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14 जनवरी 2014

बदलावों की आहट...2

5 टिप्‍पणियां:
वैसे तो परम्पराओं के प्रति आकृष्ट होना कोई बुरी बात नहीं है, वह हमारे जीवन और आधार का हिस्सा हैं, हमें उनका निर्वाह करना चाहिए, लेकिन वक़्त और हालात को देखते हुए, उनकी प्रासंगिकता और व्यावहारिकता को देखते हुए. वर्ना हममें इतना भी साहस होना चाहिए कि हम उन पुरानी, अव्यवहारिक  और जर्जर परम्पराओं को उखाड़ फेंकने की हिम्मत भी कर सकें. गतांक से आगे..

जब तक हम समाज से कटी हुई और अव्यावहारिक परम्पराओं का पालन करते रहेंगे तब तक किसी बदलाव की आशा करना बेमानी है. हम अपने चारों और नजर दौड़ा कर देखें तो हम सहज में ही समझ जायेंगे कि हम कितनी व्यवहारिक चीजों का अनुसरण कर रहे हैं और कितनी ऐसी चीजें हैं जिनके विषय में न जानते हुए भी हम उनके प्रति आकृष्ट हैं. हमारे समाज में ऐसी बहुत सी जर्जर और अव्यावहारिक मान्यताएं हैं जो हमें प्रगति के पथ पर आगे नहीं बढ़ने देती और कुछ तो ऐसी हैं जिनसे व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान रहता है. लेकिन व्यवस्था ही कुछ ऐसी हैं कि हमें उनका पालन करना पढता है, और कहीं पर हमें उसका पालन करने के लिए मजबूर भी कर दिया जाता है. हम एक विस्तृत और बहुविध देश के वासी हैं. यहाँ हर चार कदम पर नयी बोली, नया पहरावा, अलग सा खान-पान, जुदा सा रहन-सहन देखने को मिल जाता है और यही इस देश कि विशिष्टता भी है. विविधता में एकता इस देश की एक अन्यतम विशेषता है. वहीं दूसरी और इस देश में ऐसा भी है कि किसी व्यक्ति को उंचा माना जाता है, किसी को नीचा, किसी को मंदिर के आधार पर बाँट दिया तो किसी को मस्जिद के  आधार पर, कोई हिन्दू हो गया, तो कोई मुसलमान, यह क्रम बहुत बड़ा है, इसमें विविधता भी है. लेकिन किसी भी स्तर पर कोई एकता नहीं. सब जगह बंटवारा है, नफरत है, वैर है, द्वेष है और यह आज की बात नहीं यह हजारों वर्षों से यूं ही चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा जब तक कि इस घृणित मानसिकता को मजबूती देने वाले लोग इस धरती पर मौजूद रहेंगे. 

एक तरफ घृणित मानसिकता को मजबूती देने वाले लोग और दूसरी तरफ समभाव की दृष्टि अपनाने वाले लोग, एक तरफ मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने वाले लोग, और दूसरी तरफ अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए आम लोगों को भड़काने वाले लोग, दोनों इस समाज का हिस्सा हैं और दोनों एक ही समाज में रहते हैं. लेकिन एक समाज में नफरत फैलाने के लिए प्रयासरत हैं तो, दूसरे उसे मिटाने के लिए, लेकिन बहुत गहरे में उतरकर देखते हैं तो समझ आता है कि बदलाव को पसंद करने वाले लोग बहुत कम हैं, और इससे भी बड़ी बात यह है कि वास्तविक बदलाव के लिए प्रयास करने वाले व्यक्ति तो न के बराबर हैं. हम इतिहास में देखते हैं कि कलिंग के यूद्ध के बाद अशोक की जीवन दृष्टि बदल गयी और वह बुद्ध का अनुयायी बनकर बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा प्रचारक सिद्ध हुआ, यह बदलाव को अपनाने और उसके लिए प्रयत्न करने के कारण ही संभव हुआ. बदलाव की सिर्फ एक आहट हुई और उस आहट को सुनकर एक सम्राट का हृदय परिवर्तित हो गया और वह चल पडा उस राह पर जिस राह पर चलकर मानव-मानव का हितैषी बन जाता है, मानव-मानव के करीब आ जाता है. इतिहास में ऐसे कई उदहारण हैं जब अव्यावहारिक परम्पराओं को उखाड़ फैंकने के लिए प्रयास हुए, लेकिन सफलता का प्रतिशत कितना है यह हम सबके सामने है. 

हमें यह आशा तो नहीं करनी चाहिए कि सारे संसार में रहने वाले व्यक्ति समदृष्टि को अपनाकर, मानवीय
भावनाओं को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर चलेंगे. ऐसा तो संभव नहीं और खासकर आज की तारीख में तो और भी नहीं, लेकिन प्रयास तो किया जा सकता है और हम सब उस प्रयास के भागीदार तो बन ही सकते हैं. वैसे उपरी तौर पर देखें तो ऐसा लगता है कि दुनिया एक द्रुत गति के बदलाव से गुजर रही है, और सबसे ज्यादा यह शिक्षा दी जा रही है कि मनुर्भवः (मनुष्य बन जाओ), आये दिन हर जगह ऐसा देखने को मिल जाता है कि जब कोई लाखों की भीड़ के सामने इस सन्देश को प्रचारित कर रहा हो और वह भीड़ इस सन्देश को सुनकर झूम रही हो. आज इस दुनिया में बदलाव लाने वाले एक-दो नहीं बल्कि हजारों की संख्या में हैं और आये दिन गाजर-मूली की तरह पैदा भी हो रहे हैं. कोई धर्म की शिक्षा दे रहा है, कोई अध्यात्म की बात कर रहा है, कोई भ्रष्टाचार को मिटाने की तरकीबें बता रहा है, किसी के सिर पर राष्ट्रवाद का भूत सवार है तो कोई कह रहा है कि अमुक विचारधारा और वर्ग के लोगों को अगर मिटा दिया जाए तो सब समास्याओं का समाधान हो सकता है, कोई यह भी कह रहा है कि यह जो कुछ भी दिखाई दे रहा है सब माया है, तुम क्या लाये थे, क्या ले जाओगे पर गहन मंथन कर रहा है, और कोई राम-कृष्ण की कथा के माध्यम से प्रेरणा दे रहा है, कोई जीने के गुर सिखा रहा है ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’. कोई मंदिर जा रहा है, कोई मस्जिद और कोई चर्च में, कोई अखंड पाठ कर रहा है तो कोई निरंतर जाप. सतही तौर पर ऐसा दृश्य हमारे सामने तैयार है कि अब मुझे ऐसा सोचने का मन करता है कि इस दुनिया से बेहतर कुछ भी नहीं. सब एक दम बदल रहा है और हजारों लोगों की दिन रात की मेहनत का परिणाम निश्चित रूप से एक सुन्दर से संसार का निर्माण करेगा. 

लेकिन बहुत गहरे में उतरकर देखते हैं तो यह सब एक मंच पर अभिनय के सिवा कुछ भी नहीं है. जिस तरह से रंगमंच में एक कलाकार मुखौटा पहनकर अपने अभिनय के माध्यम से सबका ध्यान अपनी और आकर्षित करता है और बहुत प्रेरक सन्देश के माध्यम से बहुत बड़ी-बड़ी बातें करता है, वैसा ही बहुत कुछ यहाँ भी अभिनीत किया जा रहा है. सब तो नहीं, लेकिन ज्यादातर बदलाव की बात करने वाले लोग सिर्फ अभिनय कर रहे हैं और अपना स्वार्थ सिद्ध करने की फ़िराक में हैं. जिसका स्वार्थ जिस माध्यम से आसानी से सिद्ध हो सकता है, वह उस तरकीब को अपनाने की कोशिश कर रहा है. ज्यादातर का बदलाव से कोई लेना देना नहीं उनका एक ही मकसद है अपने स्वार्थों की पूर्ति करना और इसके लिए वह भीड़ का सहारा लेते हैं, खुद मुखौटा पहनते हैं और उस मुखौटे के आकर्षण से सबको आकर्षित करते हुए अपना रुतवा कायम करते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं. लेकिन जैसे ही इनका मुखौटा उतरता है इनकी वास्तविकता समझ आ जाती है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, ऐसी स्थिति में आम व्यक्ति एक बार फिर ठगा जाता है और फिर वह इसी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है. हर बार वह स्वतन्त्र होने की सोचता है, अपने जीवन को सही ढंग से जीने का प्रयास करता है, और जहाँ से भी उसे अपने लिए सही और सुरक्षित किनारा मिलता है वह उस और पूरी तन्मयता से बढ़ता है,लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि हर बार, वह हर स्तर पर ठगा जाता है. ऐसे में न तो कोई बदलाव की आशा कर सकता है और न ही वास्तविक रूप से कोई बदलाव लाया जा सकता है. 

यह प्रश्न भी विचारणीय है कि हम किस तरह का बदलाव चाहते हैं. कुछ क्रांतिकारी विचारों के स्वयंभू समाज सुधारक यह भी कहते हुए सुने जाते हैं कि आज से पहले जो भी व्यवस्थाएं समाज में चली आ रही हैं उन सबको बदलने की जरुरत है, वह सब कुछ का ठिकरा किसी एक के सर पर फोड़ने का पूरा प्रयास करते हैं और खुद को उन सबसे श्रेष्ठ स्थापित करने की कोशिश करते हैं. लेकिन कैसे इन व्यवस्थाओं को बदला जा सकता है, किस कमी को शीघ्र ठीक करने की जरुरत है और उसका क्या लाभ समाज को हो सकता है, इसके विषय में वह स्पष्ट नहीं होते. वह बात तो भविष्य को बदलने की करते हैं लेकिन उन्हें वर्तमान और इतिहास की कोई ख़ास समझ नहीं होती, बस वह एक राग अलापते हैं और उसी के बल पर अपना प्रभुत्व कायम करने की कोशिश करते हैं .....!!!! शेष अगले अंक में....! 

10 जनवरी 2014

बदलावों की आहट...1

14 टिप्‍पणियां:
मैं जब भी कहीं दूर पहाड़ की चोटी की तरफ देखता हूँ तो मुझे उसमें कोई बदलाब नजर नहीं आता, और जब उस पहाड़ की चोटी से दुनिया को देखता हूँ तो बहत कुछ बदला हुआ नजर आता है. ऐसे में एक ही स्थान के बारे में मेरे दो दृष्टिकोण उभरकर सामने आते हैं. जब मैं अपनी ही दुनिया में रहकर अपनी दुनिया को पहचानने की कोशिश करता हूँ तो संभवतः बहुत कुछ ऐसा बदला हुआ नजर नहीं आता जिससे मेरा कोई वास्ता नहीं होता, और अगर कहीं मेरे वास्ते की चीजों में हल्का सा भी परिवर्तन आये और वह मेरे अनुकूल न हो तो मैं खुद को बहुत असहज महसूस करता हूँ. अगर वह परिवर्तन मेरे अनुकूल होते हैं तो मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता. लेकिन बदलावों का अनुकूल और प्रतिकूल होने से तो कोई मतलब नहीं वह तो होते ही हैं, उन्हें तो होना ही है, वह हो कर ही रहेंगे, समय के साथ. वैसे भी जब यह कहा जाता है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है तो वह किसी एक चीज पर ही लागू नहीं होता, सब चीजों की प्रकृति ही ऐसी है कि उसे बदलना ही है, और बदलाव की यह प्रक्रिया स्वाभाविक और नैसर्गिक है. इसे हम चाहकर भी नहीं बदल सकते. बस इस बदलाव के प्रति अपने दृष्टिकोण में एक सहज और सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं, लेकिन यह मुमकिन है और नहीं भी?? 

बदलावों के प्रति हमारे दृष्टिकोण और सोच में परिवर्तन भी बहुत कुछ हमारे स्वार्थ का हिस्सा होता है और वह भी
काफी हद तक बदलाव लाने की प्रक्रिया हो सकता है. बेशक वह बदलाव हमारे लिए सहज न हो, लेकिन फिर भी बदलाव लाने की वह प्रक्रिया हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है, और जब वह हमें अपने आगोश में ले जाती है तो हम उसके साथ चलना शुरू करते हैं, बेशक हम चलना नहीं चाहते, लेकिन परिस्थिति वश हमें चलना ही होता है और वह हमारी प्रकृति का हिस्सा है. उसके बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं और वही बदलाव की प्रक्रिया के फलस्वरूप हुआ बदलाव कहीं न कहीं पर नयेपन की निशानी भी है, हो सकता है वह नयापन हमारी सोच के अनुकूल न हो, और उसका स्वरूप हमें पसंद भी न हो लेकिन प्राकृतिक रूप से उसे नयापन धारण करना है. इसलिए वह अपनी गति से ही हो रहा है. हम अपने जीवन क्रम से इस बदलाव को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. हम पूरी दुनिया को समझने की कोशिश न करें सिर्फ एक बार अपने भीतर और बाहर जितना झाँक सकते हैं, जितने गहरे में उतरकर देख सकते हैं देखने की कोशिश करें, और शांतचित होकर अपने बदलावों पर ध्यान देने की कोशिश करें तो हमें स्वयं ही पता चल जाएगा कि मुझमें कितने परिवर्तन हुए हैं और उनकी मेरे जीवन में क्या महता है? यहीं से सफ़र शुरू होगा न परिवर्तन होने वाली अवस्था का, और जब हम उस मुकाम पर पहुँच जायेंगे तो बाहरी परिवर्तन तो होंगे ही, लेकिन भीतर से परिवर्तन न होने वाली अवस्था होगी, कहीं कोई दुःख नहीं, कोई ख़ुशी नहीं, कोई अपना नहीं, कोई पराया नहीं. लेकिन ऐसा होना तो कल्पना करने जैसा है, संभवतः यह प्रश्न आप मुझसे कर सकते हैं और यह स्वाभाविक भी है. 

इसे ऐसे समझने की कोशिश करते हैं, मैं जब भी पहाड़ की चोटी की तरफ देख रहा हूँ तो अपने घर की एक खिड़की से देख रहा हूँ जो मेरे लिए सहज भी है, सुविधाजनक भी और मुझे पहाड़ से प्रेम है इसलिए मैंने घर बनाते वक़्त खिड़की पहाड़ की दिशा में रखीं. सिर्फ इसलिए कि मैं पहाड़ की चोटी का दर्शन कर सकूँ. मैंने पहाड़ के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करने के लिए मनचाही व्यवस्था की और उसी से मैं खुश होता गया. लेकिन अब स्थिति ऐसी है कि बहुत लम्बे अरसे से पहाड़ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और वह मुझे बोझिल लगने लगा. हर बार उसमें कोई आंशिक सा बाहरी परिवर्तन होता लेकिन भीतरी रूप से वह पहाड़ कभी बदला ही नहीं और संभवतः मैंने भी यह समझ लिया कि इसमें बदलने की कोई संभावना ही नहीं. लेकिन बहुत प्रयास करके उस पहाड़ की चोटी पर पहुंचकर जब मैंने अपनी दुनिया को देखने की कोशिश की तो मेरा दृष्टिकोण ही बदल गया, अब पहाड़ अपना सा लगने लगा और जिस दुनिया में मैं रहता था उसके प्रति मेरा दृष्टिकोण ही बदल गया. संभवतः इसके पीछे एक कारण यह भी काम कर रहा होगा कि मैं ऊंचाई से दुनिया को देख रहा हूँ और इसलिए मेरा दृष्टिकोण भी बदल गया है. अब मैं जिस ऊंचाई पर हूँ वहां न कोई अपना है, न कोई पराया, मुझे सब कुछ समान दिखाई दे रहा है और काफी हद तक यह सब मेरे लिए आनंदायक भी है, लेकिन यह बदलाव बाहरी तौर ही है तो मुझे ऐसा लग सकता है कि स्थान के परिवर्तन के कारण यह आया होगा, हां यह एक कारण हो सकता है, लेकिन वास्तविक कारण यह नहीं, वास्तविक कारण तो यह है कि उस पहाड़ की चोटी तक पहुँचते हुए मुझे जो श्रम करना पडा जो कुछ झेलना पडा और जो अनुभव मुझे वहां जाकर हुए उन्होंने मेरे दृष्टिकोण को बदल दिया. इसलिए सब कुछ समान सा लगने लगा और जहाँ तक भी नजर गयी बस एक नया अनुभव हुआ और दृष्टि बदल गयी. 

इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि जब हम अपनी बनाई हुई सोच और नजर से दुनिया को देखने समझने की
कोशिश करते हैं तो हम भ्रम में पड जाते हैं और यह स्वाभाविक भी है. क्योँकि जब भी कोई इस धरा पर जन्म लेता है तो उसे उसी समय से बन्धनों में जकड़ने प्रक्रिया शुरू की जाती है. एक नवजात के जन्म लेते ही वह हिन्दू, मुस्लमान, सिक्ख, इसाई हो जाता है. वह किसी जाति का, वर्ण का, किसी धर्म का, आमिर-गरीब तबके आदि का बना दिया जाता है, और वहीँ पर उसकी स्वतन्त्र सत्ता छिन जाती है और उसे दुनिया में जीवन रहते तक बाहरी आडम्बरों के पालन के लिए ना चाहते हुए भी मजबूर किया जाता है. हर कोई उस पर अपना हक जताता है और अपनी सोच से उसे चलाने की कोशिश करता है. एक स्वतन्त्र पैडा हुआ मनुष्य बन्धनों में जकड दिया जाता है और वह अपने जीवन रहते हुए कभी भी उन बन्धनों से मुक्त नहीं हो पाता. इसमें एक और दृष्टिकोण भी काम करता है जो कहीं किसी की मानसिक गुलामी से आगे निकल जाते हैं, वह अपनी सोच और शोहरत के आधार पर दूसरों की सोच को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं. यहाँ भी एक आम इंसान का दृष्टिकोण कोई मायने नहीं रखता, वह परिवर्तन की आस में उस तरफ कदम बढाता है, लेकिन अफ़सोस कि वह वहां पर भी सिर्फ और सिर्फ भीड़ का हिस्सा ही बनकर रह जाता है. ऐसी स्थिति में न तो परिवर्तन होता है और न ही मनुष्य बदलता है. 

आज दुनिया का जितना भी स्वरूप हमारे सामने खडा है उसमें सिर्फ एक ही चीज काम कर रही है वह है व्यक्ति का परम्पराओं के प्रति आकृष्ट होना. वैसे तो परम्पराओं के प्रति आकृष्ट होना कोई बुरी बात नहीं है, वह हमारे जीवन और आधार का हिस्सा हैं, हमें उनका निर्वाह करना चाहिए, लेकिन वक़्त और हालात को देखते हुए, उनकी प्रासंगिकता और व्यावहारिकता को देखते हुए. वर्ना हममें इतना भी साहस होना चाहिए कि हम उन पुरानी, अव्यवहारिक  और जर्जर परम्पराओं को उखाड़ फेंकने की हिम्मत भी कर सकें .....!!!  शेष अगले अंकों में.

01 जनवरी 2014

नया साल, नए संकल्प

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परिवर्तन प्रकृति का नियम है और यही इसकी पहचान भी है. प्रकृति अपने चक्र के अनुसार सदा बदलती रहती है और इसी कारण हमें इसमें कहीं पर भी पुरानापन नजर नहीं आता. सूरज नित नए रूप में हमारे सामने प्रकट होता है एक नयी ऊर्जा लेकर, तारों की टिमटिमाहट भी हमसे बहुत कुछ कहती है, चाँद भी जब अपने शबाब पर होता है तो वह भी हमें आकृष्ट करता है अपनी और, सुबह-सुबह किसी दूर पहाड़ पर सूरज की लालिमा हमें नया जीवन जीने की और प्रेरित करती है, और वहीं घास पर पड़ी ओस की बूदें हमें जीवन के हर पल को सजीवता से जीने का सन्देश देती हैं. चिड़ियों का चहचहाना हमें एक नए संसार की कल्पना करने को प्रेरित करता है और वहीँ पर फूलों का मुस्कुराना, हर पल हंसना जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि प्रदान करता है. कहीं दूर पहाड़ की चोटी से एक नन्ही सी बूंद झरने का रूप लेकर नदी में मिल जाने के लिए बेताब और कहीं खेतों से आती मिटटी की सोंधी खुशबू, कहीं किसान का हल चलाना, और कहीं गडरिये का अपनी भेड़ों के बीच गीत गाना, कहीं किसी दूर गांव में बच्चों का खिलखिलाकर हंसना और वहीँ किसी नयी-नवेली दुल्हन के हाथों में चूड़ियों का खनकना, यह सब कुछ हमारे सामने घटित होता है और हम रोमांच से भर उठते हैं. ऐसा वातावरण है कि हमें किसी की कोई चिंता नहीं, कोई परवाह नहीं, कोई अपना नहीं-कोई बैगाना नहीं. मानो सब कुछ प्रकृति का है और हम इसकी गोद में जीवन को जीने का भरपूर आनंद ले रहे हैं, ऐसे माहौल में तो जीवन का हर पल सुखद है, आनंदित है.
लेकिन आज के दौर में इस धरा पर ऐसा वातावरण कहाँ किसको नसीब होता है, कहीं किसी सुदूर क्षेत्र में भी ऐसा देखने को नहीं मिलता. सब और एक अंधी दौड़ है एक दुसरे से आगे निकलने की, लेकिन आप कितना भी दौड़ लो, कितना भाग लो समय का कोई मुकाबला नहीं कर सकता. यह एक कटु सत्य है आप समय के साथ नहीं चल सकते, आप एक पक्ष से उसे पकड़ने की कोशिश करते हो वह कहीं और अपूर्णता देकर निकल जाता है और हम उसकी राह ताकते रह जाते हैं. यह इसका स्वभाव भी है और इसी कारण समय हमेशा एक अबूझ पहली बना हुआ है. समय की अपनी चाल है उसे समझ पाना मुश्किल ही नहीं, ना मुमकिन भी है. इसलिए जो भी इस धरा पर आया एक दिन समय के साथ उसे भी अपना चोला बदलना पड़ा, यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं सिवाय समय के और इसका पहिया निरंतर घूम रहा है, एक गति से. इस गति को समझने की कोशिश हर कोई करने का प्रयास करता है लेकिन अंततः असफलता हाथ ही लगती है, अंत में वह खुद को ठगा हुआ ही महसूस करता है, लेकिन इतना कुछ होने के बाबजूद भी दूसरे के लिए यह पहली अबूझ बनी रहती है और यही समय की बड़ी ताकत भी है.
समय को हम सेकेण्डों, मिनटों, घंटों, दिनों, सप्ताहों, महीनों और सालों में गिनते हैं, यह सिर्फ हमारी सुविधा के लिए है और यह होना भी चाहिए. अब अगर हम यह कह ही रहे हैं कि एक जनवरी को नया साल शुरू होता है तो फिर क्योँ न सबको इस उपलक्ष पर शुभकानाएं प्रेषित की जाएँ. यह मानवीय स्वभाव भी है और यह हमारी एक दुसरे के प्रति संवेदनशीलता, प्रेम और सम्मान को भी दर्शाता है, एक तरीके से यह व्यवाहर मानवीय मूल्यों के बिलकुल करीब भी बैठता है. दो व्यक्तियों का एक-दूसरे के लिए ख़ुशी का कारण बनना अच्छा है और यही शुभकामना का एक व्यावहारिक पहलू भी है. लेकिन एक प्रश्न यहाँ सहज रूप से उभर कर आता है कि क्या सिर्फ शुभकामना शब्द कह देने से हम किसी के लिए खुशी का कारण बन सकते हैं ? बहुत गहरे में उत्तर कर देखा तो लगा कि आंशिक रूप से ऐसा होता है, लेकिन किसी के लिए सचमुच ही ख़ुशी का कारण बनना है तो हमें कर्म रूप में उस शुभकामना के पूर्ण होने के लिए प्रयासरत होना पडेगा तभी कहीं जाकर सार्थक परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं और जो ऐसा करने में सक्षम होता है वही वास्तविक रूप से शुभकामना को सार्थक करता है.
अभी नया साल शुरू हुआ है, जिसे में 2014 ईस्वी के नाम से अभिव्यंजित कर रहे हैं और हर कोई अपने जानने वालों को बधाई दे रहा है और आने वाले समय में उसके भले होने और सफलता की कामना कर रहा है, मैं भी आप सबके साथ पूरे विश्व के प्रत्यें प्राणी की भलाई की कामना में शरीक हूँ और ईश्वर करे कि हम सबकी शुभकामना पूरी हो और यह जो प्रकृति जिसे हम परमात्मा की छाया कहते हैं उसका स्वरूप और सुंदर बन पाए. सब प्राणी एक-दूसरे का भला मांगते हुए, भला करते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर हों, यही दिल से प्रार्थना है, यही कामना है. लेकिन ऐसा सिलसिला तो हर कहीं चलता रहता है, हर दिन हर कोई न कोई किसी न किसी उपलक्ष पर किसी न किसी के लिए शुभकामना की कामना करता ही रहता है. ऐसी शुभकामनाओं के इस दौर में हम अपने आसपास के वातावरण को देखें तो दृश्य भयावह बनते हुए नजर आ रहे हैं!!! अरे !! बनते हुए नहीं, बने हुए हैं. तो फिर ऐसे में शुभकामनाओं का क्या प्रभाव पड़ने वाला है, और क्या परिवर्तन होने वाला है, यह विचारणीय बिन्दु हैं.
आज हम जिस उपलक्ष पर एक-दूसरे को शुभकामनाएं संप्रेषित कर रहे हैं ऐसे अवसर तो पहले भी आये होंगे और ऐसा ही हमने तब भी किया होगा. लेकिन तस्वीर बदलने की बजाय बिगडती चली जा रही है और हम सिर्फ औपचारिकता निभा करके अपने-अपने स्वार्थ के साधनों को समेटने में व्यस्त हैं. हमें किसी की परवाह नहीं, हम चाहते हैं कि हम दूसरे से ज्यादा धन कमायें, हम यह भी चाह रहे हैं कि पिछले वर्ष की अपेक्षा हमारी सुख सुविधाओं में ज्यादा वृद्धि हो, हमारे पास जितने भौतिक संसाधन हैं उससे दौगुने-चौगुने संसाधन हमारे पास आयें और हम एक विलासिता पूर्ण जिन्दगी जी पायें. अगर ऐसे स्वार्थ भरे लक्ष्य हमारे पास हैं तो संभवतः हमारी शुभकामनाएं कभी भी फलीभूत होने वाली नहीं हैं वह सिर्फ औपचारिकता का हिस्सा हैं. अगर सच में हम दुनिया के वर्तमान वातावरण के प्रति तनिक भी संवेदनशील हैं तो हमें अब अपनी शुभकामनाओं को शुभकर्म में तब्दील करने की सख्त जरुरत है, वर्ना समय से तो नहीं कहा जा सकता न कि तू ठहर जा, जबकि इसे मेरे आग्रह पर भी रुकना ही नहीं है तो हम इस नए वर्ष में कुछ ऐसे संकल्प लें जिससे हमारा भविष्य और वर्तमान सुखद हो, समृद्ध हो, आनंददायक हो.
  • हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मनुष्य के नैतिक मूल्यों में निरंतर गिरावट हो रही है, ऐसी घटनाएँ घटित हो रही हैं जिनके बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन आये दिन हम देख ही रहे हैं कि मानव किस कदर गिर रहा है, इस नववर्ष में हम ऐसा संकल्प करें कि हम नैतिक मूल्यों को जीवन में ज्यादा तरजीह दे पायें. 
  • इस धरा पर मनुष्य ही नहीं जितनी भी प्रकृति है (जड़ और चेतन) वह परमात्मा की अभिव्यक्ति है, सबमें खुदा बसता है, लेकिन कुछ स्वार्थी और अक्ल के दुश्मनों ने इसे कई प्रकार से बांटा है. मनुष्य-मनुष्य में जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र और रंग आदि के आधारों पर भेद किया है और इसी कारण आये दिन विश्व में अशांति फ़ैल रही है, मनुष्य-मनुष्य के खून का प्यासा बना फिर रहा है. भाषा के नाम पर झगडे हो रहे हैं, जाति के नाम पर लोग कट रहे हैं, ऐसे भयावह दृश्य में हमें और सजग होकर कार्य करने की जरुरत है, जिससे मानवीय मूल्यों की स्थापना हो पाए और मानव उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन जीते हुए अपना जीवन सफ़र तय कर पाए. 
  • आज का इंसान वैज्ञानिक उन्नति को ही सब कुछ मन बैठा है, लेकिन यह उसके जीवन का एक पक्ष है, जिसकी तरफ उसका ध्यान सबसे ज्यादा जा रहा है और जाना भी चाहिए. लेकिन उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस भौतिकता की राह पर वह दौड़ रहा है, वह क्षणिक है, इसलिए उसे वास्तविक आनंद को प्राप्त करने के लिए ईश्वर को भी ध्यान में रखना होगा, हम ऐसा संकल्प करें कि जो हमारे जीवन का आधार है, उसे महसूस करते हुए हम जीवन के सफ़र को तय करने की कोशिश कर पायें. 
  • हमारे चारों और के वातावरण के निर्माण में प्रकृति की बहुत बड़ी भूमिका है, आग, हवा, पानी आदि सब कुछ जो भी हमारे जीने लायक है वह सब हमें प्रकृति से प्राप्त होता है, लेकिन भौतिकता और अधिक से अधिक मुनाफे की दौड़ में हम इसका अत्याधिक दोहन कर रहे हैं, विकास के नाम पर हम सब कुछ उजाड़ने पर तुले हुए हैं, हमें विभिन्न समय पर ऐसी चेतावनियाँ (उत्तराखंड जैसी) भी प्रकृति के द्वारा दी जाती रही हैं, लेकिन हम हैं कि सँभालने का ही नाम नहीं ले रहे हैं, अगर ऐसे ही हालात जारी रहे तो निकट भविष्य में धरती पर मानव का जीवन मात्र कहानी बन कर रह जाएगा, इसलिए जल, जमीन और जंगल के प्रति हमें संवेदनशील होने की जरुरत है.  
  • हमारे देश का ही नहीं, बल्कि दुनिया की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी जीवन की मुलभुत सुविधाओं से वंचित है. हमें ऐसे लोगों के उत्थान और जीवन स्तर को उंचा उठाने के संकल्प की जरुरत है.
ऐसे कई बिन्दु निरंतर मेरे दिमाग में कौंध रहे हैं जिन पर इस पोस्ट में विचार किया जा सकता है, लेकिन अब मैं इस पोस्ट को और विस्तार नहीं देना चाहता, बस आप सबसे इतना ही कहना चाहता हूँ कि हम सबको अपनी शुभकामनाओं के अनुरूप अमल करने की जरुरत है . बाकी बिन्दुओं पर अलग-अलग रूपों में चर्चा होती रहेगी.
आप सबको नववर्ष 2014  की तहे दिल से शुभकामनायें ........!!!!!!