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25 जुलाई 2017

ब्लॉगिंग : कुछ जरुरी बातें...3

17 टिप्‍पणियां:
पाठक हमारे ब्लॉग पर हमारे लेखन को पढने के लिए आता है, न कि साज सज्जा देखने के लिए. लेखन और प्रस्तुतीकरण अगर बेहतर होगा तो यकीनन हमारा ब्लॉग सबके लिए लाभदायक सिद्ध होगा, और यही तो हम चाहते हैं. गत अंक से आगे...!!!
जहाँ तक ब्लॉग के डिजाईन और लेआउट का सवाल है, वह तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और इनका ख्याल भी किया जाना चाहिए. लेकिन इसमें जरुरी नहीं कि हर दिन कोई न कोई बदलाव किया जाए. बहुत आवश्यक हुआ तो कोई बदलाव किया जा सकता है, वर्ना एक बार जो निश्चित हो जाए, उसी को लेकर आगे बढ़ें तो बहुत बेहतर होता है. इसलिए ब्लॉगिंग करने के लिए ब्लॉग के डिजाईन और लेआउट को लेकर संजीदा रहने की जरुरत है, देखा-देखी में ब्लॉग पर अनावश्यक चीजों को इकठ्ठा करने का मतलब है अपने लेखन को अप्रासंगिक बनाना.
3.   अब क्या लिखा जाए ब्लॉग पर: वैसे सोचा जाये तो यह कोई प्रश्न ही नहीं है कि ब्लॉग पर क्या लिखा जाए? क्योँकि यहाँ एक मत प्रचलित हो गया है कि ब्लॉग पर वह कुछ भी लिखा जा सकता है, जो किसी और माध्यम में प्रकाशित नहीं हो सकता. कहने को आप कुछ भी लिख सकते हैं. किसी की प्रशंसा कर सकते हैं, किसी के लिए आलोचना पूर्ण प्रविष्ठी लिख सकते हैं, किसी के भेद खोल सकते हैं, किसी पर आरोप लगा सकते हैं, या फिर एक दूसरा रास्ता है कि गम्भीर और शोधपूर्ण लेखन भी कर सकते हैं. कीबोर्ड आपके पास है, कुछ भी टाइप करिए और अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कीजिये. लेकिन रुकिये, एक गहरी सांस लीजिये और फिर सोचिये कि जो कुछ मैं लिख रहा हूँ/लिख रही हूँ, उससे किसका क्या मकसद हल हो रहा है? अगर हम इस प्रश्न के उत्तर की तलाश अपने ब्लॉग लेखन से पहले करते हैं तो यकीन मानिए कि हमें कुछ ख़ास लिखने का अभ्यास बेशक नहीं है, लेकिन अगर हम थोडा सा भी सजग हैं तो हम अपने लेखन में वह सुधार कर सकते हैं जो अपेक्षित है. अपने लेखन के माध्यम से उस मुकाम को पा सकते हैं, जो इससे पूर्व किसी ने पाया है.
हमारे लोक जीवन में एक कहावत प्रचलित है, पहले तोलो-फिर बोलो, जब सामान्य संवाद में भी हमें इतना सजग रहने के लिए कहा गया है तो फिर लेखन के लिए तो इससे भी बड़ा मानक हमारे सामने होना चाहिए. क्योँकि जब हम संवाद कर रहे होते हैं तो वहां पर कुछ ही लोग उपस्थित होते हैं, लेकिन जब हम कुछ लिखकर प्रस्तुत करते हैं तो उसका प्रभाव व्यापक तथा दीर्घकालिक होता है. इसलिए लेखन का कार्य तलवार के धार पर चलने जैसा है. ब्लॉग लेखन में तो और भी ज्यादा संजीदगी बरतने की जरुरत है, क्योँकि जब आप कुछ भी लिखकर पोस्ट कर देते हैं तो एकदम पूरी दुनिया के पास पहुँच जाता है, फिर हमारे पास बहुत कम विकल्प होते हैं कि हम अपने उस लिखे को मिटा पायें. इसलिए हम कुछ भी लिखें बहुत सोच समझकर लिखें. हमारा लेखन समाज सापेक्ष होना चाहिए, हम जिस भी विधा या माध्यम में लिख रहे हैं, कोशिश यही हो कि लेखन के क्षेत्र में उच्च मानक हासिल किये जाएँ. हमें यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि हमारा लेखन ही हमारे व्यतित्व का परिचायक है, इसलिए प्रयास हो कि बेहतर, तथ्यपूर्ण और तर्क के साथ निष्कर्षों तक पहुँचने की कोशिश की जानी चाहिए. किसी भी कार्य को करते वक़्त इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि श्रेष्ठता का कोई मानक नहीं होता, श्रेष्ठता अपने आप में एक मानक होता है. हम ब्लॉग पर साहित्य, समाज, संस्कृति, राजनीति, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान आदि दुनिया भर के विषयों पर लिख सकते हैं, लेकिन जरुरी है कि हम जो भी लिखें वह लेखकीय नियमों के अनुकूल हो. तभी हमारे लेखन की सार्थकता है.
4.   पाठकों के साथ संवाद बनायें:  एक पाठक लेखक की रचना को पढ़कर उसे उसकी रचना के विषय में पत्र लिखता है, वह पत्र कितने दिनों बाद लेखक के पास पहुंचता है. लेखक पाठक का पत्र पढ़कर फिर उसे जबाब देता है, हो सकता है यह सिलसिला आगे बढ़ता रहे. लेखक और पाठक व्यतिगत तौर से एक दूसरे को नहीं जानते, लेकिन उसके बीच में रचना रूपी सेतु है, और लेखन रूपी संवेदना, जिसके माध्यम से वह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. रचना को पढ़ने के बाद पाठक की अपनी जिज्ञासाएं हैं, जिनका समाधान वह लेखक से चाहता है, हो सकता है पाठक कई मामलों में लेखक की आलोचना भी करे. लेकिन कोई बात नहीं, लेखक और पाठक के बीच एक संवाद तो कायम हो रहा है न और यही संवाद वह महत्वपूर्ण कड़ी है जो लेखक और पाठक को एक दूसरे से जोड़ती है. मुझे लगता है कि रचनाकार को तो आलोचना के लिए तैयार रहना चाहिए और जिस रचनाकार को बेहतर आलोचक मिल जाता है, उसकी रचनाशीलता उतनी ही बेहतर होती जाती है.    
ब्लॉगिंग की जहाँ तक बात है तो यहाँ पाठक और लेखक का एक तरह से प्रत्यक्ष और त्वरित संवाद हो रहा है. लेखक और पाठक एक दूसरे से संवाद कर रहे हैं. (हिन्दी ब्लॉगिंग के सन्दर्भ में स्थिति थोड़ी अलग सी है, यहाँ ब्लॉगर ही ब्लॉगर से आह और वाह की मुद्रा में संवाद कर रहा है. पाठक अभी तक प्रविष्ठी पढ़कर चुपचाप दृश्य देख रहा है. लेकिन इतना तो तय है कि पाठक पढ़ रहा है, यह एक शुभ संकेत है) सोशल मीडिया के इस दौर में क्रिया और प्रतिक्रिया की गति बहुत तेज है. अभी कोई पोस्ट लिखी और अभी ही पाठक की प्रतिक्रिया भी मिल गयी. लेकिन ऐसे में प्रतिक्रिया का स्तर बहुत निम्न है. ब्लॉगिंग की जहाँ तक बात है, वहां भी कोई ऐसा गम्भीर विमर्श किसी प्रविष्ठी या विषय पर देखने को नहीं मिलता. लेकिन मुझे लगता है कि ब्लॉगिंग आज के दौर में तमाम विषयों को गम्भीरता से पाठकों के समक्ष रखने का एक बेहतर माध्यम हो सकता था. हालाँकि इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि ब्लॉगिंग के माध्यम से लोगों में रचनात्मक चेतना बढ़ी है, लेकिन जिस गम्भीरता की अपेक्षा की जाती है, या जिस स्वतन्त्र अभिव्यक्ति की बात की जाती है, उस तरफ जाना अभी बाकी है. यहाँ पाठकों से संवाद तो हो रहा है लेकिन वह संवाद सतही है, हमें विशुद्ध रूप से रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए अपने मंतव्यों को हासिल करने की तरफ सतत प्रयास करने के जरुरत है. शेष अगले अंक में...!!!                                                    

21 जुलाई 2017

ब्लॉगिंग : कुछ जरुरी बातें...2

10 टिप्‍पणियां:
हम ब्लॉगिंग की दुनिया में है तो, अगर हम कुछ जरुरी बातों का ध्यान रखेंगे तो हम सार्थक और बेहतर रचनात्मकता के साथ अपनी एक अलग पहचान स्थापित करने में कामयाब होंगे. इसके लिए कुछ जरुरी बातों की इन बिन्दुओं के तहत चर्चा की जा सकती है. गत अंक से आगे...!!!
जब भी कोई ब्लॉगिंग की दुनिया में प्रवेश करता है तो उसके लिए कुछ उपकरण जरुरी हैं. जैसे कम्प्यूटर, लैपटॉप, एक बेहतर इन्टरनेट कनेक्शन (जिसमें डाटा अधिक, सर्फिंग स्पीड तेज और दाम कम). हालाँकि स्मार्टफोन के आने से अब इन चीजों के बारे में अधिक नहीं सोचना पड़ता. बस एक बढ़िया सा फ़ोन खरीदिये और ब्लॉगिंग की दुनिया में प्रवेश कीजिये. इन आवश्यक उपकरणों के बाद जरुरी है कि हम बेहतर सोच के साथ ब्लॉगिंग शुरू करें. ब्लॉगिंग शुरू करने से पहले अगर हम कुछ ब्लॉग पढ़ लें, उन पर लिखे जा रहे विषयों का अध्ययन कर लें, ब्लॉग लिखने और विषय प्रस्तुतीकरण की कुछ जानकारी हासिल कर लें तो बहुत ही बेहतर होगा. इसके साथ ही ब्लॉग पर प्रकाशित प्रविष्ठियों के कंटेंट पर होने वाली बहसों पर थोडा ध्यान दें तो, हम योजनाबद्ध तरीके से ब्लॉगिंग की   दुनिया में प्रबेश कर सकते हैं. हम यह जान सकते हैं कि इस विस्तृत दुनिया में कदम रखने के बाद क्या करना है, और इस पथ पर अग्रसर होने के लिए किन-किन चीजों का ध्यान रखना है. मुझे लगता है कि अधिकतर लोग ऐसा नहीं करते. लेकिन ऐसा करने के अपने मायने हैं. ब्लॉग पर प्रविष्ठी लिखना एक तो थोड़ी सी तकनीकी जानकारी की मांग करता है, वही दूसरी और सर्च इंजन लिखी हुई सामग्री को किस तरह से लोगों तक पहुंचाता है, यह जानना बहुत जरुरी है. अगर हमें थोड़ी सी जानकारियाँ हैं तो हम अपने ब्लॉग को उसी तरह से निर्मित करेंगे और लेखन को प्रारम्भ से उसी दिशा में ले जायेंगे, जो निकट भविष्य में हमारे लिए और पाठकों के लिए सुखद हो. मैं यह ब्लॉग प्रविष्ठियां ब्लॉगिंग की सामान्य जानकारी के दृष्टिकोण से लिखा रहा हूँ. इसलिए इसमें ब्लॉगों का जिक्र कम होगा. किसी और रूप में हिन्दी ब्लॉगों के सन्दर्भ में भी अपनी समझ के हिसाब से चर्चा करने की कोशिश करूँगा.
1.   ब्लॉग प्लेटफॉर्म का चुनाव : अब जब हमने ब्लॉगिंग करने का मन बना लिया है तो क्योँ न झट से ब्लॉग बना लिए जाए. लेकिन प्रश्न यह है कि ऐसा हम कैसे और कहाँ कर सकते हैं. इसके लिए हमारे पास दो रास्ते हैं. एक तो यह कि हम मुफ्त में उपलब्ध प्लेटफॉर्म्स का चुनाव करें और ब्लॉगिंग प्रारम्भ करें. वहीं दूसरी और कुछ ऐसे भी प्लेटफॉर्म्स हैं जिन पर हम शुल्क अदा करके भी ब्लॉगिंग प्रारम्भ कर सकते हैं. मुझे लगता है कि हमें ब्लॉग प्लेटफॉर्म का चुनाव बहुत सावधानी से और अपनी जरूरतों के हिसाब से करना चाहिए. हालाँकि इसके लिए थोडा सा शोध करना होता है, अगर हम थोडा सा शोध करने के बाद किसी ब्लॉग प्लेटफॉर्म का चुनाव करते हैं तो बाद में होने वाली कई असुविधाओं से बच सकते हैं. अन्तर्जाल पर उपलब्ध जो ब्लॉग प्लेटफ़ॉर्म मुफ्त में उपलब्ध हैं उनमें से कुछ निम्न हैं:-

Price
00
00
00
00
00
Custom Domain
XX
XX
XX
XX
XX
Mobile Friendly
XX
Yes
Yes
Yes
Yes
Design
Nearly None
1000+
100+
100+
XX
Plugins
XX
1000+
XX
XX
XX
हालाँकि ब्लॉग प्लेटफॉर्म्स का विश्लेषण और कई मानकों के आधार पर किया जा सकता है. लेकिन हमारे लिए कुछ चीजें जरुरी हैं. जैसे कि कितने डिजाईन उपलब्ध हैं, प्लेटफ़ॉर्म मोबाइल फ्रेंडली है या नहीं, हम कोई डोमेन जोड़ सकते हैं या नहीं आदि. अगर हम इन आधारों को लेकर किसी ब्लॉग प्लेटफ़ॉर्म का चुनाव करते हैं और फिर ब्लॉगिंग प्रारम्भ करते हैं तो निश्चित ही हम ब्लॉगिंग की दुनिया में सफल ब्लॉगर बन सकते हैं और पूरे विश्व में अपनी रचनात्मकता का डंका बजा सकते हैं. इसके आलावा पेड प्लेटफ़ॉर्म की भी अपनी ही विशेषताएं हैं. हम उनका भी चुनाव कर सकते हैं. ब्लॉगिंग के लिए उपलब्ध Paid प्लेटफ़ॉर्म में Ghost, Weebly आदि का नाम लिया जा सकता है, इन प्लेटफॉर्म्स पर हम अपनी सुविधा के हिसाब से कोई भी प्लान चुन सकते हैं और ब्लॉगिंग शुरू कर सकते हैं. तो हमें इस बात पर गौर करना होगा कि बेहतर ब्लॉगिंग के लिए एक बेहतर ब्लॉग प्लेटफ़ॉर्म का चुनाव एक बेहतर भूमिका निभाता है.  
2.   कैसा हो ब्लॉग का डिजाईन: ब्लॉग के डिजाईन के विषय में लिखने लगेंगे तो अनेक प्रविष्ठियां लिखी जा सकती हैं. डिजाईन के इतने पहलू हमारे सामने हैं कि किसी एक पहलू पर भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है. लेकिन इस विषय में मेरा यही मानना है कि ब्लॉग का डिजाईन बेशक आकर्षक होना चाहिए, लेकिन वह पाठक की पठनीयता के अनुकूल होना चाहिए. अगर हम रंग का ही चुनाव कर रहे हैं तो आँखों में चुभने वाले रंगों का चुनाव करने से पहले सौ बार सोचा जाना चाहिए. अगर हमारा ब्लॉग लेखन पर आधारित है तो सफ़ेद पृष्ठभूमि पर काले या स्याही रंग के अक्षर बेहतर प्रभाव छोड़ते हैं. इसके आलावा फैशन डिजाईनिंग या रेसिपी के जो ब्लॉग हैं उनका टेम्पलेट हमें अलग से ही चुनना होगा और उसी अनुरूप सामग्री का चुनाव भी करना होगा. ब्लॉग का लेआउट और डिजाईन पाठक को आपका ब्लॉग देखने-पढने के लिए आकर्षित करता है. यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अपने ब्लॉग का लेआउट और डिजाईन निर्धारित करते वक़्त बहुत सी चीजों को ध्यान में रखें, ताकि पाठक को किसी भी तरह की कोई असुविधा न हो. अनावश्यक विजेट लगाने से भी परहेज किया जाना चाहिए. कई बार ब्लॉग पर सामग्री कम होती है और विजेट ज्यादा होते हैं. हालाँकि उनका कोई ख़ास मतलब नहीं होता, जो जरुरी विजेट होते हैं, वह लगभग हर प्लेटफ़ॉर्म पर पहले से ही उपलब्ध होते हैं. फिर भी किसी विजेट या प्लगइन इन जरुरत पड़ती है तो उसे प्रयोग किया जा सकता है. ध्यान रहे कि पाठक हमारे ब्लॉग पर हमारे लेखन को पढने के लिए आता है, न कि साज सज्जा देखने के लिए. लेखन और प्रस्तुतीकरण अगर बेहतर होगा तो यकीनन हमारा ब्लॉग सबके लिए लाभदायक सिद्ध होगा, और यही तो हम चाहते हैं. शेष अगले अंक में...!!!         

20 जुलाई 2017

ब्लॉगिंग : कुछ जरुरी बातें...1

14 टिप्‍पणियां:
ब्लॉगिंग की दुनिया बड़ी रोमांचक है. इसका दायरा कितना बड़ा है उसका अंदाजा लगना मुश्किल है. लेकिन इतना तो हम समझ ही सकते हैं कि जहाँ तक इन्टरनेट और स्मार्टफोन की पहुँच है, वहां तक ब्लॉगिंग आसानी से पहुँच चुकी है. सोशल नेटवर्किंग के इस दौर में अन्तर्जाल पर उपलब्ध हर प्लेटफॉर्म का अपना महत्व है. इसी कड़ी में जब हम ब्लॉग के विषय में सोचते हैं तो हमें लगता है कि अभिव्यक्ति के इस माध्यम का भी अपना विशेष महत्व है. जो व्यक्ति इस माध्यम से जुड़ा है, वह इसकी प्रासंगिकता और महत्व को बहुत बेहतर तरीके से जानता है. आज की दुनिया जिस व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है, उससे यह बात सामने आ रही है कि निकट भविष्य में ‘ऑनलाइन कंटेंट’ की अपनी महता होगी. आज ही हम देख रहे हैं कि किसी भी जानकारी को प्राप्त करने के लिए हम सबसे पहले ‘सर्च इंजन’ का ही रुख करते हैं. क्योँकि आज के दौर में किसी व्यक्ति के पास न तो इतना धैर्य है कि वह किसी तथ्य और खबर को जानने के लिए इन्तजार करे और पुस्तकालय में जाकर पुस्तकें, अखबारें या पत्रिकाएं खंगाले. वह अपनी जरुरत की सामग्री को सबसे पहले कहीं पर खोजने की कोशिश करता है तो वह है ‘सर्च इंजन’ ही है. भारत में गूगल का प्रचार-प्रसार अधिक होने के कारण, अक्सर लोग अपने काम की जानकारी के लिए गूगल का ही उपयोग करते हैं. जिस ‘कीवर्ड’ के माध्यम से वह सर्च करते हैं उसी के आधार पर उन्हें जो कुछ वहां उपलब्ध होता है, उसी को वह अपनी जानकारी का आधार मानते हैं.
इससे यह बात भी स्पष्ट हो रही है कि आज के दौर में और भविष्य में अंतर्जाल पर उपलब्ध सामग्री की महत्ता और प्रासंगिकता बढ़ेगी. इसके लिए जरुरी है अंतर्जाल पर अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध करवाने की. जो जानकारी हमें आज उपलब्ध हो रही है, उसे भी किसी ने (ब्लॉग, वेबसाइट, पोर्टल) आदि के माध्यम से उपलब्ध करवाने का प्रयास किया है. ब्लॉगिंग के माध्यम से भी बेहतर सामग्री अंतर्जाल पर उपलब्ध हुई है. वही ब्लॉगऔर ब्लॉगर  सबसे महत्वपूर्ण साबित हुए हैं, जिन्होंने कुछ मानकों के आधार पर ब्लॉगिंग की है. क्योँकि जब हम कोई प्रविष्ठी प्रकाशित करते हैं उसे कौन-कब और किस अन्दाज में पढ़ रहा है, यह हम पूरे यकीन से नहीं जान पाते. ब्लॉगिंग के विषय में जब सोचना शुरू करता हूँ तो लगता है कि मनुष्य के भीतर की दुनिया का साक्षात्कार, बाह्य जगत से त्वरित गति से किसी माध्यम से हो सकता है तो वह है ‘ब्लॉगिंग’.
हालाँकि अधिकतर लोग अंतर्जाल पर उपलब्ध इस माध्यम का उपयोग कई तरह से कर रहे हैं. कोई साहित्य की रचना जो तरजीह दे रहा है तो, कोई यहाँ अपने मन में उठने वाले भाव को लोगों से सांझा कर रहा है. किसी के लिए यह मंच विश्व में हो रही हलचल की चिन्ता करने का है तो, कोई अपने अतीत में जाकर उसे दुनिया के सामने बड़ी कलात्मकता से प्रस्तुत कर रहा है. कोई स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की विधि सुझा रहा है तो, कोई मधुर आवाज में किसी को बेहतर रचनाएँ प्रस्तुत कर रहा है. ऐसे कई आयाम हैं, जो एक मंच पर विभिन्न तरह से अभिव्यंजित किये जा रहे हैं. इससे एक तरफ तो आर्थिक पहलू जुड़ रहे हैं, वहीँ दूसरी और व्यक्ति को अभिव्यक्ति का बेहतर मंच ब्लॉगिंग के माध्यम से उपलब्ध हुआ है. हालाँकि इस विषय में मैंने इससे पहले लिखी कुछ प्रविष्ठियों में चर्चा करने की कोशिश की है. मैं पिछले सात वर्ष से ब्लॉगिंग से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ हूँ. मैंने सिर्फ ब्लॉगिंग करने के लिए ही इस माध्यम को नहीं अपनाया, बल्कि शोध की दृष्टि से भी हिन्दी ब्लॉगिंग के हर पहलू को बारीकी से जांचने की भी कोशिश की है. हालाँकि उन अनुभवों और पहलूओं पर फिर चर्चा करने की कोशिश करूँगा. लेकिन यहाँ मैं इस बात की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि बेहतर ब्लॉगिंग के जो जरुरी बातें हैं उन पर भी चर्चा कर ली जाए. 
हम जीवन में जो कुछ भी करते हैं उसके पीछे हमारा या कोई उद्देश्य होता है, या किसी इच्छा की पूर्ति के लिए हम कुछ करते हैं. हम स्वार्थवश भी ऐसे काम कर जाते हैं, जो निकट भविष्य में कई बार हमारे लिए सुखद होते हैं, या कई बार उनके परिणाम हमें आशा के अनुरूप प्राप्त नहीं होते. फिर भी मेरा मानना है कि मनुष्य जो कुछ भी अपने जीवन में करता है, उसके पीछे उसका कोई न कोई भाव जरुर काम करता है, और उसी भाव के वशीभूत होकर वह अपने किसी कार्य को अंजाम तक पहुँचाने के लिए प्रयासरत रहता है. ब्लॉगिंग के विषय में भी मुझे ऐसा ही लगता है कि इस माध्यम पर भी व्यक्ति उपस्थित है, उसका अपना कोई न कोई उद्देश्य जरुर है और यह सुखद है कि हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में अब तक जो कुछ भी घटित हुआ है, वह उद्देश्यपूर्ण है, रचनात्मकता की दृष्टि से बेहतर है. फिर भी अगर हम ब्लॉगिंग की दुनिया में है तो, अगर हम कुछ जरुरी बातों का ध्यान रखेंगे तो हम सार्थक और बेहतर रचनात्मकता के साथ अपनी एक अलग पहचान स्थापित करने में कामयाब होंगे. इसके लिए कुछ जरुरी बातों की इन बिन्दुओं के तहत चर्चा की जा सकती है. शेष अगले अंक में....! 

16 फ़रवरी 2014

सृजन की प्राथमिकता, ब्लॉगिंग और हम...1

5 टिप्‍पणियां:
चिन्तन मनुष्य की सहज प्रवृति है. यह गुण उसे प्रकृति द्वारा प्रदत्त है. चिन्तन के इसी गुण के बल पर उसने प्रकृति के रहस्यों को समझने की भरपूर कोशिश की है, और आज तक वह इस दिशा में अनवरत क्रियाशील है. उसके चिन्तन के अनेक आयाम हैं और हर एक आयाम का अपना एक महत्व है. दुनिया के इतिहास पर हम नजर डालते हैं तो हम यह सहज रूप से ही समझ जाते हैं कि मनुष्य ने आज तक जो भी चिन्तन किया है उसके केंद्र में वह स्वयं ही रहा है. अपने चिन्तन के केंद्र में खुद को रखने से उसने यह महसूस किया कि वह भी प्रकृति का ही एक अभिन्न अंग है. जिन तत्वों से प्रकृति का निर्माण हुआ है उन्हीं तत्वों से उसका भी निर्माण हुआ है. इसलिए प्रारम्भ में उसके चिन्तन का केन्द्र प्रकृति और इसके रहस्य रहे हैं. चिन्तन का जहाँ से प्रारम्भ हुआ है या जो दस्तावेज आज हमें उपलब्ध हैं या जिन विषयों के विषय में आज हमें जानकारी उपलब्ध है वह हमें स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि प्रारम्भ में मनुष्य ने अपनी चेतना को समझने के प्रयास किये हैं. उसने यह भी समझने की चेष्टा की है कि आखिर इस सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ? इस धरा पर ही नहीं बल्कि इस ब्रहमांड में जो कुछ भी है, उसका निर्माण कैसे हुआ? इस सबके पीछे किसका हाथ है? यह जो कुछ भी निर्मित हुआ है, इसका उद्देश्य क्या है? इस ब्रहमांड को सुनियोजित तरीके से चलाने में किसकी भूमिका है और क्योँ? ऐसे अनेक सवाल हैं जो सृष्टि के प्रारम्भ से मनुष्य के चिन्तन का हिस्सा रहे हैं और समय-समय पर मनुष्य ने उसके विषय में अपने निष्कर्षों से आने वाली पीढ़ियों को अवगत करवाने के लिए अनेक माध्यमों का भी विकास किया है.
मनुष्य ने आज तक जितना भी चिन्तन किया है और जहाँ भी किया है, जिस भी भाषा और जिस भी पद्धति के माध्यम से किया है उन सबके निष्कर्ष में उसने एक बात तो स्वीकार की है कि इस सृष्टि का सृजन कर्ता परमात्मा है, और इसे वह कई नामों से अभिहित करता है. इस निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद उसके जहन में यह प्रश्न पैदा होने शुरू हुए कि आखिर यह ब्रह्म क्या है? इस दुनिया की विभिन्न सत्ताओं में उसकी भूमिका क्या है? श्वेताश्वतरोपनिषद् के प्रथम अध्याय में इस प्रश्न पर कुछ इस तरह से चिन्तन किया गया है “किं कारणं ब्रह्म कुत: स्म जाता, जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठा:। अधिष्ठिता: केन सूखेतरेषु, वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्”।। (1/1/1133) अर्थात जगत का कारणभूत ब्रह्म कैसा है? हम किससे उत्पन्न हुए हैं? किसके द्वारा जीवित रहते हैं? कहाँ स्थित हैं? और हे ब्रह्मविद्गण! हम किसके द्वारा सुख-दुःख में प्रेरित होकर व्यवस्था (संसार यात्रा) का अनुवर्तन करते हैं. यक़ीनन यह सबसे गम्भीर प्रश्न है. क्योँकि जिस सृष्टि में हम रहते हैं और जिस तरह से यह क्रियान्वित होती है, उससे तो यह बात स्पष्ट रूप से समझ आती है कि इस सृष्टि की रचना के पीछे कोई न कोई उद्देश्य तो जरुर होगा.
इन सब बातों पर विस्तार से चिन्तन करने की जरुरत है, और सबसे बड़ी महता इस बात की है कि हम दुनिया भर में उपलब्ध आज तक के चिन्तन और अनुभव के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालें. क्योँकि आज तक इन विषयों पर जितना भी चिन्तन किया गया है वह एक सत्ता को तो मानता है लेकिन उसकी उत्पति, क्रिया और कारणों पर अलग-अलग राय रखता है. इसलिए जब वह चिन्तन व्यवहार के धरातल पर उतरता है तो हमें लगता है कि जो बात कोई दूसरे विचार को मानने वाला कह रहा है, मेरी बात उससे कहीं श्रेष्ठ है, मेरा मत किसी और निष्कर्ष का समर्थन करता है, इसलिए आज हम देखते हैं कि पूर्ववर्ती काल में सृष्टि के रहस्यों और दुनिया को सुन्दर स्वरूप प्रदान करने के लिए जो मार्ग खोजे गए, कालान्तर में उन मार्गों पर कुछ तथाकथित लोगों का अधिकार हो गया. उन्होंने अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए कई तरह के भ्रम और भ्रांतियां पैदा की और आज जितने भी पहलू इन विषयों पर उपलब्ध हैं, वह सुलझने की बजाय उलझते हुए ज्यादा नजर आ रहे हैं और यह सब कुछ मनुष्य जाति के लिए और उसके चिन्तन के लिए सही नहीं है.
प्रारम्भ में मनुष्य ने जब सृजन की दुनिया में कदम रखा तो उसके उद्देश्य बहुत बृहत् थे, वह सम्पूर्ण कायनात को अपने चिन्तन का हिस्सा बनाना चाहता था और इसी कोशिश में उसने वनस्पति, जल, वायु, सूर्य, चन्द्र, तारे, नक्षत्र आदि के साथ-साथ इन सबको क्रिया रूप प्रदान करने वाली शक्ति को समझने की कोशिश भी की. अपनी शक्ति और साधना के बल पर उसने जो कुछ भी पाया उसके आधार पर उसने इन रहस्यों के निष्कर्षों को क्रियान्वित करने की कोशिश की, और जो कुछ उसे हासिल नहीं हुआ या जो कुछ उसे समझ नहीं आया उसके प्रति उसने सकारात्मक भाव रखा और उसे भी अपने जीवन का आधार मानते हुए उसके प्रति आस्था और सम्मान का भाव रखते हुए उस रहस्य को समझने की कोशसिह की. वैदिक साहित्य में हमें इस बात के पुष्ट प्रमाण मिलते हैं, और जो कुछ भी उसने उस प्रकृति के माध्यम से सीखने की कोशिश की या उसने जो अपने भावों को अभिव्यक्त करने की कोशिश की उसे उसने दैवीय प्रेरणा कहा. हमारे देश भारत में तो कोई भी प्राचीन ग्रन्थ ऐसा नहीं मिलता जिसमें इस बात को पुष्ट न किया गया हो कि सृजन का विषय चाहे जो भी रहा हो, लेकिन उसमें मानवीय पहलूओं को प्रमुखता से उजागर किया गया है और इस धारणा को भी पुष्ट किया गया है कि जो भी सृजन हुआ है वह सब दैवीय प्रेरणा का परिणाम है.
कालान्तर में बेशक सृजन की यह धारणा बदली हो और यह किसी हद तक स्वाभाविक भी है. क्योँकि सृजन समाज का हिस्सा होता है, जिस तरह के परिवर्तन समाज में आते हैं वह सब कुछ सृजन के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं. तभी तो कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है. कभी साहित्य समाज को प्रभावित करता है तो कभी समाज साहित्य को प्रभावित करता है. लेकिन साहित्य के सृजन की प्राथमिकता तो मनुष्य है और वह आज तक इस दिशा में अग्रसर रहा है. लेकिन बदलते दौर में दुःख इस बात है कि सृजन की प्राथमिकताएं भी बदली और आज हम ऐसे बिन्दु पर खड़े है जहाँ से हम अतीत को देखकर समझकर गौरवान्वित होते हैं, लेकिन भविष्य पर गहरे प्रश्न चिन्ह खड़े हैं. विषय चाहे कोई भी हो, दिशा चाहे कोई भी हो अब वह गंभीरता कहाँ रही और वह ललक कहाँ. हालाँकि हम ऐसा नहीं कह सकते कि अब सृजन नहीं हो रहा है, हो रहा है, पूर्ववर्ती काल से कहीं ज्यादा हो रहा है. लेकिन कहीं कोई गंभीरता नहीं, कहीं कोई मौलिकता नहीं, बस एक सरपट दौड़ है दूसरे से आगे निकलने की, सब कुछ कम संघर्ष में हासिल करने की और उसके लिए हम किसी मानक को मानने के लिए तैयार नहीं. बस हम दौड़ना चाहते हैं, भले ही उसकी सार्थकता हो या नहीं, उसके परिणाम क्या होंगे, इस बात की कोई चिंता नहीं. बस एक ही चिंता है किस तरह से किसी से आगे निकला जाए, कैसे किसी को नीचा दिखाया जाये. यह एक ऐसा उपक्रम है जिसमें आज हमारे समय के बहुत से तथाकाथित सृजनकर्मी प्रवृत हैं. हम इस बात पर कोई ध्यान नहीं दे पा रहे हैं कि हमारे सामने चिन्तन और सृजन के जो मानक हैं, क्या हम उन मानकों पर कितना खरे उतर पाए हैं, और हम उससे आगे बढ़ने के लिए और क्या कर सकते हैं? हमारे चिन्तन का हिस्सा क्या होना चाहिए? किस दिशा में हमें और काम करने की जरुरत है?  यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर आज हमें बहुत गंभीरता से विचार करने की जरुरत है और आज जो माध्यम हमारे सामने हैं उन माध्यमों का लाभ उठाते हुए हम इस दुनिया के स्वरूप को सुन्दर बनाने में कितना सहयोग कर पाते हैं, इस बात पर सोचने की आवश्यता है.  शेष अगले अंकों में.....!!!

30 सितंबर 2012

मेरा आलस, आपका प्रेम और यह 100

15 टिप्‍पणियां:

इन पोस्टों के लिए सबसे ज्यादा पेज देखे गए
सृजन मानव जीवन का स्वभाव है . मानव ही नहीं प्रकृति के कण - कण में सृजन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है . एक चिड़िया जब अपना घोंसला बनाती है तो उसकी कला अद्भुत होती है . उस पर न तो बारिश का असर होता है , ना आंधी का और न ही तूफ़ान उस पर कोई असर करता है . एक मछली पानी को अपना सब कुछ समझती है और एक पक्षी के लिए हवा में कलाबाजियां करना आसान हो सकता है लेकिन हमारे लिए वह किसी रोमांच से कम नहीं , किसी अद्भुत दृश्य से कम नहीं . ईश्वर ने सृष्टि के हर जीव में कोई न कोई ऐसा हुनर बख्शा है जिसके आधार पर वह विशिष्ट है . उसकी अपनी पहचान है और वह कोई बजूद रखता है . जहाँ तक मानव जीवन का सम्बन्ध है इसके विषय में तो कहा गया है " मानुष जन्म दुर्लभ है " ....! क्या सच में ऐसा है कि यह दुर्लभ जीवन हमें प्राप्त हुआ है और हम खुद को धन्य समझ रहे हैं और इस जीवन के प्रत्येक पल को कुछ सार्थक करने में लगा रहे हैं . अगर ऐसा नहीं है तो फिर ऐसा भी कहा गया है " निद्रा ,भोजन , भोग भय, यह सब पशु पुरख सामान " फिर हमने भिन्नता कहाँ है श्रेष्ठता किस आधार पर है ? अगर हम वही कर्म कर रहे हैं जिनका जिक्र किया गया है तो हममें और प्रकृति के अन्य जीवों में कोई अंतर नहीं है . हमारी अवस्था उनसे किसी तरह भिन्न नहीं है बल्कि ऐसी स्थिति में हम उनसे ज्यादा खतरनाक साबित होते हैं . अगर ऐसा नहीं होता तो आज इस सुंदर सी सृष्टि का यह स्वरूप किसी भी हालत में नहीं होता , जहाँ आदमी ही आदमी कि शक्ल से डर रहा है, और आदमी ही आदमी को लूट कर अपना घर भर रहा है . जीवन की वास्तविकताएं तो सच्चाईयां कुछ और हैं लेकिन हम कहीं उसके विपरीत जा रहे हैं , इसलिए तो यह हालात हैं . हमें जीवन के वास्तविक मंतव्यों को समझना जरुरी है और हर पल सा सही उपयोग करना जरुरी है चाहे हम कोई भी कर्म कर रहे हों और लेखन जैसे कर्म में तो और भी सजगता बरतने की जरुरत है . इसके की आयाम हैं , कई मंच हैं और उनमें से ब्लॉगिंग भी एक मंच है जहाँ हम अपने विचारों को दुनिया के लोगों सांझा करते हैं अनेक विधाओं के माध्यम से अनेक आयामों को लेकर , अनेक प्रसंगों का चयन करके ...! 

 इन देशों से आये ज्यादा पाठक
ब्लॉगिंग रचनात्मक इतिहास में एक नया उपक्रम , एक नयी घटना , एक नया आयाम और एक खुला मंच है . सर्जक और पाठक के बीच में सीधे संवाद का माध्यम है . इसकी उपयोगिता निरंतर प्रगति पर है कोई निश्चित बिंदु अभी निर्धारित करना बेमानी होगी बस हम इसे बढ़ने दें , विस्तृत होने दें फिर कोई निष्कर्ष निकालते हैं .  हम सिर्फ इतना करें इसे महसूस करते रहे . खुद को अभिव्यक्त करते रहें और अभिव्यक्ति और सृजन के नए आयामों को सामने लाते रहें . मेरे लिए ब्लॉगिंग जीवन का एक अहम् हिस्सा है , और इसकी कोई सीमा नहीं है . जब इस पटल पर कदम रखा है कोशिश रही है चेतनता से इसके पहलूओं को समझने की . ब्लॉगिंग ने एक नयी दुनिया दी है मुझे और मेरी दुनिया और जीवन में कई ऐसे महानुभावों का पदार्पण हुआ है जो इसके बिना संभव नहीं था . एक नया परिवार और रिश्ता कायम हुआ है . एक अपनापन अनवरत सभी से मिल रहा है और मेरी जिन्दगी हसीं होती जा रही है और ऐसी स्थिति में मेरी  जिम्म्वारियाँ बढती जा रहीं है,क्योँकि जितना - जितना दायरा बढेगा , उतनी - उतनी जिम्मेवारियां भी बढती जायेंगी और जिम्म्वारियों  का बखूबी निर्वाह करना ही जीवन की सफलता है . रिश्तों में प्रेम और सोहार्द बनाये रखना ही जीवन का मंतव्य है . अगर यह सब कुछ हो जाता है तो कुछ नए आयाम इस जीवन के साथ जुड़ जायेंगे , लेकिन अब कदम दर कदम और सजगता बरतनी होगी . क्योँकि इस बात का तो भान होना ही चाहिए कि इस दुनिया की रीत ऐसी है जिस पेड़ पर फल लगे होते हैं उसी को ही पत्थर मारे जाते हैं . 

पाठकों के प्रवेश द्वार
हिंदी ब्लॉगिंग के इस मंच पर मेरी उपस्थिति एक रोचक घटना है . आज मुझे ब्लॉगिंग करते हुए दो वर्ष से अधिक का समय हो चुका है . मैंने अभी तक कुल 828 दिन और 19872 घंटे यहाँ बिताये हैं . अगर इन 828 दिनों का औसत आठ घंटे प्रतिदिन के हिसाब से भी निकला जाये तो भी लगभग 6624 घंटे लगभगपर मैंने बिताये हैं  . इस समय का एक - एक पल उत्साह से भरा रहा है . लेकिन कभी - कभी निराशा भी हाथ लगी है . फिर भी आपका प्रेम मेरे जीवन की अमूल्य निधि बनी है इसके लिए आपका कृतज्ञ हूँ . अपनी पहली पोस्ट से लेकर इस पोस्ट तक मेरी प्रत्येक कोशिश में आपका उत्साहवर्धन मुझे यहाँ तक ले आया है , और आशा है कि यह सब आने वाले समय में भी ऐसा ही रहेगा . हालाँकि दुनिया भर के विषयों को समझने और उनका विश्लेषण करने की क्षमता मुझे खुदा ने बख्शी है , लेकिन मेरा आलस और व्यस्तताएं उनको आप तक पहुँचने नहीं देती , फिर भी आपकी पोस्ट्स को में निरंतर पढता हूँ और मनन करता हूँ . मैंने इन दो वर्षों से अधिक के समय में बहुत कम लिखा है लेकिन इतना बड़े विश्वास से कह सकता हूँ की पढ़ा खूब है . ब्लॉगिंग को समझा खूब है . निरंतर पोस्ट लिखना मेरे लिए कठिन हो सकता है लेकिन निरंतर पढना मेरे लिए आनंददायक रहता है . हिंदी ब्लॉगिंग की एक अद्भुत और चिंतनीय प्रवृति है ,टिप्पणी के लिए लिखना और टिप्पणी देने के लिए पढना . यह बड़ा कष्टकारी होता है कभी - कभी मेरे लिए . टिप्पणी अगर कोई पाठक कर रहा है तो वह उत्साहवर्धन जरुर करती है , लेकिन हम अपनी पोस्ट को टिप्पणी के हिसाब से ढालें तो यह बड़ा दुखद है . मैं इस पक्ष में कभी नहीं हूँ अपनी मस्ती के लिए लिखता हूँ लेकिन लेखन की मर्यादा भी नहीं भूलता हूँ . पूरे विश्वास अनुभव के साथ कह सकता हूँ कि बेशक आप कम लिखें लेकिन श्रेष्ठ लिखा गया है तो पाठक आपके पास जरुर आएगा ....! और ऐसा लेखन देश काल और समय की सीमा से परे होता है , दूसरे शब्दों में कहें तो उदात भावों के दृष्टिगत किया गया लेखन कालजयी होता है .

आप सबसे विनम्र निवेदन :  ब्लॉग में तकनीकी खामियों के चलते इस ब्लॉग की चार पोस्टें गूगल के काल का ग्रास बन गयीं थीं . बड़ी मुश्किल से इन्हें प्राप्त किया, लेकिन आपकी महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ मुझे प्राप्त नहीं हो सकीं जो आप सबने बड़े प्रेम से इन पोस्टों पर की थीं ....इसके लिए आप सबसे क्षमा प्रार्थी हूँ .....बस पोस्टें प्राप्त हो गयीं इसका संतोष है ....आशा है आप अपना स्नेह और मार्गदर्शन यथावत बनाये रखेंगे ...!