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29 दिसंबर 2016
उलझ रहा हूँ मैं
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आज सोच रहा हूँ बीते हुए कल के विषय में उलझ रहा हूँ भविष्य की योजनाओं में खाका खींच रहा हूँ आने वाले दिन की गतिविधियों का द्व...
1 टिप्पणी:
30 अक्टूबर 2016
कभी न बुझने वाला दीप जलाना
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दीप खुद को जलाता किसी दूसरे को प्रकाश से सरावोर करने के लिए रिश्ता दीप का उससे कोई नहीं न ही कोई चाह है उससे न कोई बदले का भाव...
7 टिप्पणियां:
28 अक्टूबर 2016
पहाड़ पर कविता
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वर्षों पहले पहाड़ दुर्गम था, दूर होना कोई प्रश्न नहीं था? था तो पहाड़ का दुर्गम होना. सोचता था..... कभी पहाड़ की चोटी तक पहुंचा तो ...
10 टिप्पणियां:
22 मार्च 2016
‘माँ’ की ही अभिव्यक्ति हूँ ‘मैं’
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राह चलते जीवन के सफ़र में मंजिल को तय करते मिले मुझे लोग कई अपनी-अपनी विशेषता से भरपूर जिनमें अक्स देखा मैंने अपनी भावनाओं का ,...
16 टिप्पणियां:
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