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28 जून 2014

धूल चेहरे पर थी और मैं आईना साफ करता रहा

7 टिप्‍पणियां:
दुनिया भर के श्रेष्ठ साहित्य का जब हम बहुत गहराई से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि दुनिया भर का अधिकतर साहित्य एक बिन्दु पर केन्द्रित है और वह बिन्दु है मानवीय मूल्यों का विकास या मानवीय मूल्यों की स्थापना.  आखिर ऐसा क्या है कि मानव को अपने मूल्यों का विकास करना पड़ता है. जबकि धरा पर जितने भी प्राणी रहते हैं उन पर यह नियम लागू नहीं होता. दुनिया भर में लिखे गए साहित्य का अधिकतर भाग मानवीय मूल्यों की स्थापना का है. भाषा चाहे कोई भी हो. रचना की विधा चाहे कोई भी हो. लेकिन सबके मूल में मानवीय मूल्यों को तरजीह दी गयी है. हमारे देश में ही वेदों से लेकर आज तक जितना भी साहित्य रचा गया है उसके केन्द्र में मानव रहा है और मानवीय मूल्यों की स्थापना इन सब रचनाओं का मूल उद्देश्य है. वेद को भारतीय जीवन की आत्मा के रूप में चिन्हित किया जाता है, तो उपनिषद को उसका संगीत माना जाता है, रामायण को हृदय की संज्ञा से अभिहित किया जाता है तो, महाभारत को उसका मस्तक माना जाता है, पुराण प्रज्ञा, दर्शन उसका गाम्भीर्य, धर्म मर्यादा और आचार को उसके मूल्यबोध के रूप में चिन्हित किया जाता है. साहित्य का यह संसार एक परिपूर्ण मानव की परिकल्पना से भरा पडा है और आज भी इस परिकल्पना को मूर्त रूप देने के प्रयास किये जा रहे हैं.
जब हम गहराई से इस दुनिया के इतिहास को समझने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि इस दुनिया का ज्यादातर इतिहास मानव का मानव से प्रेम का नहीं, बल्कि मानव का मानव से संघर्ष का इतिहास है. इस धरा पर अनेक सभ्यताएं और संस्कृतियाँ जन्मी, उन्होंने अपने शीर्ष को हासिल किया और फिर काल का ग्रास बन गयी. समय के साथ-साथ उनका अस्तित्व मिटता गया. फिर एक नयी सभ्यता और नई संस्कृति ने जन्म लिया. देश काल और वातावरण के अनुरूप उस सभ्यता और संस्कृति ने अपने को स्थापित किया और फिर एक समय ऐसा आया कि वह भी समाप्त गयी. यह क्रम अनवरत रूप से चल रहा है सृष्टि के प्रारम्भ से और चलता रहेगा जब तक इस धरा पर मानव जीवन है. इसे ही हम परिवर्तन कहते हैं, और परिवर्तन को प्रकृति का एक अनिवार्य नियम माना जाता है. यहाँ यह बात गौर करने योग्य है कि प्रकृति के परिवर्तन और मानव के परिवर्तन में बहुत बड़ा अन्तर है.
हालाँकि यह बात भी हमें ध्यान में रखनी चाहिए कि मानव भी प्रकृति का एक हिस्सा है. इसकी संरचना और उसके जीवन का हर एक पक्ष प्रकृति से निसृत है. हम मनुष्य के शरीर की अवस्था से भी इस परिवर्तन और प्रकृति के नियम को समझ सकते हैं. मनुष्य के शरीर की अवस्थाओं बचपन, जवानी, प्रौढ़ावस्था, बुढापा या विकास मनुष्य की अपनी इच्छानुसार नहीं होता. यह प्रकृति का नियम है कि बचपन से बुढ़ापा आएगा ही उसे कोई रोक नहीं सकता. अर्थात प्रकृति, पर्यावरण, समाज एवं जीवन में घटने वाली घटनाओं एवं परिस्थितियों को रोक पाना इसके वश में नहीं है. इसलिए मनुष्य भी परिवर्तन से अछूता नहीं है. लेकिन मानवीय सभ्यता और संस्कृति में जो परिवर्तन आते हैं वह मानव को पूरी तरह से परिवर्तित कर देते हैं. लेकिन प्रकृति में जो परिवर्तन आते हैं वह उसके काल चक्र का हिस्सा होते हैं. लेकिन मनुष्य में आये परिवर्तन काल चक्र का नहीं बल्कि उसकी प्रवृतियों में आये परिवर्तन का हिस्सा होते हैं.
इसे यूं भी समझा जा सकता है. प्रकृति अनवरत रूप से परिवर्तित होती रहती है. लेकिन वह एक चक्र के बाद वहीँ पहुँच जाती है, जहाँ से वह शुरू होती है. छोटे से छोटे स्तर से लेकर बड़े से बड़े स्तर तक इस चक्र को विश्लेषित किया जा सकता है. लेकिन मनुष्य के मामले में ऐसा नहीं है. आज हम सतयुग या त्रेता की सभ्यता और संस्कृति में नहीं जा सकते. वह घटित हो गया और अब उसकी पुनरावृति किसी भी स्थिति में नहीं हो सकती. अब न तो राम इस धरा पर आ सकते हैं और न ही कृष्ण. न तो रावण का जन्म हो सकता है और न ही कंस का बध किया जा सकता है. राम और कृष्ण हमारी सभ्यता और संस्कृति के प्रतिक ही नहीं, बल्कि इन दोनों व्यक्तित्वों ने हमारी सभ्यता, संस्कृति और मानवीय मूल्यों को बहुत गहरे तक प्रभावित किया है. हालाँकि और भी बहुत से कारण और व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने मानवीय जीवन के अनेक पक्षों को प्रभावित किया है, लेकिन इन दोनों (राम और कृष्ण) का प्रभाव हमारे साहित्य, समाज, संस्कृति आदि पर व्यापक रूप से पडा है.
भारतीय साहित्य में राम और कृष्ण के विराट व्यक्तित्व को बहुत बृहत् रूप में उदघाटित किया गया है. इन दोनों का जीवन और कर्म हमारे लिए प्रेरक हैं और आज ही नहीं, बल्कि जब तक मानव इस धरा पर रहेगा वह इन दोनों से प्रभावित होता रहेगा. यह दोनों सभ्यता और संस्कृति के निर्माण और विध्वंस के नायक रहे हैं. इसलिए इन दोनों के जीवन को समझने के लिए हमने एक निरपेक्ष दृष्टिकोण की आवश्यकता के साथ-साथ एक मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है. आज तक श्रीराम और श्रीकृष्ण को आस्था के दृष्टिकोण से ही देखने का प्रयास किया गया है. उन्हें कभी इतिहास और मानवीय दृष्टिकोण से नहीं देखा गया. अगर राम और कृष्ण को इतिहास के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया जाए तो इन दोनों के जीवन का मकसद ही मानवीय मूल्यों की स्थापना करना रहा है. मानवीय मूल्यों की श्रेष्ठता के लिए महाभारत का यह कथन कितना सार्थक है. ‘तीर्थानां हृदयं तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचिः’ अर्थात “सभी तीर्थों में हृदय ही परम तीर्थ है, पवित्रता में हृदय की शुचिता ही प्रमुख है”. हृदय की शुचिता को भारतीय साहित्य में बहुत गहराई से समझाया गया है और इसके अनेक उदहारण हमें देखने को मिल जाते हैं. हृदय से पवित्र व्यक्ति अपनी पवित्रता के कारण ईश्वर तक को पाने में समर्थ हो सकता है, वह उससे मनचाहा वर प्राप्त कर सकता है. अपने व्यक्तित्व को और उज्जवल बना सकता है. इसलिए हमारे देश में व्यावहारिक जीवन में भी पवित्र हृदय व्यक्ति को ऊँचा स्थान दिया जाता है.
लेकिन वर्तमान सन्दर्भों में हम देखें तो परिस्थितियाँ कुछ बदली हुई नजर आती हैं. आज हम प्रत्येक कर्म के लिए दूसरे को दोषी ठहराना अपना नैतिक कर्तव्य समझते हैं. जबकि हम भी कहीं न कहीं उसमें भागीदार होते हैं. जैसे आजकल एक जूमला बड़ा प्रयोग हो रहा है कि यह अमरीकी संस्कृति का प्रभाव है, या हमारे देश के युवा पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण कर रहे हैं, आज नशा करना, चोरी करना, डकैती करना, मारपीट करना तो व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है. इससे भी आगे व्यक्ति अब व्यक्ति के खून का प्यासा बना फिरता है. आज पूरे विश्व के हालात ऐसे हैं कि व्यक्ति कहीं भी अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करता. उसके अंतर्मन में डर बना रहता है और वह डर उसे विचलित करता रहता है. आम व्यवहार में भी ऐसी स्थितियां पैदा हो चुकी हैं कि व्यक्ति अपनी भौतिक लालसाओं के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है और गिर रहा है. जब स्थितियां ऐसी हैं तो एक सुन्दर और स्वस्थ समाज की परिकल्पना करना बेमानी साबित होती है.
हमें आज ऐसा माहौल तैयार करने की जरुरत है जहाँ व्यक्ति अपने जीवन के सर्वांगीण विकास की तरफ प्रवृत हो. भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति या संसारिक उपलब्धियां व्यक्ति के जीवन का एक पक्ष हो सकती हैं, लेकिन जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए उसे अन्य पहलूओं की तरफ भी ध्यान देने की जरुरत है. वैसे भारतीय जीवन पद्धति कितनी वैज्ञानिक थी. जीवन को 16 संस्कारों और चार वर्गों में विभाजित किया गया था और जीवन के हर एक पड़ाव का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. लेकिन आज ऐसा नहीं है, माता-पिता बच्चों को सिर्फ और सिर्फ हॉट कलर जॉब के लिए तैयार कर रहे हैं और जब वह बच्चे बड़े होते हैं तो वहीँ कहीं न कहीं उनके लिए दुःख का कारन भी बन रहे हैं. आज आवश्यकता है दूसरों पर दोषारोपण के बजाय अपने आसपास के वातावरण को बदलने की, ताकि आने वाली पीढ़ियों के हाथ में हम एक सुन्दर सामाजिक व्यवस्था सौंप कर जाएँ.

24 मई 2014

वास्तविकता को समझने की जरुरत...2

3 टिप्‍पणियां:
जब समाज में मानवीय मूल्यों के विपरीत कुछ भी देखता हूँ तो एक पीड़ा का अनुभव होता है, एक टीस मन में पैदा होती है. एक दर्द उठता है और फिर जीवन की वास्तविकता को समझने का सिलसिला शुरू होता है.
गतांक से आगे......!!! जब हम मानवीय मूल्यों की बात करते हैं तो हम बहुत बृहत् परिप्रेक्ष्य को सामने रखकर विचार करते हैं. मानवीय मूल्य शब्द सिर्फ मानव का मानव के प्रति प्रेम का, सम्मान का ही परिचायक नहीं है. बल्कि मानवीय मूल्य शब्द मानव के साथ-साथ इस धरा पर रहने वाले हर जीव के प्रति, प्रकृति के प्रति और इन प्राकृतिक संसाधनों के प्रति मानव द्वारा किये गए व्यवहार का परिचायक भी है. मनुष्य को संवेदनशील प्राणी कहा जाता है, लेकिन उसकी संवेदना का दायरा जब व्यक्तिगत लाभों के इर्द गिर्द घूमता है तो फिर उसके मनुष्य होने के भाव तिरोहित हो जाते हैं, ऐसी स्थिति में वह सिर्फ अपने लाभ के विषय में ही सोचता है, वह अपने हर कर्म में, हर फैसले में, अपने हर सम्बन्ध में सिर्फ और सिर्फ अपने लाभ और अपने हितों को ही तरजीह देता है. ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ है. दुनिया भर के सम्यक परिप्रेक्ष्य पर अगर हम नजर डालें तो हम बहुत आसानी से समझ सकते हैं कि आज के मनुष्य ने अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किस कदर मानवीय मूल्यों को ताक पर रखा है. यह बात भी दीगर है कि आज मनुष्य अपनी लिप्साओं के कारण मनुष्य के ही खून का प्यासा बना फिरता है और दूसरी और उसने समाज में ऐसी व्यवस्थाएं कायम की हैं कि उनके बल पर वह किसी दूसरे व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक शोषण करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहता है. ऐसी स्थिति में मानवीय मूल्यों पर बहुत गहरे प्रश्न चिन्ह खड़े हो जाते हैं और समय रहते अगर इन प्रश्नों का समाधान न किया जाए तो फिर यह समाज के लिए तो घटक होते ही हैं, लेकिन मनुष्य के अस्तित्व के लिए भी यह खतरा बने रहते हैं. 

मनुष्य जब तक वास्तविकता को समझने की तरफ कदम नहीं बढाता तब तक उसके सामने भ्रम बने रहते हैं और जब तक यह भ्रम बने रहते हैं तब तक वह अपने आप को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ समझता रहता है और इस भाव के साथ जिन्दगी जीता है कि वह जो कुछ भी करेगा वह सही ही होगा. लेकिन इस बात के दूसरे पहलू की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता. जाए भी कैसे, उसके सामने बचपन से ऐसा वातावरण तैयार किया है कि उसे हर हाल में श्रेष्ठ बने रहना है. हर हाल में दूसरे से आगे निकलना है, चाहे उसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े, लेकिन खुद को श्रेष्ठ बनाना उसके जीवन का मंतव्य है. एक स्थिति में यह बात सही भी लगती है, क्योँकि मनुष्य कर्म योनि है और उसे हर हाल में कर्म के माध्यम से खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करना है, क्योँकि जब एक मनुष्य अपने बल पर बिना किसी स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा के श्रेष्ठ कर्म कर्ता है तो उस कर्म का लाभ मानव को तो मिलता ही है साथ ही साथ ऐसा वातावरण बनता है कि बाकी लोग भी उससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते हैं और वैसे कर्म में प्रवृत होते हैं. जिससे सबको सकून मिलता है, शांति मिलती है और ऐसे कर्म करने वाले दुनिया भर के प्राणियों के लिए आदर्श साबित होते हैं. 

मनुष्य का मनुष्य के लिए आदर्श स्थापित होना बहुत गहराई से सोचने को विवश करता है. आखिर क्या
ऐसा कोई मनुष्य अपने जीवन रहते कर जाता है कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरक साबित होता है. उसके वचन, कर्म, जीवन को जीने का सलीका, मानवता के लिए किये गए उसके कार्य सब कुछ इतना आदर्श होता है कि आम मनुष्य अपने आप को बौना समझने लगता है, और हो भी क्योँ न, क्योँकि जिस व्यक्ति के विषय में हम सोच रहे हैं वह मनुष्य अपने जीते जी मानवता के उन आदर्शों को जीने में कामयाब हुआ है जिसके विषय में हम सोच भी नहीं सकते हैं. ऐसी स्थिति में हम उस व्यक्ति के जीवन का आकलन करते हैं, उसके विचारों और कर्म को समझने की कोशिश करते हैं उसने जीवन में जो कुछ अर्जित किया, जिस तरह से किया उसे समझने का प्रयास करते हैं तो भी हम जीवन को किसी हद तक बेहतर तरीके से जी सकते हैं. लेकिन यह सब तब ही संभव हो पायेगा जब हमारा चिन्तन और हमारा दृष्टिकोण मानवीय मूल्यों के अनुरूप होगा. वर्ना बिना किसी उद्देश्य के  जीवन तो हर कोई जी कर यहाँ से रुखसत होता ही है. 

जीवन और मृत्यु हर प्राणी के जीवन के दो किनारे हैं. मनुष्य को इस धरा पर रहने वाले प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. इस सर्वश्रेष्ठता के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं, कई तरह के सिद्धांत, कई तरह की अवधारणायें आज तक मनुष्य की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए प्रचलन में आई हैं. सैद्धांतिक तौर पर बेशक मनुष्य को कितना भी श्रेष्ठ क्योँ न कहा गया हो लेकिन उसे खुद को व्यावहारिक तौर पर श्रेष्ठ सिद्ध करना है, और जब तक वह ऐसा नहीं कर पाता तब तक लिखने और कहने को चाहे कुछ भी कहा जाए लेकिन यह सब वास्तविकता से दूर ही होगा, और इसे एक तरह से मनुष्य की हार भी कहा जा सकता है. क्योँकि अपने विषय में जो धारणा उसने बनाई है वह उसकी अनुपालना में ही सक्षम नहीं है. ऐसी स्थिति को हम मनुष्य की हार न कहें तो क्या कहें? इसलिए कुछ भी करने से पहले हमें वास्तविकता को समझने की जरूरत है, क्योँकि यह इसलिए जरुरी है कि जब हम वास्तविकता को सामने रखकर अपने मंतव्यों को पूरा करने की कोशिश करेंगे तो बेशक हम शत-प्रतिशत सफल न हो पायें, लेकिन आंशिक रूप से भी सफल हो पाते हैं तो यह हमारे लिए सबसे सुखद होगा. 

आज दुनिया ने तकनीकी और भौतिक रूप से बहुत विकास कर लिया है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इससे पहले हुए युगों में भी मनुष्य ने इससे कहीं अधिक विकास तकनीकी रूप से किया है, अपनी सुख सुविधाओं के साधनों के साथ-साथ उसने कई अन्य वैज्ञानिक और अध्यात्मिक प्रयोग मनुष्य के जीवन और प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए किये हैं. लेकिन उसे जितनी भी सफलता मिली है उसे उसने अपने जीवन का, कर्म का हिस्सा बनाया है और आज हमारे सामने वह सब आदर्श के रूप में हैं. लेकिन आज हम देखते हैं कि मनुष्य में भौतिकता की एक लिप्सा सी है और इसी लिप्सा के चलते वह वास्तविकताओं से दूर हटकर अपने जीवन को जीने की कोशिश कर रहा है. एक ऐसा जीवन जिसका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ भौतिकता को हासिल करना है और उसके बल पर वह सुख और शांति की तलाश में है, लेकिन भौतिक चकाचौंध में वह यह भूल गया है कि सुख और शांति भौतिकता को अपनाने से नहीं आने वाली, अगर इन्हें जीवन का हिस्सा बनाना है तो उसे वास्तविकता को समझना होगा. शेष अगले अंक में.....!!!