31 जुलाई 2012

तन्हाई

29 टिप्‍पणियां:
संख्या का महत्व ..इस श्रृंखला की अगली कड़ी फिर कभी ......क्योँकि आजकल हम हैं तन्हा और यह हाल है हमारा ....लीजये प्रस्तुत है आज बहुत दिनों बाद आपके लिए यह कविता .....!

तन्हाई के आलम में
अन्धेरा आँखों के सामने होता है
दुखी दिल तुम्हारे वियोग में
टूट - टूट कर , न जागता न सोता है !

तुम्हारी चुलबुली अदाएं
एक - एक कर जब याद आती हैं
क्या हालत होती कैसे करूँ वयां
अधर बंद, आँखें सो जाती हैं !

मिले थे तुम तो कुछ सकूँ मिला था
अरमानों की थी मैंने बस्ती बसाई 

इस कदर जुदा हुए हम
तुम्हें मेरी वफ़ा रास नहीं आई 

अब अश्क नहीं , रक्त टपकता दृगों से
रुई का तकिया सब सोख लेता
हिज्र में तुम्हारे कैसे कटती रातें
पलंग भी सोने नहीं देता ...!

17 जुलाई 2012

संख्या का महत्व

28 टिप्‍पणियां:
हमारे जीवन और इस दृश्यमान प्रकृति में संख्याओं का बहुत महत्व है . संख्या के इस चक्कर से कोई भी अछूता नहीं . सृष्टि के प्रारंभ से आज तक हम जो कुछ भी सहेज पाए हैं उसमें सख्या की भूमिका को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता . दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि कई बार किसी चीज की महता का निर्धारण करने में संख्या बहुत महती भूमिका निभाती है . इतिहास के दायरे में जितनी भी चीजें आतीं हैं वह संख्या के बगैर अधूरी हैं . यह भी कह सकते हैं कि इतिहास को जीवंत बनाने में संख्या का बहुत महत्व है . हम देश, काल और समय की गणना संख्या के माध्यम से करते हैं . संख्या को गिनाने के लिए सामान्य तौर पर हमारे पास सिर्फ दस अंक हैं . शून्य से लेकर नौ तक, लेकिन जितनी भी गणना है वह इन दस अंकों में ही समाई है  . जिस तरह से संगीत सात सुरों (सा, रे, गा, , , नि, स) में समाया है, उसी तरह सृष्टि की सारी गणना इन दस अंकों में समाई है . गणित में हम गणना के लिए कुछ और चिन्हों का प्रयोग भी करते हैं , लेकिन सामान्य तौर पर यही दस अंक पूरी सृष्टि में गणना के लिए मानक के तौर पर प्रयोग किये जाते हैं . हमारे यहाँ पर प्रचलन में जो अंक हैं उनका महत्व सर्वश्रेष्ठ है . सबसे पहली बात तो यह कि यह औच्चारणिक दृष्टि से सबसे शुद्ध हैं . हम इनका जैसा उच्चारण करते हैं वैसे ही इनकी ध्वनि भी निकलती है . सिर्फ ध्वनि ही नहीं हमारी स्वरतंत्रियों में जो कम्पन होता है वह भी इन अंकों के उच्चारण के आधार पर होता है . इन सबकी  महता ज्योतिष की गणना करने वाले और भाषा विज्ञान को समझने वाले अधिक बारीकी से जानते हैं .

हमारे यहाँ का जितना भी ज्योतिष है वह इन्हीं संख्याओं के आधार पर आधारित है , और यह बहुत आश्चर्यजनक है कि इन अंकों के माध्यम से हम नवग्रहों और नक्षत्रों की बहुत सटीक गणना करने में सक्षम हुए हैं . हमनें धरती से सूर्य के बीच की दूरी को इन अंकों के माध्यम से जाना , सूर्य की एक किरण को धरती पर पहुँचने के में लगने वाले वक़्त को भी हमने इन्हीं अंकों के माध्यम से जाना . हमने चंद्रमां की दूरी को भी इन अंकों के माध्यम से जाना . साँसों के चलने की प्रक्रिया को भी यह संख्याएं ही इंगित करती हैं , और इस शरीर के सफ़र को भी संख्या के माध्यम से इंगित किया जाता है . संख्या के आधार पर ही हम समय का अंकन करते हैं और यह संख्या ही है जिसके आधार पर हम जड़ और चेतन सत्ता की पहचान करते हैं . आखिर जब संख्या ही नहीं है तो कुछ भी नहीं . जब मैंने इस संख्या की महता के विषय में गहराई से सोचा तो मुझे कोई भी ऐसा पदार्थ इस सृष्टि में नजर नहीं आया जिसका संख्या से कोई लेना देना न हो या जिस पर कोई संख्या लागू न होती हो . यह पूरी सृष्टि संख्याओं के माध्यम से अभिव्यक्त होती है और जब यह विलीन होती है तो तब भी संख्या इससे जुदा नहीं होती . यानि संख्या की महता हर परिस्थति में है .
 
कई बार संख्याएँ कुछ रोचक सा माहौल पैदा करतीं हैं . जैसे किसी के मोबाईल का नम्बर , गाडी का नम्बर या फिर कहीं कुछ और . पिछले दिनों हमने देखा कि सचिन तेंदुलकर के सौवें 100 शतक के लिए लोग किसी तरह से बेताब थे . एक धावक की जीत में मिनटों और सेकंडों की संख्या कितनी मायने रखती है . इस बात से आप भलीभांति अवगत हैं और एक नेता की जीत के लिए एक वोट कितने मायने रखता है . यह सब संख्याओं का खेल है . जरा गहराई से देखें तो कितनी महत्वपूर्ण है संख्या और कितना रोचक है संख्याओं का संसार . हम जितना डूबेंगे उतना ही पायेंगे संख्याओं के बारे में और जितना खोजेंगे उतना ही कम होगा संख्या को जानना . पिछले दिनों मेरे सामने एक रोचक सी संख्या आई ( 12345 ) . जिसे मैंने आदरणीय ललित शर्मा जी के ब्लॉग ललित डॉट कॉम पर देखा . इनके ब्लॉग पर टिप्पणियों की संख्या 12345 हुई तो एक अद्भुत संख्या बन गयी . एक तरह से हम इसे एक , दो , तीन , चार , पांच ही कहते तो यह संख्या का खंडित रूप होता और इसके कोई मायने नहीं होते  और अगर हम दूसरे शब्दों में कहते बारह हजार तीन सो पैंतालीस तो एक बहुत बड़ी संख्या हमारे पास होती . देखिये कितना अद्भुत है संख्याओं का संसार . अब इसी बात को आगे बढ़ाते हैं . इन बारह हजार तीन सो पैंतालीस टिप्पणियों में ललित शर्मा जी के ब्लॉग और उनके लेखन की महता छुपी हुई है . 601 पोस्टों पर बारह हजार तीन सो पैंतालीस टिप्पणियाँ इंगित करती हैं कि इनके पाठक वर्ग का दायरा कितना बड़ा है और संभवतः इस संख्या ने यह भी बता दिया कि कोई एक विषय ही लेखन का विषय नहीं रहा होगा . विषय विविधता , लेखन की निरंतरता , प्रमाणिकता और मौलिकता आदि सभी इस संख्या के माध्यम से इंगित हुए और मेरा मन एक रोमांच से भर गया , और यह भी मेरे लिए आश्चर्यजनक रहा कि इस संख्या तक यह मेरी टिप्पणी के माध्यम से ही पहुंचे थे . यह तो एक उदहारण मात्र है . गहराई में जाकर देखें कितनी महत्वपूर्ण हैं संख्याएं यह बड़ा अद्भुत विषय है और हम संख्याओं के बगैर एक पल भी नहीं जी सकते और एक पल में ही कई तरह की महत्वपूर्ण संख्याएं हमारे जीवन को प्रभावित कर रहीं होती हैं .......!

09 जुलाई 2012

प्रदूषण ही प्रदूषण .. 3 ..

18 टिप्‍पणियां:
काश ! हम जीवन की उन्मुक्तता को समझ पाते, मर्यादा में रहते और जीवन के वास्तविक लक्ष्यों को पाने का प्रयास करते, मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीते धरती के इस वातावरण को अपने मानसपटल से सुंदर बनाने का प्रयास करते ....लेकिन अभी तक ऐसा कोई चिराग नजर नहीं आता जो सभी के लिए रौशनी का कारण बन सके .  
गतांक से आगे .....!

आज के परिप्रेक्ष्यों पर विचार किया जाये तो बहुत गंभीर सवाल हमारे सामने खड़े होते हैं . कोई ऐसा चिराग सच में नहीं जो आम व्यक्ति का आदर्श हो , जिसका अनुसरण किया जाये , हम जिसके विचारों पर मंथन कर सकें , सब और शोर ही शोर है . ऐसे हालात में आम व्यक्ति क्या करे उसके सामने बड़े अँधेरे रास्ते हैं और उनकी मंजिलें कहाँ तक जाती हैं यह उसे मालूम नहीं . मानसिक प्रदूषण के साथ - साथ यहाँ वैचारिक प्रदूषण बहुत तेजी से फ़ैल रहा है और उसे फ़ैलाने के लिए लोग तरह - तरह के साधनों का प्रयोग करते हैं . इस वैचारिक प्रदूषण के कई आयाम हैं और यह सबसे खतरनाक साबित हो रहा है . लोग गुटों में बंट रहे हैं , हर तरफ अस्थिरता का माहौल है और इन दूषित विचारों के कारण दिन प्रतिदिन हमारे देश और समाज की तस्वीर बदल रही है और इसके भयंकर परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं . व्यवस्था चाहे कोई भी हो सब जगह विचारों की टकराहट है. किसी हद तक तो यह होनी भी चाहिए लेकिन जब यही विचार टकराकर आग का रूप ले लेते हैं , जानमाल का नुक्सान करते हैं , आदमी का शोषण करते हैं , उसे मानसिक क्षति पहुंचाते हैं तो फिर ऐसे विचारों का क्या किया जाए ??? यह सबसे बड़ा सवाल है हम सबके सामने और इसका उत्तर भी हम सभी को खोजना है , लेकिन इस दिशा में बढ़ने की बजाय हम उल्टी दिशा में बढ़ रहे हैं और अगर यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हम अपना अस्तिव खो देंगे . 

आज हर स्तर पर वैचारिक प्रदूषण देखने को मिलता है . हम अपनी राजनीतिक , सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं को देख लें सब जगह वैचारिक प्रदूषण देखने को मिलता है . यहाँ जितनी भी व्यवस्थाएं हैं यह सब हमारे उत्तम विचारों की व्यवस्थाएं हैं . लेकिन आप किसी भी व्यवस्था का गहराई से आकलन करें तो वह अपने लक्ष्यों की तरफ हमें नहीं बढाती हुई लगती है . राजनीति की अगर हम बात करें तो इसका तो सबसे बुरा हाल है . हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शासन व्यवस्था और राजनीति बेशक एक दूसरे से गहरे से जुड़े होते हैं लेकिन क्रियात्मक रूप से यह दोनों अलग हैं . लेकिन आज के दौर में जो राजनीति करता है, जिसकी सत्ता होती है, वह शासन को अपने अनुकूल बना देता है और यहीं से गड़बड़ शुरू हो जाती है और हो रही है . राजनीतिज्ञों और प्रशासकों की सांठगाँठ ने आम व्यक्ति का जीना दूभर कर दिया है . अगर हमारे पास स्वस्थ विचार होता तो हम  कदापि ऐसा नहीं करते . दूसरी बात राजनीति की कोई स्पष्ट दिशा नहीं और राजनेता का कोई चरित्र नहीं, ऐसे में एक व्यक्ति ही समूची राजनीति को प्रभावित कर रहा है . सबके अपने - अपने स्वार्थ हैं और सभी मौके की तलाश में हैं कि कब उन्हें लोगों और इस देश को लूटने का अवसर प्राप्त हो . इससे गन्दी राजनीति और क्या हो सकती है ? यह सब हमारे विचारों के कारण है . हमारे यहाँ जितनी भी राजनितिक पार्टियाँ अस्तित्व में हैं वह देश और समाज को नई दिशा देने के नज़रिये से नहीं , बल्कि अपने स्वार्थों के कारण अस्तित्व में हैं.  किसी का भी कोई चरित्र नहीं जिसको जहाँ जैसे अवसर प्राप्त हो रहा है वह अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है .
 
समाज व्यक्तियों से बनता है , व्यक्ति समाज की एक सशक्त ईकाई है लेकिन आज जैसे - जैसे व्यक्ति का नैतिक पतन हो रहा है वैसे - वैसे समाज रुपी यह व्यवस्था समाप्त होती जा रही है . संकीर्ण विचारों ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बना दिया है उसे अपने सिवाय किसी से कुछ लेना देना नहीं , उसे यह आभास नहीं कि उसके पड़ोस में क्या हो रहा है . वह अपने आसपास की हलचल से कोई मतलब नहीं रखना चाहता . उसका मतलब तो सिर्फ वहां है जहाँ उसका स्वार्थ पूरा हो रहा है . दूसरी तरफ हमारी सोच के कारण हमारे समाज में कई कुरीतियाँ आ गयी हैं . कन्या भ्रूण ह्त्या , दहेज के लिए किसी अबला का कत्ल, किसी नारी के शोषण की दास्ताँ , ऐसे कई पहलू हैं जो सीधे ही हमारे समाज से जुड़े होते हैं . लेकिन आज हमारे विचारों के कारण सामाजिक नाम की यह संस्था ही समाप्त होती जा रही है . धर्म से व्यक्ति का कोई लेना देना नहीं रह गया है . उसे आचरण से कोई सरोकार नहीं और जो धर्म के प्रतिनिधि हैं वह भी इसे सही दिशा की तरफ ले जाने के बजाय इसे पतन की तरफ ले जा रहे हैं . यहाँ तो हर जगह नित्यानंद , निर्मल बाबा और ना जाने क्या - क्या पैदा हो रहे हैं . धर्म जो व्यक्ति को जीने की कला सिखाता था . वही आज गर्त में जा रहा है और लोग हैं कि अंधश्रद्धा के वशीभूत होकर अपना सब कुछ लूटा रहे हैं और यह जो लोग खुद को बड़ा भक्त कह रहे हैं वह भी एक स्वार्थ के कारण ऐसे लोगों से जुड़े हैं , भौतिक साधनों की प्राप्ति के लिए , मतलब सोच और विचार दोनों तरफ से गलत . ऐसे में किसी से क्या आशा कर सकते हैं ?

अर्थ की तो बात ही छोडिये जिसको जैसे मौका मिल रहा है वह इसका अर्जन कर रहा है . जीवन चलाने के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है , यह तो सबकी समझ में आता है . लेकिन पूँजी के लिए जीवन का सब कुछ दावं पर लगा देना कैसी समझदारी है ?? आज इस देश में कोई ऐसा नजर नहीं आता जो गलत तरीकों से धन अर्जन की अपेक्षा नहीं रखता हो . यानि के हमारे विचारों में बहुत परिवर्तन आ गया है हम उत्तम विचारों से गिर रहे हैं . साहित्य की तो बात ही छोडिये यहाँ भी स्थिति ठीक नहीं है . कहीं पर पूरी कायनात को अपनी अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाने वाला रचनाकार अब दलित विमर्श , स्त्री विमर्श , आदिवासी विमर्श की कल्पित धारणाओं तक ही सीमित हो गया है और कुछ लोग विचारधाराओं के नाम पर उल जलूल लिखने से भी नहीं हिचक रहे हैं . और दूसरी तरफ मनोहर कहानियां , जीजा साली के किस्से, अखबारों में छपते काम शक्ति बढाने के विज्ञापन सब खोखला कर रहे हैं इस देश को ?? 

संगीत में पॉप कल्चर के नाम पर कुछ भी गाया जा रहा है और फिल्मों में देह दिखाने के आलावा कोई दृष्टि नहीं बची है , चित्रकार देवी देवताओं की नग्न और अश्लील तस्वीरें बनाकर क्या दिखाना चाह रहे हों यह समझ से बाहर की बात है . इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया भी अपने तरीके से प्रदूषण फ़ैलाने की भूमिका निभा रहा है . कोई नेता जब किसी को गाली देता है तो वह इनके समाचारों की हेडलाइन बन जाती है . इधर कुछ वर्षों से ब्लॉगिंग को अभिव्यक्ति की नयी क्रांति या स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का माध्यम माना जा रहा था . लेकिन यहाँ भी कुछ लोग ऐसे आ गए हैं जो अपने तरीके से इसे प्रदूषित कर रहे हैं . 

अगर जिसे देश की राजनितिक , सामाजिक , धार्मिक और आर्थिक स्थिति ही दयनीय हो कोई स्पष्ट विचार जहाँ ना हो वहां की संस्कृति क्या हो सकती है ? यह बड़ा विचारणीय पहलू है . अगर जहाँ कोई संस्कृति ही ना हो वहां फिर प्रदूषण के सिवा क्या हो सकता है ? अब हर जगह प्रदूषण ही प्रदूषण है तो जी लो कैसे जीना है आपको , एक तनाव भरे माहौल में संभवतः ऐसे में खुद को पाक साफ़ रखना ही एक बड़ी चुनौती है और जो अपने दामन को पाक साफ़ रखकर जीवन जी रहा है समझो वह बड़ी उपलब्धि हासिल कर रहा है . उसका जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं .