जीवन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है . हमारा जीवन कितना है इस बात को कोई भी नहीं जानता लेकिन फिर भी हम सब अपने - अपने ढंग से जीवन के लिए कुछ न कुछ निर्धारित करते हैं . कई बार हमें सफलता मिलती है तो कई बार असफलता लेकिन फिर भी हम अनवरत रूप से जीवन की गति को बनाये रखते हैं और यह होना भी चाहिए . जहाँ तक मैं अपने सन्दर्भ में बात करूँ एक ही बात बचपन से सोची है कि जीवन एक क्षण है हम जीवन को वर्षों , महीनों , सप्ताहों या फिर दिनों में नहीं बल्कि क्षणों में जीते हैं और क्षण हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है ..किसी विचारक ने कहा है कि " हमें जीवन में क्षणों की चिंता करनी चाहिए मिनटों और घंटों की चिंता तो स्वतः ही हो जाएगी" इस विषय में मैंने जब भी सोचा है तो वक्त की महता सदा मेरे सामने रही है और इसलिए जितना संभव हो सकता है जीवन के हर पहलु को बड़ी संजीदगी से जीता हूँ और सदा खुश रहता हूँ . इस धरती पर रहते हुए जितने भी इंसानों से संपर्क कर पाऊँ और उनके सुख दुःख में शामिल हो पाऊँ इससे बड़ा क्या लक्ष्य जीवन का निर्धारित किया जा सकता है . बस एक कोशिश है जीवन को सफल बनाने की और उसी तरफ सदा उन्मुख रहता हूँ . इसलिए जहाँ पर भी जो भी कार्य करता हूँ वहां पर सबका सम्मान और आदर करने का दिल करता है और ब्लॉग जगत में भी यही कुछ करने के मन सदा रहता है . हालाँकि मैं अभी भी यह मानता हूँ कि मैं अभी बहुत छोटा हूँ ब्लॉगिंग की दुनिया में ..लेकिन आप सबका साथ प्यार और आशीर्वाद मुझे सदा मिला है और यही कामना है कि यह अनवरत रूप से मिलता रहे .
एक सुखद और प्रेरणादायक अनुभव रहा हिंदी भवन दिल्ली में हुए कार्यक्रम का . वहां मैं लगभग सभी ब्लॉगर्स से रूबरू हुआ . सभी से कुछ न कुछ सीखने को मिला और मेरी जिज्ञासा शांत होती रही . इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए मैं पहले ही दिल्ली पहुँच चुका था और वहां से मुझे वापिस धर्मशाला आना था, यह पहले की योजना थी ललित शर्मा जी ने भी दिल्ली आने के साथ साथ अपने धर्मशाला आने का कार्यक्रम तय कर रखा था और मेरे मन में बहुत उत्साह था उनके धर्मशाला आगमन को लेकर . एक मई की शाम को मैं कश्मीरी गेट बस अड्डा पहुंचा जहाँ पर ललित शर्मा जी के साथ राजीव तनेजा जी भी उपस्थित थे देखकर प्रसंता हुई और फिर हमने आगे का सफ़र शुरू किया 6:50 पर हमारी बस थी और हमने टिकट लिया लेकिन सीटें बहुत पीछे मिलीं मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ता यकीन ललित जी के बारे सोच कर थोडा अजीब भी लगा कोशिश तो मैंने की लेकिन सफल नहीं हो पाया . खैर सफ़र तो तय करना ही था . हम 2 मई की सुबह धर्मशाला पहुँच गए और आगे का कार्यक्रम उस दिन का निर्धारित नहीं था सोचा था कि मेक्लोडगंज जायेंगे शाम तक लेकिन ललित जी चक्करदार रास्तों के चक्कर में फंस गए और सोये तो शाम तक उठ न सके . मैं तो आते ही नाश्ता करने के बाद अपने कार्यस्थल चला गया था लेकिन जब आकर देखता हूँ तो ललित जी सो ही रहे थे खैर शाम को हम धर्मशाला शहर घुमने निकले लेकिन जल्द ही वापिस आ गए . 3 मई का कोई कार्यक्रम निर्धारित नहीं किया हाँ 4 मई के लिए कार्यक्रम मैंने निर्धारित कर दिया था और उस विषय में मेरी बात हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय क्षेत्रीय केंद्र धर्मशाला के निदेशक से हो चुकी थी और उन्होंने अपनी सहर्ष अनुमति भी दे दी थी . 4 मई को हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय क्षेत्रीय केंद्र धर्मशाला के हिंदी और पत्रकारिता विभाग द्वारा एक सेमीनार का आयोजन किया गया . जिसकी अध्यक्षता आदरणीय ललित शर्मा जी ने की . विषय था " हिंदी भाषा और न्यू मीडिया : संभावनाएं एवं चुनौतियां" . हिंदी और पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों के साथ - साथ अंग्रेजी विभाग के विद्यार्थियों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई जो इस विषय और सेमीनार की महता को दर्शाता है . हालाँकि केंद्र में एक और कार्यक्रम की तैयारियां चल रहीं थी फिर भी हमारे पास जितना स्थान था भरा था . यह देखिये सेमीनार की चित्रमयी झलक :-
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| जय प्रकाश जी मंच सञ्चालन करते हुए |
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| केंद्र निदेशक ललित शर्मा जी का स्वागत करते हुए |
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| मैंने स्वागत किया केंद्र निदेशक डॉ . कुलदीप चंद "अग्निहोत्री" जी का |
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| ललित शर्मा जी और डॉ . कुलदीप चंद अग्निहोत्री जी चिन्तन करते हुए |
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| केंद्र निदेशक विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए |
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| ललित शर्मा विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए |
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| कुछ कहने की अपेक्षा सुनना बेहतर समझता हूँ सभी के विचारों को सुनते विद्यार्थी |

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| प्रिंट मीडिया ने भी सराहा प्रयास को |
सेमीनार में क्या कहा गया इस विषय पर आप ललित शर्मा की रिपोर्ट या फिर प्रिंट मीडिया में जो छपा हैं देख सकते हैं . 4 मई को सेमिनार होने के बाद हम मेक्लोडगंज की तरफ निकले और फिर 5 मई को हमने काँगड़ा के किले का दौरा किया 6 मई को हम नूरपुर किले को देखने के लिए गए और फिर 7 मई को ललित शर्मा जी धर्मशाला से दिल्ली रवाना हो गए . उनके धर्मशाला आगमन और उनके द्वारा किये गए कार्यों और ब्लॉगिंग पर की गयी चर्चा के कारण मुझे यह कहना है कि वह आये और मुझे बहुत कुछ सिखा गए और जब जाने लगे तो आँखों में आंसू आना स्वाभाविक ही थे ना ....!















