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16 मार्च 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...4

कोई टिप्पणी नहीं:
4. धर्म के वास्तविक महत्व को समझने की कोशिश करें: आदमी किसी भी समाज में पैदा हो, लेकिन दो चीजें उसके जन्म के साथ ही उससे जुड़ जाती हैं. एक है “जाति” और दूसरा है “धर्म”. संसार में अधिकतर यह नियम सा ही बन गया है कि जो जिस जाति में पैदा होगा उसी के अनुसार उसका धर्म भी निर्धारित कर दिया जाता है. हालाँकि इसका एक पहलू यह भी है कि जो जिस देश में पैदा होता है, उसके द्वारा उसी देश में प्रचलित धर्म का पालन करना पहली प्राथमिकता होता है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है. क्योँकि हमारी मान्यता ही कुछ ऐसी बन गयी है कि धर्म के पालन के बिना जीवन का कोई मकसद पूरा नहीं हो सकता. इसलिए धर्म को जीवन का आधार सा मान लिया गया है. लेकिन धर्म की अनुपालना के विषय में ज्यादातर अनुभव यही बताते हैं कि इसने किसी एक समाज और धर्म के लोगों को जोड़ने का काम बेशक किया है, लेकिन किसी दूसरे को अपने से अलग मानने का भाव भी अधिकतर धर्म के कारण ही पैदा हुआ है. मेरा धर्म श्रेष्ठ है, और किसी दूसरे का नहीं. इस भाव ने दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा की हैं. हमारी किसी दूसरे व्यक्ति से नफरत के कारणों पर विचार करें तो उसमें धर्म और जाति की भूमिका सबसे बड़ी है. हालाँकि देशों की सीमाओं के आधार पर भी व्यक्ति से व्यक्ति का भेद पैदा हुआ है, लेकीन यह भेद उतना खतरनाक नहीं है, जितना कि धर्म और जाति का भेद खतरनाक है. देशों का भेद किसी दूसरे देश के लोगों से हो सकता है. लेकिन जाति और धर्म का भेद किसी एक देश में बसने वाले लोगों में भी द्वंद्व का कारण बन सकता है, और इतिहास गवाह है कि इसी भेद के कारण दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा हुई हैं.
हालाँकि देखने में यह आया है कि जाति की सीमा किसी हद तक सीमित है, लेकिन धर्म की सीमा व्यापक है. एक ही समाज-क्षेत्र और देश में कई जातियां हो सकती हैं, लेकिन उसी समाज और क्षेत्र में उन सभी जातियों का एक ही धर्म हो सकता है. इससे यह सिद्ध होता है कि जाति और धर्म का गहरा सम्बन्ध है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जाति धर्म की रक्षा करती है तो, धर्म जाति को संरक्षण प्रदान करता है. अगर हम भारत के विषय में ही बात करें तो हम समझ सकते हैं कि यहाँ चार मुख्य धर्म प्रचलन में हैं. हिन्दू, इस्लाम, ईसाई और सिक्ख. लेकिन मुझे लगता है कि सिक्ख धर्म को धर्म कहने के बजाय अध्यात्म के प्रचार की संस्था के दृष्टिकोण से देखना चाहिए. हालाँकि सिक्खों की भी अपनी एक जीवन पद्धति है. लेकिन सामाजिक समरसता के जो तत्व सिक्खों में देखने को मिलते हैं वह बाकी के तीन धर्मों में कम ही देखने को मिलते हैं. फिर भी अगर कोई सिक्ख धर्म मानता है तो वह उसकी अपनी सोच है. मैं धर्म के विषय पर दूसरे तरीके से बात करने की कोशिश कर रहा हूँ.
हमारे देश में वैसे तो बौद्ध और जैन विचारधाराओं को भी धर्म की श्रेणी में रखा जाता है. लेकिन इनमें धर्म के तत्व मौजूद होते हुए भी इन्हें धर्म नहीं कहा जा सकता. फिर भी बात जो भी हो इन्हें विचारधारा कह लीजिये यह धर्म, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें समझना यह है कि एक ही धर्म को मामने वाले अगर समान हैं तो फिर जाति का प्रश्न ही पैदा नहीं होना चाहिए था, लेकिन यहाँ होता यह है कि एक ही धर्म को मानने वाले लोगों में भी कई जातियां विद्यमान रहती है. इससे यह जाहिर होता है कि इनसान किसी एक स्तर पर बंटा हुआ नहीं है, बल्कि कुछ धर्मभीरु लोगों ने उसे अनेक स्तरों पर बांटने की कोशिश की है. इसलिए हम किसी भी धर्म को मानें, पहले तो हमें उसकी खूबियों और खामियों के विषय में अवगत होना चाहिए और दूसरी बात यह है कि हम धर्म और जाति के आधार पर इनसान को न बाँटें तो बेहतर होगा. किसी की आस्था, मान्यता से हम असहमत हो सकते हैं, लेकिन उससे नफरत का अधिकार हमें किसी भी स्थिति में प्राप्त नहीं है. बदलते दौर में युवाओं की यह जिम्मेवारी है कि वह धर्म और जाति के बन्धन से ऊपर उठकर इनसान को इनसान के नजरिये से देखने का प्रयास करे, ऐसा करने से उन्हें खुद भी एक बेहतर जीवन जीने का मौका मिलेगा और वह दूसरों के लिए भी एक बेहतर मिसाल के रूप में दुनिया के सामने होंगे. उन्हें धर्मों के इस अस्तित्व को सकारात्मक रूप में लेने की आवश्यकता है.
5. परम्पराओं और संस्कृति के महत्व और प्रासंगिकता को समझें: परम्पराएँ और संस्कृति किसी भी देश-समाज और व्यक्ति की पहचान है. परम्पराएँ और संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं. हम देखते हैं कि हमारे समाज में अनेक परम्पराएं मौजूद हैं, जो समाज के स्वरुप को निर्धारित करने में अपनी भूमिका बखूबी निभाती हैं. एक तरह से अनेक परम्पराएं मिलकर के संस्कृति का निर्माण करती हैं. संस्कृति किसी भी देश की पहचान को निर्धारित करती है, इसलिए अक्सर यह कहा जाता है कि इस देश की संस्कृति ऐसी है, उस देश की संस्कृति ऐसी है. संस्कृति के आधार पर ही हम किसी देश के जन-जीवन और मानवीय मूल्यों के विषय में जानकारी आसानी से हासिल कर सकते हैं. इसलिए हमारे लिए यह जरुरी है कि हम अपने देश और समाज की परम्पराओं और संस्कृति के विषय में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करें. परम्पराओं के पीछे जो मान्यताएं प्रचलन में हैं उन मान्यताओं को समझने की कोशिश करें. इससे एक तो हमारी जानकारी बढ़ेगी और दूसरी तरफ हमें जो सही लगेगा हम उसे बड़े उत्साह से अपनाएंगे और जो कुछ सही नहीं है उसमें सुधार करने का प्रयास करेंगे.
यह सब युवाओं पर निर्भर करता है कि वह अपने देश की संस्कृति और परम्पराओं को किस तरह से समझते हैं और किस तरह से उन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं. आजकल जो दौर चल रहा है इसमें परम्पराओं और संस्कृति की बात करना बेमानी सा हो गया है, लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि इसका खामियाजा हमें भुगतना भी पड़ रहा है. जो परम्पराएं और संस्कृति एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़कर रखती थी, उनके न मानने से समाज में कई तरह की विसंगतियां पैदा हुई हैं, मनुष्य-मनुष्य का वैरी हो गया है, समाज में व्यक्ति केन्द्रित जीवन को तरजीह दी जाने लगी है. जिससे हम एकाकी जीवन की और बढ़ रहे हैं. एकाकी जीवन में अवसाद और घुटन के कारण आत्महत्या और किसी की जान लेने की प्रवृतियां बढ़ रही हैं. इससे हर जगह भय का माहौल बना हुआ है. युवाओं के लिए यह जरुरी है कि वह अपने आसपास के समाज में सक्रिय रूप से भागीदार बने. लोगों के दुःख-दर्द में काम आने का साधन बने, एक सहयोग और प्रेम वाली संस्कृति को जन्म देने की कोशिश करें. इसे एक परम्परा के रूप में ही विकसित करें, ताकि समाज एक सुंदर रूप ले सके और सभी का जीवन खुशहाली से बीत सके. शेष अगले अंक में...!!!  

18 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...3

2 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे....मैं जहाँ तक समझ पाया हूँ कि दुनिया को बदलने का प्रयास करने से पहले हम खुद को बदलने का प्रयास करें. जब एक-एक करके हर कोई खुद को मानवीय भावनाओं के अनुरूप ढालने का प्रयास करेगा तो दुनिया का स्वरुप स्वतः ही बदल जायेगा. लेकिन आज तक जितने भी प्रयास हुए हैं उनका स्तर उपदेशात्मक ही रहा है. वास्तविक प्रयास बहुत कम हुए हैं. हालाँकि इस धरती पर बहुत से महापुरुष-गुरु-पीर-पैगम्बर और समाज सुधारक पैदा हुए हैं, जिन्होंने मानव को मानवीय पहलूओं के विषय में बताने की कोशिश की है. साथ ही यह भी प्रयास किया है कि हर कोई अपने वास्तविक स्वरूप को समझकर अपने जीवन को दूसरों के भले के लिए अर्पित कर दे. लेकिन ऐसा हो कहाँ पा रहा है, आज के भौतिकवादी दौर में अधिकतर लोग भौतिक सुखों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं. एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ ने पूरे समाज के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है. ऐसे में युवाओं को अतीत से अनुभव लेकर, वर्तमान में अपने विचारों और कर्म में परिवर्तन करते हुए भविष्य के लिए एक सुन्दर से संसार की नींव रखनी चाहिए. हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि इनसान चाहे जिनती भी भौतिक उन्नति कर ले, अन्ततः उसे मनुष्य के साथ की जरुरत ही पड़ती है. मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव ही ऐसा भाव है जो इस भौतिक उन्नति की प्रासंगिकता को और बढ़ा सकता है. जब तक मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव नहीं होगा तब तक हम इस भौतिक और वैज्ञानिक उन्नति से कोई ख़ास लाभ नहीं ले सकते. ऐसे में युवाओं को थोडा चिन्तन-मनन कर आगे बढ़ने की जरुरत है. उसके लिए सबसे पहले उन्हें समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेवारी को समझना होगा और देश और दुनिया के परिदृश्य को बदलने के लिए गम्भीर और जिम्मेवार प्रयास की तरफ कदम बढ़ाना होगा. कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिन पर अगर हम थोडा चिन्तन मनन करें तो दुनिया को बदलने में युवाओं की भूमिका को रेखांकित किया जा सकता है.
     1.   अपने अस्तित्व के विषय में विचार करें: हम दुनिया में तमाम तरह की उपलब्धियां अर्जित करने का प्रयास करते हैं. बचपन से लेकर मृत्यु तक हम कुछ न कुछ ऐसा अर्जित करने के विषय में सोचते रहते हैं जिससे हमारे यश-मान-सम्मान में वृद्धि होती रहे. दुनिया के बीच में नाम होता रहे, हम जहाँ भी जाएँ लोग हमें एकदम पहचान लें, और ऐसा भी प्रयास मनुष्य का रहा है कि मृत्यु के उपरान्त भी लोग उसे याद करते रहें. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि मनुष्य शरीर और शरीर के बाद भी अमर होने के लिए प्रयत्नशील रहा है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है कि मनुष्य को भाग्य के बजाय पुरुषार्थ को महत्व देना चाहिए और अपने जीवन काल में जितना वह कर्म कर सकता है करना चाहिए. लेकिन ऐसा कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों का नुकसान हो. हमारे आगे बढ़ने की दौड़ में कई बार हम अपने साथियों का ही अहित कर देते हैं तो फिर वैसी उपलब्धि का क्या लाभ, जिसे दूसरों के हक़ मार कर हासिल किया गया हो. यही वह प्रश्न है जो हमें अपने अस्तित्व के विषय में सोचने के लिए मजबूर करता है. अपने कॉलेज के दिनों में मैं एक वाक्य अपनी हर नोटबुक के पहले पन्ने पर लिखा करता था. After all what we are, what is our entity, when we see the universe, where we stand. यह वाक्य मुझे हमेशा आत्मविश्लेषण के लिए प्रेरित करता रहता. हम क्या हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर मनुष्य सोचना शुरू करे तो उसके जीवन की कई उलझने तो स्वतः ही समाप्त हो जाएँ, लेकिन मनुष्य है कि कभी वह इस प्रश्न पर विचार ही नहीं करता. इसलिए युवाओं को कुछ भी करने से पहले, संसार की तमाम उपलब्धियों की तरफ बढ़ने से पहले इस बात पर विचार करना चाहिए कि उनका अस्तित्व क्या है इस संसार में? मैं इस प्रश्न का जबाब नहीं दूंगा आप स्वयं सोच लेना, क्योँकि मैं आपको किसी दायरे में नहीं बांधना चाहता कि आप यह हैं, आप वो हैं, जो कि अब तक होता आया है. लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि आप दुनिया में आगे जरुर बढ़ें, जो अरमान आपके हैं, उनको पूरा करने के लिए बिलकुल प्रयास करें, लेकिन इतना जरुर सोचें कि आखिर यह सब किया किस लिए जा रहा है और आपको वास्तविक रूप में इससे क्या लाभ होने वाला है.
 2.   जाति के प्रश्न पर तर्क के साथ सोचें: आज दुनिया इतनी आगे बढ़ चुकी है कि कहीं से भी नहीं लगता है कि हमें जाति जैसे प्रश्न पर विचार करने की जरुरत है. लेकिन वास्तविकता वह नहीं है जो हमें दिखाई दे रही है. वास्तविकता यह है कि मनुष्य से मनुष्य के बीच में शरीर की खाई बेशक न हो, लेकिन मन के स्तर पर मनुष्य से मनुष्य के बीच में गहरी खाई व्याप्त है, और यह खाई ऐसी है जिसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि यह कितनी गहरी है और कितनी दर्दनाक है. जाति का प्रश्न ऐसा प्रश्न है जो मनुष्य के जन्म के साथ ही उसके साथ जुड़ जाता है और इसका प्रभाव इतना व्यापक है कि ताउम्र मनुष्य इस प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता. हालाँकि ऐसा नहीं है कि जाति के प्रश्न पर आज तक विचार नहीं किया गया? इस प्रश्न विचार किया गया है, कई सामाजिक आन्दोलन हुए हैं, बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन फिर भी जाति का जिन्न ऐसा है कि यह अन्दर ही अन्दर अपना विकास करता रहता है और समय आने पर अपना रूप दिखा देता है. मुझे लगता है कि मनुष्य से मनुष्य को दूर करने का सबसे बड़ा उपकरण जाति व्यवस्था के रूप में समाज में ऐसा पल्लवित-पुष्पित किया गया है कि इससे बाहर कोई आना ही नहीं चाहता. लेकिन जाति का बजूद क्या है? इस पर कोई तार्किक उत्तर भी नहीं मिल पाता. भारत के विषय में तो यहाँ तक कहा गया है कि यहाँ कि सबसे छोटी समझे जाने वाली जाति भी अपने से छोटी जाति ढूंढ लेती है. ऐसी स्थिति में समाज में विघटन की स्थिति पैदा होती रही है. जाति की यह व्यवस्था किसी एक देश में ही व्याप्त नहीं है, कमोवेश इसकी उपस्थिति दुनिया के हिस्से में है. लेकिन हमारे देश में तो यह इतनी विकराल रूप से व्याप्त है कि हम जितनी जल्दी इस जाति से छुटकारा पा लें, उतना ही हमारे लिए अच्छा है. क्योँकि आज जितनी भी विसंगतियां हमारे समाज में मौजूद हैं, उनके मूल में जाति एक बड़ा आधार है. जब हम इस प्रश्न पर तर्क के साथ सोचेंगे तो हमें समझ आएगा कि जाति का अस्तित्व सिर्फ मानसिक है, इसका कोई वैज्ञानिक और तार्किक आधार नहीं है. हमें जितनी जल्दी या बात समझ आएगी उतना ही हमारे लिए भी यह अच्छा होगा. यूवाओं से यह अपेक्षा है कि वह इस रूढ़ि को समाज से उखाड़ फैंकने के लिए प्रयास करे. शेष अगले अंक में..!!! 

23 सितंबर 2016

जीवन में इतिहास जैसा कुछ नहीं...3

4 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे... इस यात्रा का अनुभव अद्भुत है, लेकिन यह महसूस तब होता है जब हम इसे महसूस करना चाहते हैं. अधिकतर तो मनुष्य के साथ यह होता है कि वह जैसे-जैसे जीवन की यात्रा को तय करता है, वैसे-वैसे उसके दिलो-दिमाग पर कई तरह की परतें जमती जाती हैं. उसके मन में कई तरह की दीवारें बन जाती है. वह जाति, मजहब, वर्ण, रंग, रूप, वेश-भूषा, खान-पान, सभ्यता-संस्कृति आदि अनेक आधारों पर खुद को दूसरे मनुष्य से अलग समझता है. जिन आधारों की चर्चा यहाँ की गयी यह आधार ऐसे हैं जो मनुष्य की शारीरिक पहचान से जुड़े हैं. किसी हद तक तो यह सही भी है, इस संसार में जिनती विविधता होगी उतना ही यह संसार बेहतर भी होगा. क्योँकि ऐसी ही विविधता प्रकृति में भी है. मनुष्य भी इसी प्रकृति का अंग है. लेकिन वह कभी खुद को प्रकृति का हिस्सा नहीं मानता. यही बड़ी भूल मनुष्य करता है. जब इनसान खुद को प्रकृति के साथ जोड़कर, इसे अपनी सहचरी मानकर अपना जीवन जीने की कोशिश करेगा तो वह अपने जीवन रहते इस दुनिया की बेहतरी के लिए ही कार्य करेगा. लेकिन मनुष्य ऐसा नहीं कर पाता है. उसे उसके अग्रजों द्वारा कई तरह के बन्धनों में बाँधने का प्रयास किया जाता है, वह भी ‘इतिहास’ का हवाला देकर और साथ ही उसे यह भी समझाया जाता है कि इसके बगैर वह कुछ भी नहीं है.

यही से मनुष्य खुद का इतिहास बनाने की कोशिश करने लगता है. खुद को बेहतर समझने की होड़ यहीं से शुरू होती है. दुनिया में कहीं नाम और यश हो इस तरफ इनसान प्रयास करना शुरू करता है, और यही भाव उसे दूसरे इनसान से नफरत, वैर, विरोध आदि करने के लिए प्रेरित करता है. इतिहास बनाने की दौड़ बेहतर है, यह इनसान के द्वारा किया जाने वाला बेहतर प्रयास है. लेकिन जरा रूककर सोचें तो समझ आता है कि इस इतिहास को बनाने की दौड़ में मनुष्य कई बार इस हद तक गिर जाता है कि वह अपने खून तक के रिश्तों को भी नहीं बख्शता. वह उनका भी क़त्ल करता है. इतिहास की यात्रा, हमारे जीवन की भौतिक यात्रा से जुडी है. फिर भी अगर इनसान दूसरे इनसान की भलाई और आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बेहतर करने का सपना लेकर आगे बढ़ता है तो यह अच्छा है. लेकिन आज तक का मनुष्य का उपलब्ध इतिहास देखें तो बात आसानी से समझ आती है कि चंद ही मनुष्य इस धरती पर हुए हैं, जिन्होंने सही मायने में इंसानियत के ऊँचे मायने स्थापित करने के लिए अपने जीवन के हर पल को जिया है. लेकिन ऐसे इनसानों के भावों से एक और भी सार निकल कर आता है कि इन्होंने जीवन चाहे जैसा भी जिया हो लेकिन हमेशा इस भाव में रहे कि वह तो निमित मात्र हैं. इससे अनेक लाभ हुए, लेकिन सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि इन्होंने बिना किसी इतिहास का हवाला दिए बिना मनुष्य को वर्तमान में जीने के लिए प्रेरित किया. साथ ही यह भी समझाने का प्रयास किया कि मनुष्य वास्तव में इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त चेतना का अंश है, और अंततः इनसान को इसी चेतना में समाना है. इस संसार तो चंद दिनों का बसेरा है, हमारी वास्तविक मंजिल तो आत्मा से परमात्मा का मिलन है. संसार में हुए अधिकतर महान व्यक्तियों ने इसी भाव से मनुष्य को समझाने का प्रयास किया है. हमारे पास ऐसे और कई उदाहरण हैं, जिनसे यह साबित हो जाता है कि बेशक भौतिक स्तर हम इतिहास का हिस्सा हैं, लेकिन आत्मिक और वास्तविक स्तर पर हमारी यात्रा अकेली है.

इस अद्भुत यात्रा जे अनुभव को ऐसे भी समझा जा सकता है. जैसे एक माँ का अनुभव अपनी कोख से पैदा किये हुए बच्चे के लिए अलग होगा. लेकिन उसी बच्चे के लिए पिता का अनुभव अलग होगा और इसी अनुभव के आधार पर अगर हम बच्चे का अनुभव माता और पिता के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करेंगे तो उसका भी माता और पिता के प्रेम के प्रति अनुभव अलग होगा. एक ही परिवार में एक ही माता-पिता का अपने बच्चों का प्रति तथा उन्हीं बच्चों का अपने माता-पिता के प्रति नजरिया और अनुभव हमेशा जुदा होता है. जबकि वह एक ही परिवेश में रहते हैं, एक ही माता-पिता से उन्होंने जन्म लिया है और अधिकतर एक ही तरह का वातावरण उन्हें मिला है. फिर भी हर किसी की सोच अलग है, चीजों को देखने का नजरिया अलग है. जीवन के छोटे से छोटे पहलू से लेकर बड़े से बड़े पहलू तक किसी का कोई भी भाव और विचार समान नहीं होता. जब मैं दसवीं कक्षा में पढता था तो मुझे एक व्यक्ति ने कहा था कि “केवल तुम्हारे अंगूठे की तरह दुनिया में दूसरा कोई अंगूठा नहीं है”. हालाँकि यह बात मुझे तब किसी और सन्दर्भ में समझ आई, आज इसी बात के मायने मेरे लिए अलग हो गए हैं और हो सकता है जीवन के किसी और पड़ाव पर इस बात के मायने मेरे लिए कुछ अलग हो जाएँ. इस बात को सुनने के बाद तब मुझे जो अनुभव हुआ, जो मैंने समझा, आज सब कुछ वैसा नहीं है और हो सकता है, कल कुछ और हो. इसलिए किसी एक बात के प्रति भी हमारा खुद का नजरिया बदलता रहता है तो फिर जीवन में इतिहास जैसा कहाँ कुछ घटित होता है. हम अपने आस-पास की चीजों को जब बेहतर तरीके से टटोलेंगे तो हमने जो अनुभव वहां से प्राप्त होंगे वह हमारे खुद के करीब जाने का मार्ग प्रशस्त करेंगे.

मनुष्य की यात्रा सांसारिक चकाचौंध में गुम होने की यात्रा नहीं है. जबकि मनुष्य की यात्रा खुद के भीतर झांककर अपने अस्तित्व को पहचानने की यात्रा है. जीवन का सफ़र दो स्तरों पर तय होता है, एक भौतिक स्तर पर और दूसरा आत्मिक स्तर पर. शरीर की यात्रा सीमित और अनिश्चित है. लेकिन इसमें एक पहलू निश्चित है और वह है कि किसी दिन हमें इस शरीर से अलग होना है और आत्मिक स्तर की यात्रा अनंत है, उसके विषय में हम कोई अनुमान नहीं लगा सकते. लेकिन वह हमारे संचित अनुभवों की यात्रा के बजाय हमेशा कुछ नया अनुभव करने की यात्रा है. यह यात्रा जीवन को समझने की यात्रा है. यह यात्रा वर्तमान से इतिहास की और बढ़ने की यात्रा नहीं है, बल्कि वर्तमान से वर्तमान में रहते हुए आगे बढ़ने की यात्रा है. यह यात्रा अनन्त से अनंत में विलीन होने की यात्रा है. जीवन की यात्रा इतिहास की नहीं, बल्कि वर्तमान की यात्रा है, मृत्यु की नहीं, बल्कि अमरत्व की यात्रा है . इस यात्रा में इतिहास जैसा कुछ  नहीं, जो है वह सिर्फ वर्तमान है. 

11 दिसंबर 2010

चलो मयखाने में

52 टिप्‍पणियां:

एक बार मेरे अनुरोध पर
तुम चलो मयखाने में
फिर देखना .......
क्या मजा आता है,
पीने और पिलाने में ।

वहां ना कोई साजिश
ना कोई भेदभाव
ना कोई नफरत की दीवार
जितनी पीयेंगे
उतना खुमार ,उतना प्यार ।

.. इस नफरत की दुनिया की चीजों से
तो बेहतर है, मेरे दोस्तो...!
मयखाने का शराब और सिगार
तुम चलो मेरे अनुरोध पर एक बार ।

वहां हम ना जाति की बात करेंगे
ना होगा भाषा की भिन्नता पर विचार
ना होगी सीमाओं की बातें
ना नफरत,ना तकरार...
मेरे मयखाने की मेज पर
तुम नजर टिकाना, एक बार
उसकी चमकीली तह तुम्हें बता देगी
समता...को समझता है समझदार
उसके चारों तरफ की कुर्सियां ,
कर देंगी मिलकर रहने का इजहार ।

तुम मयखाने में
बेशक खूब मत पीना
ना ही पिलाना
बस एक बार
तुम महसूस करना
मयखाने का संसार