25 मार्च 2012

कम्प्यूटर सुरक्षा हेतु कुछ टिप्स

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सूचना तकनीक के इस दौर में व्यक्ति की यांत्रिक चीजों पर बढती निर्भरता ने व्यक्ति के काम करने की कुशलता को भले ही कम किया हो लेकन उसे आसान जरुर बनाया है . आज अकेला व्यक्ति ही कई व्यक्तियों का काम कर सकता है . विकास के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली इस तकनीक ने वैश्विक परिदृश्य को बदल कर रख दिया है . कम्प्यूटर  का अविष्कार इस दिशा में महत्वपूर्ण घटना है , और इंटरनेट के अविष्कार ने तो दुनिया की दुनिया का नक्शा ही बदल दिया .  इंटरनेट आज सूचनाओं के आदान प्रदान का ही नहीं बल्कि जीवन का अहम् हिस्सा बन चुका है .कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं जिसका सम्बन्ध इंटरनेट से न हो . सूचनाओं को एक दूसरे तक पहुँचाने के लिए  इलेक्ट्रोनिक विधियों द्वारा कम्प्यूटरों को जोड़कर नेटवर्क बनाने की प्रक्रिया चार दशक पहले शुरू हो गयी थी . वर्ष 1966 में अमरीकी रक्षा विभाग के एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स  (ARPA) ने पहले पहल कम्प्यूटर नेटवर्क ' " अर्पानेट " तैयार किया तथा वर्ष 1969 में इस पर चार प्रोग्राम प्रोवाइडर कम्प्यूटरों को जोड़ा . प्रारंभ में इसका उपयोग रक्षा अनुसन्धान से जुड़े कार्यक्रमों के लिए किया गया . तब किसी ने शायद ही इसकी व्यापक भावी संभावनाओं का आकलन किया होगा . लेकिन समय सदा एक सा नहीं रहता और मानवीय स्वभाव है कि वह अपनी रचनात्मकता के बल पर आगे बढ़ता रहता है . इस क्षेत्र में अचानक रचनात्मक मोड़ तब आया जब मार्च 1989  में सर्न के वैज्ञानिक टिम बर्नर्स ली ' के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने वर्ल्ड वाइड वेब www खोज की जो इन्फोर्मेशन का मूल आधार बना . इसके बाद ब्रोडबेंड , आप्टिकल फाइबर , टेलीफोन तथा उपग्रह संचार प्रणाली ने सूचनाओं को और अधिक तेजी से प्रेषित करना शुरू कर दिया . आगे चलकर इस प्रगति को सूचना क्रांति का नाम दिया गया . 
सूचना क्रांति का यह दौर आगे बढ़ता रहा और हम प्रगति करते गए . लेकिन समय के साथ - साथ इसमें भी उलझने और परेशानियां आने लगी . जिनमें से एक परेशानी जिससे संभवतः हर किसी को कम्प्यूटर पर कम करते वक़्त झेलनी पड़ती है' वह है किसी कम्प्यूटर में वायरस का आ जाना . पिछले 3 वर्षों के लगातार अनुभव के बाद कह सकता हूँ कि वायरस की जानकारी सामान्य तौर पर हमें नहीं हो पाती लेकिन वह धीमे से हमारे सिस्टम को प्रभावित करता है और कभी तो नौबत यहाँ तक आ जाती है कि हमें पूरे सिस्टम को फार्मेट करना पड़ता है . तब ही कहीं समस्या का समाधान हो पाता है . लेकिन इस प्रक्रिया में हमारे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और प्रोग्राम भी काल का ग्रास बन जाते हैं  . कम्प्यूटर पर काम करते वक़्त और इंटरनेट का उपयोग करते हुए कुछ सावधानियां अगर हम बरतें तो काफी हद तक निजात पाई जा सकती है . आइये कुछ बिन्दुओं पर गौर करते हैं :- 

  • जब हम कम्प्यूटर पर काम कर रहे हैं तो हमेशा ही यह ध्यान रखें कि कम्प्यूटर में स्थापित मेमोरी 640 किलोवाइट से कम तो नहीं हो गयी है . यह भी हो सकता है कि हमें अपने सिस्टम की सक्रीन पर कोई अनचाहा सन्देश प्राप्त हो रहा हो ' या यह भी हो सकता है कि कोई फ़ाइल या प्रोग्राम अस्वाभाविक रूप से घट या बढ़ रहा हो या फिर हमारा कम्प्यूटर हार्ड डिस्क से बूट प्रोग्राम पढ़कर भी आरम्भ  नहीं हो रहा है, तो हमें समझ लेना चाहिए की वायरस का अटैक हमारे कम्प्यूटर में हो चुका है  . 
  • इससे पहले कि हमें ऐसी परेशानी से दो - चार होना पड़े , हम अपने सिस्टम में हमेशा एक अच्छे एंटी वायरस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करें . एंटी वायरस सॉफ्टवेयर ख़ासतौर पर कम्प्यूटर को वायरस से बचाने के लिए तैयार किये जाते हैं . यह वायरस हमले से कम्प्यूटर को बचाते हैं , वायरस को फैलने से रोकते हैं और उन्हें हटाते भी हैं . अगर हम प्रतिदिन इंटरनेट पर कम करते हैं तो हमें एंटी वायरस सॉफ्टवेयर को जरुर अपडेट करना चाहिए , हालाँकि अब उपलब्ध होने वाले लगभग सभी एंटी वायरस सॉफ्टवेयर स्वतः ही उपडेट हो जाते हैं , लेकिन फिर भी इस मामले में सावधानी बरती जा सकती है . 
  • एंटी वायरस सॉफ्टवेयर किन्हीं ख़ास तरह के कोड्स को ध्यान में रखकर तैयार किये जाते हैं . जैसे ही कोई फ़ाइल इन कोड्स से मिलती जुलती है तो यह प्रोग्राम उन्हें ब्लॉक कर देता है, तथा हमें यह बताता है कि हमारे सिस्टम में वायरस है . 
  • ई-मेल , पेन ड्राइव या सीडी से डाटा लेते वक़्त , या फिर इंटरनेट से कोई फ़ाइल डाउनलोड करते वक़्त सावधानी से काम लें तो बेहतर है . ऐसा करते समय अगर हम इन्हें एंटी वायरस से स्केन करके ही प्रयोग करें तो असुविधा से बचा जा सकता है .  
  • अगर हमारे सिस्टम में वायरस आ गया है तो पूरे सिस्टम को एंटी वायरस सॉफ्टवेयर से स्केन करना चाहिए . जिससे वायरस मिल जायेगा और उसके मिलते ही तुरंत उसे हटाया जा सकता है . 
  • ऐसे पेन ड्राइव, सीडी या डीवीडी का उपयोग न किया जाए जो किसी वायरस ग्रस्त कम्प्यूटर में चलें हों . अगर इस बात का अंदाजा बाद में भी लगता है तो सिस्टम को स्केन किया जा सकता है और नेटवर्क पर मौजूद लोगों को सूचित करके उन्हें इस असावधानी से बचाया जा सकता है .  
  • आज बाजार में कई कम्पनियों के अच्छे एंटी वायरस उपलब्ध हैं . अपने सिस्टम के अनुरूप उनका चुनाव किया जा सकता है . जैसे मैक्फे, एवीजी , नार्टन , अवास्त, अवीरा, के -सेवन; पांडा, आदि सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जा सकता है . इन्हें मार्केट से या फिर सीधे इंटरनेट से ख़रीदा जा सकता है . इसके अलावा इनके मुफ्त वर्जन भी उपलब्ध रहते हैं .लेकिन यह निश्चित अवधि तक ही होते हैं और फिर उस अवधि के बाद इन्हें दुबारा से अपडेट करना होता है . लेकीन सुरक्षा के लिहाज से हमें सचेत रहने की आवश्यकता है . 
  • हमें अपने सारे महत्वपूर्ण दस्तावेज तथा प्रोग्रामिंग से जुड़े सॉफ्टवेयर को अलग सीडी या डीवीडी में लोड कर रखना चाहिए . ताकि समय आने पर इनका उपयोग किया जा सके .
ऐसे कई और महत्वपूर्ण बिंदु हो सकते हैं जिनको मध्यनजर रखकर हम अपने सिस्टम को सुरक्षित करके कई तरह की परेशानियों से बच सकते हैं ,और बेहतर ब्लॉगिंग के साथ - साथ कई काम आसानी से कर सकते हैं .

19 मार्च 2012

चरणों में सजाये रखना

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जीवन में प्रार्थना का महत्व किसी से छुपा नहीं है . व्यक्ति जब जिन्दगी की जंग में हार जाता है तो वह अपने ईष्ट से प्रार्थना करता है और अगर हमारी प्रार्थना सच्चे मन से निकली होती है तो फिर स्वाभाविक है कि प्रार्थना पूर्ण हो जाये .....लेकिन भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए जब हम प्रार्थना करते हैं तो हम वास्तविक प्रार्थना से दूर होते जाते हैं ....वास्तविक प्रार्थना है खुदा से खुदा को मांग लेना ....जब खुदा हमारा है और हम खुदा के हैं तो फिर क्या दुःख और कैसी परेशानी ....! आओ ऐसी प्रार्थना करें  ..जिसमें सबका भला हो ..सबकी ख़ुशी हो ....! 

दाता करना कृपा , खुली रखना हमारी निगाहों को 
करते हैं हम भूल , बख्श लेना हमारे गुनाहों को

तेरे दर आये हैं हम , झोली खाली - पसारी 
सेवा-सुमिरन-सत्संग से, तूने किस्मत संवारी  

झुकना सीख जाएं हम , झुकना जिंदगी है 
झुकने में है भला सबका, झुकना तेरी बंदगी है  

मानवता है -मिशन, एकता और भाईचारा
अन्धेरा ना रहे कहीं , चहुँ और हो उजियारा 

भटके थे हम थे भूले, नाता सत्य से था तोड़ दिया 
हमें चरणों में बिठाकर , तूने सत्य से जोड़ दिया    

अरदास है हमारी , हमें अपना बनाये रखना 
'केवल' अपने चरणों की धूल में सजाये रखना 

12 मार्च 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...4

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गतांक से आगे.....रचनाकर्म में स्पष्टता का अपना महत्व है. हम कुछ भी सृजन कर रहे हैं लेकिन जितनी हमारी विषय और विचार के प्रति स्पष्टता होगी उतना ही हमारा सृजन बेहतर होगा. कालजयी सृजन निश्चित रूप से विषय के प्रति स्पष्टता का ही परिणाम होता है . पूर्वाग्रहों और पक्षपातों से भरा सृजन कभी भी कालजयी नहीं हो सकता. ऐसा सृजन थोड़ी देर के लिए चर्चा का विषय तो बन सकता है. लेकिन एक सच्चे और समझदार पाठक के लिए उसके कोई मायने नहीं. कुछ एक प्रतिक्रियाओं के आधार पर हम यह सोच लें कि हमारा सृजन उत्तम है तो यह हमारे लिए भी भ्रम ही होगा. अच्छे चिंतन और बेहतर लेखन के परिणाम तो वर्षों बाद ही प्राप्त होते हैं. इसलिए बेशक हमें आलोचनाओं का सामना करना पड़े लेकिन सृजन के मूल्यों को बरकरार रखने के लिए हमें अगर यह भी सहना पड़े तो कोई हर्ज नहीं

बोधगम्यता : विषय प्रतिपादन में जितना महत्व स्पष्टता का है. उससे कहीं ज्यादा महत्व विषय की बोधगम्यता का है. विषय प्रतिपादन बहुत कठिन कार्य हो सकता है, जब विषय के प्रति सोच स्पष्ट न हो. लेकिन अगर हम किसी तरह विषय प्रतिपादन में सफल हो जाते हैं तो सबसे बड़ा मुद्दा उसकी बोधगम्यता का बना रहता है. हमारी दृष्टि विषय के प्रति मौलिक भी है, जानकारी भी हमें पूरी है और हम उस विषय के प्रति पूरी तरह से स्पष्ट भी हैं. लेकिन हमने उसे इस तरह से प्रस्तुत किया है कि वह समझ से बाहर की वस्तु बना रहता है तो हमारे अच्छे तर्कों और तथ्यों का कोई लाभ पाठक को नहीं होने वाला. पाठक की अपनी समझ और सोच है किसी विषय के प्रति और उसी समझ और सोच के आधार पर वह आपके लेखन का मूल्यांकन करता है. इसलिए यह जरुरी है कि जब हम किसी विषय को अभिव्यक्ति का माध्यम बनायें तो उसके प्रत्येक पहलू पर गहराई से चिंतन करें. जब तक हम विषय की बोधगम्यता पर ध्यान नहीं दे पायेंगे तो अच्छे से अच्छे तर्क और तथ्य भी समझ के स्तर पर टेढ़ी खीर बने रहेंगे. कई बार यह देखने में आता है कि रचनाकार ने बहुत अच्छे विषय का चुनाव किया है, लेकिन उसकी विषय प्रतिपादन शैली इतनी असमंजस भरी होती है कि सब कुछ पढने के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता. हालाँकि पाठक उस विषय में जानना चाहता है, लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी वह समझ नहीं पाता कि क्या कहा गया है. हालाँकि तथ्य और तर्क वहां पर पूरी तरह से अभिव्यक्त किए गए होते हैं. मेरा अपना निजी अनुभव है कि कई अच्छे रचनाकारों की पुस्तकों को सिर्फ और सिर्फ बोधगम्यता की कमी के कारण ही नहीं पढ़ा गया. हालाँकि यह हो सकता है कि मेरे लिए जो कुछ कठिन रहा हो वह किसी के लिए सरल भी तो हो सकता है. लेकिन विषय को ग्राह्य बनाने में विषय की बोधगम्यता निश्चित रूप से महती भूमिका निभाती है और बोधगम्य विषय अपेक्षा से अधिक लाभ पाठक को दे जाता है.

विषय अनुकूल भाषा : भाषा भावों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है. भाव अव्यक्त रह जाता अगर भाषा नहीं होती. हालाँकि बहुत से माध्यम हैं भावों को अभिव्यक्त करने के, लेकिन भाषा से सशक्त माध्यम कोई नहीं हो सकता. मानव ने जितना भी विकास किया है उसमें भाषा की महता को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. विकास के हर एक मानक में भाषा की महता बहुत महत्वपूर्ण है. यह भी सच है कि आज भाषा ने विषय के अनुकूल अपना विकास किया है . हर विषय की अपनी शब्दावली है और उसी शब्दाबली के आधार पर उस विषय ने भी नए आयाम स्थापित किए हैं. विषय के प्रतिपादन में भाषा महती भूमिका निभाती है. जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जिसे भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता. अनुभूति को अभिव्यक्त करना, दृश्य को अभिव्यक्त करना, सोच को अभिव्यक्त करना, समझ को अभिव्यक्त करना, भाषा के ना जाने कितने आयाम है अभिव्यक्ति के स्तर पर, और इन सभी आयामों ने भाषा को बहुत व्यापक विस्तार दिया है. जितनी-जितनी हमारी आवश्यकता और समझ बढ़ी भाषा ने उसी अनुरूप अपना विकास किया और यह निरंतर विकास की राह पर अग्रसर है. 

विश्व की प्रत्येक भाषा का मंतव्य तो स्वस्थ संवाद के माध्यम से जीवन को आनंदमय बनाना रहा है,
सभ्यता-संस्कृति का विकास करना रहा है और इन मंतव्यों को पूरा करने में हर भाषा सक्षम भी है. लेखन के स्तर पर जब हम भाषा की बात करते हैं तो इसका प्रयोग करना और भी सजगता का विषय बन जाता है. क्योँकि हम जो कुछ भी अनुभूत करते हैं वह अभिव्यक्त तो भाषा के माध्यम से ही होता है. भाषा के दृष्टिकोण से अगर हिंदी ब्लॉगिंग की बात करें तो यहाँ एक नयी शब्दावली का विकास होता नजर आ रहा है. लेकिन अभी तक इसको अंतिम स्वरूप मान लिया जाये यह कहना तर्कसंगत नहीं लगता. या कोई यह कह दे कि हिंदी ब्लॉगिंग अपनी शब्दावली में भावों को अभिव्यक्ति देती है तो यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी. हालाँकि इस दिशा में सम्भावना देखी जा सकती है, लेकिन भाषा का विकास या शब्दों का निर्माण करना कोई आसान प्रक्रिया नहीं है, यह एक विज्ञान है और विज्ञान हमेशा तर्क और तथ्य के आधार पर  कार्य करता हुआ किसी निष्कर्ष तक पहुँचता है. लेकिन भाषा, विज्ञान से भी आगे की चीज है, विज्ञान से भी दो कदम आगे का आविष्कार है, इस कथन के पीछे मेरी यह मान्यता है कि भाषा अक्षरों से बनती बेशक है लेकिन उन अक्षरों के निर्माण और संयोजन से जो शब्द बनते हैं उनमें भाव और अनुभूति भी समाहित होती है. हिंदी भाषा में ऐसे अनेकों शब्द हैं जहाँ पर यह तथ्य पूरी तरह से उभरकर सामने आता है कि जब हम किसी भाव को अभिव्यक्त करना चाह रहे हैं और हमने शब्द का उच्चारण कर दिया तो एक बिम्ब स्वतः ही उभर आता है जो कि भाषा के वैज्ञानिक पक्ष को उभार कर सामने लाता है. इसलिए किसी भी विषय को अभिव्यक्ति देते समय भाषा और शब्दों का चयन बहुत चुनौती भरा कार्य होता है . लेकिन जब हमें विषय पूरी तरह से स्पष्ट है तो फिर भाषा कोई चुनौती नहीं. जैसे कबीर द्वारा अपने उपदेशों के लिए प्रयुक्त की गयी भाषा के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है  कबीर वाणी के डिक्टेटर थे, भाषा पर उनका जबरदस्त अधिकार था’ निश्चित रूप से कबीर ने अपने विषय को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भाषा को सशक्त माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया. लेकिन ब्लॉगिंग में कई बार टिप्पणी या पोस्ट में अभद्र शब्दों का प्रयोग अखरता है, और जब कहीं भी ऐसा कुछ देखता हूँ तो उस व्यक्ति की भाषा के प्रति नासमझी पर दया का भाव पैदा हो जाता है.  

शैली की रोचकता : भाषा अगर भावों को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है तो शैली उन भावों को रोचकता से पाठकों तक पहुंचाने का माध्यम है. हालाँकि सामान्य तौर पर पाठक शैली पर ध्यान नहीं देते. लेकिन जैसे ही हम रचनाकार की शैली को पहचान जाते हैं तो उस रचनाकार को समझना हमारे लिए आसान होता है. भारतीय काव्यशास्त्र में शैली पर व्यापक चर्चा की गयी है और पाश्चात्य समीक्षा जगत में तो यह कहा जाता है कि ‘शैली ही व्यक्तित्व है’ यानि शैली के माध्यम से ही रचनाकार के विचार पाठक तक पहुंचते हैं और पाठक उन विचारों को शैली के माध्यम से ही समझने का प्रयास करता है. शैलियाँ के भी कई प्रकार हैं. जैसे वर्णात्मक, विवरणात्मक, विश्लेषणात्मक, आत्मकथात्मक आदि और इसी तरह निबंध में समास शैली, व्यास शैली, धारा प्रवाह शैली और तरंग आदि शैलियाँ  प्रयोग की जाती हैं. कविता का तो अपना एक अलग से शास्त्र है ही जहाँ पर कविता के सभी पक्षों पर विचार किया गया है. रस, अलंकार, रीतिध्वनि आदि पर बहुत व्यापक रूप से विचार किया गया है, और यह विचार रचना की शैली के रूप को समृद्ध करने के लिए किया गया है. हालाँकि भावों को किसी नियम या सीमा में बांधना मुश्किल होता है लेकिन फिर भी अगर हम ऐसा प्रयास नहीं करेंगे तो सब कुछ बिखर जाएगा. ब्लॉगिंग में शैली का एक अपना महत्व है. हालाँकि यहाँ सब कुछ साहित्य के सिद्धांतों के अनुरूप रचा जा रहा है. इसलिए हर कोई ब्लॉगर होने के बजाये लेखक होने का भ्रम पाले है. लेकिन एक बात ध्यान देने वाली है. 

लेखन और ब्लॉगिंग के सृजन में व्यापक अंतर है. ब्लॉगर अपने आप में सृजन से लेकर प्रकाशन और विज्ञापन तक एक संस्था है. लेकिन लेखक के साथ ऐसा नहीं है. इसलिए निश्चित रूप से हमें ब्लॉगिंग और साहित्य सृजन के सम्बन्ध में ध्यान देना होगा. अगर हम इस अंतर को समझ जाते हैं तो निश्चित  रूप से किसी भी पोस्ट को शैली के स्तर पर रोचक बनाने का प्रयास कर सकते हैं. ब्लॉगिंग में ब्लॉगर किसी भी विषय को त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में अभिव्यक्त कर सकता है, लेकिन लेखन का अपना स्तर है. यहाँ पाठक की प्रतिक्रिया तुरंत मिलती है और दूसरी तरफ साहित्य में ऐसा नहीं है. ब्लॉगिंग में हर कोई टिप्पणी करने की लालसा रखता है, लेकिन साहित्य में ऐसा प्रयास कोई-कोई ही करता है, और वहां की गयी समीक्षा निश्चित  रूप से बहुत उतरदायी भरा कार्य होता है. शैली की रोचकता निश्चित रूप से लेखक के व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करती है और ब्लॉगिंग में ब्लॉगर की अंतरात्मा उसकी पोस्ट के माध्यम से अभिव्यक्त होती है. ब्लॉगिंग का स्वभाव ही है स्पष्ट, त्वरित और उन्मुक्त अभिव्यक्ति और निश्चित रूप से इस आधार पर देखें तो ब्लॉगिंग की शैली भिन्न होनी ही स्वाभाविक है. 

ब्लॉगिंग का अद्भुत संसार विविधताओं भरा है. किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं. मैंने एक छोटा सा प्रयास किया अपनी समझ के आधार पर...आपकी सकारात्मक टिप्पणियाँ और प्रोत्साहन इस दिशा में और गंभीरता से सोचने को प्रेरित करेगा...!

04 मार्च 2012

सार्थक ब्लॉगिंग की ओर...3

19 टिप्‍पणियां:
गतांक से आगे.....जीवन का मंतव्य जब कला की साधना बन जाता है तो फिर जीवन उस कला में रम जाता है. फिर कला ही जीवन बन जाता है और ऐसा सर्जक निश्चित रूप से कला को नया आयाम देते हुए जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर देता है. ब्लॉगिंग की जहाँ तक बात है यह तकनीक और कला का अद्भुत संगम है. आपके पास सृजन के इतने आयाम हैं कि आप किसी भी विषय को किसी भी तरह से लोगों तक पहुंचा सकते हैं, बेशर्त कि आप रोचकता और संजीदगी से सृजन को प्राथमिकता देते हों. अगर आप सृजन की प्राथमिकता और महता को समझते हैं तो आपके लिए ब्लॉगिंग रोचक और गंभीर होने के साथ-साथ जिम्मेवारी भरा कार्य हो सकता है. अगर ब्लॉगिंग के प्रति ऐसा दृष्टिकोण है तो निसंदेह आप आने वाली पीढ़ियों के लिए नए आयाम स्थापित कर रहे हैं, और सृजन को एक नया क्षितिज प्रदान कर रहे हैं.

मौलिकता : आपने अपने सृजन की प्राथमिकता को तय कर लिया. आप किसी भी विषय पर गहन चिंतन के
लिए तैयार हैं तो आपके समक्ष मौलिकता एक बड़ा प्रश्न हो सकता है. मौलिकता से अभिप्राय विषय के प्रति आपका दृष्टिकोण है, आपकी उस विषय के प्रति दृष्टि है. यूं तो हर विषय पर वर्षों से बहुत कुछ लिखा जाता रहा है और हो सकता है कि आपके समय में भी ऐसे विषयों पर बहुत कुछ लिखा जा रहा हो, लेकिन हर विषय में नवीनता और मौलिकता की सम्भावना सदा से छिपी रहती है. किसी भी विषय के अनेकों आयाम हो सकते हैं, हम किस आयाम पर केन्द्रित होकर विचार करते हैं यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है. एक ही विषय पर दो अलग-अलग विशेषज्ञ अपनी अलग - अलग मान्यताएं रख सकते हैं. यह मान्यातएं उनके चिंतन को हमारे सामने लाती हैं और यही मान्यताएं आगे चलकर उस विषय की नवीनता और मौलिकता को बनाये रखती हैं. ब्लॉगिंग की जो प्रकृति है यहाँ कोई भी विषय, अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकता है. इसकी प्रकृति को समझते हुए हम उस विषय को किस तरह और कितने मौलिक तरीके से सांझा करते हैं यह हम पर निर्भर करता है. जितना मौलिक चिंतन करते हुए हम किसी विषय को सांझा करते हैं निश्चित रूप से वह विषय अपन प्रभाव छोड़ने में सक्षम होता है, और उसी विषय का प्रस्तुतीकरण  हमारे चिंतन और दर्शन को पाठकों तक पहुंचाने में कारगर सिद्ध होता है. मौलिकता विषय को नयी जान देती है और नए आयाम देती है. अगर हम किसी शुष्क विषय पर भी लिख रहे हैं तो हमारी मौलिक सोच और प्रस्तुतीकरण उस विषय को ग्राह्य और पठन के योग्य बनाता है. अनुभव के आधार  पर कह सकता हूँ कि ब्लॉगिंग में विषय को मौलिकता प्रदान करने की अनेकों संभावनाएं हैं और उन संभावनाओं का बेहतर उपयोग इस विधा को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.  

सम्बंधित विषय की पूर्ण जानकारी : यूं तो जब कोई किसी सृजन की तरफ अग्रसर होता है तो उसकी अपनी मानसिकता होती है, प्रारंभ में हो सकता है कि सृजन की तरफ आकृष्ट होना एक शौक हो, लेकिन जब हम उस विधा में रम जाते हैं तो यह हमारा स्वभाव बन जाता है और किसी चीज का स्वभाव होना उसकी गहराई और महता को समझते हुए उसका हो जाना है. यह मानवीय स्वभाव है कि जब वह अपने भावानुकूल विषय की तरफ बढ़ता है तो उसे आनंद आने लगता है और वही आनंद हमारी निरंतरता को बनाये रखता है. किसी विधा की तरफ बढ़ने से पहले उसकी जानकारी होना आवश्यक है और जब हम जानकारी के साथ आगे बढ़ते हैं तो परिपक्वता की तरफ अग्रसर होते हैं. जैसे अगर हम कविता लिखना चाहते हैं तो हमें यह जानकारी तो होनी ही चाहिए कि छंद क्या है? अलंकार क्या है? प्रतीक क्या होता है? बिम्ब किसे कहते हैं? आदि-आदि. साहित्य की विधाओं का अपना एक शास्त्र है इसी तरह ग़ज़ल, कहानी, निबंध आदि विधाओं के विषय में बात की जा सकती है. हालाँकि ब्लॉगिंग एक ऐसा मंच है जहाँ साहित्य, कला, इतिहास, रंगमंच, संगीत, संस्कृति, समाज आदि ना जाने कितने आयाम हैं जिनमें निरंतर बेहतर अभिव्यक्ति हो रही है और काफी हद तक संतोषजनक भी. लेकिन फिर भी हर आयाम का अपना एक शास्त्र है, अपने नियम हैं और अगर हमें उन नियमों की जानकारी है तो हम बेहतर तरीके से आगे बढ़ सकते हैं. सम्बन्धित विषय की पूर्ण जानकारी होना नितांत आवश्यक है जिस विषय पर आप लिख रहे हैं. वर्ना अधूरी जानकारी ना तो आपने लिए उपयोगी होती है और ना किसी और के लिए. अगर हम पूरी जानकारी के साथ किसी विषय को पाठकों के साथ सांझा करते हैं तो निश्चित रूप से पाठक लाभान्वित होते हैं और आपके प्रति सम्मान के भाव उनके हृदय में पैदा होते हैं और आपसे बहुत कुछ सीखने की ललक उनमें बनी रहती है, और जब हमारा पाठक हमसे लाभान्वित हो रहा है तो हमारे श्रम का लाभ उसे मिल रहा है. ब्लॉगिंग की कोई सीमा नहीं आपके किसी पोस्ट को कौन सा पाठक पढ़ रहा है यह तय कर पाना कठिन है, अलग-अलग पाठक के लिए आपकी पोस्ट अपना महत्व रखती है. एक सामान्य पाठक के लिए वह जानकारी नवीन हो सकती है जिसे आप ब्लॉग पर पोस्ट के माध्यम से सांझा कर रहे हैं और वहीँ पर दूसरा पाठक उस विषय में अपनी जानकारी को और बढ़ाना चाहता हो और एक ऐसा भी पाठक है जो सब कुछ जानता है वह विश्लेषण, मौलिकता और प्रस्तुतीकरण  के लिए आपकी पोस्ट पढ़ रहा हो. जिस तरह लेखन के कई आयाम हो सकते हैं उसी से पठन के भी कई आयाम होते हैं, हर पाठक का अपना नजरिया होता है और एक लेखक को उन सब बातों के मध्यनजर अपने आपको प्रस्तुत करना होता है, लेकिन यह सब तभी संभव हो पाता है जब हम विषय को पूरी तरह से समझते हैं और उस समझ को सभी के साथ सांझा करना चाहते हैं. 

स्पष्टता : विचारों को अभिव्यक्त करना किसी हद तक कठिन नहीं है. लेकिन विचारों को स्पष्टता से अभिव्यक्ति करना यह एक कठिन कार्य है. हम किसी विषय पर लिख रहे हैं हमारे मन में विचारों का प्रबल प्रवाह बना हुआ है और हम एकाग्र होकर मन में आने वाले विचारों को अभिव्यक्त किये जा रहे हैं. लेकिन जब किसी विषय पर अपने विचारों को पूर्ण रूप से लिख लेने के बाद जब उसे पुनः पढ़ा जाता है तो बहुत सी खामियां नजर आ  सकती हैं जिन्हें हम दूर कर सकते हैं. विचार जब आ रहे हैं आने दिए जा सकते हैं लेकिन जब विषय को साँझा कर रहे हैं तो एक बार उन विचारों की महता और उनका मूल्यांकन करना जरुरी हो जाता है. जब हम तथ्यपूर्ण विषय जैसे इतिहास आदि पर लिख रहे हों तो और भी सजग रहने की आवश्यकता होती है, क्योँकि यहाँ हमें तथ्य को सही ढंग से प्रस्तुत करना है और तथ्य को प्रस्तुत करने के लिए हमें तर्क की आवश्यकता होती है, राजनीति जैसे विषयों पर लिखने के लिए हमें सापेक्ष दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है और सच को सच की तरह प्रस्तुत करना टेढ़ी खीर हो सकता है. लेकिन ब्लॉगिंग जिसे हम अभिव्यक्ति की नयी क्रांति कहते हैं उसके स्वभाव के अनुकूल अगर हम काम करते हैं तो निश्चित रूप से हम इसकी स्वायतता को बरकरार रख पायेंगे और विचारों की स्पष्टता इसके स्वभाव को और ज्यादा प्रभावी बनाएगी. विचारों की स्पष्टता के कारण लेखन में एक अजीब आकर्षण पैदा होता है और वही आकर्षण पाठक को बार-बार उस विषय को पढने को मजबूर करता है. धर्म जैसे विषय पर लिखने के लिए हमें तार्किकता नहीं बल्कि अनुभवजन्य समझ की जरूरत होती ही और अध्यात्म और दर्शन जैसे विषयों पर लिखने के लिए खुद अगर हम उस राह से गुजरे हैं तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं. कहने का अभिप्राय यह कि जैसा विषय हमारे पास है वैसे ही हम विचारों को अभिव्यक्त करें तो बेहतर होता है. विषय के प्रति समझ से ही, विषय के प्रति दृष्टिकोण बनता है और यह दृष्टिकोण जितना सकारत्मक होगा उतनी ही लेखन की सार्थकता होगी. लेकिन यह सार्थकता तभी बनी रहेगी जब हम तथ्यों के प्रति ईमानदार बने रहकर अपने विषय का प्रतिपादन करेंगे. शेष अगले अंक में....!!!