नववर्ष की शुभकामनाएं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नववर्ष की शुभकामनाएं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

01 जनवरी 2014

नया साल, नए संकल्प

9 टिप्‍पणियां:
परिवर्तन प्रकृति का नियम है और यही इसकी पहचान भी है. प्रकृति अपने चक्र के अनुसार सदा बदलती रहती है और इसी कारण हमें इसमें कहीं पर भी पुरानापन नजर नहीं आता. सूरज नित नए रूप में हमारे सामने प्रकट होता है एक नयी ऊर्जा लेकर, तारों की टिमटिमाहट भी हमसे बहुत कुछ कहती है, चाँद भी जब अपने शबाब पर होता है तो वह भी हमें आकृष्ट करता है अपनी और, सुबह-सुबह किसी दूर पहाड़ पर सूरज की लालिमा हमें नया जीवन जीने की और प्रेरित करती है, और वहीं घास पर पड़ी ओस की बूदें हमें जीवन के हर पल को सजीवता से जीने का सन्देश देती हैं. चिड़ियों का चहचहाना हमें एक नए संसार की कल्पना करने को प्रेरित करता है और वहीँ पर फूलों का मुस्कुराना, हर पल हंसना जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि प्रदान करता है. कहीं दूर पहाड़ की चोटी से एक नन्ही सी बूंद झरने का रूप लेकर नदी में मिल जाने के लिए बेताब और कहीं खेतों से आती मिटटी की सोंधी खुशबू, कहीं किसान का हल चलाना, और कहीं गडरिये का अपनी भेड़ों के बीच गीत गाना, कहीं किसी दूर गांव में बच्चों का खिलखिलाकर हंसना और वहीँ किसी नयी-नवेली दुल्हन के हाथों में चूड़ियों का खनकना, यह सब कुछ हमारे सामने घटित होता है और हम रोमांच से भर उठते हैं. ऐसा वातावरण है कि हमें किसी की कोई चिंता नहीं, कोई परवाह नहीं, कोई अपना नहीं-कोई बैगाना नहीं. मानो सब कुछ प्रकृति का है और हम इसकी गोद में जीवन को जीने का भरपूर आनंद ले रहे हैं, ऐसे माहौल में तो जीवन का हर पल सुखद है, आनंदित है.
लेकिन आज के दौर में इस धरा पर ऐसा वातावरण कहाँ किसको नसीब होता है, कहीं किसी सुदूर क्षेत्र में भी ऐसा देखने को नहीं मिलता. सब और एक अंधी दौड़ है एक दुसरे से आगे निकलने की, लेकिन आप कितना भी दौड़ लो, कितना भाग लो समय का कोई मुकाबला नहीं कर सकता. यह एक कटु सत्य है आप समय के साथ नहीं चल सकते, आप एक पक्ष से उसे पकड़ने की कोशिश करते हो वह कहीं और अपूर्णता देकर निकल जाता है और हम उसकी राह ताकते रह जाते हैं. यह इसका स्वभाव भी है और इसी कारण समय हमेशा एक अबूझ पहली बना हुआ है. समय की अपनी चाल है उसे समझ पाना मुश्किल ही नहीं, ना मुमकिन भी है. इसलिए जो भी इस धरा पर आया एक दिन समय के साथ उसे भी अपना चोला बदलना पड़ा, यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं सिवाय समय के और इसका पहिया निरंतर घूम रहा है, एक गति से. इस गति को समझने की कोशिश हर कोई करने का प्रयास करता है लेकिन अंततः असफलता हाथ ही लगती है, अंत में वह खुद को ठगा हुआ ही महसूस करता है, लेकिन इतना कुछ होने के बाबजूद भी दूसरे के लिए यह पहली अबूझ बनी रहती है और यही समय की बड़ी ताकत भी है.
समय को हम सेकेण्डों, मिनटों, घंटों, दिनों, सप्ताहों, महीनों और सालों में गिनते हैं, यह सिर्फ हमारी सुविधा के लिए है और यह होना भी चाहिए. अब अगर हम यह कह ही रहे हैं कि एक जनवरी को नया साल शुरू होता है तो फिर क्योँ न सबको इस उपलक्ष पर शुभकानाएं प्रेषित की जाएँ. यह मानवीय स्वभाव भी है और यह हमारी एक दुसरे के प्रति संवेदनशीलता, प्रेम और सम्मान को भी दर्शाता है, एक तरीके से यह व्यवाहर मानवीय मूल्यों के बिलकुल करीब भी बैठता है. दो व्यक्तियों का एक-दूसरे के लिए ख़ुशी का कारण बनना अच्छा है और यही शुभकामना का एक व्यावहारिक पहलू भी है. लेकिन एक प्रश्न यहाँ सहज रूप से उभर कर आता है कि क्या सिर्फ शुभकामना शब्द कह देने से हम किसी के लिए खुशी का कारण बन सकते हैं ? बहुत गहरे में उत्तर कर देखा तो लगा कि आंशिक रूप से ऐसा होता है, लेकिन किसी के लिए सचमुच ही ख़ुशी का कारण बनना है तो हमें कर्म रूप में उस शुभकामना के पूर्ण होने के लिए प्रयासरत होना पडेगा तभी कहीं जाकर सार्थक परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं और जो ऐसा करने में सक्षम होता है वही वास्तविक रूप से शुभकामना को सार्थक करता है.
अभी नया साल शुरू हुआ है, जिसे में 2014 ईस्वी के नाम से अभिव्यंजित कर रहे हैं और हर कोई अपने जानने वालों को बधाई दे रहा है और आने वाले समय में उसके भले होने और सफलता की कामना कर रहा है, मैं भी आप सबके साथ पूरे विश्व के प्रत्यें प्राणी की भलाई की कामना में शरीक हूँ और ईश्वर करे कि हम सबकी शुभकामना पूरी हो और यह जो प्रकृति जिसे हम परमात्मा की छाया कहते हैं उसका स्वरूप और सुंदर बन पाए. सब प्राणी एक-दूसरे का भला मांगते हुए, भला करते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर हों, यही दिल से प्रार्थना है, यही कामना है. लेकिन ऐसा सिलसिला तो हर कहीं चलता रहता है, हर दिन हर कोई न कोई किसी न किसी उपलक्ष पर किसी न किसी के लिए शुभकामना की कामना करता ही रहता है. ऐसी शुभकामनाओं के इस दौर में हम अपने आसपास के वातावरण को देखें तो दृश्य भयावह बनते हुए नजर आ रहे हैं!!! अरे !! बनते हुए नहीं, बने हुए हैं. तो फिर ऐसे में शुभकामनाओं का क्या प्रभाव पड़ने वाला है, और क्या परिवर्तन होने वाला है, यह विचारणीय बिन्दु हैं.
आज हम जिस उपलक्ष पर एक-दूसरे को शुभकामनाएं संप्रेषित कर रहे हैं ऐसे अवसर तो पहले भी आये होंगे और ऐसा ही हमने तब भी किया होगा. लेकिन तस्वीर बदलने की बजाय बिगडती चली जा रही है और हम सिर्फ औपचारिकता निभा करके अपने-अपने स्वार्थ के साधनों को समेटने में व्यस्त हैं. हमें किसी की परवाह नहीं, हम चाहते हैं कि हम दूसरे से ज्यादा धन कमायें, हम यह भी चाह रहे हैं कि पिछले वर्ष की अपेक्षा हमारी सुख सुविधाओं में ज्यादा वृद्धि हो, हमारे पास जितने भौतिक संसाधन हैं उससे दौगुने-चौगुने संसाधन हमारे पास आयें और हम एक विलासिता पूर्ण जिन्दगी जी पायें. अगर ऐसे स्वार्थ भरे लक्ष्य हमारे पास हैं तो संभवतः हमारी शुभकामनाएं कभी भी फलीभूत होने वाली नहीं हैं वह सिर्फ औपचारिकता का हिस्सा हैं. अगर सच में हम दुनिया के वर्तमान वातावरण के प्रति तनिक भी संवेदनशील हैं तो हमें अब अपनी शुभकामनाओं को शुभकर्म में तब्दील करने की सख्त जरुरत है, वर्ना समय से तो नहीं कहा जा सकता न कि तू ठहर जा, जबकि इसे मेरे आग्रह पर भी रुकना ही नहीं है तो हम इस नए वर्ष में कुछ ऐसे संकल्प लें जिससे हमारा भविष्य और वर्तमान सुखद हो, समृद्ध हो, आनंददायक हो.
  • हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मनुष्य के नैतिक मूल्यों में निरंतर गिरावट हो रही है, ऐसी घटनाएँ घटित हो रही हैं जिनके बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन आये दिन हम देख ही रहे हैं कि मानव किस कदर गिर रहा है, इस नववर्ष में हम ऐसा संकल्प करें कि हम नैतिक मूल्यों को जीवन में ज्यादा तरजीह दे पायें. 
  • इस धरा पर मनुष्य ही नहीं जितनी भी प्रकृति है (जड़ और चेतन) वह परमात्मा की अभिव्यक्ति है, सबमें खुदा बसता है, लेकिन कुछ स्वार्थी और अक्ल के दुश्मनों ने इसे कई प्रकार से बांटा है. मनुष्य-मनुष्य में जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र और रंग आदि के आधारों पर भेद किया है और इसी कारण आये दिन विश्व में अशांति फ़ैल रही है, मनुष्य-मनुष्य के खून का प्यासा बना फिर रहा है. भाषा के नाम पर झगडे हो रहे हैं, जाति के नाम पर लोग कट रहे हैं, ऐसे भयावह दृश्य में हमें और सजग होकर कार्य करने की जरुरत है, जिससे मानवीय मूल्यों की स्थापना हो पाए और मानव उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन जीते हुए अपना जीवन सफ़र तय कर पाए. 
  • आज का इंसान वैज्ञानिक उन्नति को ही सब कुछ मन बैठा है, लेकिन यह उसके जीवन का एक पक्ष है, जिसकी तरफ उसका ध्यान सबसे ज्यादा जा रहा है और जाना भी चाहिए. लेकिन उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस भौतिकता की राह पर वह दौड़ रहा है, वह क्षणिक है, इसलिए उसे वास्तविक आनंद को प्राप्त करने के लिए ईश्वर को भी ध्यान में रखना होगा, हम ऐसा संकल्प करें कि जो हमारे जीवन का आधार है, उसे महसूस करते हुए हम जीवन के सफ़र को तय करने की कोशिश कर पायें. 
  • हमारे चारों और के वातावरण के निर्माण में प्रकृति की बहुत बड़ी भूमिका है, आग, हवा, पानी आदि सब कुछ जो भी हमारे जीने लायक है वह सब हमें प्रकृति से प्राप्त होता है, लेकिन भौतिकता और अधिक से अधिक मुनाफे की दौड़ में हम इसका अत्याधिक दोहन कर रहे हैं, विकास के नाम पर हम सब कुछ उजाड़ने पर तुले हुए हैं, हमें विभिन्न समय पर ऐसी चेतावनियाँ (उत्तराखंड जैसी) भी प्रकृति के द्वारा दी जाती रही हैं, लेकिन हम हैं कि सँभालने का ही नाम नहीं ले रहे हैं, अगर ऐसे ही हालात जारी रहे तो निकट भविष्य में धरती पर मानव का जीवन मात्र कहानी बन कर रह जाएगा, इसलिए जल, जमीन और जंगल के प्रति हमें संवेदनशील होने की जरुरत है.  
  • हमारे देश का ही नहीं, बल्कि दुनिया की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी जीवन की मुलभुत सुविधाओं से वंचित है. हमें ऐसे लोगों के उत्थान और जीवन स्तर को उंचा उठाने के संकल्प की जरुरत है.
ऐसे कई बिन्दु निरंतर मेरे दिमाग में कौंध रहे हैं जिन पर इस पोस्ट में विचार किया जा सकता है, लेकिन अब मैं इस पोस्ट को और विस्तार नहीं देना चाहता, बस आप सबसे इतना ही कहना चाहता हूँ कि हम सबको अपनी शुभकामनाओं के अनुरूप अमल करने की जरुरत है . बाकी बिन्दुओं पर अलग-अलग रूपों में चर्चा होती रहेगी.
आप सबको नववर्ष 2014  की तहे दिल से शुभकामनायें ........!!!!!!

01 जनवरी 2013

शुभकामना से शुभकर्म की ओर

24 टिप्‍पणियां:
भारतीय जन जीवन को जब देखते हैं तो यहाँ पर शुभकामनाओं की बड़ी महता नजर आती है। सोने से लेकर जागने तक, शाम से सुबह तक, मृत्यु से जीवन तक, जड़ से चेतन तक, युद्ध से शांति तक, हार से जीत तक, प्रकृति से परमात्मा तक। शुभकामनाओं का यह सिलसिला अनवरत रूप से चलता रहता है, और इसके अनेक पक्ष हैं। हमारे जीवन का कोई भी ऐसा पक्ष नहीं जहाँ हम शुभकामनाओं की अपेक्षा नहीं करते या हम शुभकामना देने को आतुर नहीं होते। घर से किसी काम को निकलते वक़्त अगर कोई बुजुर्ग या उम्र में बड़ा सामने दिख जाये तो उसका आशीर्वाद लेना और उससे अपने लिए शुभकामना की कामना करना तो हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। जीवन में चाहे कैसा भी समय आये शुभकामना आगे बढ़ने का साहस देती है। हम तो यहाँ तक मानते हैं कि ‘जो बात दवा से नहीं होती, वो बात दुआ से होती है। जब कामिल मुर्शिद मिलता है, तो बात खुदा से होती है’। ‘कामिल मुर्शिद’ मतलब कि सच्चा गुरु जब मिलता है तो फिर जीवन में किसी चीज की कोई कमी नहीं रहती, गुरु की दुआओं और आशीर्वाद से जीवन का हर मसला हल हो जाता है। क्योँकि गुरु एक भटके हुए इनसान को उसकी वास्तविक राह पर डाल देता है। जब किसी इनसान की दिशा बदल जाती है तो दशा स्वयं ही बदल जाती है। क्योँकि जब हम मंजिल की तरफ चलते हैं तो चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आयें हम अगर दृढ निश्चयी हैं तो जरुर पहुंचेंगे और जब हमने अपनी इच्छित मंजिल पा ली तो दशा का बदलना स्वाभाविक है। किसी अनुभवी और सच्चे इनसान का मार्गदर्शन जीवन की महता को अनमोल बना देता है तो वहीँ दूसरी तरफ अगर हम मंजिल से उलटे चलते हैं तो जीवन कौड़ियों से भी बदहाल हो जाता है।
शुभकामना और शुभकर्म दोनों का चोली-दामन का साथ है। हमारे जीवन दर्शन में मन, वचन और कर्म से एक होने की बात की गयी है। जो व्यक्ति अपने जीवन रहते इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, उसका जीवन धन्य हो माना है। उसे संत (मतलब की सत्य से अंत तक जुड़ा रहने वाला) महात्मा, या ऋषि की उपाधि से विभूषित किया जाता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन और चरित्र का अनुसरण हर कोई करना चाहता है। ऐसा जीवन जो अनेक के लिए प्रेरक और पथप्रदर्शक होता है। हमारे चिन्तन में जीवन को संवारने की बात की गयी है। कोई भी ऐसा कर्म न हो जिससे खुद को या दूसरे किसी प्राणी को क्षति हो। हमारा जीवन दर्शन सामूहिकता और सामाजिकता को महत्व देता है। हमारी व्यक्तिगत उपलब्धियों का लाभ सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि जितने प्राणियों हम वह लाभ को दे सकते हैं उतनों तक पहुंचाने की कोशिश की बात यहाँ की जाती है, और हमेशा जहन में शुभ भाव सभी के लिए रखते हुए शुभकर्म की और बढ़ने की प्रेरणा दी जाती है। इस देश के लोग ही हैं जो जो यह शुभकामना करते हुए सुने जाते हैं कि:
                                                             सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:।
                                                             सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित दु:ख भाग भवेत्।।
यानि की एक ऐसी शुभकामना जिसमें सभी के सुख की आशा की गयी हो, और हम तो ऐसे चिंतन का हिस्सा रहे हैं जहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की कामना की जाती है। कोई एक देश और उस देश के प्राणी ही नहीं, बल्कि सार संसार ही अपना घर है। यह सब पढ़कर, सोच कर खुद पर गर्व होता है और ज्यादा ख़ुशी तो तब होती है कि यह मात्र कहने, लिखने, पढने की ही बातें नहीं हैं। बल्कि जिन्होंने इन्हें कहा है, लिखा है उनका जीवन ऐसी भावनाओं और कर्मों का जीवन्त उदाहरण रहा है। हमें यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होती कि हम एक महान देश भारत के नागरिक हैं। मनुष्य जन्म मिलना तो खुदा की सौगात है ही, लेकिन भारत जैसे देश में जन्म मिलना यह खुदा की विशेष कृपा है, उसका एक उपहार है। जहाँ सबके भले की कामना ही नहीं की जाती बल्कि अगर किसी को कोई मौका मिलता है तो वह उस व्यक्ति के लिए काम करने से भी नहीं कतराता और बदले में किसी लाभ की कोई इच्छा किये बगैर सेवा भाव से कर्म करता है। इस देश में शुभकर्म और शुभकामना दोनों का महत्व है।
आज फिलहाल इतना ही....आप सबको नववर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाएं.