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15 दिसंबर 2012

हो तुम

20 टिप्‍पणियां:

जीवन पथ में, मैं अकेला /  साथी हो तुम
मंजिल को पाने मैं  निकला / साहिल हो तुम
मेरे हृदय में उठती करुणा / आंसू हो तुम
हर शै पर चमकने वाला / सितारा हो तुम .

 
जीवन और जगत में / चेतना हो तुम
सोच और कल्पना से परे / ऐसा रहस्य हो तुम 
सुख और आनंद के बीच  / सच्चिदानंद हो तुम
दृश्यमान सत्ता की / वास्तविक सत्ता हो तुम .

लिखता हूँ कविता मैं / भाव हो तुम
संजोता हूँ शब्द मैं / अर्थ हो तुम
क्या कहता हूँ , कैसे कहता हूँ / शैली हो तुम
मेरे अधरों पर अंतिम / ' केवल ' शब्द हो तुम .

03 नवंबर 2012

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य और मानवीय मूल्यों की सार्थकता

13 टिप्‍पणियां:
मानव का स्वभाव है. वह हर कर्म करने से पहले सोचता है और आकलन करता है अपनी लाभ-हानि का. जब मानव में चिंतन की प्रवृति जागृत होती है तो, वह जीवन के हर पहलू को उसी दृष्टिकोण से सोचता है और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँच कर अपना कर्म करता है. मानव का यह कर्म उसके बुद्धि के सापेक्ष पक्ष की पहचान करवाता है. आज हम विकास के जिस पड़ाव पर हैं वह मानव की दूरदृष्टि और परिस्थितियों से हार न मानने के दृढ निश्चय के कारण है. इसी दृढ निश्चय के कारण उसने इस धरती पर रहते हुए अप्रतिम उपलब्धियां हासिल की हैं और निरंतर इस और अग्रसर है. धरती से लेकर आकाश तक उसने अपनी उपलब्धियों की गाथा लिखी है. किसी सीमा तक जब मैं  मानव के इस पक्ष पर सोचता हूँ तो एक अद्भुत सा अहसास मुझे होता है और मानवीय उपलब्धियों  पर गर्व महसूस होता है.
 
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पर अगर दृष्टिपात करें तो हम यह महसूस कर सकते हैं कि दुनिया सीमा रहित हो गयी है. सूचना और तकनीक के साधनों के विकास के कारण हमारी जीवन शैली में परिवर्तन हुआ है. परिणामस्वरूप आज विश्व की प्रत्येक हलचल से हम शीघ्र ही रुबरु हो जाते हैं. हमारे आस-पास क्या कुछ घट रहा है, उसकी जानकारी हमें तत्काल मिल जाती है. हमारे सामने ऐसा बहुत कुछ अप्रत्याशित है जिसके बारे में सोचकर हम दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाते हैं. लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं यह सब अगर संभव हुआ है तो मानव की सोच और मेहनत के कारण. वैश्विक पटल पर हम जो भी परिवर्तन देख रहे हैं वह निश्चित रूप से मानव के प्रयासों का ही परिणाम हैं. मानव ने इस धरा पर बहुत से प्रयोग किये और निरंतर कर रहा है, उन प्रयोगों के बदले उसे बहुत कुछ प्राप्त हुआ भी है, और वह प्राप्त कर भी रहा है. यह इस दौर की ही बात नहीं यह सब आदिकाल से चला आ रहा है और अनवरत रूप से चलता रहेगा, मानवीय सभ्यता और संस्कृति के अंत तक. 

सूचना और तकनीक के अद्भुत विकास के कारण हमारा जीवन परिवर्तित हो गया है. कठिन चीजें जिन्हें प्राप्त करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती थी वह आज हमें आसानी से प्राप्त हो जाती हैं या फिर सहज में ही मिल जाती  हैं. आज ऐसा बहुत कुछ हमारे सामने है जिसके बारे में हम सिर्फ सोच ही सकते थे लेकिन आज उसे हम प्रायोगिक तौर पर देख भी रहे हैं. जिस ढर्रे पर मानव आगे बढ़  रहा था, लक्ष्य तो आज भी उसका वही है लेकिन चाल में परिवर्तन आ गया. वह अब और तेजी से आगे बढ़ रहा है और अपने लक्ष्यों को हासिल कर रहा है. लेकिन मानव में जिस बदलाव को आज देखा जा रहा है. शायद इसके बारे में हम आगाह नहीं थे. आज जब हम 21 वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं. भौतिक रूप से तो मानव ने बहुत कुछ हासिल किया है. इस विकास के कारण समय और स्थिति के साथ-साथ हमारे सोचने समझने का तरीका बदला है. अगर हमारी सोच और समझ के स्तर में ही परिवर्तन आ गया तो यह निश्चित है कि हमारा रहन सहन बदल गया, हमारा आचार–व्यवहार बदल गया. रिश्तों के प्रति हमारी सोच बदल गयी. अगर यह परिवर्तन आये हैं तो निश्चित रूप से हमें कहना चाहिए कि हमारी सोच मानवीय मूल्यों के प्रति भी बदली है. अगर नहीं बदली होती तो फिर यह परिवर्तन हमें नजर नहीं आते. कुल मिलाकर आज अगर पूरे विश्व के मानवीय पहलुओं पर अगर दृष्टिपात करें तो यह आभास होता है कि हम मानवीय मूल्यों को नजर अंदाज कर आगे तो बढ़ रहे हैं लेकिन  बहुत कुछ ऐसा भी है जिसे हम खो चुके हैं और बहुत सी चीजों से निरंतर हाथ पीछे खींच रहे हैं. एक तरफ तो हमारा लक्ष्य मानव को भौतिक रूप से सुखी करना है और दूसरी तरफ देखें तो उसके सामने उतनी ही मानवीय समस्याएं भी. एक तरफ हमने आविष्कार किया सुख के साधनों का तो दूसरी तरफ वही सुख के साधन बने हमारे लिए चिंता का सबब. मानव ने अविष्कार किया बम का अपनी सुरक्षा के लिए लेकिन आज वही उसके लिए खौफ का कारण है. ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिन्हें अगर गहराई से  देखें तो बड़ी सोचनीय स्थिति हमारे सामने पैदा होती है, और फिर मन कहता है क्योँ न वैराग्य ही धारण किया जाये. 

विश्व का कोई भी देश ऐसा नहीं जहाँ आज मानवीय मूल्यों की समस्या नहीं हो. हम अपनी आम जिन्दगी में देखते हैं कि कहीं भी अगर हमारे मनों में खौफ पैदा होता है तो वह हमारे कर्मों के कारण होता है. हम कहीं भी हैं बस में, रेल में, सड़क में या फिर घर से कहीं बाहर तो हम खुद को अगर किसी से बचाने की कोशिश करते हैं तो वह है ‘इंसान’. अक्सर डर बना रहता है. कोई मेरा पर्स न चुरा ले, मेरे हाथ की घडी ना ले जाये कोई, मेरी जेब न लूट ले कोई और हम देखते हैं कि ऐसी वारदातें अक्सर हमें हर जगह देखने-सुनने को मिल जाती हैं. यह तो हुई बाहरी दुनिया की बात. अब हम अपने परिवेश की तरफ लौटते हैं. एक घर में सास बहु की नहीं बनती, बेटा माँ-बाप के कहने से बाहर है, पति और पत्नी आपस में मिलजुल कर नहीं रह सकते. दहेज़ के लिए किसी की बेटी का क़त्ल, मानसिक प्रताड़ना, सड़क पर किसी अबला की आबरू को लूटना, किसी बच्चे का कहीं से खो जाना, ना जाने कितनी समस्याएं हैं जिनका सामना अक्सर होता रहता है. ऐसी परिस्थिति में हम क्या सोचें ? क्या करें, यह हम पर निर्भर करता है. लेकिन हम खुद ही अगर ऐसी चीजों के शिकार हैं तो हम क्या कर सकते हैं? यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है. 

विश्व के प्रत्येक देश में मानवीय मूल्यों का ह्रास और हमारा भौतिक उन्नति के लिए निरंतर प्रयासरत रहना,
दो अलग चीजें हैं. हालाँकि यह सही है कि दोनों का एक दुसरे से अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. भौतिक उन्नति जहाँ मानव जीवन के बाह्य पक्ष से सम्बंधित है, तो आध्यात्मिक उन्नति मानव जीवन के आंतरिक पक्ष से सम्बंधित है. लेकिन  अगर व्यक्ति के समझ के स्तर को ऊँचा उठाना है उसे पहले आत्मिक उन्नति के बारे में सोचना होगा और जब व्यक्ति की समझ का स्तर ऊँचा होगा तो निश्चित रूप से वह बहुत सी समस्याओं से निजात पा लेगा. लेकिन जहाँ तक आकर्षण की बात है तो वह हमारे मनों पर निर्भर करता है, और यह बात सही है कि इंसान का मन चंचल है. वह कभी भी एक सी चीजों पर केन्द्रित नहीं रह सकता. इस चंचलता के बारे में तो यह कहा जा सकता है कि किसी हद तक यह सही भी है. लेकिन अगर हम अपनी अस्मिता को भूल कर लक्ष्य से भटक जाते हैं तो फिर सारी उन्नतियाँ हमारे लिए बेकार साबित होती हैं. आज के मानव के सामने यही तो यक्ष प्रश्न है कि उसे जीवन में किस चीज को तरजीह देनी है और किस को नहीं. लेकिन जिस तरह का परिवेश उसके सामने है उससे वह अमीर और भौतिक साधनों के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है और यही कुछ आज हमारे सामने हो रहा है. आज का इंसान किसी भी हद पर अपनी सुविधा देखता है, इसलिए जिसे जहाँ मौका मिलता है वह मानवीय मूल्यों को ताक पर रख देता है अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए इसीलिए तो आज कोई ही ऐसा देश होगा जहाँ कोई घोटाला न होता हो, चोरी न होती हो, डकैती न होती हो. 

यह सब कब तक चलता रहेगा और मानव-मानव के खौफ से कब तक खौफजदा होता रहेगा. इस प्रश्न पर हमें गहराई से सोचने की आवश्यकता है. निरंकारी बाबा जी कहते हैं "कुछ भी बनो मुबारक है, लेकिन सबसे पहले इंसान बनो". इस पंक्ति को अगर गहराई से विचारते हैं तो हमें हमारे जीवन का सही लक्ष्य हासिल हो सकता है. हम जीवन में सब बनते हैं और बनने की कोशिश करते हैं, लेकिन इन्सान कभी नहीं बन पाते और ना ही प्रयास करते हैं. हम अपने घरों में देखें हम अपने बच्चों को संस्कारों की शिक्षा देने से बेहतर भौतिकता की शिक्षा देना ज्यादा उचित समझते हैं और फिर आगे चलकर वही बच्चे तो देश और दुनिया को चलाते हैं जिनके संस्कार अच्छे होते हैं वह अच्छे कर्म करते हैं और जिनमें संस्कारों की कमी होती है वह भी अपना जलबा दिखाते, और फिर लोग उन्हें किस नजर से देखते हैं यह तो हमारा अनुभव ही है. इसलिए हमें यह बात ध्यान देनी होगी "कि सिर्फ चलने का नाम प्रगति नहीं, दिशा भी देखनी पड़ती है"  और जब हमारी दिशा सही होगी तो निश्चित रूप से हमारी दशा भी बदल जायेगी. 

वर्तमान वैश्विक परिद्रश्य जो हमारे सामने है वह काफी रोचक और विविधता भरा है. और काफी हद तक बहुत सुखद भी है. लेकिन जहाँ पर मानवीय मूल्यों की बात है उनमें निरन्तर कमी होती जा रही है,  बस यही एक दुखद पहलु है. हालाँकि यह सही है कि राम के साथ रावण, कृष्ण के साथ कंस हमेशा रहा है. फिर भी हमारे जो आदर्श हैं उन्हें तो हमें कायम रखना होगा. अगर हम उन्हें ऊंचाई नहीं दे सकते तो उनके मानकों को गिराने का अधिकार हमें भी नहीं है. यही कुछ हमें सोचना है और इस पहलु पर विचार कर आगे बढ़ना है. हम जितना मानवीय मूल्यों की तरफ ध्यान देंगे उतना ही हमारे जीवन उज्ज्वल और हमारा परिवेश उतना ही सुखद होगा. इसी आशा के साथ....!  यह पोस्ट यहाँ भी प्रकाशित हो चुकी है ....!

08 जून 2012

दुआ का एक लफ्ज, और वर्षों की इबादत...4

25 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे...!!! मनुष्य जब भौतिक चीजों से उपर उठकर सिर्फ और सिर्फ ईश्वर को पाने के लिए प्रार्थना करता है तो उसकी प्रार्थना उसे आनंद देने वाली होती है, और वास्तविक मायनों में यह ही सच्ची प्रार्थना है. क्योँकि इस प्रार्थना का फल हमेशा उसे आनंद देता है. जिसने इबादत में खुदा को मांग लिया वह धन्य हो गया. क्योँकि सांसारिक चीजों की प्राप्ति थोड़ी देर के लिए आनंददायक हो सकती है और फिर दुसरे ही क्षण हमारे सामने हमारी कोई और इच्छा जाग्रत हो जाती है. ऐसी हालत में हम सदा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही प्रार्थना करते हैं और करते रहेंगे. लेकिन जिसने इबादत में खुदा से खुदा को मांग लिया वह धन्य हो गया. उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं, वह हर परिस्थिति में एक जैसे भावों से युक्त है, वह खुद को इस ईश्वर में स्थापित कर लेता है. क्योँकि उसे इस बात का अहसास है कि:- राम नाम निज औषधि, काटे कोटि विकार. / विषम व्याधि ये उबरै, काया कंचन सार. (दादू)

राम नाम रूपी यह औषधि एक निजी औषधि है, और यह करोड़ों विकारों का शमन करने वाली है. जैसे ही
हमारे जीवन में ईश्वर का रंग चढ़ने लगता है तो हमारी विषमता
, असंतुलन कम होने लगता है, समता की अवस्था की और जीवन के भाव अग्रसर होते हैं, ईश्वर और जगत के बीच संतुलन कायम हो जाता है.
जितनी भी विषम परिस्थितियाँ इस जगत में उभरती हैं वह सब चित से हट जाती हैं, और हम इस स्वर्ण देह को देखते हुए इस नश्वर शरीर में ही अनश्वर शरीर को देख पाते हैं. ऐसी स्थिति में जीवन के प्रति मोह भंग तो नहीं होता, लेकिन जीवन की वास्तविकता समझ आती है कि इस नश्वर देह के साथ अनश्वर ईश्वर का गहरा सम्बन्ध है और फिर जीवन का हर क्षण दूसरों की भलाई के लिए, कल्याण के लिए प्रयुक्त होता है, यही से इबादत-दुआ बन जाती है. जब हम आत्मिक और भावनात्मक स्तर पर  बिना किसी लाभ हानि के हमेशा दूसरों का हित सोचते हैं तो हमारे आनंद की सीमा कई गुणा बढ़ जाती है फिर हम संसार की प्रत्येक परिस्थिति में एक जैसे भावों से युक्त रहते हैं और समय आने पर किसी के कल्याण के लिए , दुःख का शमन करने के लिए ईश्वर से दुआ करते हैं :-“जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि./छोड़ सिआणप सगल मनु तनु अरपि धरि”. (आदि ग्रन्थ : 519) 

अर्थात ऐसे गुरसिख की अरदास कभी खाली नहीं जाती जो पूरे समर्पण भाव से गुरु से प्रार्थना करता है, जो अपनी अक्ल और तन-मन को गुरु को समर्पित कर देता है. दुआ की पहुँच बहुत गहरी होती है, अगर सच्चे मन से हम कोई भी भाव इस ईश्वर के सामने रखते हैं तो वह निश्चित रूप से पूर्ण होता है.  इस भाव में किसी देश की, भाषा की, जाति की सीमा आड़े नहीं आती हम किसी के दुःख को देखकर दुआ करते हैं उसे तुरंत सुख महसूस होता है. कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि सामने वाले मनुष्य के लिए प्रार्थना करते ही उसके जीवन कि दशा बदलने लगती है और की बार तो प्रार्थना के बल पर ही आश्चर्यजनक परिणाम भी प्राप्त होते हैं. यह बात ध्यान देने वाली है कि प्रार्थना अंधविश्वास नहीं है, यह एक पक्का विश्वास है और यह विश्वास ईश्वर की पूर्णता और उसके साथ आत्मिक सम्बन्ध स्थापित कर लेने के बाद ही प्राप्त होता है. ज्यादातर हमारी दुआ और इबादत अंधविश्वास पर आधारित होती है और ऐसी हालत में सामने वाला हमारा लाभ उठाता है. हमारी मजबूरी का लाभ उठाकर वह अपना स्वार्थ सिद्ध करता है. कई बार तो यह भी देखा जाता है ऐसे स्वार्थी व्यक्ति दुआ के नाम पर व्यक्ति का मानसिक और शारीरिक शोषण भी करते हैं, यह एक नकारात्मक पहलू हैं. जिससे हमें बचना होगा. हम खुद के लिए जब प्रार्थना करते हैं तो उसमें हमारी इबादत और आस्था बहुत मायने रखती है, लेकिन जब कोई किसी के लिए दुआ करता है तो उसमें हमारा विश्वास काम करता है और यही हमारी इबादत और दुआ का आधार है.