16 जुलाई 2017

हिन्दी ब्लॉगिंग : आह और वाह!!!...3

12 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे.....हिन्दी ब्लॉगिंग का प्रारम्भिक दौर बहुत ही रचनात्मक था. इस दौर में जो भी ब्लॉगर ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सक्रिय थे, वह इस माध्यम के प्रति काफी रचनात्मक और गम्भीर थे. हालाँकि उस समय अंतर्जाल पर हिन्दी को लेकर कुछ तकनीकी बाधाएं जरुर थीं, लेकिन हिन्दी को अन्तर्जाल पर स्थापित करने की दिशा में बड़ी गम्भीरता से काम किया जा रहा था. जैसे ही इन तकनीकी बाधाओं से थोड़ी सी राहत मिली, ब्लॉग जैसे प्लेटफ़ॉर्म का प्रचार हुआ तो हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में नए और उर्जावान लोगों का पदार्पण हुआ. यह लोग नयी भाषा-भाव और अभिव्यक्ति के नए तरीकों से सरावोर थे. यह वही लोग थे जो किसी अकादमिक दुनिया में अपना परचम लहराने के लिए नहीं लिख रहे थे, और न ही इन्हें कोई ऐसी मजबूरी थी कि इन्हें लिखना ही है. यह वह लोग थे जो अपने निजी जीवन के समय में से कुछ समय निकालकर हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए समर्पित कर रहे थे.  हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में पदार्पण करने वाले यह लोग अपने अध्ययन और रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों के अनुभव को हिन्दी भाषा के माध्यम से साँझा कर रहे थे. बहुत ही कम समय में अंतर्जाल पर ब्लॉगिंग के माध्यम से साहित्य-इतिहास-पुरातत्व-अर्थशास्त्र-राजनीतिविज्ञान-मनोविज्ञान-खगोलशास्त्र-ज्योतिष आदि अनेक विषयों की जानकारी हिन्दी भाषा में प्राप्त होने लगी. ब्लॉग अब एक मंच बन गया अभिव्यक्ति के विभिन्न रूपों का. यहाँ पर मुख्यधारा के पत्रकारों का एक समूह सक्रिय हो गया, और वह उस खबर का विश्लेषण नए अंदाज में करने लगा, जिसे वह सम्पादकीय दवाब के चलते अपने अखबार या टीवी चैनल के माध्यम से नहीं कर सकता था. इसी दौर में काफी सामूहिक ब्लॉग भी बने, जो किसी एक खास मकसद के लिए स्थापित किये गए थे. कुछ ही दिनों बाद यह नारा दिया गया कि ‘ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति है’.
यह बात तो सही भी है कि ब्लॉगिंग ने अभिव्यक्ति के क्षेत्र में काफी बदलाव किये हैं. पाठक और रचनाकार के बीच की दूरी को कम किया है. पाठक किसी रचना के विषय में क्या सोचता है, उसकी क्या राय है, उससे रचनाकार सहज ही अवगत हो जाता है. इसे अभिव्यक्ति के क्षेत में हुए बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू कहा जा सकता है. लेकिन जिस मायने में ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति है, उसका प्रतिफल आना अभी बाकी है. सिर्फ माध्यम के बदलने से कोई क्रान्ति घटित नहीं होती, क्रान्ति जब घटित होती है, तब वह समूल परिवर्तन करती है. हमें इस बात को समझना होगा कि ब्लॉगिंग के माध्यम से हम क्या कुछ नया हासिल कर पाए और आगे हम क्या कुछ नया हासिल करने की इच्छा रखते हैं. ब्लॉगिंग का उद्देश्य हर किसी के लिए अलग हो सकता है. लेकिन जब हम ब्लॉगिंग को समाज और राष्ट्र के सरोकारों से जोड़ेंगे तो यक़ीनन हमें वह लाभ प्राप्त होंगे, जिनकी हम परिकल्पना कर रहे हैं. लेकिन इसके लिए हमें सतत प्रयास करने की जरुरत है. ब्लॉगिंग को और धार देने की आवश्यकता है. इस माध्यम के माध्यम से अपने निजी भावों की अभिव्यक्ति के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों की दिशा में भी काम करने की जरुरत है. हालाँकि ऐसा नहीं है कि हिन्दी ब्लॉगों पर सामाजिक सरोकारों से जुड़ सामग्री नहीं मिलती, या लोग समाज और राष्ट्र को लेकर कुछ नहीं लिख रहे हैं, लोग लिख रहे हैं लेकिन ऐसे लोगों को ‘नोटिस’ कौन कर रहा है, यह सबसे बड़ा प्रश्न है? हमारा अधिकतर ध्यान हिन्दी ब्लॉगों और ब्लॉगरों की संख्या पर केन्द्रित है, उनकी सक्रियता पर केन्द्रित है. लेकिन सही मायने में हमें यह भी परख करनी होगी कि कौन क्या लिख रहा है? और बेहतर लिखने वालों को प्रोत्साहित भी करना होगा. हमें सही मायने में किसी भी मुद्दे को विमर्श के केन्द्र में लाना होगा. लेकिन यह होगा तब ही जब हम लेखन के प्रति जागरूक होंगे.             
अभी जो विचार किया जा रहा है कि हिन्दी ब्लॉगिंग को किस तरह से पुनः पटरी पर लाया जाए . तो इसका एक सीधा सा जबाब है कि हम अपने लेखन के प्रति गम्भीर हो जाएँ. अब हमें मात्र सक्रिय रहने के लिए ही नहीं लिखना है. अब हमें जो कुछ भी लिखना है वह लेखकीय जिम्मेवारी के साथ लिखना है. बहस-सहमति-असहमति लेखन का एक महत्वपूर्ण पहलू है, हमें हर एक टिप्पणी को, किसी के दृष्टिकोण को, तथा किसी नवीन जानकारी के प्रति बहुत सजगता से विचार करते हुए आगे बढ़ना होगा. बहुत जरुरी है कि हम एक सकारात्मक वातावरण तैयार करें और अपने ब्लॉगों को ऐसी सामग्री से सरावोर करें, जो सही मायने में पाठक के लिए लाभप्रद हो. मात्र टिप्पणी की संख्या के हिसाब से यह अन्दाजा लगाने की कोशिश न की जाये कि मेरी यह रचना काफी महत्वपूर्ण हो गयी है. हमारी किसी रचना की क्या महता है, वह उसके पाठकों से पता चलती है, और यह निर्णय हम एक दिन में नहीं कर सकते. इसके लिए थोडा वक़्त लगता है. सर्च इंजन से जो पाठक आपकी रचना तक पहुंचता है, वह उस पर कितना समय बिताता है वहीँ से हम एक अंदाजा लगा सकते हैं कि हमें अपने लेखन में किस तरह के बदलाव करने की जरुरत है. हालाँकि यह सब तकनीकी पहलू हैं, आम ब्लॉगर इनकी तरफ ध्यान नहीं दे पाता. ऐसे में उसके लिए टिप्पणी की संख्या बहुत मायने रखती है. मैंने टिप्पणी करने के खिलाफ नहीं हूँ, यक़ीनन टिप्पणी बहुत प्रोत्साहन देती है. लेकिन कोशिश यह भी होनी चाहिए कि हम वाह!! वाह !!! वाली टिप्पणियों के प्रति सतर्क हो जाएँ. लेखन और रचना के सन्दर्भ में अगर हम टिप्पणी करते हैं तो यक़ीनन वह रचनाकार को खुद का विश्लेषण करने का मौका देती है. इससे उसका भी लेखन परिष्कृत होता है, जिसका लाभ निकट भविष्य में उसी रचनाकार को होता है. जरुरी नहीं कि हमें सब विषयों की जानकारी हो, लेकिन हम जिन विषयों पर लिखें, या जिस पोस्ट पर टिप्पणी करें, जो कुछ भी लिखें उसके प्रति हम पूरी तरह से सजग हों. अगर हम इस विमर्श को और आगे ले जाने में सहायक हो पायें तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी ब्लॉगिंग अब तक हुए रचनात्मक क्षेत्र में एक नयी मशाल बनकर उभरेगी. 

15 जुलाई 2017

हिन्दी ब्लॉगिंग : आह और वाह!!!...2

14 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे....सन 2011 तक आते-आते ऐसा लगने लगा था कि ब्लॉगिंग के माध्यम से हिन्दी ब्लॉगर आने वाले समय में साहित्य-समाज-संस्कृति-राजनीति-अर्थव्यवस्था जैसे विषयों के साथ-साथ उन तमाम विषयों पर विचार-विमर्श करेंगे जो अभी तक चर्चा से अछूते रहे हैं. ब्लॉगिंग को अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति भी इस दौर में हिन्दी ब्लॉगरों द्वारा कहा जा रहा था. अभिव्यक्ति और रचनाकर्म के क्षेत्र में एक ऐसा दौर चल पड़ा था, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा था कि भविष्य में ब्लॉगिंग ही एक ऐसा माध्यम होगा, जिसके द्वारा तमाम तरह के विषयों पर खुलकर चर्चा की जा सकेगी और आम जनमानस को उन सब विषयों के बारे में आसानी से जानकारी मिल जाएगी, जो अब तक मेनस्ट्रीम में चर्चा के केन्द्र में नहीं हैं. सन 2011 तक के पड़ाव को देखें तो ऐसा लगता था कि जिस दिन हिन्दी ब्लॉगिंग के दस वर्ष पूरे होंगे उस समय तक हिन्दी ब्लॉगिंग का खूब प्रचार-प्रसार हो चुका होगा. ऐसे ब्लॉगर और ब्लॉग भी होंगे, जिनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान होगी. लेकिन समय के साथ-साथ यह अपेक्षा धूमिल सी होती गयी और हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में सन्नाटा सा छा गया.
जीवन में एक सामान्य सा सिद्धान्त है कि जो चीज जितनी जल्दी ऊपर उठती है, वह उतनी जल्दी ही नीचे भी गिर जाती है. हम सबने बचपन में कछुए और खरगोश वाली वह कहानी भी पढ़ी होगी. हिन्दी ब्लॉगिंग के सन्दर्भ में कई बार यह कहानियाँ अनायास ही याद आ जाती हैं. हो सकता है कि मेरा विश्लेषण गलत हो. लेकिन मुझे लगता है कि सन 2007 से लेकर 2011 तक जिन ब्लॉगरों ने हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखा था, उन्हें ही हिन्दी ब्लॉगिंग के कारवाँ को आगे ले जाने का कार्य भी करना था. क्योँकि 2003 से 2006 तक जो ब्लॉगर हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में सक्रिय थे, किन्हीं कारणों से वह 2010 तक आते-आते हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया को लगभग अलविदा कह चुके थे. रवि रतलामी और बी एस पाबला ही ऐसे ब्लॉगर हैं जो हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में प्रारम्भ से लेकर आज तक एक निश्चित गति से ब्लॉगिंग कर रहे हैं. 2007 के बाद आये ब्लॉगरों में भी कई ऐसे ब्लॉगर जो अनवरत रूप से अपने ब्लॉग पर लिख रहे हैं. हाँ यह जरुर कहा जा सकता है कि उनके ब्लॉग पर जितनी प्रविष्ठियां 2008-09-10 में लिखी गयी, बाद के वर्षों में वह सिलसिला थोडा सा थम गया, फिर भी ऐसे कई ब्लॉगर हैं जो नियमित रूप से अपने ब्लॉग पर लिखते रहे हैं. वह भी काफी संगीदगी के साथ, इनके ब्लॉग पढ़ने के बाद कई बार तो लगता है कि हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में हलचल हो रही है, लकिन बहुत ही शान्त तरीके से, कहीं कोई विवाद नहीं, कोई मठाधीशी नहीं, बस चल रहे हैं. मैं अकेला चला था जानिबे मन्जिल, लोग जुड़ते गए और कारवाँ बनता गया. लेकिन हिन्दी ब्लॉगिंग के सन्दर्भ में इन पंक्तियों में थोडा बदलाव करना पड़ेगा. मैं बहुतों के साथ चला था जानिबे मन्जिल, लोग रुकते गए और मैं अकेला रह गया.  
लेकिन फिर भी कई ब्लॉगरों को ऐसा लग रहा है कि हिन्दी ब्लॉगिंग अपने अन्तिम दौर से गुजर रही है, उसे पुनः पटरी पर लाने की जरुरत है. किसी हद तक यह सही भी है, लेकिन गहराई से देखा जाए तो इसकी कुछ खास बजहें भी नजर आती हैं. सबसे पहला तो यह कि आजकल अन्तर्जाल पर अभिव्यक्ति (और टाइमपास) इतने ठिकाने उपलब्ध हो गए कि एक सामान्य इनसान की पूरी दिनचर्या इससे प्रभावित हो गयी है, ऐसे में उसके पास से सूचनाओं का अथाह प्रवाह गुजर रहा है. वह एक ठिकाने से दूसरे ठिकाने की तरफ ही शायद जा पा रहा है. उसके हाथ में मोबाइल है और वह चाहे कुछ भी कर रहा है, लेकिन उसका ध्यान हमेशा नोटिफिकेशन पर टिका है. वह बार-बार अपनी मोबाइल की स्क्रीन को देख रहा है. कुछ नहीं हो रहा है तो वह सेल्फी खींच कर उसे ही फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप्प, इन्स्टाग्राम जैसे ठिकानों पर पोस्ट कर रहा है. वह किसी आये हुए सन्देश को बिन पढ़े अग्रेषित कर रहा है, उसे यह भी ध्यान नहीं है कि कल उसने क्या किया था और क्या करने के विषय में सोचा था. वह पूरी तन्मयता से आभासी दनिया में खो गया है, और ऐसे में उसके पास कहाँ वक़्त है ब्लॉग जैसे गम्भीर लेखन की अपेक्षा करने वाले माध्यम के लिए. हाँ जिन लोगों को ब्लॉग की महत्ता और प्रासंगिकता का अंदाजा है वह नियमित रूप से ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाए हुए हैं. ऐसे लोगों को किसी खास दिन या मौके की जरुरत नहीं है, वह अपना काम बड़ी शिद्दत से कर रहे हैं. सही मायने में देखा जाए तो यही वह लोग हैं जो बिना किसी अपेक्षा के अंतर्जाल पर हिन्दी के कंटेंट को बढ़ावा दे रहे हैं.   
सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इनसान की (ब्लॉगरों) व्यस्तता के अलावा एक और कारण जो मुझे नजर आता है. वह है कि हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए किसी खास एग्रीगेटर का आभाव. चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी के दौर में हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में एक अलग सा ही माहौल था. हमें यह भली-भान्ति याद है कि जब कोई भी ब्लॉगर अपने ब्लॉग पर कोई भी प्रविष्ठी प्रकाशित करता था तो वह अन्य ब्लॉगों पर प्रकाशित प्रविष्टियों को या तो अपने द्वारा अनुसरित किये गए फीड के माध्यम से पढ़ता था, या फिर वह सीधे ही किसी संकलक का रुख करता था. चिट्ठाजगत या ब्लॉगवाणी की तरफ. इन दोनों ब्लॉग एग्रीगेटरों की अपनी-अपनी खूबियाँ थीं. इसलिए ब्लॉगर अपनी पसन्द के हिसाब से किसी भी संकलक के साथ अपना ब्लॉग जोड़ देते थे. प्रयोग की दृष्टि से दोनों बेहतर थे कोई भी आसानी से इनका प्रयोग कर सकता था. लेकिन इन दोनों एग्रीगेटरों के बंद होने के बाद हिन्दी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में एग्रीगेटर तो बहुत से आये, लेकिन यह एग्रीगेटर वह मुकाम हासिल नहीं कर सके, जो पूर्व में प्रचलित एग्रीगेटरों ने किया था. हालाँकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दी ब्लॉगिंग को अगर वही गति और धार देनी है तो बेहतर और सुविधासम्पन्न एग्रीगेटर की महत्ती आश्यकता है. शेष अगले अंक में...!!!

06 जुलाई 2017

हिन्दी ब्लॉगिंग : आह और वाह!!!...1

19 टिप्‍पणियां:
जरा उन दिनों को याद करते हैं जब हम हर दिन अपना ब्लॉग देखा करते थे. कोई पोस्ट लिखने के बाद उस पर आई हर टिप्पणी को बड़े ध्यान से पढ़ते थे. साथ ही यह भी प्रयास होता था कि जिसने पोस्ट पर टिप्पणी की है, बदले में उसके पोस्ट पर जाकर भी टिप्पणी कर आयें. हम कोई पोस्ट लिखें या न लिखें, लेकिन ब्लॉगरों के ब्लॉग पोस्ट पर टिप्पणियों का सिलसिला अनवरत जारी रहता था. उन दिनों यह भी होता था कि ब्लॉगिंग हमारी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा था. सुबह उठते ही सबसे पहले ब्लॉग की हलचल को देख लिया जाता था, वरना ऐसा लगता था कि आज जिन्दगी का अहम् समय बेकार चला गया. जीमेल की बत्ती देखकर अंदाजा लगाया जाता कि सामने वाला अभी जाग रहा है. समय रात का हो या दिन का, हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था और हिन्दी ब्लॉगरों की अंगुलियाँ कभी नहीं रूकती थी. कीबोर्ड और माऊस बेशक जबाब दे जाएँ, लेकिन ब्लॉगर अनवरत रूप से कार्य कर रहा होता था. उसके जहन में जनून था अपनी रचनात्मकता को दुनिया के सामने लाने का, साथ ही इन्टरनेट के माध्यम से हिन्दी की ताकत से दुनिया को अवगत करवाने का. वह तकनीकी रूप से सक्षम नहीं है, लेकिन उसकी हर शंका का समाधान करने के लिए कोई न कोई हर समय तत्पर है. एक ऐसा वातावरण जिसने सचमुच देश के हर उस व्यक्ति को करीब ला दिया जो ब्लॉगिंग से जुड़ा हुआ है.
मैं यह बात कोई सौ-पचास पहले की नहीं कर रहा हूँ, यह तो बस 7-8 साल पुराना किस्सा है. यह उस समय की भी बात है जब हिन्दी ब्लॉगिंग अपन चरम की और बढ़ रही थी. हर दिन नए ब्लॉग बन रहे थे, जैसे ही किसी ब्लॉगर को नए ब्लॉग के विषय में जानकारी मिलती वह तुरन्त ही उस ब्लॉग पर जाकर एक प्रशंसा से भरी टिप्पणी करता और साथ ही यह भी कहता कि हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में आपका स्वागत है, अनवरत लेखन के लिए आपको शुभकामनाएं. लेकिन मुझे समझ नहीं आया कि यह सिलसिला एकदम थम कैसे गया? क्या ब्लॉगरों द्वारा, ब्लॉगरों को दी जाने वाली इन शुभकामनाओं का असर थोड़ी देर के लिए ही था. जो कि ब्लॉगर अपना लेखन उस गति से जारी नहीं रख सके, जो गति 2007 से 2011-12 तक थी. हिन्दी ब्लॉगिंग की विकास यात्रा पर मैंने जितना काम किया है, उसमें कई रोचक चीजें भी देखने को मिली हैं. प्रारम्भ के हिन्दी ब्लॉगरों ने हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में ऐसे-ऐसे प्रयोग किये हैं जिनके बारे में जानकार आश्चर्यचकित हो जाना स्वभाविक है. ब्लॉगिंग शुरू होने से पहले भी इन्टरनेट पर हिन्दी की पहुँच को सुगम बनाने के लिए कई प्रयास हो चुके थे. लेकिन जैसे ही ब्लॉग की तरफ तकनीक से जुड़े लोगों का ध्यान गया तो, उन्होंने दिन रात मेहनत कर इस कार्य को भी अंजाम दिया और उन्हीं के प्रयासों की बदौलत हिन्दी ब्लॉगिंग का मार्ग प्रशस्त हुआ.
हिन्दी की पहली ब्लॉग प्रविष्ठी विनय जैन के ब्लॉग ‘हिन्दी’ पर देखने को मिलती है. हिन्दी का पहला सम्पूर्ण ब्लॉग 9-2-11 के रूप में 21 अप्रैल 2003 को अस्तित्व में आता है. इसके बाद से हम हिन्दी ब्लॉगिंग की विधिवत शुरुआत मानते हैं. इसके बाद धीरे-धीरे हिन्दी ब्लॉगिंग का सिलसिला आगे बढ़ता है. आलोक कुमार के ब्लॉग की ब्लॉग पोस्टें पढ़ने के बाद हिन्दी ब्लॉगिंग के प्रारम्भिक दौर के विषय में आसानी से जाना जा सकता है. इसके बाद सितम्बर 2003 में पद्यमजा का ब्लॉग ‘कही-अनकही’ सामने आता है. इस ब्लॉग की टेगलाइन हमारा ध्यान खींचती है, “नई शक्ति, नई चमत्कार के साथ पद्यमजा का चिट्ठा अब हिन्दी में’. इसी से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि उस दौर में ब्लॉगिंग के प्रति ब्लॉगरों में कैसा जनून था. हालाँकि इनके ब्लॉग पर पहली प्रविष्ठी 1 जनवरी 2004 को प्रकाशित होती है. लेकिन फिर भी इन्होंने हिन्दी ब्लॉगिंग के प्रारम्भिक दौर में बहुत से कार्य किये हैं. इसके बाद देबाशीष चक्रवर्ती का पदार्पण हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में होता है, और यह व्यक्ति ‘नुक्ताचीनी’ के माध्यम से ऐसे-ऐसे प्रयोग करता है कि हिन्दी ब्लॉगिंग का परिदृश्य ही बदल जाता है. 2003 में हिन्दी के 2 ब्लॉग अंतर्जाल पर देखने को मिलते हैं, 2004 में इनकी संख्या 21, 2005 में 39 और इस तरह फिर संख्या के बढ़ने का यह सिलसिला आगे बढ़ता है.
हिन्दी ब्लॉगिंग की अब तक की यह यात्रा लगभग 14 वर्षों की यात्रा है. इन 14 वर्षों में हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में कई घटनाएं घटित हुई हैं. इन्टरनेट पर हिन्दी ब्लॉगों को संख्या को लेकर कोई निश्चित आंकडा कहीं से उपलब्ध नहीं हो सका है. लेकिन अगर चिट्ठाजगत के आंकड़ों को देखें तो 10 दिसम्बर 2010 तक 16,476 चिट्ठे उस पर पंजीकृत थे. इससे यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि हिन्दी ब्लॉगों की संख्या हजारों में हैं. एक अनुमानित आंकड़ा निकालने की कोशिश की जाए तो हिन्दी ब्लॉगों की संख्या 25 से 30 हजार के बीच में हो सकती है. लेकिन यहाँ संख्या का प्रश्न गौण हो जाता है, जब हम ब्लॉगों पर रचे जा रहे साहित्य का विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं. यह सुखद पहलू है कि हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में स्त्री और पुरुषों की भागीदारी बराबर की है. युवा और युवावस्था पार कर चुके सब मिलजुल कर कार्य कर रहे हैं. हिन्दी ब्लॉगिंग की विकास यात्रा के दृष्टि से देखा जाए तो प्रारम्भ में ब्लॉगिंग के प्रति एक खासा आकर्षण देखने को मिलता है. लेकिन समय के साथ-साथ यह गति धीमी होती चली गयी. ऐसा भी नहीं है कि हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में सन्नाटा पसरा हुआ है, हाँ इतना जरुर है जो माहौल हमें 2011 तक देखने को मिलता है, उसमें कमी जरुर आई है. उसके कई कारण हैं. शेष अगले अंक में....!!!