं. वर्ना अधूरी जानकारी ना तो आपने लिए उपयोगी होती है और ना किसी और के लिए. अगर हम पूरी जानकारी के साथ किसी विषय को पाठकों के साथ सांझा करते हैं तो निश्चित रूप से पाठक लाभान्वित होते हैं और आपके प्रति सम्मान के भाव उनके हृदय में पैदा होते हैं और आपसे बहुत कुछ सीखने की ललक उनमें बनी रहती है, और जब हमारा पाठक हमसे लाभान्वित हो रहा है तो हमारे श्रम का लाभ उसे मिल रहा है. ब्लॉगिंग की कोई सीमा नहीं आपके किसी पोस्ट को कौन सा पाठक पढ़ रहा है यह तय कर पाना कठिन है, अलग-अलग पाठक के लिए आपकी पोस्ट अपना महत्व रखती है. एक सामान्य पाठक के लिए वह जानकारी नवीन हो सकती है जिसे आप ब्लॉग पर पोस्ट के माध्यम से सांझा कर रहे हैं और वहीँ पर दूसरा पाठक उस विषय में अपनी जानकारी को और बढ़ाना चाहता हो और एक ऐसा भी पाठक है जो सब कुछ जानता है वह विश्लेषण, मौलिकता और प्रस्तुतीकरण  के लिए आपकी पोस्ट पढ़ रहा हो. जिस तरह लेखन के कई आयाम हो सकते हैं उसी से पठन के भी कई आयाम होते हैं, हर पाठक का अपना नजरिया होता है और एक लेखक को उन सब बातों के मध्यनजर अपने आपको प्रस्तुत करना होता है, लेकिन यह सब तभी संभव हो पाता है जब हम विषय को पूरी तरह से समझते हैं और उस समझ को सभी के साथ सांझा करना चाहते हैं. 

स्पष्टता : विचारों को अभिव्यक्त करना किसी हद तक कठिन नहीं है. लेकिन विचारों को स्पष्टता से अभिव्यक्ति करना यह एक कठिन कार्य है. हम किसी विषय पर लिख रहे हैं हमारे मन में विचारों का प्रबल प्रवाह बना हुआ है और हम एकाग्र होकर मन में आने वाले विचारों को अभिव्यक्त किये जा रहे हैं. लेकिन जब किसी विषय पर अपने विचारों को पूर्ण रूप से लिख लेने के बाद जब उसे पुनः पढ़ा जाता है तो बहुत सी खामियां नजर आ  सकती हैं जिन्हें हम दूर कर सकते हैं. विचार जब आ रहे हैं आने दिए जा सकते हैं लेकिन जब विषय को साँझा कर रहे हैं तो एक बार उन विचारों की महता और उनका मूल्यांकन करना जरुरी हो जाता है. जब हम तथ्यपूर्ण विषय जैसे इतिहास आदि पर लिख रहे हों तो और भी सजग रहने की आवश्यकता होती है, क्योँकि यहाँ हमें तथ्य को सही ढंग से प्रस्तुत करना है और तथ्य को प्रस्तुत करने के लिए हमें तर्क की आवश्यकता होती है, राजनीति जैसे विषयों पर लिखने के लिए हमें सापेक्ष दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है और सच को सच की तरह प्रस्तुत करना टेढ़ी खीर हो सकता है. लेकिन ब्लॉगिंग जिसे हम अभिव्यक्ति की नयी क्रांति कहते हैं उसके स्वभाव के अनुकूल अगर हम काम करते हैं तो निश्चित रूप से हम इसकी स्वायतता को बरकरार रख पायेंगे और विचारों की स्पष्टता इसके स्वभाव को और ज्यादा प्रभावी बनाएगी. विचारों की स्पष्टता के कारण लेखन में एक अजीब आकर्षण पैदा होता है और वही आकर्षण पाठक को बार-बार उस विषय को पढने को मजबूर करता है. धर्म जैसे विषय पर लिखने के लिए हमें तार्किकता नहीं बल्कि अनुभवजन्य समझ की जरूरत होती ही और अध्यात्म और दर्शन जैसे विषयों पर लिखने के लिए खुद अगर हम उस राह से गुजरे हैं तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं. कहने का अभिप्राय यह कि जैसा विषय हमारे पास है वैसे ही हम विचारों को अभिव्यक्त करें तो बेहतर होता है. विषय के प्रति समझ से ही, विषय के प्रति दृष्टिकोण बनता है और यह दृष्टिकोण जितना सकारत्मक होगा उतनी ही लेखन की सार्थकता होगी. लेकिन यह सार्थकता तभी बनी रहेगी जब हम तथ्यों के प्रति ईमानदार बने रहकर अपने विषय का प्रतिपादन करेंगे. शेष अगले अंक में....!!!  

18 फ़रवरी 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...2

35 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे....जैसे ही सृजन का क्रम प्रारंभ हुआ वैसे ही उसे और बेहतर बनाने के लिए कुछ मूल बिंदु भी निर्धारित किये गए. यह आप किसी भी क्षेत्र में देख सकते हैं. संगीत, साहित्य, शिल्प, वास्तुशास्त्र, ज्योतिष, विज्ञान, योग आदि  ना जाने कितने आयाम हैं सृजन के, सभी के अपने  नियम है और उन्हीं नियमों के तहत वह आगे बढ़ते हैं, और जो उन नियमों का अनुसरण करते हुए नव सृजन करता है. वह उस क्षेत्र का ज्ञाता माना जाता है. इस पोस्ट के पहले भाग पर टिप्पणी करते हुए आदरणीय राहुल सिंह जी ने टिप्पणी करते हुए लिखा है ‘ब्‍लागिंग का स्‍वभाव और प्रकृति की सीमा व्‍यापक है, निर्धारित करना कठिन जान पड़ता है’. काफी हद तक इनकी यह बात प्रासंगिक प्रतीत होती है. ब्लॉगिंग के स्वभाव और प्रकृति को समझना कठिन जरुर हो सकता है लेकिन असंभव नहीं और ऐसा कुछ भी नहीं जो हमारी समझ से बाहर हो, क्योँकि किसी नयी चीज को समझना मुश्किल हो सकता है.

लेकिन जब हम उससे प्रत्यक्ष ताल्लुक रखना शुरू करते हैं तो निश्चित रूप से हम उसके प्रति संवेदनशील
होते हैं और वहीँ से हमारी समझ विकसित होना शुरू होती है, और अगर हम अनमने ढंग से जुड़े हैं या कहीं पर हमारा स्वार्थ जुड़ा है तो हम उस स्वार्थ की पूर्ति करने में सफल तो हो सकते हैं लेकिन सार्थकता का जहाँ तक सवाल है वह नहीं हो सकता. इसे यूँ भी समझाया जा सकता है. जैसे कि टिप्पणी या लगातार लिखना किसी के लिए महत्वपूर्ण है तो कुछ भी लिखकर वह टिप्पणी हासिल कर सकता/सकती है. टिप्पणी के लिहाज से तो उसने सफलता प्राप्त कर ली लेकिन उस लिखे हुए की सार्थकता कितनी है यह बात बहुत महत्वपूर्ण है (मात्र संकेत किया है कृपया अन्यथा न लें) सफलता और सार्थकता में अंतर जान पड़ता है और उस अंतर को समझे बिना हम किसी दिशा में आगे नहीं बढ़ सकते. भाव और कर्म के दृष्टिकोण से सफलता के अनेक बिंदु हो सकते हैं. सफलता के मानक व्यष्टिगत और समष्टिगत दोनों होते हैं, लेकिन सार्थकता के मानक हमेशा समष्टिगत रहे हैं. सफलता के मानक निरपेक्ष और सापेक्ष दोनों हो सकते हैं लेकिन सार्थकता के मानक सापेक्ष ही रहे हैं. सफलता और सार्थकता पर ऐसी बहुत सी विचारणीय बाते कही जा सकती हैं लेकिन यहाँ सिर्फ संकेत रूप में कहूँ तो बेहतर है. सफल और सार्थक ब्लॉगिंग के लिए कुछ बिंदु हो सकते हैं, अगर हम उन्हें ध्यान में रखकर आगे बढ़ते हैं तो निश्चित रूप से हम काफी हद तक बेहतर योगदान कर सकते हैं. हालाँकि यह सभी  बिन्दु मेरा एक दृष्टिकोण हैं....और इसे आगे बढाने में आप अपनी सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं :-

सृजन की प्राथमिकता : सृजन मानवीय स्वभाव है. लेकिन सृजन करते वक़्त सर्जक को यह सोचना अवश्यम्भावी हो जाता है कि वह जिस दिशा या विधा में आगे बढ़ रहा है वह समाज और देश के लिए कितनी सार्थक है. उसकी दृष्टि क्या? उसका दृष्टिकोण क्या है? उसे क्या नया करना है? किस चीज को आगे बढ़ाना है. उस विधा में क्या सार्थक है और समय के साथ-साथ उसे उसमें क्या निरर्थक लगता है? ऐसे बहुत से प्रश्न है जो सृजन से पहले सर्जक के मन में कौंधने चाहिए. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या सच में वह-वह करना चाहता है जिसके विषय में वह सोच रहा है. निश्चित है व्यक्ति किसी काम को करने से पहले अपना लाभ भी सोचता है. यह व्यक्ति का स्वभाव है. उसे उस सृजन से क्या लाभ होने वाला है यह भी विचारणीय है. यह सब कुछ सोचने के बाद उसे अपनी सक्षमता पर भी ध्यान देना होगा. क्या जो कुछ वह सोच रहा है उसे कर पाने में वह सक्षम है या नहीं, उसकी व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक आदि स्थितियां उसे यह सब कुछ करने के लिए सहायक हैं या नहीं. हालाँकि सृजन इन सबका मोहताज नहीं होता लेकिन ऐसा सर्जक भी तो कोई-कोई ही होता है जो सब कुछ दावं पर लगाकर सिर्फ और सिर्फ सृजन के लिए जीता है. सृजन ही उसका ‘धर्म’ बन जाता है. लेकिन बहुतर ऐसा नहीं होता इसलिए इन स्थितियों पर भी ध्यान दिया जाये तो बेहतर है.

सृजन का एक पहलू यह भी है कि हम किस विधा को अपनाना चाहते हैं, और उस विधा में हम कितना जानते हैं पूर्ववर्तियों के बारे में जो हमसे पहले इस दिशा में अग्रसर हैं. उनकी क्या उपलब्धियां हैं, क्या कुछ उन्होंने किया है. जब हम किसी दिशा में कदम बढ़ाते हैं तो यह सब जानकारी हमारे लिए अपेक्षित हो जाती है. अगर हम थोडा सा इस बिंदु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं तो निश्चित रूप से हम अपनी एक महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करवा सकते हैं और उस विधा में नव सृजन के द्वारा उसके किसी महत्वपूर्ण पक्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. जिस निश्चित विधा की तरफ आप बढ़ रहे हैं उस विधा के भी अपने कई आयाम हैं और उनमें से आप किसी एक का चुनाव करके भी सार्थकता को लेकर आगे बढ़ते हैं तो आपका योगदान निश्चित रूप से रेखांकित करने योग्य हो जाता है. इतिहास में जिन व्यक्तियों का नाम आज दर्ज है उनके व्यक्तित्व में यह विशिष्ट गुण देखने को मिलता है. भाव के स्तर पर भी कई आयाम देखे जाते हैं जिनको आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण होता है. लेकिन यह सब कुछ करने से पहले आपको सृजन की प्राथमिकता को तय करना होगा और जैसे ही आप यह तय करने में सक्षम हो जाते हैं आपके सामने सृजन के नए आयाम खुलते जाते हैं और फिर आप निर्बाध गति से आगे बढ़ते हुए ऊँचाइयों को प्राप्त करते हैं. लेकिन सृजन के बदले किसी पुरस्कार की कामना या किसी चर्चा में आने के लिए सृजन करना एक निम्न पहलू है. आपके सृजन का पहला और अंतिम पुरस्कार आपके वह प्रशंसक हैं जिन्हें आपसे व्यक्तिगत रूप से कोई लेना देना नहीं लेकिन फिर भी वह आपके लिए दिल में सम्मान रखते हैं. अब हमें यह निर्धारित करना होगा कि हमारा सृजन का मुख्य पहलू क्या है??? मात्र और मात्र सार्थक सृजन, चर्चा के लिए सृजन या पुरस्कार के लिए सृजन? या फिर सृजन ही मेरा धर्म है. जैसे कहा जाता है कि कला-कला के लिए, कला जीवन के लिए. शेष अगले अंक में...!!!

14 फ़रवरी 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...1

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सृजन मानव का स्वभाव है. यही उसकी चेतना का प्रतिबिम्ब भी है. मानव मन-मस्तिष्क में चलने वाली हलचल, भावनाओं और विचारों का अनवरत प्रवाह सृजन के माध्यम से बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है. जब तक सब कुछ हमारे मन-मस्तिष्क में घटित हो रहा है, तक वह हमारा है. जैसे ही हमनें उसे अभिव्यक्त किया वह सबका हो गया. हमारी चेतना के मूल में सृजन स्वभाव के रूप में स्थापित है. (स्वभाव के बारे में बात फिर कभी) और इसी का परिणाम है कि मानव अपने अस्तित्व में आने से लेकर निरंतर सृजन में प्रवृत है. सृजन की उद्भट प्रतिभा ने उसे ‘सृष्टा’ के समकक्ष ला दिया. सृजन के मूल में उसकी भावना ने महती भूमिका अदा की. अनवरत चिंतन और दनिया में कुछ नया करने के भाव ने उसे हमेशा जगाए रखा. प्रकृति उसकी पहली प्ररणा रही है और परमात्मा उसके जीवन का ध्येय. उसने सारी प्रकृति को परमात्मा का प्रतिबिम्ब स्वीकार कर लिया और प्रकृति में ही उसने सृजन के विविध आयाम खोजे. अगर हम संस्कृत वाङ्मय पर गहराई से ध्यान देते हैं तो यही पाते हैं. ‘ऋग्वेद’ के प्रत्येक मंडल में ऐसा बहुत कुछ हमें देखने को मिलता है. जहाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वर्षा आदि के लिए ऋचाएं वर्णित है. कालान्तर में इन्हीं ऋचाओं का रूपांतरण मन्त्र के रूप में हुआ. हालाँकि ‘मन्त्र-तंत्र’ के लिए लिखित साहित्य को आज तक साहित्य की कोटि में नहीं रखा गया है. लेकिन कहीं न कहीं पर इनकी प्रमाणिकता पर भी ध्यान देने की जरुरत है. ‘मन्त्र–तंत्र’ के लिए लिखी गयी बातें सिर्फ उन्हीं लोगों का विषय बनी रही हैं जिनका इससे सम्बन्ध रहता है. हालाँकि अब यह कहा जाता है कि यह सब वैज्ञानिक नहीं है, और यह सब ढोंग है. लेकिन एक बात बताता चलूँ कि 'विज्ञान जहाँ अपनी हद मान लेता है वहीँ से अध्यात्म शुरू होता' है और उसका आज तक कोई अंत नहीं पा सका. सृजन भी एक अनन्त और अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है. समय और स्थिति का प्रभाव बेशक इस पर पड़ता है लेकिन यह भावनात्मक रूप से एक सी रहती है. कालिदास के ‘अभिज्ञानशकुन्तलम’ में जिस प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है, उसी प्रेम को आज तक विभिन्न रूपों में, विभिन्न शैलियों में विभिन्न देशों और भाषाओँ के रचनाकारों द्वारा अभिव्यक्त किया जाता रहा है, लेकिन न तो कालिदास द्वारा अभिव्यक्त प्रेम पुराना पड़ा, और न ही परवर्ती रचनाकारों द्वारा अभिव्यक्त प्रेम. इसीलिए यह बात हमें स्वीकार करनी पड़ेगी कि सिर्फ भावनाओं को अभिव्यक्त करने के तरीके बदले हैं, लेकिन भाव तो शाश्वत है. 

आचार्य भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में भाव को लेकर बहुत कुछ वैज्ञानिक तरीके से अभिव्यक्त करने
का प्रयास किया गया है. भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी आदि भावों को लेकर बहुत सटीक व्याख्याएं भरतमुनि के बाद के आचार्यों ने प्रस्तुत की हैं. भट्ट लोल्लट, भट्ट शंकुक,  भट्ट नायक और अभिनवगुप्त इस सिद्धांत को आगे बढाने का काम करते हैं और काफी हद तक विषद विवेचन के आधार पर अपनी मान्यताओं को पुष्ट करते हुए भाव और उसके अंगों को पुष्ट करने का प्रयास करते हैं और यह भी समझाने की कोशिश करते हैं कि काव्य में क्या जरुरी है. हालाँकि उनके इस सिद्धांत पर कई पोस्ट्स लिखी जा सकती हैं, और आदरणीय मनोज जी के ब्लॉग मनोज पर आपको यह जानकारी सहज मिल सकती है. सृजन के सन्दर्भ  में इसी तरह की मान्यता पाश्चात्य विचारक प्लेटो ने भी अभिव्यक्त की है. काव्य के सन्दर्भ में अपनी मान्यता को अभिव्यक्त करते हुए प्लेटो कहता हैं कि ‘काव्य प्रकृति की अनुकृति है’. हालाँकि बाद में प्लेटो की इस मान्यता का खंडन उनके शिष्य अरस्तु करते हैं और यह कहते हैं कि ‘काव्य प्रकृति की अनुकृति नहीं, बल्कि उसकी प्रतिकृति है’. यहाँ अनुकृति और प्रतिकृति शब्दों ने एक दुसरे में भेद कर दिया और एक ही विषय पर दो सिद्धांत प्रचलन में आ गए. इससे भी यह स्पष्ट होता है कि सृजन के मूल में प्रकृति की महता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भरतमुनि ने जो मंतव्य अपने नाट्यशास्त्र में रस के सम्बन्ध में अभिव्यक्त किया है, उसी तरह के भाव मुझे अरस्तु के विरेचन सिद्धांत में देखने को मिलते हैं, और कभी-कभी मुझे इन दोनों आचार्यों की काव्य के सन्दर्भ में लगभग एक सी मान्यताओं ने ( रस और विरेचन के सम्बन्ध में ) आश्चर्यचकित किया है. भारतीय और पाश्चात्य आचार्यों ने काव्य की सार्थकता, उसकी उपयोगिता, सृजन की प्राथमिकता को लेकर व्यापक बहस की है, और कुछ सार्थक निष्कर्ष भी निकाले हैं. उनके यह निष्कर्ष आज सिद्धांत के रूप में मान्यता प्राप्त है, और उन्हीं के आधार पर समस्त साहित्य रचना  हो रही है. हालाँकि समय -समय पर इनमें भी बदलाव आया है, यह बदलाव पूर्व प्रचलित मान्यता को खंडित तो करता है, लेकिन उसकी उपयोगिता को नजरअंदाज नहीं करता, और यही सार्थक बहस से ही संभव हो सकता है. 

सूचना तकनीक के विकास के इस दौर में अभिव्यक्ति और सृजन के साधनों का भी विकास होता रहा .सृजन की विधाएं अनन्त हैं. लेखन उनमें से एक है.  कभी पत्थरों पर लिखा गया तो कभी भोजपत्रों पर. लेखन का इतिहास सृजन के इतिहास से ही जुड़ा है. लेखन पर भी विकास का प्रभाव पड़ा. कभी शैली तो कभी भाव पर और यह विकास निरंतर जारी है. इन्हीं विकास के पडावों को पार करते हुए हमने इन्टरनेट की दुनिया में प्रवेश किया. इन्टरनेट ने दुनिया को एक क्लिक तक सीमित कर दिया और अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हमें एक नायाब तोहफा दिया ‘ब्लॉगिंग’. आज दुनिया के तमाम लोग तरह-तरह के माध्यमों से एक-दुसरे से जुड़ रहे है. मानवीय भावनाओं को अभिव्यक्ति के नए साधन मिले हैं, इन साधनों ने मनुष्य में रचनाशीलता का जो संचार किया है वह कभी-कभी सोचने पर मजबूर करता है. ब्लॉगिंग भी मनुष्य की रचनाशीलता को अभिव्यक्त करने के एक सशक्त माध्यम के रूप में आज हमारे सामने है. ब्लॉगिंग की दुनिया अद्भुत है. रचनाशीलता का यहाँ व्यापक प्रसार है. एक ही मंच पर सब कुछ अभिनीत किया जा रहा है और दर्शक दांतों तले अंगुली दवाने पर मजबूर है. हालाँकि ब्लॉगिंग का अपना एक स्वभाव है, उसकी अपनी एक प्रकृति है (यह विषय फिर कभी) इन सभी के बाबजूद ब्लॉगिंग करने के लिए कुछ बाते निर्धारित की जा सकती हैं. जिनके आधार पर हम सफल ब्लॉगिंग की और बढ़ सकते हैं. शेष अगले अंकों में....!!!  

05 फ़रवरी 2012

उपलब्धि का आधार...2

25 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे...अब तो यह निश्चित हो गया कि उपलब्धि को हासिल करने के लिए साधन से महत्वपूर्ण है साध्य. साधक का लक्ष्य क्या है? जिसे वह हासिल करना चाह रहा है. उसके पीछे उसका मन्तव्य क्या है? उसकी भावना क्या है? जिसकी भावना जैसी होगी उसे उसके कर्म का वैसा ही फल मिलेगा. जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूर्त तिन देखि तैसी. जिसका जैसा भाव होता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है. जैसे कि किसी भी जीव कि ह्त्या करना अपराध है, लेकिन किसी शत्रु को जब हम अपनी सीमा पर मारते हैं तो उसे क्या कहते हैं? वहां एक भावना काम कर रही है. हालाँकि ऐसा किसी भी स्तर पर  होना तो नहीं चाहिए, लेकिन फिर भी दुनिया का दस्तूर है, संसार के नियम हैं और उन नियमों  के तहत हम जो कुछ भी हासिल कर रहे हैं वह किसी हद तक हमें प्रासंगिक लगता है. क्योँकि किसी ऐसे व्यक्ति का कर्म बाकी इनसानों के लिए चिन्ता का सबब बन सकता है, इसलिए हम उसे किनारे लगा देते हैं.
जीवन में कर्म से पहले भाव का महत्व है. भाव बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है हमारे जीवन में, हमारे कर्म में और निश्चित रूप से हमारी उपलब्धि का कारण भी वही है. भाव हालाँकि किसी को दिखाई नहीं देता, लेकिन वह कर्म के माध्यम से बाहर आता है, प्रकट होता है. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कीमती मोतियों की माला एक साधारण से धागे में पिरोई जाती है. लेकिन वह धागा दिखाई नहीं देता, और जब तक मोती उस धागे में बंधें हैं तब तक वह सुन्दर दिख रहे हैं, उनकी कीमत है. हालाँकि मोती कीमती हैं, और धागे की कीमत और मोतियों की कीमत में जमीन-आसमान का अन्तर है, लेकिन फिर भी मोतियों का संग पाकर धागा कीमती हो गया और जब तक धागा उन मोतियों में लगा है तब तक धागा भी उतना ही कीमती है, जितने की मोती. भाव का यही महत्व है. उपलब्धि का भी यही कारण है. अब थोडा सा पीछे झांकते हैं अपने इतिहास की तरफ . विवेकानंद ने एक बार कहा था ‘अगर आपके पास दुनिया को देने के लिए सर्वश्रेष्ठ विचार है तो उसे बेशक आप किसी पत्थर की शिला की गुफा में सोच रहे हो, अभिव्यक्त कर रहे हो, वह विचार बाहर आएगा और अपना प्रभाव जरुर छोड़ेगा’. यह विचार और भाव की शक्ति है.
जिस फूल को में देख रहा था, उस फूल ने मुझे एक भाव दिया. उसने मेरे जहन में करुणा, प्रेम, दया, समदृष्टि आदि भावों का संचार किया. लेकिन किसी व्यक्ति के जहन में ऐसे भावों का संचार यूं ही नहीं हो जाता. जिससे हम प्रेरित हो रहे हैं, उसमें वह भाव होना चाहिए. वह प्रेरक होना चाहिए, और प्रेरणा भी ऐसी जिससे सभी प्रेरित हों. दुनिया में ऐसा तो बहुत बार देखने को मिलता है कि किसी विशेष व्यक्ति के व्यक्तित्व का अनुसरण कुछ विशेष लोग ही करते हैं, और कुछ के लिए वह आँखों की किरकिरी बना रहता है. लेकिन जब हम सम्पूर्ण मानवता के लिए दया, करुणा, प्रेम, उदारता, सहिष्णुता जैसे मानवीय भावों को धारण कर कार्य करते हैं तो हमारा जीवन सबके लिए प्रेरक बन जाता है उस फूल की तरह. जिसका किसी से कोई वैर नहीं,कोई द्वेष नहीं, जिसे किसी से नफरत नहीं. वह तो हर किसी की तरफ अपनी सुगन्ध, अपनी कोमलता, सहजता, शालीनता सब कुछ अर्पित कर रहा है. उसका यह निश्छल भाव ही उसकी उपयोगिता का निर्धारण करता है.
मानवीय धरातल पर अगर सोचें तो हम पाते हैं कि जीवन में हम सब कुछ बनने की चेष्ठा करते हैं और ऐसा प्रयास करना कोई बुरी बात नहीं है. मानवीय प्रगति के लिए यह आवश्यक भी है, आज जितना भी भौतिक विकास हम देख रहे हैं यह मानव की जिज्ञासा और उसके निरन्तर क्रियाशील रहने के कारण ही सम्भव हो पाया है. लेकिन इस भौतिक उन्नति ने हमसे बहुत कुछ छीन भी लिया, यहाँ तक कि हमारा सुख-चैन भी. आज जो त्राहि-त्राहि चारों और मची है उसके पीछे कारण अगर देखें तो इनसानी ही नजर आते हैं, लेकिन इनसान है कि अपने बजूद को मिटाने पर ही तुला है, उसे अपने स्वार्थ के सिवा कुछ सूझता ही नहीं और जब ऐसी सोच इनसान की है तो फिर प्रगति तो कर ली, लेकिन मूल लक्ष्य से भटक जाना सही नहीं. इसलिए आवश्यक है कि हम अपने परिवेश को देखें, वहां की विसंगतियों को महसूस करें, अच्छाइयों का प्रचार करें. बुराइयों का त्याग करें और इस धरती पर एक सुन्दर से वातावरण का निर्माण करने में अपनी भूमिका अदा करें. ताकि आने वाली पीढियां इस वातावरण को कायम रखकर एक अद्भुत प्रेम, अमन, भाईचारे वाली दुनिया का निर्माण कर सके. ऐसी दुनिया में हर कोई हर किसी से प्यार करेगा उस फूल की तरह जैसा उसने मुझसे किया है.

30 जनवरी 2012

उपलब्धि का आधार...1

24 टिप्‍पणियां:
कल दोपहर कुर्सी पर बैठा मैं किसी विचार में मगन था. अचानक मेरी नजर सामने खिल रहे फूलों के गमलों पर पड़ी. अनायास ही मेरे चेहरे पर रौनक छा गयी. लगभग 300 गमलों पर दृष्टिपात करने के बाद अचानक मेरी दृष्टि एक सुन्दर से खिले फूल पर टिक गयी. बहुत देर निहारा मैंने उसे, उसकी सुन्दरता, शालीनता, भोलापन सब कुछ. एक जीवन्त अहसास कुछ देर ऐसा लगा कि मैं उस फूल में समा गया हूँ. बहुत आत्मीयता से उसने मुझे गले लगाया है, और अपना कोमल और निश्छल प्रेम अनवरत मुझ पर बरसा रहा है, कुछ पल तक मैं विस्मृत कर गया खुद को और शामिल हो गया उस फूल के माध्यम से इस अनन्त प्रकृति में और प्रकृति से परमात्मा में. मैंने शरीर की सत्ता से बाहर कई बार खुद को महसूस किया है और आज फिर उसकी पुनरावृति इस फूल के माध्यम से हुई. इतने में किसी ने मुझे कहा सर कैसे हैं?? मुझे सुना नहीं. उन्हें लगा कि शायद मुझे कोई समस्या है, इसलिए आत्मीयता से पास आये और कहने लगे, सर आप ठीक तो हैं ना? एकाएक मेरा ध्यान भंग हुआ और मेरे चहरे को देखकर वह चुप हो गए, बिना कुछ कहे वह वहां से चले गए और शाम को जब मुझे मिले तो अपनी अनुभूति बताने लगे और मुझे कहने लगे तुम सच में धन्य हो......बस इतना कह कर फिर रुक गए. मैंने कुछ जानना नहीं चाहा लेकिन जब वह कुछ बोलने लगे तो फिर रुके नहीं और मैं सुनता रहा, और बार-बार मैं कृतज्ञ हो रहा था उस फूल के लिए. याद आया मुझे वह शे'र और सुना दिया उसे ‘क्या खूब है जीना फूलों का, हँसते आते हैं और हँसते चले जाते हैं’. काश मैं भी यही सोचता इस जीवन के बारे में और करता वह सब कुछ जो उस फूल ने मुझे दिया है.
जीवन भी क्या है ? अभी मैंने अस्तित्व की तलाश पर भी कुछ लिखने का एक छोटा सा प्रयास किया और उस वक़्त में सोच भी इसी बारे में रहा था. लेकिन एक फूल ने जिस तरह मुझे अपने आगोश में लिया वह अनुभव जीवन में बहुत कुछ दे गया. उस फूल की उपलब्धि उसकी सुन्दरता नहीं, उसकी पंखुड़ियां नहीं, किसी हद तक उसकी सुगन्ध भी नहीं. उसकी उपलब्धि का आधार है उसका अपनापन, वह हमेशा हर परिस्थिति में मुस्कुराता है, उसके मन में किसी के लिए वैर नहीं, कोई विरोध नहीं, कोई ईर्ष्या नहीं. वह तो निश्छल रूप से लुटा रहा है खुद को, और वह किसी एक के लिए नहीं, बल्कि पूरी कायनात के लिए हैं. तितली भी उस पर बैठती है , भवंरा उस पर गुंजन करता है, व्यक्ति उसे ईश्वर के चरणों में समर्पित करके अपनी मनोकामना पूरी करता है, और फूल को देखिये हम उसे उसके बजूद से अलग करते हैं, लेकिन फिर भी वह हँसते-हँसते हमारी ख़ुशी में शामिल हो जाता है. यहाँ मुझे अज्ञेय जी द्वारा रचित कविता सत्य तो बहुत मिले एकदम आँखों के सामने घूम गयी और फिर एक बार मैं उस फूल के प्रति नतमस्तक हुआ.
हमारे जीवन में हमारी उपलब्धि का आधार क्या है? हम जीवन में किसे उपलब्धि मानते हैं. उपलब्ध और उपलब्धि में सिर्फ एक मात्रा का अन्तर है. ‘ई’ की मात्रा उपलब्धि में है और उपलब्ध में नहीं. अंग्रेजी में इन दोनों के लिए जो शब्द प्रयोग किये जाते हैं एक को हम Achievement कहते हैं और दूसरे को Available  कहते हैं. जो आज उपलब्ध है कल वह समाप्त हो सकता है, फिर वह आ सकता है. लेकिन उपलब्धि के मामले में ऐसा नहीं. वह एक बार आती है, फिर आती है, फिर आती है लेकिन उसके रूप अलग अलग होते हैं, वह निरंतरता बनाये रखती है. वह हमारे जीवन को मूल्यवान बनाती है. लेकिन एक सहज सा प्रश्न उठता है कि उपलब्धि का आधार क्या हो ? उसके मानक क्या हैं ? कौन सी हद है उपलब्धि की और कौन पात्र है उपलब्धि का ? अनायास ही यह प्रश्न उठ सकते हैं और इन प्रश्नों का उठना हमें अपनी वास्तविक उपलब्धि की तरफ अग्रसर करेगा.
बात मूल बिन्दु की करते हैं. वेदों से लेकर आज तक हमारे पास जितने भी ग्रन्थ हैं सबके निष्कर्ष लगभग एक जैसे हैं. अगर निष्कर्ष एक जैसे हैं तो निश्चित रूप से आधार भी एक जैसा होगा. हमें जो उपरी भिन्नताएं नजर आती हैं, अगर हम भिन्नताओं के इस आधार को पहचान लें तो किसी हद तक  हम भी उपलब्धि के करीब पहुँच सकते हैं. उस फूल की तरह जिसे देखने मात्र से ही हमें ईश्वर का अहसास होने लगता है, हम खुद की अस्मिता को भूल कर उस फूल में खो जाते हैं. हमारा खुद को भूलकर उस फूल के प्रेमपाश में बंध जाना उस फूल की उपलब्धि को निर्धारित करता है, और उस फूल में सिर्फ हम ही नहीं, बल्कि इस कायनात का हर जीव समा सकता है. अब हम खुद को ही देखें, इस इनसानी जन्म को कहा तो सर्वश्रेष्ठ जाता है. निश्चित रूप से यह ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है. ईश्वर ने इसे अपने रूप में उतारा है और खुद जब ईश्वर ने धरती पर अवतार लिया तो मानव तन का ही सहारा लिया और दुनिया का मार्गदर्शन किया खासकर इनसानों का. उसे अवतरित होना पड़ा इनसानों को समझाने के लिए, उन्हें जीवन की सार्थकता की पहचान करवाने के लिए. तैतरीय उपनिषद में इसे यूँ अभिव्यक्त किया गया है : 
                             यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्तिI
                            यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्तिI तद्विजिज्ञासस्वI तद्ब्रह्मेतिI (तै०उ0 312)
 यह सब प्रत्यक्ष दिखने वाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं, तथा अन्त में प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको जानने की इच्छा कर और वही ब्रह्म है. अब जब सृष्टि का आधार ही ब्रह्म है तो उसे जानना आवश्यक है और मानव जीवन का लक्ष्य भी वही है. यानि उपलब्धि का आधार ईश्वर है हम सब इससे पैदा हुए हैं और इसी में समायेंगे. शेष अगले अंकों में ....!