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16 मार्च 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...4

कोई टिप्पणी नहीं:
4. धर्म के वास्तविक महत्व को समझने की कोशिश करें: आदमी किसी भी समाज में पैदा हो, लेकिन दो चीजें उसके जन्म के साथ ही उससे जुड़ जाती हैं. एक है “जाति” और दूसरा है “धर्म”. संसार में अधिकतर यह नियम सा ही बन गया है कि जो जिस जाति में पैदा होगा उसी के अनुसार उसका धर्म भी निर्धारित कर दिया जाता है. हालाँकि इसका एक पहलू यह भी है कि जो जिस देश में पैदा होता है, उसके द्वारा उसी देश में प्रचलित धर्म का पालन करना पहली प्राथमिकता होता है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है. क्योँकि हमारी मान्यता ही कुछ ऐसी बन गयी है कि धर्म के पालन के बिना जीवन का कोई मकसद पूरा नहीं हो सकता. इसलिए धर्म को जीवन का आधार सा मान लिया गया है. लेकिन धर्म की अनुपालना के विषय में ज्यादातर अनुभव यही बताते हैं कि इसने किसी एक समाज और धर्म के लोगों को जोड़ने का काम बेशक किया है, लेकिन किसी दूसरे को अपने से अलग मानने का भाव भी अधिकतर धर्म के कारण ही पैदा हुआ है. मेरा धर्म श्रेष्ठ है, और किसी दूसरे का नहीं. इस भाव ने दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा की हैं. हमारी किसी दूसरे व्यक्ति से नफरत के कारणों पर विचार करें तो उसमें धर्म और जाति की भूमिका सबसे बड़ी है. हालाँकि देशों की सीमाओं के आधार पर भी व्यक्ति से व्यक्ति का भेद पैदा हुआ है, लेकीन यह भेद उतना खतरनाक नहीं है, जितना कि धर्म और जाति का भेद खतरनाक है. देशों का भेद किसी दूसरे देश के लोगों से हो सकता है. लेकिन जाति और धर्म का भेद किसी एक देश में बसने वाले लोगों में भी द्वंद्व का कारण बन सकता है, और इतिहास गवाह है कि इसी भेद के कारण दुनिया में कई बार विकट स्थितियां पैदा हुई हैं.
हालाँकि देखने में यह आया है कि जाति की सीमा किसी हद तक सीमित है, लेकिन धर्म की सीमा व्यापक है. एक ही समाज-क्षेत्र और देश में कई जातियां हो सकती हैं, लेकिन उसी समाज और क्षेत्र में उन सभी जातियों का एक ही धर्म हो सकता है. इससे यह सिद्ध होता है कि जाति और धर्म का गहरा सम्बन्ध है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जाति धर्म की रक्षा करती है तो, धर्म जाति को संरक्षण प्रदान करता है. अगर हम भारत के विषय में ही बात करें तो हम समझ सकते हैं कि यहाँ चार मुख्य धर्म प्रचलन में हैं. हिन्दू, इस्लाम, ईसाई और सिक्ख. लेकिन मुझे लगता है कि सिक्ख धर्म को धर्म कहने के बजाय अध्यात्म के प्रचार की संस्था के दृष्टिकोण से देखना चाहिए. हालाँकि सिक्खों की भी अपनी एक जीवन पद्धति है. लेकिन सामाजिक समरसता के जो तत्व सिक्खों में देखने को मिलते हैं वह बाकी के तीन धर्मों में कम ही देखने को मिलते हैं. फिर भी अगर कोई सिक्ख धर्म मानता है तो वह उसकी अपनी सोच है. मैं धर्म के विषय पर दूसरे तरीके से बात करने की कोशिश कर रहा हूँ.
हमारे देश में वैसे तो बौद्ध और जैन विचारधाराओं को भी धर्म की श्रेणी में रखा जाता है. लेकिन इनमें धर्म के तत्व मौजूद होते हुए भी इन्हें धर्म नहीं कहा जा सकता. फिर भी बात जो भी हो इन्हें विचारधारा कह लीजिये यह धर्म, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें समझना यह है कि एक ही धर्म को मामने वाले अगर समान हैं तो फिर जाति का प्रश्न ही पैदा नहीं होना चाहिए था, लेकिन यहाँ होता यह है कि एक ही धर्म को मानने वाले लोगों में भी कई जातियां विद्यमान रहती है. इससे यह जाहिर होता है कि इनसान किसी एक स्तर पर बंटा हुआ नहीं है, बल्कि कुछ धर्मभीरु लोगों ने उसे अनेक स्तरों पर बांटने की कोशिश की है. इसलिए हम किसी भी धर्म को मानें, पहले तो हमें उसकी खूबियों और खामियों के विषय में अवगत होना चाहिए और दूसरी बात यह है कि हम धर्म और जाति के आधार पर इनसान को न बाँटें तो बेहतर होगा. किसी की आस्था, मान्यता से हम असहमत हो सकते हैं, लेकिन उससे नफरत का अधिकार हमें किसी भी स्थिति में प्राप्त नहीं है. बदलते दौर में युवाओं की यह जिम्मेवारी है कि वह धर्म और जाति के बन्धन से ऊपर उठकर इनसान को इनसान के नजरिये से देखने का प्रयास करे, ऐसा करने से उन्हें खुद भी एक बेहतर जीवन जीने का मौका मिलेगा और वह दूसरों के लिए भी एक बेहतर मिसाल के रूप में दुनिया के सामने होंगे. उन्हें धर्मों के इस अस्तित्व को सकारात्मक रूप में लेने की आवश्यकता है.
5. परम्पराओं और संस्कृति के महत्व और प्रासंगिकता को समझें: परम्पराएँ और संस्कृति किसी भी देश-समाज और व्यक्ति की पहचान है. परम्पराएँ और संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं. हम देखते हैं कि हमारे समाज में अनेक परम्पराएं मौजूद हैं, जो समाज के स्वरुप को निर्धारित करने में अपनी भूमिका बखूबी निभाती हैं. एक तरह से अनेक परम्पराएं मिलकर के संस्कृति का निर्माण करती हैं. संस्कृति किसी भी देश की पहचान को निर्धारित करती है, इसलिए अक्सर यह कहा जाता है कि इस देश की संस्कृति ऐसी है, उस देश की संस्कृति ऐसी है. संस्कृति के आधार पर ही हम किसी देश के जन-जीवन और मानवीय मूल्यों के विषय में जानकारी आसानी से हासिल कर सकते हैं. इसलिए हमारे लिए यह जरुरी है कि हम अपने देश और समाज की परम्पराओं और संस्कृति के विषय में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करें. परम्पराओं के पीछे जो मान्यताएं प्रचलन में हैं उन मान्यताओं को समझने की कोशिश करें. इससे एक तो हमारी जानकारी बढ़ेगी और दूसरी तरफ हमें जो सही लगेगा हम उसे बड़े उत्साह से अपनाएंगे और जो कुछ सही नहीं है उसमें सुधार करने का प्रयास करेंगे.
यह सब युवाओं पर निर्भर करता है कि वह अपने देश की संस्कृति और परम्पराओं को किस तरह से समझते हैं और किस तरह से उन्हें अपने जीवन में अपनाते हैं. आजकल जो दौर चल रहा है इसमें परम्पराओं और संस्कृति की बात करना बेमानी सा हो गया है, लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि इसका खामियाजा हमें भुगतना भी पड़ रहा है. जो परम्पराएं और संस्कृति एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़कर रखती थी, उनके न मानने से समाज में कई तरह की विसंगतियां पैदा हुई हैं, मनुष्य-मनुष्य का वैरी हो गया है, समाज में व्यक्ति केन्द्रित जीवन को तरजीह दी जाने लगी है. जिससे हम एकाकी जीवन की और बढ़ रहे हैं. एकाकी जीवन में अवसाद और घुटन के कारण आत्महत्या और किसी की जान लेने की प्रवृतियां बढ़ रही हैं. इससे हर जगह भय का माहौल बना हुआ है. युवाओं के लिए यह जरुरी है कि वह अपने आसपास के समाज में सक्रिय रूप से भागीदार बने. लोगों के दुःख-दर्द में काम आने का साधन बने, एक सहयोग और प्रेम वाली संस्कृति को जन्म देने की कोशिश करें. इसे एक परम्परा के रूप में ही विकसित करें, ताकि समाज एक सुंदर रूप ले सके और सभी का जीवन खुशहाली से बीत सके. शेष अगले अंक में...!!!  

18 फ़रवरी 2017

रूढ़ियाँ-समाज और युवाओं की जिम्मेवारी...3

2 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे....मैं जहाँ तक समझ पाया हूँ कि दुनिया को बदलने का प्रयास करने से पहले हम खुद को बदलने का प्रयास करें. जब एक-एक करके हर कोई खुद को मानवीय भावनाओं के अनुरूप ढालने का प्रयास करेगा तो दुनिया का स्वरुप स्वतः ही बदल जायेगा. लेकिन आज तक जितने भी प्रयास हुए हैं उनका स्तर उपदेशात्मक ही रहा है. वास्तविक प्रयास बहुत कम हुए हैं. हालाँकि इस धरती पर बहुत से महापुरुष-गुरु-पीर-पैगम्बर और समाज सुधारक पैदा हुए हैं, जिन्होंने मानव को मानवीय पहलूओं के विषय में बताने की कोशिश की है. साथ ही यह भी प्रयास किया है कि हर कोई अपने वास्तविक स्वरूप को समझकर अपने जीवन को दूसरों के भले के लिए अर्पित कर दे. लेकिन ऐसा हो कहाँ पा रहा है, आज के भौतिकवादी दौर में अधिकतर लोग भौतिक सुखों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं. एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ ने पूरे समाज के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है. ऐसे में युवाओं को अतीत से अनुभव लेकर, वर्तमान में अपने विचारों और कर्म में परिवर्तन करते हुए भविष्य के लिए एक सुन्दर से संसार की नींव रखनी चाहिए. हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि इनसान चाहे जिनती भी भौतिक उन्नति कर ले, अन्ततः उसे मनुष्य के साथ की जरुरत ही पड़ती है. मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव ही ऐसा भाव है जो इस भौतिक उन्नति की प्रासंगिकता को और बढ़ा सकता है. जब तक मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम और सहयोग का भाव नहीं होगा तब तक हम इस भौतिक और वैज्ञानिक उन्नति से कोई ख़ास लाभ नहीं ले सकते. ऐसे में युवाओं को थोडा चिन्तन-मनन कर आगे बढ़ने की जरुरत है. उसके लिए सबसे पहले उन्हें समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेवारी को समझना होगा और देश और दुनिया के परिदृश्य को बदलने के लिए गम्भीर और जिम्मेवार प्रयास की तरफ कदम बढ़ाना होगा. कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिन पर अगर हम थोडा चिन्तन मनन करें तो दुनिया को बदलने में युवाओं की भूमिका को रेखांकित किया जा सकता है.
     1.   अपने अस्तित्व के विषय में विचार करें: हम दुनिया में तमाम तरह की उपलब्धियां अर्जित करने का प्रयास करते हैं. बचपन से लेकर मृत्यु तक हम कुछ न कुछ ऐसा अर्जित करने के विषय में सोचते रहते हैं जिससे हमारे यश-मान-सम्मान में वृद्धि होती रहे. दुनिया के बीच में नाम होता रहे, हम जहाँ भी जाएँ लोग हमें एकदम पहचान लें, और ऐसा भी प्रयास मनुष्य का रहा है कि मृत्यु के उपरान्त भी लोग उसे याद करते रहें. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि मनुष्य शरीर और शरीर के बाद भी अमर होने के लिए प्रयत्नशील रहा है. किसी हद तक यह बात सही भी लगती है कि मनुष्य को भाग्य के बजाय पुरुषार्थ को महत्व देना चाहिए और अपने जीवन काल में जितना वह कर्म कर सकता है करना चाहिए. लेकिन ऐसा कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों का नुकसान हो. हमारे आगे बढ़ने की दौड़ में कई बार हम अपने साथियों का ही अहित कर देते हैं तो फिर वैसी उपलब्धि का क्या लाभ, जिसे दूसरों के हक़ मार कर हासिल किया गया हो. यही वह प्रश्न है जो हमें अपने अस्तित्व के विषय में सोचने के लिए मजबूर करता है. अपने कॉलेज के दिनों में मैं एक वाक्य अपनी हर नोटबुक के पहले पन्ने पर लिखा करता था. After all what we are, what is our entity, when we see the universe, where we stand. यह वाक्य मुझे हमेशा आत्मविश्लेषण के लिए प्रेरित करता रहता. हम क्या हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर मनुष्य सोचना शुरू करे तो उसके जीवन की कई उलझने तो स्वतः ही समाप्त हो जाएँ, लेकिन मनुष्य है कि कभी वह इस प्रश्न पर विचार ही नहीं करता. इसलिए युवाओं को कुछ भी करने से पहले, संसार की तमाम उपलब्धियों की तरफ बढ़ने से पहले इस बात पर विचार करना चाहिए कि उनका अस्तित्व क्या है इस संसार में? मैं इस प्रश्न का जबाब नहीं दूंगा आप स्वयं सोच लेना, क्योँकि मैं आपको किसी दायरे में नहीं बांधना चाहता कि आप यह हैं, आप वो हैं, जो कि अब तक होता आया है. लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि आप दुनिया में आगे जरुर बढ़ें, जो अरमान आपके हैं, उनको पूरा करने के लिए बिलकुल प्रयास करें, लेकिन इतना जरुर सोचें कि आखिर यह सब किया किस लिए जा रहा है और आपको वास्तविक रूप में इससे क्या लाभ होने वाला है.
 2.   जाति के प्रश्न पर तर्क के साथ सोचें: आज दुनिया इतनी आगे बढ़ चुकी है कि कहीं से भी नहीं लगता है कि हमें जाति जैसे प्रश्न पर विचार करने की जरुरत है. लेकिन वास्तविकता वह नहीं है जो हमें दिखाई दे रही है. वास्तविकता यह है कि मनुष्य से मनुष्य के बीच में शरीर की खाई बेशक न हो, लेकिन मन के स्तर पर मनुष्य से मनुष्य के बीच में गहरी खाई व्याप्त है, और यह खाई ऐसी है जिसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि यह कितनी गहरी है और कितनी दर्दनाक है. जाति का प्रश्न ऐसा प्रश्न है जो मनुष्य के जन्म के साथ ही उसके साथ जुड़ जाता है और इसका प्रभाव इतना व्यापक है कि ताउम्र मनुष्य इस प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता. हालाँकि ऐसा नहीं है कि जाति के प्रश्न पर आज तक विचार नहीं किया गया? इस प्रश्न विचार किया गया है, कई सामाजिक आन्दोलन हुए हैं, बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन फिर भी जाति का जिन्न ऐसा है कि यह अन्दर ही अन्दर अपना विकास करता रहता है और समय आने पर अपना रूप दिखा देता है. मुझे लगता है कि मनुष्य से मनुष्य को दूर करने का सबसे बड़ा उपकरण जाति व्यवस्था के रूप में समाज में ऐसा पल्लवित-पुष्पित किया गया है कि इससे बाहर कोई आना ही नहीं चाहता. लेकिन जाति का बजूद क्या है? इस पर कोई तार्किक उत्तर भी नहीं मिल पाता. भारत के विषय में तो यहाँ तक कहा गया है कि यहाँ कि सबसे छोटी समझे जाने वाली जाति भी अपने से छोटी जाति ढूंढ लेती है. ऐसी स्थिति में समाज में विघटन की स्थिति पैदा होती रही है. जाति की यह व्यवस्था किसी एक देश में ही व्याप्त नहीं है, कमोवेश इसकी उपस्थिति दुनिया के हिस्से में है. लेकिन हमारे देश में तो यह इतनी विकराल रूप से व्याप्त है कि हम जितनी जल्दी इस जाति से छुटकारा पा लें, उतना ही हमारे लिए अच्छा है. क्योँकि आज जितनी भी विसंगतियां हमारे समाज में मौजूद हैं, उनके मूल में जाति एक बड़ा आधार है. जब हम इस प्रश्न पर तर्क के साथ सोचेंगे तो हमें समझ आएगा कि जाति का अस्तित्व सिर्फ मानसिक है, इसका कोई वैज्ञानिक और तार्किक आधार नहीं है. हमें जितनी जल्दी या बात समझ आएगी उतना ही हमारे लिए भी यह अच्छा होगा. यूवाओं से यह अपेक्षा है कि वह इस रूढ़ि को समाज से उखाड़ फैंकने के लिए प्रयास करे. शेष अगले अंक में..!!! 

20 जनवरी 2012

अस्तित्व की तलाश .. 2

32 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे....आखिर क्या कारण है कि कुछ लोगों का अस्तित्व उनके ना होने पर भी बना रहता है और कुछ ऐसे भी हैं जो जीवन की दौड़ में जीते जी खो जाते हैं. वह साँसें तो ले रहे हैं, चल फिर तो रहे हैं. भोजन, भोग और निद्रा सब कुछ कर रहे हैं. लेकिन फिर भी अधूरे हैं. उनके जीवन का कोई लक्ष्य नहीं, कोई आधार नहीं, कोई सोच नहीं. बस जी रहे हैं जिन्दगी एक अनजान की तरह जो खुद के साथ होते हुए भी खुद से नहीं मिल पाते, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है? खैर यहाँ आज तक यही तो होता आया है. हमारे दर्शन में तो पहले ही स्पष्ट है कि "आये हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर.  एक सिंहासन चढ़ चले, एक बाँध जंजीर" जो जंजीरों में बंध गया उसने खुद को खो दिया. वह खुद को भूल गया. उसके जीवन का कोई मकसद नहीं रहा. लेकिन जिसने खुद से बात कर ली, खुद की भावना को समझ लिया वह जीवन के मकसद के करीब पहुच गया. संभवतः उसने अपने अस्तित्व को पहचान लिया और सजग हो गया, जीवन के प्रति.
अब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इनसान खुद के अस्तित्व को कैसे पहचाने? यह बड़ा जटिल प्रश्न है, और संभवतः इसका हल इतनी आसानी से निकलने वाला नहीं. जिनको इसका हल मिल गया, उनके जीवन की दुबिधा समाप्त हो गयी. लेकिन ऐसा आज तक बहुत कम लोगों के साथ हुआ है. अस्तित्व को तलाशना असाध्य वीणा को बजाने जैसा है. यहाँ सब बड़े-बड़े अहंकारी हार जाते हैं और जो खुद को उस किरीटी तरु को समर्पित कर देता है, वह वीणा बजाने में सफल हो जाता है. यही अस्तित्व है. हम किसी वाद्य यंत्र को देखते हैं. कहीं से क्या ऐसा प्रतीत होता है जो उसकी महता को बताता हो. देखने में वह वाद्य धातु, लकड़ी या किसी से भी निर्मित होता है. लेकिन उस वाद्य का अस्तित्व तो उससे निसृत होने वाली मधुर ध्वनि से है और वह ध्वनि कोई अनाडी नहीं निकाल सकता. उसका स्पर्श करने से तो स्वर भंग हो जाता है. लेकिन जब कोई साधक उसे बजाता है तो उस निर्जीव सी वस्तु से निसृत स्वर हमें आनंद के सागर में डुबो देता है. अब वहां एक ऐसा वातावरण बना जिसने हमें सोचने पर विवश कर दिया. साधक का अस्तित्व स्वर से जुड़ गया, और वाद्य का अस्तित्व साधक से जुड़ गया. वाद्य से मधुर ध्वनि निसृत हो सकती है, लेकिन उसके लिए साधक चाहिए, अब साधक मधुर ध्वनि से वातावरण को सहज बना सकता है, लेकिन उसे वाद्य चाहिए. दोनों का मकसद ध्वनि हो गया. साधक का भी और वाद्य का भी. जब तक दोनों का तालमेल बना रहा, दोनों का अस्तित्व बना रहा, और जब किसी एक ने दुसरे की महता को कमतर आँका अस्तित्व तलाशने से महरूम हो गए. जीवन जीने के आनंद से वंचित हो गए. 
अस्तित्व के मामले में यही बात सभी पर लागू होती है. जिस तरह शरीर आत्मा के बगैर, और आत्मा शरीर के बगैर कोई पहचान नहीं रखते. लेकिन आत्मा के लिए शरीर का होना ही काफी नहीं है और शरीर के लिए आत्मा का होना. दोनों की सत्ता एक दुसरे से भिन्न नहीं. दोनों का एक दूसरे से अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. शरीर स्थूल है और आत्मा सूक्षम, शरीर क्षणभंगुर है और आत्मा कालातीत. आत्मा परमात्मा का अंश है, तो शरीर प्रकृति का. लेकिन यह दोनों एक ही सत्ता के दो रूप हैं. किसी हद तक हम सोच सकते हैं कि आत्मा के कारण शरीर का अस्तित्व है और शरीर के कारण आत्मा का. लेकिन जिस अस्तित्व की बात में कर रहा हूँ यह अस्तित्व का अगला पड़ाव है , और जिसने इसकी पहचान कर ली वह सवंर गया.
हम खुद को नहीं खोज पाते, क्योँकि हम खुद को जकड देते हैं कभी भाषा में, कभी जाति में, कभी धर्म में, कभी मजहब में, और कहीं संसारिक रिश्तेदारियों में. निभाने के तौर पर तो यह सब ठीक हैं, लेकिन हम खुद की पहचान इन्हें बना लें तो यह हमारे लिए सही नहीं होगा. हम अपना अस्तित्व इन्हें मान लें तो बड़ी भूल हो जायेगी. क्योँकि  "जो दीसे सगल विनासे, ज्यों बादल की छाहीं". जो कुछ हमारे सामने घटित हो रहा है वह सब नष्ट होने वाला है, और जो खुद ही एक दिन नष्ट हो जायेगा उसे हम अपना अस्तित्व कैसे मान लेंगे. खुद के अस्तित्व को तलाशना है तो निर्लेप भाव से संसारिक दायित्वों को निभाते हुए, आत्मा को परमात्मा में स्थापित करते हुए जीवन की यात्रा को तय करें. बिना किसी पूर्वाग्रह के, तब हम पायेंगे कि इस सृष्टि में जो भी प्राणी हैं, वह हमसे गहरा रिश्ता रखते हैं और अगर हम ऐसा भाव बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो अपने अस्तित्व को स्थापित करते हुए हम उसे कायम रख पायेंगे. 

14 जनवरी 2012

अस्तित्व की तलाश .. 1

30 टिप्‍पणियां:
इस प्रकृति को जब भी भीतर की आँख से देखता हूँ तो बहुत कुछ अप्रत्याशित सा महसूस होता है , और जब इसके करीब जाकर इसको अपने पास महसूस करता हूँ तो भाव विभोर हो जाता हूँ . यह एक बार नहीं बल्कि कई बार होता है . इस अनुभूति का कोई निश्चित क्रम नहीं है . कोई समय नहीं है और कोई सीमा भी नहीं . सब कुछ अप्रत्याशित है . सब कुछ अनुभूति के स्तर पर घटित होता , अभिव्यक्त नहीं हो पाता , एक अनुभव बन जाता है जीवन के क्रम में . जीवन अनिश्चित है और इस अनुभव का जीवन में दखल भी अनिश्चित है . हर किसी के लिए एक सी प्रकृति में अनुभव अलग है . आज तक प्रकृति में भी परिवर्तन हुए हैं . लेकिन एक ही समय में , एक ही वातावरण में रहने वाले इंसानों के अनुभव अलग - अलग हैं , यह बहुत अद्भुत बात है . एक ही माता पिता से जन्म लेने वाले दो जुडवा बच्चों के अनुभव अलग हैं . सोच अलग है , व्यवहार अलग है . ऐसा बहुत कुछ अलग है जिसकी कल्पना करना हमारे मस्तिष्क से बाहर है , और यही है वह जिसे हम अस्तित्व कहते हैं . 

पूरी प्रकृति पांच तत्वों का मिश्रण है और चेतना का स्रोत एक ही है . लेकिन विविधता इतनी कि जितनी आँखें उतने नज़ारे , जितने मस्तिष्क उतने विचार , जितने ह्रदय उतनी भावनाएं , जितने मन उतनी इच्छाएं . सब कुछ अप्रत्याशित सा जान पड़ता है , और जब हम इस सब अप्रत्याशित को करीब से अनुभव करते हैं तो हम खुद को अद्भुत पाते हैं . खुद को धन्य पाते हैं . खुद को हम खुदा का तोहफा मानते हैं . लेकिन ऐसा अनुभव हमें जीवन में होता नहीं . क्योँकि हमारे पास समय नहीं . खुद के करीब आने का . खुद के भीतर झाँकने का . खुद से प्रेम करने का . खुद को महसूस करने का . लेकिन एक तलाश हम जिन्दगी में जरुर करते हैं . जिसे हम अस्तित्व कहते हैं . यह तलाश हम बचपन से जीवन के निर्वाण तक करते हैं . जन्म से मृत्यु तक करते , आत्मा से परमात्मा तक करते हैं . आशा से निराशा तक करते हैं . लेकिन हमारे हाथ क्या लगता है ? यह हमारी तलाश पर निर्भर करता है . हम खोजना क्या चाह रहे हैं ? हमारी आवश्यकता क्या है ? जिसने अपनी आवश्यकता को पहचान लिया , उसका लक्ष्य आसन हो गया . उसके सामने कठिनाईयां भी हैं , लेकिन दृढ निश्चयी है तो लक्ष्य तक जरुर पहुंचेगा ..और उसका लक्ष्य तक पहुंचना उसके अस्तित्व का बोध करवाता है .
अब प्रश्न उठता है कि अस्तित्व की तलाश जरुरी क्योँ है ? क्या बिना अस्तित्व के भी जिया जा सकता है ? अस्तित्व की तलाश व्यक्ति नहीं करता , ना ही उसे इसकी जरुरत है . लेकिन एक बात बहुत महत्वपूर्ण है वह यह कि अस्तित्व की तलाश उसका स्वभाव है . वह इसके बिना जी ही नहीं सकता . वह चाहता नहीं है कि वह अस्तित्व को तलाशे , लेकिन फिर भी स्वभाववश इस तरफ अग्रसर होता है . जिसने खुद के  इस स्वभाव को पहचान लिया वह अस्तित्व के लिए चिंतित तो नहीं लेकिन सजग जरुर होता है , और वहीँ से शुरू होता है जीवन की सार्थकता का सफ़र . हमारे धर्म ग्रन्थ इस विषय पर गहनता से प्रकाश डालते हैं . जीवन एक रोचक सफ़र है . अगर हम इसे जियें तो , एक ऐसा अनुभव है जिसका कोई सानी नहीं . लेकिन हम जीवन को जीते ही कहाँ हैं ? सबसे बड़ी भूल तो यहाँ होती है . हमारे पास साँसे होती हैं जिन्हें हम बिना लक्ष्य के जीते हैं और फिर विदा हो जाते हैं . हमारे जाने के बाद ना तो कोई हमारा अस्तित्व होता है और न कोई याद . यह क्रम चलता रहा है सदियों से . जिनका अस्तित्व है , जिन्हें हम याद करते हैं वह शरीर रूप में विद्यमान नहीं , लेकिन उनका अनुभव हमारे पास है . उन्होंने जो महसूस करने के बाद अभिव्यक्त किया वह हमारे पास है और जब तक वह हमारे पास है तव तक उनका अस्तित्व बना रहा है , और बना रहेगा .   
शेष अलगे अंकों में ........!                                                       

07 नवंबर 2010

अस्तित्व

21 टिप्‍पणियां:
जब भी देखता हूँ
आकाश की तरफ
मेरी कल्पना की सीमा से परे ....!
मेरे सपनों का संसार
चाँद तारों में नजर आता है ।

चमकते चाँद में
जीवन का सार,
उभर आता है ..निखर आता है
तारों की टिमटिमाहट में
ख्वाबों की बुनाबट में
एक तारा टूटते , मेरा घर लूटते हुए ,
यादों के मंजर में
अपनों का संसार
बिखर जाता है , टूट जाता है ।


चाँद भी आकाश में
सदा नहीं चमकता ,
कभी पूर्ण प्रकाश , कभी नहीं दिखता...!

जिन्दगी के इस खेल में
अपने- परायों के मेल ,
अजनबी सा अपनापन
कुछ ठहरा सा खालीपन
यादों की उलझन .....!
सब कुछ सोचने के बाद
कुछ पाने -कुछ खोने के बाद
मुझे मेरा अस्तित्व याद आता है ।