21 फ़रवरी 2016

प्रेम का गणित 1+1=1...2

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गत अंक से आगे एक नयी दुनिया नहीं, बल्कि एक बनी-बनाई दुनिया में नए ढंग से जीना है. प्रेम का यह अर्थ उसके लिए एक ऐसे लक्ष्य को प्राप्त करने जैसा था, जैसे इसे पाकर वह पूरी दुनिया के लिए प्रेम की एक अद्भुत मिसाल कायम करेगा. प्रेम और प्रेम के बाद की जिन्दगी के विषय में उसकी अपनी कल्पनाएँ थी. वह हमेशा मुझे यही कहता कि आज मेरी जिन्दगी प्रेम की जिन्दगी है, तो मैं उससे सीधा सवाल करता कि क्या कल आपकी जिन्दगी प्रेम वाली नहीं होगी? तो वह कहता कि तब यह सब कुछ नहीं हो पायेगा न, जो आज कर रहा हूँ? इस सब-कुछ में उसकी कई बातों होती, कई तर्क होते, लेकिन कहीं पर प्रेम का जो अहसास था वह धूमिल सा था. कहाँ तो प्रेम प्रकाश के समान चमकना चाहिए, लकिन यहाँ प्रेम के आलावा सब चीजों की चमक थी, लेकिन यह सब चीजें प्रेम रूपी आवरण के पीछे छुपी हुई थी. फिर भी प्रेम का आवरण धुंधला था.
मैं कभी किसी के मनोभावों को लेकर कभी कोई अनुमान नहीं लगाता. किसी के दिल में क्या छुपा है उसे समझने की कोशिश तब तक नहीं करता, जब तक उसका मुझसे कोई बास्ता न हो. इसलिए मेरे मित्र के जहन में जो भाव चल रहे थे, उनका मुझसे कोई सीधा सरोकार नहीं था. लेकिन उसे मेरी बातों को समझने में काफी जिज्ञासा होती तो हम कई बार किन्हीं ख़ास मुद्दों पर बात कर लेते. प्रेम उनमें से ही एक खास मुद्दा था. प्रेम के विषय में उसे मेरी धारणाएं थोड़ी हटकर लगती और वह खुद को उन्हीं के अनुरूप बनाने की कोशिश भी करता. लेकिन जब उसे कहीं असफलता मिलती या फिर कुछ उसके भावों के अनुरूप नहीं होता तो वह थोडा असहज होता और फिर उसी सन्दर्भ में बात करने या स्पष्टीकरण के लिए मेरे पास आ जाता. यूं ही कई दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा. प्रेम के कई पक्षों के विषय में मैंने उसे समझाने का प्रयास किया. लेकिन उसे अपनी धुन में रहना ही पसंद था.
खैर एक दिन मैंने उसे कहा कि आज आपको प्रेम के गणित को समझाता हूँ, वह मुस्कराया और मेरे साथ चल दिया. हम चलते-चलते पहाड़ियों के बीच एक सुन्दर से स्थान पर पहुँच गए, पास में नदी वह रही थी, पक्षी रात्री विश्राम के लिए वापिस आ रहे थे, दिन ढल रहा था, गडरिया अपनी भेड़-बकरियों को अपने ठिकाने की तरफ बुला रहा था, सब अपने-अपने रोजमर्रा के कामों को करके अपने परिवार से मिलने घर वापिस आ रहे थे. मौसम बड़ा सुहावना था. हम दोनों ऐसे मौसम का आनन्द लेते हुए कुछ बातों में व्यस्त थे. धीरे-धीरे सूरज की लामिमा पहाड़ की चोटी तक पहुँचते हुए अँधेरे के होने का संकेत दे रही थी. मैं काफी रोमांचित था और मेरा मित्र उस वातावरण में अपनी प्रेमिका की याद में मग्न था. मैंने उससे कोई प्रश्न नहीं किया, वह प्रकृति में इतना राम गया कि उसे यह भी ख्याल नहीं रहा कि हम यहाँ आये किस मकसद से थे. धीरे-धीरे रात का सन्नाटा बढ़ रहा था, और वह कुछ ख्यालों में खोया हुआ अपने आप से बुदबुदा रहा था, वह मुझे बात करने के बजाय प्रकृति में रमने में खुश हो रहा था. उसे आनन्द की अनुभूति हो रही थी, वह खामोश होने के बजाय नाचने पर मजबूर हो रहा था, उसका रोम-रोम पुलकित हो रहा था और मैं शान्त भाव से उसकी हर क्रिया-प्रतिक्रिया पर नजर बनाये हुए था.
उसे ऐसी अवस्था में देखकर मुझे अपने बीते हुए लम्हों की याद आ रही थी, जीवन का हर वह अहसास जीवन्त रूप ले रहा था. दृश्य आँखों के सामने घूम रहे थे, सब कुछ पास महसूस हो रहा था. था तो मैं अपने दोस्त के साथ, लेकिन तनहा था, मेरा मित्र प्रकृति में अपनी प्रेयसी को खोजकर उससे इकमिक हो चुका था, ठीक वैसे ही जैसे पन्त अपनी प्रेयसी को प्रकृति में पाते हैं. यहाँ प्रकृति का मानवीकरण हो रहा था और मानव प्रकृति में समा रहा था. प्रेम की यह निश्छल और अविरल धारा दोनों और से एक सी बह रही थी और अन्तहीन सफ़र तक साथ होने का अहसास करवा रही थी. मेरा मित्र जाने कब इस अहसास में खो गया. सब कुछ भूल कर वह सिर्फ प्रकृति में खोना चाहता था और संभवतः प्रकृति उसमें. यहाँ प्रेम इस रूप में वह रहा था कि दोनों एक-दूसरे के लिए सहज समर्पित हो गए. कोई बनावटीपन नहीं, एक सहज समर्पण, एक सहज आकर्षण. सिर्फ और सिर्फ प्रेम, प्रेम के सिवा कुछ भी नहीं. 1+1=1 होने की प्रक्रिया की शुरुआत और अंत कहीं नहीं. बस एक और एक हो गए.
मैं अपने मित्र की सुध-बुध खोने की इस स्थिति को देखकर अचम्भित था, प्रेम को संभवतः उसने पहली बार अनुभव किया था. उसके हावभाव बदल गए थे, वह प्रेम में बनाबटीपन के बजाय नैसर्गिकता का पक्षधर होता जा रहा था. रात के इस गहरे सन्नाटे में वह प्रेम में समन्दर में और गहरे अन्तस् तक उतरने की कोशिश में था. उसे प्रेम लौकिक से अलौकिक की यात्रा महसूस हो रही थी, जड़ से चेतन का सफ़र, माया से ब्रह्म की यात्रा. उसे अपने शरीर का भान नहीं रह रहा था, बस वह चेतना में अवस्थित हो रहा था, एक से एक होने की प्रक्रिया में एक के बचने की सम्भावना बलबती होती जा रही थी. उसके चेहरे पर एक अलौकिक प्रकाश छा रहा था, आनन्द के सागर में लगाये गोते उसके जीवन को परिवर्तित कर रहे थे, उसके जीवन के कई मुखौटे अब उतर चुके थे, मन का अहम् कब्र में चला गया था, पूरी कायनात से प्रेम करने का मन कर रहा था. जीवन बदल रहा था, अहम् और अस्तित्व से शुरू हुई यात्रा, समर्पण और शून्य में प्रवेश कर गयी थी और इतने में सुबह के सूरज की लालिमा दूर पहाड़ की चोटी पर हमें दिखाई दी, भोर हो चुकी थी, सब अपने-अपने घरौंदों से निकल रहे थे, और ऐसे में मेरे मित्र ने जीवन का एक सच अनुभूत कर लिया था. अब वह निकल पड़ा था प्रेम की एक रौशनी लेकर दुनिया को प्रेम की सीख देने के लिए, क्योँकि  उसने महसूस किया कि अन्ततः संसार में जो सबसे बेहतर है, वह है “प्रेम”....लेकिन सिर्फ और सिर्फ “नैसर्गिक प्रेम”.
एक दृश्य और एक सपना, अंततः साकार हो रहा था.

11 फ़रवरी 2016

प्रेम का गणित 1+1=1...1

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एक दिन मैं अपने मित्र से बात कर रहा था. बातों-बातों में बात प्रेम के विषय तक आ पहुंची. बात-बात में मैंने महसूस किया कि वह अपने प्रेम को लेकर संशय की स्थिति में है. वह अपने प्रेम के अनुभवों और भविष्य की स्थितियों को लेकर बहुत असमंजस में था. उसे लग रहा था कि कहीं वह उसे खो न दे, जिसे उसने बड़ी शिद्दत से पाया है. उसके मन में कई तरह के प्रश्न थे. मैंने उसे सलाह दी कि प्रेम के गणित में 1 और 1 का जबाब 1 ही होता है. मेरी बात सुनकर वह हंसा और मेरा मजाक बनाते हुए वहां से चल दिया. उसे लगा शायद मैं उसकी इस हरकत पर बुरा मान जाऊंगा या फिर अपनी बात को सही साबित करने की कोशिश करूँगा. उसके हाव-भाव से यह भी लग रहा था कि मैं किसी दिन अपने इस तर्क से पीछे हट जाऊंगा और उसे यह कह दूंगा कि मैं तो मजाक कर रहा था.
गणित के नियम के अनुसार जब हम 1+1 करते हैं तो स्वाभाविक सी बात है कि उसका उत्तर 2 होता है. यह बात तो एक सामान्य सी बुद्धि का व्यक्ति भी समझ सकता है. लेकिन जब भी वह मुझसे प्रेम के विषय में पूछता तो मैं अन्त में उसे यह जरुर कहता कि जीवन में स्थिति चाहे जैसी भी हो, लोग चाहे जैसे भी हों, वह कुछ भी कर लें, लेकिन उन्हें प्रेम की कमी महसूस होती ही है. जीवन में प्रेम का कोई विकल्प नहीं है. ‘प्रेम’ जीवन का वह अहसास है जिसका होना ही जीवन के मायने बदल देता है. मेरी इस बात पर उसकी प्रतिक्रिया उसके मन की स्थिति  के हिसाब से होती, जब वह खुश होता तो वह वाह-वाह करता, लेकिन अगर थोड़ी सी भी कहीं कोई किन्तु-परन्तु हो तो वह सिरे से नकार देता कि जीवन में प्यार-व्यार कुछ नहीं होता. सब अपने मतलब से किसी से जुड़ते हैं, उनका अपना कोई ख़ास मकसद होता है. जब उनका मकसद पूरा हो जाता है तो वह किसी को किनारे करके किसी और मंजिल का रुख कर लेते हैं, ऐसे में एक संवेदनशील व्यक्ति अपने जीवन और मौत के बीच जूझता रहता है. ऐसी कई बातें थी जो वह मुझसे किया करता था. लेकिन उसे ख़ास दिलचस्पी इसी बात को समझने में थी कि 1+1=1 कैसे हो सकता है.
मैं उसे कई दिन टालता रहा, लेकिन उसे यही समझना था कि प्रेम का गणित कैसे, सामान्य गणित से अलग हो सकता है. जहाँ प्रेम है वहां गणित का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है. वहां तो भाव हैं, अनुभूति है, चाहत है, एक दूसरे के लिए मर मिटने के अरमान हैं. ऐसी कई बातें हैं जिन्हें हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं, उन्हें कहना मुश्किल लगता है. उसकी बातों और व्यवहार का यह अन्तर उसके प्रेम पर और भी सन्देह पैदा करता था. प्रेम में आदर्श स्थिति किसी हद तक सही हो सकती है, कल्पना की ऊँची उड़ान भी वहां है, साथ जीने और साथ चलने के वादे भी हैं, लेकिन यह प्रेम के प्रारम्भिक चिन्ह हैं, यह प्रेम के अंकुरण के संकेत हैं. बीज के प्रस्फुटित होने की निशानियाँ हैं. हो सकता है कि आगे चलकर यह अंकुर फल तक पहुंचे ही न, तो ऐसी स्थिति में क्या होगा? मैं जब भी उससे यह प्रश्न करता तो उसके लिए प्रेम किसी अबूझ पहेलो जैसा हो जाता. इस बात पर तो उसे और भी चिढ़ आती, जब मैं यह कहता कि प्रेम करने का नाम नहीं, प्रेम होने का नाम है. प्रेम में संसार (जाति-धर्म-वर्ण-आश्रम-अमीरी-गरीबी-रंग-रूप आदि) कहीं नहीं है, प्रेम में सिर्फ प्रेम ही है, ‘सिर्फ और सिर्फ प्रेम’. प्रेम जीवन में एक क्रान्ति है, जो होती तो कहीं भीतर घटित है, लेकिन उसका प्रभाव व्यक्ति के पूरे जीवन में देखा जा सकता है. प्रेम रूपी क्रान्ति सभी सीमाओं को तोड़ने की क्षमता रखती है. प्रेम को परिभाषित करना और उसे शब्दों में बांधना बहुत कठिन है.
प्रेम के विषय में यह सब बातें सुनकर वह अपने को टटोलने की कोशिश करता कि क्या सच में प्रेम एक ‘क्रान्ति’ का नाम है, जो ‘भीतर’ ही ‘भीतर’ घटित होती है. जो आखों से उतर कर रूह के धरातल पर अवस्थित होती है. जो जिस्म के बन्धन की अपेक्षा हृदय के स्तर पर बंधी होती है. जो तर्क की अपेक्षा सहजता को स्वीकार करती है. वह मेरी बातों में उलझता जा रहा था. पहले प्रेम का गणित और अब प्रेम एक ‘क्रान्ति’, आँखें और रूह, आखिर यह माजरा क्या है? वह तो अभी तक यही सोच रहा था कि प्रेम की यात्रा तो आखों से होते हुए शरीर के एक ख़ास हिस्से पर पहुँच कर ख़त्म हो जाती है और उसके बाद प्रेम ठहर जाता है. वह एक सामान्य जीवन की और अग्रसर होता है, वह सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाता है, और फिर एक सीमा पर आकर प्रेम रूपी यह अहसास समाप्त भी हो जाता है. प्रेम का मतलब उसके लिए सिर्फ इतना ही है कि किसी ख़ास इनसान को अपने करीब लाओ, उसे अपना बनाओ और फिर उसके साथ जीवन गुजारने के बारे में सोचो. घर-गृहस्थी बसाओ और मौज उड़ाओ, इससे ज्यादा और क्या चाहिए होता है जिन्दगी में. लेकिन मेरी बातें सुनकर वह परेशान हो जाता. उसे अपनी योजनायें बेकार लगने लगती, जो कुछ उसने अभी तक सोचा है, मेरे सामने वह सब निरर्थक हो जाता. बचता तो सिर्फ एक आधा-अधूरा शब्द ‘प्रेम’ जिसका वह मतलब भी सही तरीके से नहीं समझ पाया था, और उसने कभी उसे समझने की कोशिश ही नहीं की. उसके लिए प्रेम सिर्फ दो लोगों का मिलन है, बस इसके सिवा और कुछ नहीं.
लेकिन दो से एक होने के मायने और एक और एक होने के मायने बहुत अलग हैं. मैं उसे यही बात समझाने की कोशिश करता, लेकिन उसे लगता कि प्रेम में सिद्धान्त का क्या काम, वहां तो मौज मस्ती है, घूमना फिरना है, गप्पें मारना है, मिलना जुलना है और फिर एक उम्र के बाद शादी के बन्धन में बंधकर आगे का नीरस जीवन जीना है. जहाँ खुद को जिम्मेवारियों के हवाले करना है और परिवार और समाज को संभालना है. ....शेष अगले अंक में..!!

04 नवंबर 2015

मनुष्य : मान्यता और मानसिकता

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‘मनुष्य’ शब्द जब भी जहन में आता है तो मन ‘कल्पना’ में कहीं खो जाता है, और वह कल्पना मनुष्य जाति के इतिहास और वर्तमान का आकलन करते हुए भविष्य की और ले जाती है. हालांकि यह भी सच है कि मनुष्य कभी भी भविष्य के बारे में कुछ भी दृढ रूप से नहीं कह सकता. लेकिन वह इतिहास का आकलन तो कर ही सकता है, वर्तमान को तो विश्लेषित कर ही सकता है और उसी आधार पर भविष्य की रूपरेखा तय कर सकता है. एक और पहलू यहां बहुत महत्वपूर्ण है, वह यह कि मनुष्य अपनी सोच के आधार पर अपनी दुनिया का निर्माण करता है. अब यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह किस दृष्टि से सोच रहा है. हमें इस पहलू पर भी ध्यान देने की जरुरत है कि मनुष्य की सोच को निर्मित करने में उसके परिवेश की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है. अक्सर मनुष्य की सोच और समझ का विकास उसके परिवेश पर निर्भर करता है, और जैसा परिवेश मनुष्य को प्रारम्भिक अवस्था में प्राप्त होता है उसकी सोच और समझ का निर्माण काफी हद तक उसी परिवेश के आधार पर होता है.  क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह समाज में रहता है ऐसे में उसकी सोच का दायरा अपने व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा सामाजिक हित में होना जरुरी है. व्यक्तिगत लाभ की सोच चाहे, परिवार के स्तर पर हो, समाज या समुदाय के स्तर पर हो या देश और विश्व के स्तर पर वह काफी हद तक दूसरों के लिए लाभदायक नहीं होती. वह कहीं न कहीं पर व्यक्ति के अपने स्वार्थ से जुड़ी होती है और जहां पर व्यक्तिगत लाभ सर्वोपरि हैं वहां पर हम किसी ‘दूसरे का हित’ कैसे सोच सकते हैं?

किसी ‘दूसरे का हित’ जैसे शब्द हमें प्रेरित करते हैं किसी के लिए भी कार्य करने के लिए, और मनुष्य एक
ऐसा जीव है जो इतना क्षमतावान है कि वह ‘दूसरे’ के हित के लिए कार्य कर सकता है. हम इतिहास उठाकर देखें तो हमें इस पहलू के कई प्रमाण मिल जायेंगे कि इस धरा पर ऐसे भी मनुष्य हुए हैं जिन्होंने अपना सर्वस्व प्राणी मात्र के हित के लिए अर्पित किया है और मनुष्य ही नहीं प्रकृति के हर पहलू के साथ उन्होंने सामंजस्य स्थापित करते हुए अपने जीवन को जिया है. मनुष्य जीवन के विषय में किसी ने यह भी खूब कहा है कि “अपने लिए जिया तो क्या जिया, है जिन्दगी का मकसद औरों के काम आना”. इस पंक्ति में तो किसी दूसरे के काम आना ही ‘जिन्दगी का मकसद’ बताया गया है, इसके अलावा जिन्दगी का और क्या मकसद हो सकता है. जिन्दगी के मकसद पर कई लोगों ने अपने तरीके से विचार किया है और जिसको जो श्रेष्ठ लगा उसने उसी अनुरूप कार्य करने का प्रयास किया है. लेकिन भाव वही रहा ‘दूसरों’ के लिए कुछ करने का. ऐसे में हमें यह सोचना होगा कि मनुष्य के जीवन मकसद की पूर्ति में कौन सी चीज बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है?

मनुष्य की सोच और उसके कर्म का आकलन करें तो हमें यह बात समझने में देर नहीं लगेगी कि मनुष्य के जीवन मकसद की पूर्ति में उसकी सोच की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है. मनुष्य जैसे सोचता है वैसे ही अपने लक्ष्य निर्धारित करता है और उन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए वह वैसे ही प्रयास भी करता है.अब हमें यह देखना है कि मनुष्य के लक्ष्य, सोच, मान्यता और उसकी मानसिकता का क्या प्रभाव उसके जीवन पर पड़ता है. हमें यह बात भली प्रकार से समझ लेनी चाहिए कि मनुष्य की सोच का विकास उसकी मान्यता पर निर्भर करता है और उस मान्यता का क्रियान्वयन उसकी मानसिकता का आधार है. हालांकि यह बात भी सच है कि मान्यता का कोई भौतिक आधार नहीं होता और उसे हम कल्पना भी नहीं कह सकते. वह मनुष्य का एक अहसास है जो हमेशा उसे अपनी और खींचती है. ‘मान्यता’ और ‘मानसिकता’ को परिभाषित करना थोड़ा कठिन है. इन दोनों में एक महीन सा अंतर है, लेकिन जहां मान्यता का प्रभाव समष्टिगत है तो वहीँ पर मानसिकता व्यक्तिनिष्ठ है. इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि जहां मान्यता किसी समुदाय, समाज, जाति और देश का हिस्सा होती है, वहीं मानसिकता काफी हद तक व्यक्तिगत होती है. लेकिन कई बार किसी व्यक्ति की मानसिकता का प्रभाव भी किसी दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करता है. इसलिए मानसिकता और मान्यता का एक दूसरे के साथ अन्योयाश्रित सम्बन्ध प्रतीत होता है, और हम मान्यता और मानसिकता को एक दूसरे से अलग नहीं कर पाते. मान्यता का प्रभाव व्यक्ति पर ताउम्र रहता है, लेकिन मानसिकता परिवेश, समय और स्थिति के अनुसार बदलती रहती है. फिर भी यह तो तय है कि ऐसी परिस्थिति में भी मान्यता कहीं न कहीं पर अपनी भूमिका का निर्वहन कर ही रही होती है. शेष अगले अंक में....!!!