29 अप्रैल 2012

'बाबा' मुझे 'निर्मल' कर दो .. 1

27 टिप्‍पणियां:
भारतीय संस्कृति में "बाबा" शब्द एक अहम् स्थान रखता है . बाबा शब्द फ़ारसी भाषा का शब्द है और इस शब्द को साधू संतों के लिए आदरसूचक शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है . बाबा शब्द जहन में आते ही एक ऐसे व्यक्ति का चित्र मानस पटल पर उभरता है जो तप और त्याग की मूर्ति हो , साधना , अराधना और तपस्या के बल पर हासिल अध्यात्मिक शक्ति को जो जन कल्याण के लिए प्रयोग करता हो . उसके जीवन का प्रत्येक पल दीन और दुखियों की सेवा के लिए समर्पित हो , जिसका जीवन स्वयं में आदर्श हो उसके पास बैठने मात्र से ही सकून और शांति का अनुभव हो , ऐसी बहुत सी बातें हैं जो "बाबा" शब्द के साथ जुडी हुई हैं और जब जिज्ञासु संसार की तपती हवाओं को सहन नहीं कर पाता है तो वह किसी ऐसे संत/ गुरु / बाबा  की तलाश में होता है  जो उसे सकून प्रदान करते हुए , जीवन में मार्गदर्शन देते हुए उसके जीवन को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे  . संसार में कर्म करते हुए किस तरह से निर्लिप्त भाव को अपनाया जा सकता है इसकी महता से उसे वाकिफ करवाए , और ऐसे बाबा / संत या गुरु को पाकर जीव धन्य हो जाता है उसका जीवन लोगों के लिए अनुकरणीय होता जाता है . वह जीव भी स्वयं जीवन में सुख और ख़ुशी का अनुभव करते हुए अपने जीवन की यात्रा को तय करता है .
क भक्त की पुकार है "बाबा" मुझे "निर्मल" कर दो" लेकिन बाबा खुद ही मल (स्थूल ) और मैल ( स्थूल और सूक्ष्म) से मुक्त नहीं तो वह दूसरों को कैसे इससे मुक्ति दिलाएगा , "मल" से मुक्ति कोई आसान नहीं, और निर्मल होना तो और भी कठिन है, कठिन ही नहीं असंभव भी है . जब तक जीवन है व्यक्ति स्थूल और सूक्षम रूप से मल से जुड़ा है निर्मल होने का सवाल ही पैदा नहीं होता . हाँ हमारे यहाँ चिंतन के स्तर पर निर्मल होने की भाव सदा रहा है और निश्चित रूप से यह होता भी रहा है . चिंतन के स्तर पर व्यक्ति निर्मल हो सकता है और हमारे अध्यात्म में इसे सदा महता दी जाती रही है  . आज हम जिस ऊंचाई पर खुद को महसूस करते हैं उसमें हमारे चिंतन का बहुत बड़ा हाथ है . क्योँकि व्यक्ति संसार में रहता है और संसार में रहते हुए उसे कई प्रकार की स्थितियों से जूझना पड़ता है और अगर व्यक्ति मानसिक रूप से उन स्थितियों का गुलाम बन जाता है तो फिर जीवन की नैसर्गिकता से वह पीछे हट जाता है और जीवन के वास्तविक अनुभवों को अनुभूत नहीं कर पाता . निश्चित रूप से भावनात्मक रूप से निर्मल होना ऐसी स्थिति में उसके लिए कारगर होता है जो उसे नवजीवन प्रदान करता है . हमारे जीवन दर्शन में इस भाव को बनाये रखने के लिए गुरु को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है और उसे ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संज्ञा से नवाजा गया है . गुरु जो शिष्य को अंधकार से प्रकाश की और ले जाए , उसके अज्ञान को मिटाकर उसे ज्ञान प्रदान करे और उसे जीवन में कर्म की महता समझाते हुए कर्म करने की प्रेरणा दे . गुरु के विषय में ऐसा बहुत कुछ कहा जा सकता है और अगर ऐसा गुरु हमें जीवन में मिल जाता है तो निश्चित रूप से जीवन धन्य हो जाता है .

जकल निर्मल बाबा प्रकरण हर जगह छाया है , प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया हो या साइबर मीडिया सभी जगह निर्मल बाबा की निर्मलता को बखूबी अभिव्यक्त किया जा रहा है और यह सब यहाँ पर होता रहा है . हमारा जीवन दर्शन आज बहुत सतही बन चुका है , जीवन के प्रति भौतिकवादी नज़रिये ने हमारे पास से हमारा वह सब कुछ छीन लिया है जिसकी भरपाई अब शायद ही हो सके और ऐसे हालात में हम कुछ स्वार्थपरक लोगों के चक्कर में पड़कर अपने जीवन के महत्वपूर्ण पलों को ही नहीं बल्कि पूरे जीवन को ही बर्बाद कर रहे हैं . कई बार यह प्रश्न मुझे बहुत पीड़ा देता है कि भारत जैसे देश में यह सब कुछ हो रहा है , और यहाँ का आम जनमानस इन सब कुरीतियों का शिकार होता जा रहा है . हमारी संस्कृति और सभ्यता दिन प्रतिदिन अपनी महता खोती जा रही है और उसके लिए कोई और जिम्मेवार नहीं बल्कि हम ही जिम्मेवार है . लेकिन व्यक्ति का क्या है अपना दोष दूसरों पर मढ़ कर अपना पल्लू साफ़ करना उसकी फितरत में है . कुछ लोग यहाँ समाज सेवक होने के नाम पर लोगों को लूट रहे हैं तो कुछ कृपा के नाम पर , कुछ योग और आयुर्वेद के नाम पर तो कुछ किसी विशेष जाति, धर्म, विचारधारा और भाषा के हिमायती बनकर . लेकिन सबका लक्ष्य है आम व्यक्ति को लूटना उसे अपने पथ से भ्रमित करना और इसमें दोष किसका है ???  यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है ?? आज एक निर्मल बाबा के लिए सभी विरोध प्रकट कर रहे हैं, यह होना भी चाहिए लेकिन मुझे तो कदम - कदम पर ऐसे बाबा नजर आते हैं जो हमारे देश के लोगों को दोनों हाथों से लूट रहे हैं .......!
शेष अगले अंकों में .......!

16 अप्रैल 2012

दीवारें नहीं, पुल चाहिए...2

11 टिप्‍पणियां:
जैसे ही सरकारें बदलती हैं वैसे ही नीतियाँ भी बदल जाती है, और आज तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि देश की राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है. जो आने वाले समय के लिए यह सबसे अन्धकारमय और खतरनाक पहलू है. गतांक से आगे...!!!! 

 व्यक्ति पर केन्द्रित होती राजनीति और उसके निर्णय को सर्वोपरि मानने जैसी प्रवृतियों ने हमारे सामने बड़ी विकट स्थिति पैदा की है. कुछ सत्ता के अभिलाषी लोग ऐसे लोगों को आश्रय देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने में तो सफल हो रहे हैं लेकिन देश और समाज की दुर्गति हो रही है. लेकिन मेरा यह मानना है कि समाज भी ऐसी स्थितियों के लिए जिम्मेवार है और यह सब हो रहा है हमारी राजनितिक कट्टरता के कारण, (राजनितिक कट्टरता से मेरा अभिप्राय बिना सोचे समझे किसी राजनितिक पार्टी के भक्त हो जाना) और जब ऐसे हालात पैदा होते हैं तो फिर व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके अधिकार कहाँ हैं? यह सबसे बड़ा प्रश्न है. क्योँकि  उसने खुद को किसी विचारधारा के साथ जोड़ दिया और अब वह हर परिस्थिति में उस विचारधारा का ही होकर रहा गया. ऐसी परिस्थिति में वह नेता लाभ उठा रहे हैं जो सिर्फ और सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए राजनीति में आये हैं. यह तो एक पहलू है. 

अगर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो स्थिति और भी गंभीर है. राष्ट्रहित और राष्ट्रीय चेतना तो आज मुझे किसी पार्टी में नजर नहीं आती. सब राजनितिक पार्टियों में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र तो मुख्य रूप से छाये हुए हैं और इन्हीं आधारों पर देश की राजनीति की रूपरेखा तय होती है. मानवीय विकास, राष्ट्रहित, सामाजिक समस्याएं, सांस्कृतिक चेतना आदि किस राजनितिक पार्टी के विचार और घोषणापत्र में हैं यह प्रश्न गहन विश्लेषण की मांग करता है? यह सब बातें इसलिए कहनी पड़ रही हैं, क्योँकि राजनीति प्रत्यक्ष रूप से लोगों पर प्रभाव डालती है और नियम और क़ानून भी इन नेताओं की संसद से हो पास होकर आते हैं. हमारे देश की राजनीति में तो दीवारें ही दीवारें हैं, और इन दीवारों के कारण ही आज हम लुटने के लिए तैयार हैं.

विचार के धरातल पर अगर देखें तो एक गुलदस्ते को अगर एक ही तरह के फूलों से सजाया जाये तो वह
कितना सुंदर प्रतीत होगा? लेकिन एक ऐसा गुलदस्ता है जिसे कई प्रकार के फूलों से सजाया गया है, एक ही प्रकार के फूलों से सजाये गए गुलदस्ते की अपेक्षा मुझे लगता है अनेक प्रकार से सजाये गए फूलों का गुलदस्ता ज्यादा सुंदर प्रतीत होगाऔर उस अलग - अलग फूलों से सजाये गुलदस्ते से हमें एक सीख भी मिलती है, कि किस तरह से अलग-अलग होते हुए भी एक ही स्थान पर कैसे बेहतर तरीके से रहा जा सकता है. यही बात इंसान पर भी लागू होती है. खुदा ने इस धरती को एक गुलदस्ते की तरह बनाया है और इसमें अनेक प्रकार के प्राणी इसकी सुन्दरता को बढाने के लिए ही पैदा किये हैं और उनमें से सर्वश्रेष्ठ इंसान को बनाया है. लेकिन धरती पर जितना आतंक, जितनी अशांति, जितनी अव्यवस्था इंसान ने पैदा की है उतनी किसी और जीव ने नहीं. वह दूसरों को अपने उपभोग का साधन तो बनाता ही है लेकिन इंसान खुद इंसान से इंसानों वाला व्यवहार नहीं करता. वह जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर, धर्म आदि ना जाने कितने आधारों पर  बंटा है और ना जाने कितने आधार हैं जिनके आधार पर इंसान बंटता चला जा रहा है और अपने अस्तित्व के लिए स्वयं ही खतरा बनता जा रहा है. नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति इंसान की इन सब भिन्नताओं का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं और आज तक यह प्रयास निरंतर होते आये हैं. मैं जब भी इन सब भिन्नताओं का विश्लेषण करता हूँ तो मुझे आज तक ऐसा कोई आधार नजर नहीं आया जिसके आधार पर इंसान को इंसान से दूर किया जा सके. लेकिन हमारे यहाँ इन आधारों पर जो खाईयां बनी हैं वह उतरोतर और ज्यादा गहरी होती जा रही हैं और अगर यही हाल रहा तो एक दिन ऐसा आएगा हम स्वयं ही इन खाईयों में अपना अस्तित्व गवां देंगे और तब हमारे पास सोचने का भी वक़्त नहीं होगा.

कितना सुंदर इस धरती का स्वरूप है और कितने तरह से खुदा ने इसे सजाया है. लेकिन हमारी संकीर्णताओं ने इस धरती को जीने लायक नहीं छोड़ा है. आज धरती का जो स्वरूप हमारे सामने है वह बहुत खतरनाक है. आये दिन जैविक हथियारों का परीक्षण किस लिए किया जा रहा है, क्योँ तकनीक का इस्तेमाल खतरनाक हथियारों को बनाने के लिए किया जा रहा है? क्योँ देशों की सरहदों पर निरंतर गोला बारूद इक्कठा किया जा रहा है? सिर्फ मानव को मिटाने के लिए. आज दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी है कोई भी व्यक्ति घर से निकलते ही खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता. घर से निकलते ही क्या घर में भी वह सुरक्षित महसूस नहीं करता तो ऐसी हालात में हमें क्या करना चाहिए यह बहुत विचारणीय प्रश्न है? और इसका एक ही समाधान है इंसान अपनी वास्तविकता को समझे. जो बिना वास्तविकता की दीवारें हमने खड़ी की हैं उन सब दीवारों को गिराया जाये और उन्मुक्त आकाश में विचरण किया जाए. शरीर के आधार पर तो हमारी कोई सीमा है, यह समझ में आता है. लेकिन हमने खुद को सोच के आधार पर भी सीमित कर दिया है यह बहुत दुखदायी है. समय रहते ही हमें इन सब भिन्नताओं पर गहतना से सोचने की जरुरत है और किसी सार्थक निर्णय पर पहुंच कर उस निर्णय को पूरी शिद्दत से क्रियान्वित करने की आवश्यकता है. हमारे सामने जो मानवीय मूल्य हैं इनके वास्तविक महत्व को पहचान कर सुंदर सा दीवारहीन संसार सजाया जा सकता है.

आज जब दुनिया के हालातों पर गहनता से सोचता हूँ तो ऐसा कोई साधन नजर नहीं आता जिससे यह यकीन किया जा सके कि आने वाले समय में हम एक विश्व कि परिकल्पना को साकार कर सकते हैं. आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के इस दौर में हम यह तो कह देते हैं कि विश्व को एक गांव का रूप दिया जा रहा है और विश्व का प्रत्येक मानव एक दुसरे के करीब आ रहा है. लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है. सूचना और तकनीक के इस दौर में ऐसा तो प्रतीत होता है. लेकिन वास्तविक धरातल पर ऐसा नहीं है. जिस वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण की हम बात कर रहे हैं वह मात्र कुछ कम्पनियों द्वारा दिया गया एक शगूफा है और इसका लाभ चंद सत्तासीन और पूंजीवादी लोगों तक ही सीमित है. इसे तरह प्रचारित वैश्वीकरण को मेरी समझ से ब्रिटिश उपनिवेशवादी नीति का बदला हुआ रूप कहना ज्यादा उचित प्रतीत होता है. 

वैश्वीकरण ने जितने बदलाब हमारे समाज और हमारी मानसिकता में लाये हैं उससे बहुत सी दीवारें खड़ी हो गयी हैं, उसने एक भाषा का वर्चस्व कायम करने की कोशिश की है, विज्ञापन के माध्यम से लोगों को गुमराह कर उनके निर्णयों को बार-बार बदलने की कोशिश की है और तो और आज धर्म और अध्यात्म जैसी अलौकिक विद्याएँ भी विज्ञापन से बच नहीं पायी हैं और कुछ लोग योग और ईश्वर कृपा के नाम पर लोगों का सीधे ही शोषण कर रहे हैं. समाज के एक वर्ग से दुसरे वर्ग में भिन्नताएं पैदा कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे ऐसे लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं. दुनिया में दीवारों के नाम पर ऐसा बहुत कुछ है जिसे विश्लेषित करने की महती आवश्यकता है. लेकिन हम हैं की आँखें मूंदें आगे बढ़ रहे हैं और अपनी बढती सुख सुविधाओं को देखकर प्रसन्न हो रहे हैं. लेकिन हमने कभी उस भिखारी के बारे में नहीं सोचा, कभी उस अबला के विषय में नहीं सोचा, कभी उस अनाथ के बारे में नहीं सोच पाए. हम खुद के बारे में सोचते रहे और खुद को भी खुश नहीं कर सके. इस जीवन की इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है? दुनिया में हर जगह दीवारें ही दीवारें हैं लेकिन हम उन्हें गिरा देंगे तो समाधान हमें खुद-ब-खुद ही मिल जायेंगे. लेकिन इन को गिराने के लिए हमें अपने से उपर उठने की आवश्यकता है. आपका क्या ख्याल है?

08 अप्रैल 2012

दीवारें नहीं, पुल चाहिए .. 1

35 टिप्‍पणियां:
मानव सभ्यता के विकास में दीवारों और पुलों की बहुत महती भूमिका है. उसने अपने आश्रय के लिए दीवारों का निर्माण किया और खुद को सुरक्षित महसूस किया, और पुलों का निर्माण कर उसने एक सीमा से दूसरी सीमा में प्रवेश किया. कभी-कभी तो मानव के यह अभिनव प्रयास सोचने पर विवश करते हैं. ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण पांच तत्वों से किया है. पूरी कायनात इन पांच तत्वों का ही मिश्रण है. जड़ से लेकर चेतन तक हम प्रकृति के विभिन्न रूपों को निहारते हैं और इस सृष्टा की बनाई हुई कायनात के रहस्यों को जानने की चेष्टा करते हैं. यह क्रम मानव विकास के इतिहास और उसकी प्रकृति विषयक जिज्ञासा की पूरी जानकारी हमें देता है, और हमें अवगत करवाता है कि किस तरह से मानव पहले इस खुले आकाश के नीचे अपना जीवन व्यतीत करता था. प्रकृति का एक अभिन्न अंग मानव स्वयं भी प्रकृति से जुड़कर इसके विभिन्न रूपों का आनंद लेता था. लेकिन समय के साथ-साथ उसकी चेतना ने उसके जीवन जीने के तौर तरीकों में अंतर ला दिया. आग के आविष्कार ने उसकी जिन्दगी को बदल दिया. धीरे-धीरे मानव खेती करने लगा, उसने अपना आश्रय एक जगह बना लिया और फिर एक नया अध्याय शुरू हुआ. यह क्रम अनवरत चल रहा है और मानव जीवन के रहते तक यह चलता रहेगा. क्योँकि इस सृष्टि के जितने भी जीव है उनमें से सृजन की शक्ति ईश्वर ने सिर्फ और सिर्फ मानव को ही प्रदान की है. चेतना और बुद्धि की तमाम शक्तियां खुदा ने मानव को प्रदान की हैं. इसलिए मानव स्वभाववश सृजन की तरफ प्रवृत होता है. मानवीय सभ्यता के विकास में सृजन का यह पहलू उसे ईश्वर के समकक्ष ला देता है. पूरी प्रकृति में मानव का परचम छाया है और इसके अनेकों उदहारण हमारे सामने हैं. 

ईश्वर ने मानव को सृजन की शक्ति प्रदान कर उसके स्वरूप को और सुन्दर बनाने का प्रयास किया. हम
मानव विकास के प्रारंभिक इतिहास से लेकर आज तक के इतिहास को देखें तो ऐसी बहुत सी घटनाएँ हमारे सामने आती हैं. जिनमें मानव की सोच और समझ के प्रमाण हमें मिलते हैं. लेकिन यह प्रमाण दोनों तरह के हैं, कहीं पर मानव ने अपनी बुद्धि के बल पर सभी प्राणियों के विषय में सोचा तो कहीं वह इतना स्वार्थी हो गया कि उसे अपने हित के सिवाय कुछ भी नजर नहीं आया, कहीं वह अपने शरीर को दावं पर लगाकर प्राणी मात्र की रक्षा हेतु आगे बढ़ा तो, कहीं उसने अपनी एक इच्छा पूर्ति के लिए कई प्राणियों की जान ले ली. यह क्रम सदियों से चल रहा है और ना जाने कब तक चलता रहेगा. लेकिन मानव को मानव से जोड़ने के जितने भी प्रयास हो सकें उन पर गंभीरता से विचार करने की महती आवश्यकता है. क्योँकि चिरकाल से हम देखते आ रहे हैं कि जितनी भी हमने भौतिक उन्नति की है, उसने मानव की सुख सुविधाओं को तो बढ़ाया है. उसे शारीरिक सुख तो प्रदान किये हैं. लेकिन जितना-जितना वह इन सुखों को प्राप्त करता गया है उतना ही उसका चरित्र गिरता जा रहा है. 

विश्व के सभी प्राणियों को बनाने वाला खुदा अब जुदा हो गया है. उसके नामों पर लड़ाईयां जारी हैं, धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग एक दुसरे को नीचा दिखा रहे हैं, वह वास्तविकता को समझे बिना झूठ को प्रश्रय देकर आम व्यक्ति को मुर्ख बना रहे हैं, उनके सामने चिंतन कोई मायने नहीं रखता. बस उनका अपना स्वार्थ सिद्ध जिस तरह से होता है उनके लिए वह महत्वपूर्ण हो गया है. मैं एक बात से हतप्रभ हूँ कि कभी राजनीति को दिशा धर्म देता था. लेकिन आज जितने भी धर्म  का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति हैं. वह सब इन राजनीति के लोगों को पीछे घूमते रहते हैं. सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं और ऐसी हालत में आम व्यक्ति पिसता जा रहा है उसका जीना दूभर हो गया है. एक और महत्वपूर्ण बात जो मुझे अखरती है. वह यह कि आज धर्म और अध्यात्म ने एक संस्था का रूप ले लिया है. जिस संस्था के जितने सदस्य होंगे वह उतनी ही सफल संस्था मानी जायेगी, वह छदम गुरु उतना ही प्रमाणिक. ऐसी हालत में लोग गुटों में बंट रहे हैं. एक ही परिवार के विभिन्न सदस्य कई गुरुओं के भक्त बनकर अपने परिवार में ही वैचारिक भेद पैदा कर रहे हैं. इससे बड़ी और धर्म की क्या दुर्गति हो सकती है? यह विचारणीय है.

राजनीति की ही अगर बात करें तो हाल और भी बुरा है कोई भी नेता ऐसा नहीं जिसे जनता का सेवक समझा जाए. बल्कि जो लोग राजनीति में हैं उनकी सेवा करने के लिए देश के महत्वपूर्ण व्यक्ति तैनात किये जाते हैं, उनके निजी सचिव उच्च शिक्षा प्राप्त  व्यक्ति होते हैं, लेकिन नेता तो अनपढ़ भी हो सकता है. इससे बड़ी और विडंबना क्या हो सकती है? विदेश  में पढ़ा एक व्यक्ति यहाँ की स्थितियों को समझे बगैर किसी महत्वपूर्ण ओहदे पर बिठाया जाता है. ऐसे कई नेता आज हमरी संसद में हैं जो देश की वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं. लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण दायित्व संभाले हुए हैं. ऐसी स्थिति में क्या नीतियाँ बन सकती हैं, और कैसे उनको क्रियान्वित किया जा सकता है. यह सबसे बड़ा प्रश्न है? ऐसा अनुभव रहा है कि कोई भी नीति यहाँ ज्यादा समय तक नहीं चल सकती. जैसे ही सरकारें बदलती हैं वैसे ही नीतियाँ भी बदल जाती है, और आज तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि देश की राजनीति व्यक्ति केन्द्रित हो गयी है. जो आने वाले समय के लिए यह सबसे अन्धकारमय और खतरनाक पहलू है. शेष अगले अंक में....!!!  

01 अप्रैल 2012

मेरे आलेख , आपकी टिप्पणियाँ और यह पॉडकास्ट

20 टिप्‍पणियां:

जीवन और साहित्य एक दूसरे के पर्याय हैं . जिस तरह जीवन की कोई सीमा नहीं , उसी तरह साहित्य को भी किसी सीमा में बांधना असंभव सा प्रतीत होता है . सीमा तो शरीरों की है . लेकिन भाव तो शाश्वत है , भाव मानव जीवन की अमूल्य पूंजी है और इसे अभिव्यक्त करने के माध्यम भी कई है . शब्द अपने आप में निर्जीव होता, लेकिन अर्थ उसे जीवन देता है और  एक मधुर आवाज उस शब्द को अमर करती है . मधुर आवाज और शब्द का अद्भुत संगम ही हमें आनंद की पराकाष्ठा तक ले जाता है, और हम भाव विभोर हो जाते हैं . इन्हीं शब्दों और आवाज के अद्भुत संगम ने संगीत जैसी कला को जन्म दिया और आज हम चाहे जैसी परिस्थिति में हो संगीत हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है . पिछले दिनों मैंने सार्थक ब्लॉगिंग के कुछ पहलूओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया था . जिसे चार पोस्टों में मैंने आपसे सांझा किया . आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं भी मुझे प्राप्त हुई और आदरणीय अर्चना जी ने तो मुझे हतप्रभ कर दिया . इन चारों पोस्टों को स्वर देकर .....! तो आइये पहले अवगत करवाते हैं, आपकी चुनिन्दा प्रतिक्रियाओं से.......!

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर  इस श्रृंखला के पहले भाग से लेकर अंतिम भाग तक आप सबकी प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई जिनमें से कुछ यहाँ शामिल कर रहा हूँ  ......! 
चला बिहारी ब्लॉगर बनने सलिल वर्मा जी ने कहा … केवल राम जी, बड़ी वृहत जानकारी आपने प्रस्तुत की है.. एक ज्ञानवर्धक श्रृंखला!!  गिरधारी खंकरियाल जी का कहना है …गहन अध्ययन के बाद किया गया विवेचन . कुछ जगहों पर वर्तिका का संपादन छुट गया है. उपेन्द्र नाथ बहुत ही अच्छी प्रस्तुति. ... आज के समय में ब्लागिंग की सार्थकता से इंकार नहीं किया जा सकता है. अपनी बात कहने का ये महत्वपूर्ण साधन है. मनोज कुमार जी इस आलेख को ब्लॉगिंग का अच्छा नमूना बता रहे हैं  यह आलेख सार्थक ब्लॉगिंग का अच्छा नमूना है। SKT ने कहा… सुंदर विवेचन ! सृष्टि, मानव सृष्टि पर आपकी दृष्टि के हम कायल हुए! 

दूसरे भाग पर आपकी टिप्पणियाँ कुछ इस तरह प्राप्त हुई .......!
vidya सार्थक लेख...टिप्पणियां पाने से खुशी तो मिलती है...मानव स्वभाव है...मगर हम स्वयं आपने आलोचक बने तो रचनात्मकता निश्चित ही बनी रहेगी.. डा. अरुणा कपूर. जी ने महत्वपूर्ण बात कही :  मात्र सृजन को ही धर्म मान कर चलने वाले लेखक आज के जमाने में मिलने मुश्किल है...सृजन के पीछे कोई न कोई उद्देश्य जरुर होता ही है!...देखना यह है कि उद्देश्य लेखक को किसी भी तरह का लाभ पहुंचाने के बावजूद भी पाठक गण को भी लाभकारक सिद्ध हो!...बहुत सुन्दर विषय!...धन्यवाद! shikha varshney जी ने इस बात पर ध्यान दिलाते हुए कहा " आपके सृजन का पहला और अंतिम पुरस्कार आपके वह प्रशंसक हैं जिन्हें आपसे व्यक्तिगत रूप से कोई लेना देना नहीं लेकिन फिर भी वह आपके लिए दिल में सम्मान रखते हैं ."  मेरे ख़याल से यही मुख्य बात है.टिप्पणियों पर बहस बहुत हो चुकी है.वह सार्थक लेखन की गारंटी नहीं - सहमत.परन्तु लेखन के लिए हौसलाफजाई का माध्यम अवश्य ही हैं.अंत में - ब्लॉग्गिंग को ब्लॉग्गिंग ही रहने दो .....:) कुल मिलाकर बहुत अच्छा विश्लेषण और सार्थक लेखन. Rahul Singh जी की बात बहुत गौर करने वाली है : अवधारणा और विवरणमूलक चर्चा के साथ बिंदुवार और भी स्‍पष्‍ट किया जाना आवश्‍यक है. दूसरे शब्‍दों में ब्‍लागिंग और ब्‍लागेतर लेखन में क्‍या कोई खास, साफ और ठोस फर्क बताया जा सकता है. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद  ब्लागिंग तो रचनाकार को विधा और शैली चुनने के साथ साथ मकसद का विस्तार भी देताहै। यह तो क्षितिज है :) रचना दीक्षित जी की चिंता बाजिब है  : यदि विकासकाल में ही उसके कायदे निर्धारित हो जाएँ तो विकास सही दिशा में होता है . अन्यथा दिशाहीन विकास रचनात्मकता खो बैठता है और कुछ समय पश्चात ही निरर्थक लगने लगता है. संजय @ मो सम कौन ? जी कह रहे हैं  : मैनेजमेंट की शुरुआती पढ़ाई में एक चैप्टर एफ़िशियेंटऔर इफ़ैक्टिवपर हुआ करता था, वैसा ही कुछ सफ़लऔर सार्थकके बारे में समझा जा सकता है। प्राथमिकताएं सबकी अपनी अपनी होती हैं। अच्छा लगा पढ़ना। पी.एस .भाकुनी : बेशक टिप्पणियां किसी भी रचना को आयाम देते हैं किन्तु सिर्फ टिप्पणियों की संख्या के आधार पर रचना का मुल्यांकन नहीं किया जा सकता है.....सुंदर प्रस्तुति...! anju(anu) choudhary इस बात से सहमत होती हुई कहती हैं कि " मात्र और मात्र सार्थक सृजन ,चर्चा के लिए सृजन या पुरस्कार के लिए सृजन ? या फिर सृजन ही मेरा धर्म है . जैसे कहा जाता है कि कला - कला के लिए , कला जीवन के लिए "  . .... इन सब से हट कर बस एक ही बात ...सृजन ...कभी नहीं रुकता...उसे सबके सामने आना ही हैं...किसी का पहले या किसी का बाद में ...बिना किसी उम्मीद के ...बिना किसी इच्छा के .....! 

तीसरे भाग पर आपकी प्रतिक्रियाएं ऐसी रहीं ........! 
दर्शन कौर 'दर्शी' जी को तो हमारी बात समझ ही नहीं आई .....हा..हा..हा..!  लेकिन फिर भी ऐसे अपनी बात कही ...केवल,... मुझे कुछ समझ आया कुछ नहीं ..पर जो समझ आया वो ईमानदारी से लिखा प्रतीत होता हैं ....एक बार नहीं अपितु कई बार पढ़ चुकी हूँ ...टिपण्णी लिखने में भी सहज नहीं हो पाती हूँ ..पर फिर भी हमेशा तुम्हारे ब्लॉग पर आती हूँ कई बार टिपण्णी नहीं लिख पाती हूँ ओके या बहुत अच्छा ,बढियां कहकर तुम्हारे मेहनती लेख के साथ इन्साफ करना ठीक नहीं लगता ...तुम इसी तरह लिखते रहो ..धन्यवाद ! संध्या शर्मा जी ने लिखा  ब्लॉगिंग के लिए आवश्यक विभिन्न पहलूओं  पर आपके विचार बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. और इस विधा को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है... " निसंदेह आप आने वाली पीढ़ियों के लिए नए आयाम स्थापित कर रहे हैं , और सृजन को एक नया क्षितिज प्रदान कर रहे हैं " उपयोगी जानकारी से भरे इस आलेख के लिए बहुत-बहुत आभार ...! सुबीर रावत जी तो सोच में पड़ गए : आपकी पोस्ट बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है. इतने गंभीर विषय लेकर आप चलते हैं कि इसको पढने के लिए तन्हा होना बहुत जरूरी हो जाता है, और फिर दुबारा पढ़कर ही कुछ पल्ले पड़ता है. सचमुच आपकी इस तन्मयता का कायल हूँ. अब ब्लॉगिंग  जैसे नए व नीरस विषय को उठाकर आपने एक सार्थक बहस छेड़ ही है. आभार !! ब्लॉ.ललित शर्मा का अंदाज काबिल -ए- तारीफ है  कल ही एक मित्र ने चर्चा के दौरान कहा कि - केवल राम जो लिखता है वह समझ नहीं आता, क्या लिख गया और मेरी भी समझ नहीं आता कि क्या कमेंट लिखुं।---------- मेरी भी आज यही स्थिति है क्योंकि………………आज होली है। इसलिए इसी से काम चलाएं, "हम आपकी लेखनी के कायल हैं, इतना अच्छा आप कैसे लिख लेते हैं?" :):) हरकीरत ' हीर' जी ने हमारी बात को ही हथियार बना लिया और कहा " जब हम तथ्यपूर्ण विषय जैसे इतिहास आदि पर लिख रहे हों तो और भी सजग रहने की आवश्यकता होती है , क्योँकि यहाँ हमें तथ्य को सही ढंग से प्रस्तुत करना है और तथ्य को प्रस्तुत करने के लिए हमें तर्क की आवश्यकता होती है , राजनीति जैसे विषयों पर लिखने के लिए हमें सापेक्ष दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है और सच को सच की तरह प्रस्तुत करना टेढ़ी खीर हो सकता है . लेकिन ब्लॉगिंग जिसे हम अभिव्यक्ति की नयी क्रांति कहते हैं उसके स्वभाव के अनुकूल अगर हम काम करते हैं तो निश्चित रूप से हम इसकी स्वायतता को बरकरार रख पायेंगे और विचारों की स्पष्टता इसके स्वभाव को और ज्यादा प्रभावी बनाएगी . विचारों की स्पष्टता के कारण लेखन में एक अजीब आकर्षण पैदा होता है और वही आकर्षण पाठक को बार - बार उस विषय को पढने को मजबूर करता है " lgta hai bloging par kitaab likhi ja rahi hai ....agrim shubhkamnayein .....:)) वाणी गीत जी के विचार भी महत्वपूर्ण हैं …ब्लॉगिंग में मौलिक अभिव्यक्ति की सहजता बहुत मायने रखती है , वैसे तो पाठक वर्ग पर निर्भर करता है वह क्या पढना चाहता है !अच्छी प्रस्तुति !

अब हम  चौथे भाग तक पहुँच गए .....! काजल कुमार Kajal Kumar जी भाषा पर बात करते हुए कहते हैं : यहां बहुत से लोगों के अपने अपने एजेंडें हैं. जहां तक भाषा की बात है जिसके थाली में जितना है, जीम कर चला जाता हैडॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहायही पूरी श्रृंखला सभी के लिए उपयोगी रही है .... सार्थक चिंतन प्रस्तुत करती पोस्ट....प्रवीण पाण्डेय ने कहासबके लिये बार बार पठनीय..Amrita Tanmay ने कहा… ब्लॉगिंग के अद्भुत संसार के नायाब हीरे की कलम से निकली.. अनमोल आलेख..अरुण चन्द्र रॉय जी ने सुझाब देते हुए कहा बढ़िया चर्चा केवल जी. थोड़े उदहारण के साथ चर्चा करेंगे तो अच्छा रहेगा.......! इन सब प्रतिक्रियाओं के साथ इस पॉडकास्ट को सुनना अपने आप में एक नया अनुभव रहेगा .....किसी भी प्रकार की गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ .......!