24 मई 2014

वास्तविकता को समझने की जरुरत...2

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जब समाज में मानवीय मूल्यों के विपरीत कुछ भी देखता हूँ तो एक पीड़ा का अनुभव होता है, एक टीस मन में पैदा होती है. एक दर्द उठता है और फिर जीवन की वास्तविकता को समझने का सिलसिला शुरू होता है.
गतांक से आगे......!!! जब हम मानवीय मूल्यों की बात करते हैं तो हम बहुत बृहत् परिप्रेक्ष्य को सामने रखकर विचार करते हैं. मानवीय मूल्य शब्द सिर्फ मानव का मानव के प्रति प्रेम का, सम्मान का ही परिचायक नहीं है. बल्कि मानवीय मूल्य शब्द मानव के साथ-साथ इस धरा पर रहने वाले हर जीव के प्रति, प्रकृति के प्रति और इन प्राकृतिक संसाधनों के प्रति मानव द्वारा किये गए व्यवहार का परिचायक भी है. मनुष्य को संवेदनशील प्राणी कहा जाता है, लेकिन उसकी संवेदना का दायरा जब व्यक्तिगत लाभों के इर्द गिर्द घूमता है तो फिर उसके मनुष्य होने के भाव तिरोहित हो जाते हैं, ऐसी स्थिति में वह सिर्फ अपने लाभ के विषय में ही सोचता है, वह अपने हर कर्म में, हर फैसले में, अपने हर सम्बन्ध में सिर्फ और सिर्फ अपने लाभ और अपने हितों को ही तरजीह देता है. ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ है. दुनिया भर के सम्यक परिप्रेक्ष्य पर अगर हम नजर डालें तो हम बहुत आसानी से समझ सकते हैं कि आज के मनुष्य ने अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किस कदर मानवीय मूल्यों को ताक पर रखा है. यह बात भी दीगर है कि आज मनुष्य अपनी लिप्साओं के कारण मनुष्य के ही खून का प्यासा बना फिरता है और दूसरी और उसने समाज में ऐसी व्यवस्थाएं कायम की हैं कि उनके बल पर वह किसी दूसरे व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक शोषण करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहता है. ऐसी स्थिति में मानवीय मूल्यों पर बहुत गहरे प्रश्न चिन्ह खड़े हो जाते हैं और समय रहते अगर इन प्रश्नों का समाधान न किया जाए तो फिर यह समाज के लिए तो घटक होते ही हैं, लेकिन मनुष्य के अस्तित्व के लिए भी यह खतरा बने रहते हैं. 

मनुष्य जब तक वास्तविकता को समझने की तरफ कदम नहीं बढाता तब तक उसके सामने भ्रम बने रहते हैं और जब तक यह भ्रम बने रहते हैं तब तक वह अपने आप को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ समझता रहता है और इस भाव के साथ जिन्दगी जीता है कि वह जो कुछ भी करेगा वह सही ही होगा. लेकिन इस बात के दूसरे पहलू की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता. जाए भी कैसे, उसके सामने बचपन से ऐसा वातावरण तैयार किया है कि उसे हर हाल में श्रेष्ठ बने रहना है. हर हाल में दूसरे से आगे निकलना है, चाहे उसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े, लेकिन खुद को श्रेष्ठ बनाना उसके जीवन का मंतव्य है. एक स्थिति में यह बात सही भी लगती है, क्योँकि मनुष्य कर्म योनि है और उसे हर हाल में कर्म के माध्यम से खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करना है, क्योँकि जब एक मनुष्य अपने बल पर बिना किसी स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा के श्रेष्ठ कर्म कर्ता है तो उस कर्म का लाभ मानव को तो मिलता ही है साथ ही साथ ऐसा वातावरण बनता है कि बाकी लोग भी उससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते हैं और वैसे कर्म में प्रवृत होते हैं. जिससे सबको सकून मिलता है, शांति मिलती है और ऐसे कर्म करने वाले दुनिया भर के प्राणियों के लिए आदर्श साबित होते हैं. 

मनुष्य का मनुष्य के लिए आदर्श स्थापित होना बहुत गहराई से सोचने को विवश करता है. आखिर क्या
ऐसा कोई मनुष्य अपने जीवन रहते कर जाता है कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरक साबित होता है. उसके वचन, कर्म, जीवन को जीने का सलीका, मानवता के लिए किये गए उसके कार्य सब कुछ इतना आदर्श होता है कि आम मनुष्य अपने आप को बौना समझने लगता है, और हो भी क्योँ न, क्योँकि जिस व्यक्ति के विषय में हम सोच रहे हैं वह मनुष्य अपने जीते जी मानवता के उन आदर्शों को जीने में कामयाब हुआ है जिसके विषय में हम सोच भी नहीं सकते हैं. ऐसी स्थिति में हम उस व्यक्ति के जीवन का आकलन करते हैं, उसके विचारों और कर्म को समझने की कोशिश करते हैं उसने जीवन में जो कुछ अर्जित किया, जिस तरह से किया उसे समझने का प्रयास करते हैं तो भी हम जीवन को किसी हद तक बेहतर तरीके से जी सकते हैं. लेकिन यह सब तब ही संभव हो पायेगा जब हमारा चिन्तन और हमारा दृष्टिकोण मानवीय मूल्यों के अनुरूप होगा. वर्ना बिना किसी उद्देश्य के  जीवन तो हर कोई जी कर यहाँ से रुखसत होता ही है. 

जीवन और मृत्यु हर प्राणी के जीवन के दो किनारे हैं. मनुष्य को इस धरा पर रहने वाले प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. इस सर्वश्रेष्ठता के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं, कई तरह के सिद्धांत, कई तरह की अवधारणायें आज तक मनुष्य की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए प्रचलन में आई हैं. सैद्धांतिक तौर पर बेशक मनुष्य को कितना भी श्रेष्ठ क्योँ न कहा गया हो लेकिन उसे खुद को व्यावहारिक तौर पर श्रेष्ठ सिद्ध करना है, और जब तक वह ऐसा नहीं कर पाता तब तक लिखने और कहने को चाहे कुछ भी कहा जाए लेकिन यह सब वास्तविकता से दूर ही होगा, और इसे एक तरह से मनुष्य की हार भी कहा जा सकता है. क्योँकि अपने विषय में जो धारणा उसने बनाई है वह उसकी अनुपालना में ही सक्षम नहीं है. ऐसी स्थिति को हम मनुष्य की हार न कहें तो क्या कहें? इसलिए कुछ भी करने से पहले हमें वास्तविकता को समझने की जरूरत है, क्योँकि यह इसलिए जरुरी है कि जब हम वास्तविकता को सामने रखकर अपने मंतव्यों को पूरा करने की कोशिश करेंगे तो बेशक हम शत-प्रतिशत सफल न हो पायें, लेकिन आंशिक रूप से भी सफल हो पाते हैं तो यह हमारे लिए सबसे सुखद होगा. 

आज दुनिया ने तकनीकी और भौतिक रूप से बहुत विकास कर लिया है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इससे पहले हुए युगों में भी मनुष्य ने इससे कहीं अधिक विकास तकनीकी रूप से किया है, अपनी सुख सुविधाओं के साधनों के साथ-साथ उसने कई अन्य वैज्ञानिक और अध्यात्मिक प्रयोग मनुष्य के जीवन और प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए किये हैं. लेकिन उसे जितनी भी सफलता मिली है उसे उसने अपने जीवन का, कर्म का हिस्सा बनाया है और आज हमारे सामने वह सब आदर्श के रूप में हैं. लेकिन आज हम देखते हैं कि मनुष्य में भौतिकता की एक लिप्सा सी है और इसी लिप्सा के चलते वह वास्तविकताओं से दूर हटकर अपने जीवन को जीने की कोशिश कर रहा है. एक ऐसा जीवन जिसका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ भौतिकता को हासिल करना है और उसके बल पर वह सुख और शांति की तलाश में है, लेकिन भौतिक चकाचौंध में वह यह भूल गया है कि सुख और शांति भौतिकता को अपनाने से नहीं आने वाली, अगर इन्हें जीवन का हिस्सा बनाना है तो उसे वास्तविकता को समझना होगा. शेष अगले अंक में.....!!!        

19 मई 2014

वास्तविकता को समझने की जरुरत...1

4 टिप्‍पणियां:
दुनिया जिस रफ़्तार से बदल रही है वह हमारे लिए एक अद्भुत सत्य है. भौतिक संसाधनों का जिस तरीके से फैलाव आज हम दुनिया में देख रहे हैं वह मनुष्य की प्रगति का सूचक है. इस पड़ाव पर पहुँचने के लिए मनुष्य ने अपने जीवन के सभी साधनों को समर्पित किया है. मनुष्य के आज तक के इतिहास पर अगर हम एक निगाह डालें तो हमें यह आसानी से समझ आयेगा कि मनुष्य ने अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही प्रकृति के रहस्यों को समझने की चेष्टा की है और अपने जीवन को साधन सम्पन्न बनाने के लिए निरंतर प्रयास किया है. उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती जीवन को समझने की भी रही है. भौतिक साधनों की पूर्ति, उनका उत्पादन, जीवन में उनकी महत्ता और प्रयोग, विज्ञान और तकनीक के माध्यम से प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने के अलावा मनुष्य के चिन्तन का विषय इस जीवन के पार झाँकने का भी रहा है, और उसने उसे जीवन की वास्तविकता को समझना कहा है.

जीवन की इस वास्तविकता को समझने के चक्कर में उसने कई अवधारणाओं को जन्म दिया. कई सिद्धांत
बनाए, कई मार्गों का निर्माण किया, कई पद्धतियाँ विकसित की और अंततः जिस लक्ष्य को उसने निर्धारित किया उसे उसने मोक्ष (जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्ति) की संज्ञा दी. ऐसी स्थिति में व्यक्ति जीवन में चाहे कुछ भी कर ले लेकिन मोक्ष के रास्ते पर चलना उसके लिए अनिवार्य हो गया. ऐसी स्थिति में समाज में उसके लिए कुछ नियम और कायदे बनाये गए. अब दुनिया को अलग-अलग तरीके से विश्लेषित किया जाने लगा. सनातन धर्म से लेकर आज तक जितने भी धर्म, जितनी भी विचारधाराएँ, जितनी भी दार्शनिक अभिव्यक्तियाँ हमारे सामने हैं उन सभी को जब हम गहराई से विश्लेषित करते हैं तो पाते हैं कि इन सभी का लक्ष्य मनुष्य को मोक्ष की तरफ ले जाने का रहा है, और अगर मनुष्य को इस दिशा में बढ़ना होता है तो उसे इस दुनिया और इसके भौतिक साधनों का त्याग करना होगा. बौद्ध और जैन धर्म में हम इस पराकाष्ठा को देख सकते हैं. जहाँ एक साधक के लिए न तो भौतिक जगत के मायने हैं और न ही उन्हें इस जगत से कोई ख़ास सरोकार है. उनके लिए समाज के कोई ख़ास मायने नहीं, शारीरिक सुख सुविधाओं का कोई ज्यादा मोल नहीं. धन संचय का कोई ख़ास स्थान नहीं बस जीवन को चलाने के लिए जो आवश्यक है उससे ही उन्हें जीवन चलाना है और इस जीवन के पार जो कुछ है उसे पाने का प्रयास इस जीवन के रहते हुए करना है. 

इस सबको करने के लिए मनुष्य की एक ख़ास मानसिकता तैयार की जाती है, उसे ऐसा वातावरण प्रदान किया जाता है और अंततः वह इस दिशा में सर्वस्व अर्पित करते हुए आगे बढ़ता है. मोक्ष को प्राप्त करने की दिशा में अनेक प्रयास वह करता है और जीवन के रहते हुए वह इस शरीर को, इसकी मूलभूत आवश्यकताओं को और अपनी इच्छाओं की परवाह किये वगैर आगे बढ़ता है और यही सोचता है कि इस जीवन के न रहने के बाद उसे जो कुछ भी मिलेगा वह उसके लिए सुखद होगा और वहां पहुँच कर वह उन सभी तमाम सुख सुविधाओं का उपभोग करेगा जो मनुष्य जन्म में उसकी साधना और तपस्या के बल पर उसे मिलेंगी. कमोबेश हर धर्म के मूल में यह बात प्रचलित है और इसलिए कुछ लोग जन्म के बाद ही उस दिशा में बढ़ते हैं और अपने जीवन को किसी ख़ास विचारधारा, जीवन पद्धति, फिर किसी गुरु के हवाले करके अपने आप को मोक्ष के हकदार मान बैठते हैं और उनके जीवन की हर गतिविधि, हर कर्म उसी अनुरूप होता है, यदा-कदा वह अपने गुरु के माध्यम से ईश्वर  साक्षात्कार की बात भी करते हैं और खुद को आनन्द से सराबोर कहते हुए दूसरों को भी इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देते हैं, और जो उनका गुरु होता है वह किसी मनुष्य के उससे जोड़ने और जुड़ने को सबसे बड़ा कर्म मानता है. 

यह क्रम न जाने कब से चला आ रहा है और संसार के लोग इन सब गतिविधियों में न जाने कब से शामिल हैं और आज के सन्दर्भ में अगर हम देखें तो ऐसी संस्थाओं और मोक्ष की प्राप्ति करने और करवाने वालों की बाढ़ सी आ गयी है. हर चौराहे पर एक ऐसी दुकान जरुर होगी जहाँ से आप अपने मोक्ष जाने का रास्ता पूछ सकते हैं और उस दुकान के नियमित ग्राहक बनकर आप अपनी आने वाली सात पीढ़ियों का कल्याण कर सकते हैं. बस इसी चक्कर में लोग दिन रात भाग दौड़ कर रहे हैं और उनका मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इस बात को पहुंचाने का रहता है कि जिस तरह से हमने अपने मोक्ष का रास्ता पक्का कर लिया है उसी तरह तुम भी अपने मोक्ष का रास्ता पक्का कर लो. यह दुनिया कुछ भी नहीं है, जो कुछ इस दुनिया में है वह सब तो यहीं रह जाएगा, हम क्या लाये थे और क्या हमें लेकर जाना है. बस हम अच्छे कर्म करें और आगे के रास्ते को सुगम बना लें. नहीं तो आगे का मार्ग बहुत कठिन है, वहां बहुत यातनाएं मिलती है और उन यातनाओं के बारे में जानकारी देने के लिए एक विशेष प्रकार का साहित्य तैयार किया गया है, जिसके उदहारण देकर व्यक्ति को यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि इस जीवन के बाद का मार्ग कैसा है और तुम्हें वहां से बचने के लिए क्या-क्या करना है. तुम उस मार्ग पर जाओ ही नहीं इसके इंतजाम तुम्हें इस जीवन में रहते हुए करने होंगे. ऐसे माहौल में व्यक्ति अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसे कामों में लगता है जिसका उसके जीवन से कोई खास सरोकार नहीं होता. वह अपने अगले जीवन को सुखद बनाने के चक्कर में इस जीवन को ही स्वाहा कर देता है. 

ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए. यह एक बड़ा प्रश्न है. हमारे समाज की व्यवस्था ही कुछ ऐसी बन गयी है कि अब हमें इन सब भ्रमों से निकलने के रास्ते तलाशने चाहिए. हालाँकि व्यक्तिगत रूप से न तो मैं किसी विचारधारा का विरोध करता हूँ और न ही मुझे ऐसा करने का कोई अधिकार है. लेकिन जब समाज में मानवीय मूल्यों के विपरीत कुछ भी देखता हूँ तो एक पीड़ा का अनुभव होता है, एक टीस मन में पैदा होती है. एक दर्द उठता है और फिर जीवन की वास्तविकता को समझने का सिलसिला शुरू होता है .....शेष अगले अंकों में ....!!!!