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08 मार्च 2016

एक ऐसा विश्व जहाँ सिर्फ इनसान रहते हों

3 टिप्‍पणियां:
पहचानों के दायरे में सिमटता इनसान संभवतः अपनी वास्तविक पहचान को भूल गया है. ऐसा कौन सा समय रहा होगा जब मनुष्य ने खुद को मनुष्य के रूप में समझा होगा. इतिहास का गहन अध्ययन करने के पश्चात इस बात के संकेत कम ही मिलते हैं कि इनसान ने इस धरती पर जन्म लेने के बाद खुद को इनसान के रूप में प्रस्तुत किया हो. वह अधिकतर पहचानों के दायरे में खुद को बांधता हुआ प्रतीत होता है. उसकी शंकाएं और संभावनाएं अधिकतर निर्मूल हैं, लेकिन फिर भी वह खुद की एक पहचान बताते और बनाते हुए आगे बढ़ रहा है, और उसका लक्ष्य उस पहचान को कायम रखते हुए ‘व्यक्तिगत’ रूप से एक ‘नयी’ पहचान कायम करने का रहा है. ऐसे में हम देखते हैं कि इनसान के रूप में जन्म लेने वाला प्राणी कभी इनसान की तरह व्यवहार नहीं कर पाया है. वह अधिकतर खुद को “दूसरों से श्रेष्ठ” साबित करने की होड़ में आगे बढ़ रहा है. इस तथाकथित श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए इनसान ने कई ऐसे कदम उठाये हैं, जिनके बारे में सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, हृदय बैचैनी से काँप उठता है,  दिमाग सोचने पर मजबूर हो जाता है, कि इस धरती पर ऐसा भी कोई कालखंड रहा होगा जब इनसान ने सबसे ज्यादा नुकसान इनसान का ही किया. हमें इनसान के द्वारा इनसान के बजूद तक को मिटाने के लिए किये गए प्रयासों के भरपूर चिन्ह देखने को मिलते हैं, लेकिन ऐसे प्रयासों का जिक्र कम ही मिलता है, जब इनसान ने मानवता की रक्षा और इंसानियत के लिए अपने सर्वस्व को अर्पित किया हो. अगर ऐसे चिन्ह कहीं मिलते भी हैं तो उनकी संख्या बहुत ही कम है. मनुष्य द्वारा अपनी एक विशेष पहचान को कायम करने के लिए किये गए प्रयासों और उनके परिणामों पर अगर हम गौर करें तो बहुत से ऐसे पहलू हमारे सामने आते हैं जो सर्वथा निर्मूल हैं, एक भ्रान्ति के सिवा कुछ भी नहीं.

मनुष्य द्वारा खुद की एक नयी पहचान को कायम करने के लिए बनाये गए दायरों को अगर हम देखें तो हमें आसानी से समझ आता है कि यह प्रयास कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा कि मेरी कमीज दूसरे की कमीज से ज्यादा सफ़ेद है, हालाँकि मुझे यह भी पता है कि दूसरे की कमीज भी सफ़ेद ही है, लेकिन मेरा प्रयास खुद की कमीज को ज्यादा सफ़ेद सिद्ध करने का है. मनुष्य की श्रेष्ठता की सारी कहानी सिर्फ कमीज के सफ़ेद होने और ज्यादा सफ़ेद होने की ही कहानी जैसी लगती है, लेकिन इस यथार्थ को कोई समझना नहीं चाहता, अगर कोई इसे समझने का प्रयास करेगा तो उसे भी उसी वर्ग के लोगों द्वारा बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा, उसके जीवन को दूभर किया जाएगा, यहाँ तक कि उसके मानवीय अधिकार भी छीन लिए जायेंगे. इसलिए अधिकतर मनुष्य अपनी संसारिक पहचान को बनाये रखने के प्रयास करता है, और ऐसा ही प्रयास मनुष्य का रहा है कि वह अपनी पहचान के लिए हमेशा सजग रहे. उसे जो पहचान उसके देश, धर्म, समाज, भाषा, जाति, वर्ग, वर्ण आदि द्वारा प्रदान की गयी है, वह हर हाल में उस पहचान की रक्षा करे, किसी भी स्थिति में उस पहचान से सम्बन्धित नियमों का उलंघन नहीं होना चाहिए. अगर किसी के द्वारा भूल से भी इन तथाकथित नियमों और सीमाओं का उलंघन होता है तो उसके लिए सजा का प्रावधान ऐसा किया गया है कि सोचकर ही दिल दहल जाता है.

आज हम जिस विश्व में जी रहे हैं वहां कई तरह की चीजें एक साथ घटित हो रही हैं. ऐसा नहीं है कि इससे
पहले यह सब कुछ न हुआ हो, यह सब कुछ पहले से ही होता आ रहा है, और संभवतः किसी भी घटना के पीछे इतिहास को जोड़ दिया जाता है. पहचानों के दायरे में बंधे इनसान के सामने आज कई तरह की चुनौतियां हैं, एक तरफ वह इन चुनौतियों से लड़ना चाहता है, वहीं दूसरी और वह अपनी तथाकथित पहचान को बनाये रखना चाहता है. उसकी यात्रा दो नावों में एक साथ सफ़र करने की है, वह परम्परा और आधुनिकता को साथ लेकर बढ़ना चाहता है, लेकिन इसी द्वंद्व में वह सब कुछ खो भी देता है, क्योँकि परम्परा के स्थान पर आधुनिकता आई है, उसके पास एक ही विकल्प है, या तो वह परम्परा को साथ लेकर जीवन जिए या फिर आधुनिकता को साथ लेकर. दोनों जीवन दर्शनों को साथ लेकर जीवन जीना एक सामान्य मनुष्य के लिए बहुत चुनौती भरा है. परम्परा और आधुनिकता की जहाँ तक बात है उसमें भी पहली जरुरत मनुष्य को अपनी सोच को बदलने की है. हालाँकि ऐसा नहीं है कि आज का परम्परावादी इनसान पाषाणकालीन तकनीक के साथ जी रहा है, वह तकनीकी और भौतिक स्तर पर आज के दौर के साथ जी रहा है या ऐसा भी कह सकते हैं कि वह भौतिक रूप से समय के साथ जी रहा है, लेकिन जहाँ तक सोच का सवाल है, उस पर कई प्रश्न किये जा सकते हैं. जो पहचान उसे प्रकृति की विविधता के कारण मिली थी, उस पहचान को कहीं खोकर वह कृत्रिम पहचान को बनाये रखने के लिए कृतसंकल्प है.

इनसान की कृत्रिम पहचान ने उसे इनसान से जुदा करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. कई बार मुझे ऐसा आभास होता है कि यह सब, कुछ लोगों द्वारा इनसान से अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किया गया है. हम देखते हैं कि एक इनसान के जन्म के साथ ही उसकी जाति, धर्म आदि निर्धारित हो जाता है और पूरा जीवन उस इनसान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसका पालन करेगा. उसी दायरे में वह बंध कर रहेगा. एक हद तक यह ठीक भी लगता है, लेकिन दूसरी और हम देखते हैं कि जाति और धर्म के नाम पर आज तक दुनिया के इतिहास में कई हृदय विदारक घटनाएँ घटी हैं. मनुष्य की पहली पहचान जाति हो गयी है, उसी के हिसाब से उसका धर्म निर्धारित हुआ है. यह बड़ा अजीब सा है पहलू है. धर्म का जहाँ तक लक्ष्य है वह मनुष्य के आचरण से सम्बन्धित है. काफी हद तक धर्म मनुष्य का व्यक्तिगत मामला लगता है, लेकिन धर्म के मामले में ऐसा होता कहाँ है? आज मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाई जाति और धर्म से है. एक ही धरा पर रहने वाले इनसान, एक ही तरह से जीवन यापन करने वाले लोग धर्म के नाम पर कैसे एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं यह हमें आये दिन देखने को मिलता रहता है. कुछ तथाकथित लोग धर्म को एक खौफ की तरह प्रचारित करते हैं और जाति उनके लिए मनुष्य की भावनाओं से खेलने का एक महत्वपूर्ण अस्त्र है. शेष अगले अंकों में......

08 जून 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...4

25 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे...!!! मनुष्य जब भौतिक चीजों से उपर उठकर सिर्फ और सिर्फ ईश्वर को पाने के लिए प्रार्थना करता है तो उसकी प्रार्थना उसे आनंद देने वाली होती है, और वास्तविक मायनों में यह ही सच्ची प्रार्थना है. क्योँकि इस प्रार्थना का फल हमेशा उसे आनंद देता है. जिसने इबादत में खुदा को मांग लिया वह धन्य हो गया. क्योँकि सांसारिक चीजों की प्राप्ति थोड़ी देर के लिए आनंददायक हो सकती है और फिर दुसरे ही क्षण हमारे सामने हमारी कोई और इच्छा जाग्रत हो जाती है. ऐसी हालत में हम सदा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही प्रार्थना करते हैं और करते रहेंगे. लेकिन जिसने इबादत में खुदा से खुदा को मांग लिया वह धन्य हो गया. उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं, वह हर परिस्थिति में एक जैसे भावों से युक्त है, वह खुद को इस ईश्वर में स्थापित कर लेता है. क्योँकि उसे इस बात का अहसास है कि:- राम नाम निज औषधि, काटे कोटि विकार. / विषम व्याधि ये उबरै, काया कंचन सार. (दादू)

राम नाम रूपी यह औषधि एक निजी औषधि है, और यह करोड़ों विकारों का शमन करने वाली है. जैसे ही
हमारे जीवन में ईश्वर का रंग चढ़ने लगता है तो हमारी विषमता
, असंतुलन कम होने लगता है, समता की अवस्था की और जीवन के भाव अग्रसर होते हैं, ईश्वर और जगत के बीच संतुलन कायम हो जाता है.
जितनी भी विषम परिस्थितियाँ इस जगत में उभरती हैं वह सब चित से हट जाती हैं, और हम इस स्वर्ण देह को देखते हुए इस नश्वर शरीर में ही अनश्वर शरीर को देख पाते हैं. ऐसी स्थिति में जीवन के प्रति मोह भंग तो नहीं होता, लेकिन जीवन की वास्तविकता समझ आती है कि इस नश्वर देह के साथ अनश्वर ईश्वर का गहरा सम्बन्ध है और फिर जीवन का हर क्षण दूसरों की भलाई के लिए, कल्याण के लिए प्रयुक्त होता है, यही से इबादत-दुआ बन जाती है. जब हम आत्मिक और भावनात्मक स्तर पर  बिना किसी लाभ हानि के हमेशा दूसरों का हित सोचते हैं तो हमारे आनंद की सीमा कई गुणा बढ़ जाती है फिर हम संसार की प्रत्येक परिस्थिति में एक जैसे भावों से युक्त रहते हैं और समय आने पर किसी के कल्याण के लिए , दुःख का शमन करने के लिए ईश्वर से दुआ करते हैं :-“जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि./छोड़ सिआणप सगल मनु तनु अरपि धरि”. (आदि ग्रन्थ : 519) 

अर्थात ऐसे गुरसिख की अरदास कभी खाली नहीं जाती जो पूरे समर्पण भाव से गुरु से प्रार्थना करता है, जो अपनी अक्ल और तन-मन को गुरु को समर्पित कर देता है. दुआ की पहुँच बहुत गहरी होती है, अगर सच्चे मन से हम कोई भी भाव इस ईश्वर के सामने रखते हैं तो वह निश्चित रूप से पूर्ण होता है.  इस भाव में किसी देश की, भाषा की, जाति की सीमा आड़े नहीं आती हम किसी के दुःख को देखकर दुआ करते हैं उसे तुरंत सुख महसूस होता है. कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि सामने वाले मनुष्य के लिए प्रार्थना करते ही उसके जीवन कि दशा बदलने लगती है और की बार तो प्रार्थना के बल पर ही आश्चर्यजनक परिणाम भी प्राप्त होते हैं. यह बात ध्यान देने वाली है कि प्रार्थना अंधविश्वास नहीं है, यह एक पक्का विश्वास है और यह विश्वास ईश्वर की पूर्णता और उसके साथ आत्मिक सम्बन्ध स्थापित कर लेने के बाद ही प्राप्त होता है. ज्यादातर हमारी दुआ और इबादत अंधविश्वास पर आधारित होती है और ऐसी हालत में सामने वाला हमारा लाभ उठाता है. हमारी मजबूरी का लाभ उठाकर वह अपना स्वार्थ सिद्ध करता है. कई बार तो यह भी देखा जाता है ऐसे स्वार्थी व्यक्ति दुआ के नाम पर व्यक्ति का मानसिक और शारीरिक शोषण भी करते हैं, यह एक नकारात्मक पहलू हैं. जिससे हमें बचना होगा. हम खुद के लिए जब प्रार्थना करते हैं तो उसमें हमारी इबादत और आस्था बहुत मायने रखती है, लेकिन जब कोई किसी के लिए दुआ करता है तो उसमें हमारा विश्वास काम करता है और यही हमारी इबादत और दुआ का आधार है.

11 दिसंबर 2010

चलो मयखाने में

52 टिप्‍पणियां:

एक बार मेरे अनुरोध पर
तुम चलो मयखाने में
फिर देखना .......
क्या मजा आता है,
पीने और पिलाने में ।

वहां ना कोई साजिश
ना कोई भेदभाव
ना कोई नफरत की दीवार
जितनी पीयेंगे
उतना खुमार ,उतना प्यार ।

.. इस नफरत की दुनिया की चीजों से
तो बेहतर है, मेरे दोस्तो...!
मयखाने का शराब और सिगार
तुम चलो मेरे अनुरोध पर एक बार ।

वहां हम ना जाति की बात करेंगे
ना होगा भाषा की भिन्नता पर विचार
ना होगी सीमाओं की बातें
ना नफरत,ना तकरार...
मेरे मयखाने की मेज पर
तुम नजर टिकाना, एक बार
उसकी चमकीली तह तुम्हें बता देगी
समता...को समझता है समझदार
उसके चारों तरफ की कुर्सियां ,
कर देंगी मिलकर रहने का इजहार ।

तुम मयखाने में
बेशक खूब मत पीना
ना ही पिलाना
बस एक बार
तुम महसूस करना
मयखाने का संसार