26 सितंबर 2011

हमारी मानसिकता और अनशन की प्रासंगिकता .. 3 ..

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पिछले अंक से आगे ......!            पहला और दूसरा अंक यहाँ देखें
पिछले दो अंकों में मैंने भ्रष्टाचार के विभिन्न पहलुओं  पर विचार किया , तथा यह प्रश्न मेरे मन में उभर कर आया कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए जो तरीके अपनाये जा रहे हैं, क्या सच में वह कारगर हैं ? लेकिन मैंने यही पाया कि फिलहाल तो ऐसा कोई तरीका नजर नहीं आ रहा है जिससे भ्रष्टाचार को समाप्त करने में सहायता मिल सके , और अभी तक कोई ऐसा तरीका ईजाद हुआ हो यह भी नजर नहीं आ रहा है , लेकिन फिर भी मैंने यह कहा था कि इंसान को आशा का दामन  नहीं छोड़ना नहीं चाहिए . हमें अपनी कार्यप्रणाली में परिवर्तन करने चाहिए और जब तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आता तब तक डटे रहना चाहिए . लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि ऐसी दृढ़ता अभी तक किसी भी आन्दोलनकारी में नजर नहीं आ रही है . 10-15 दिन खूब हो हल्ला होता है और फिर सब ठंडे बस्ते  में चला जाता है , और अगर यही कुछ होता रहा तो यह कहना चाहिए कि हम क्या करना चाहते हैं, और क्या कर रहे हैं , क्या होना चाहिए और क्या नहीं, इस विषय में हम स्पष्ट नहीं हैं . सबसे पहले तो यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि कोई लक्ष्य निर्धारित करना तो आसान है लेकिन उसे अंजाम तक पहुचाना उतना ही कठिन .जब हमारा लक्ष्य अंजाम तक पहुच जाता है तो स्वतः ही हमें उसके परिणाम नजर आने लगते हैं . बस एक आवश्यकता है सही कदम बढ़ाने की अगर सही दिशा और सही तरीके से कदम बढाए जाएँ तो कुछ भी असंभव नहीं .

अब बात मुद्दे की वर्ष 2011 को भ्रष्टाचार विरोधी वर्ष कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. इस वर्ष दो भिन्न -भिन्न क्षेत्रों के महारत हासिल व्यक्तियों ने  "अनशन"   किया भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए . लाखों की संख्या में हमारे देशवासियों ने भी इन दो महानुभावों का समर्थन किया . लेकिन दोनों की कार्यप्रणाली और विचार भिन्न रहे . हालाँकि मुद्दा तो एक ही था . लेकिन एक ही मुद्दे पर विचार भिन्न -भिन्न थे . और हो भी क्योँ ना... एक का सम्बन्ध योग जैसी परम्परागत और उच्च विद्या से है तो दुसरे महानुभाव को सामाजिक कार्यकर्ता  के रूप में ख्याति हासिल है . एक को लोकपाल बिल चाहिए तो दूसरे ने सीधे ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध "सत्याग्रह" का आह्वान कर दिया . लेकिन तरीका "अनशन" का ही अपनाया . एक का अनशन तुडवाने के लिए सरकार आगे आई और दुसरे का अनशन तुडवाने के लिए आध्यात्मिक जगत के महानुभावों ने प्रयास किया . कुल मिलाकर अगर स्थितियों का आकलन किया जाए तो बहुत कुछ विरोधाभासी लक्षण हमारे सामने आते हैं और बहुत सारी  स्थितियों से आप सभी अवगत भी हैं . चलिए अब बात करते हैं "अनशन" की , कि आखिर अनशन क्योँ किया जाए ? अनशन के क्या लाभ हैं ? और क्या हासिल हुआ है आज तक अनशन से जिसने भी अनशन किया है

पहले "अनशन" शब्द को देखते हैं . "अनशन" शब्द का हिंदी में अगर अर्थ देखा जाये तो वह अर्थ निकलता है : "अन्न का त्याग करना या निराहार होना" , लेकिन वयुत्पति के आधार पर इस शब्द को निरुक्त में देखते हैं तो वहां यह इस तरह मिलता है . "अशनम्" अर्थात 'खाना निगलना' इसके साथ अगर "न" समास का प्रयोग किया जाए तो यह "अनशनम् " बनेगा और यहाँ इस शब्द का अर्थ रहता है अन्न को ग्रहण करना  , लेकिन अगर अन्न का त्याग करने के लिए किसी शब्द का प्रयोग सही तौर पर किया जाए तो वह है "अन्नानशम" जिसका अर्थ हुआ अन्न को ग्रहण ना करना . तो अनशन शब्द पहले तो अपने आप में मूल अस्मिता से हटा हुआ शब्द है लेकिन हिंदी में इसका प्रयोग "अनशन" ही किया जाता है और यह आज प्रचलन में भी है . खैर कभी - कभी तो यह भी कहा जाता है कि शब्द को नहीं उसकी भावना को देखना चाहिए . चलिए अब देखते हैं इस शब्द के मूल में निहित भाव को . "अनशन" एक तरह की तपस्या है , अन्न का त्याग करना एक तरह की साधना है और उस कार्य की सिद्धि 'अनशन' का प्रतिफल है . अब देखें अनशन का तरीका कोई भी हो अन्न का त्याग करना या फिर खुद का त्याग करना . जब हममें किसी चीज को पाने की उत्कट इच्छा पैदा हो जाती है तो तब हम कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए की इच्छा बड़ी या उद्देश्य . इच्छा का सम्बन्ध व्यक्ति से है तो उद्देश्य का सम्बन्ध सामाजिक हित से है . इच्छा में व्यष्टि भाव है तो, उद्देश्य में समष्टि भाव .

हमारे देश में अनशन करने की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है . लेकिन उसका तरीका अलग अलग रहा है . रावण ने भी तो अनशन ही किया था और सोने की लंका प्राप्त कर ली , हिरणकश्यप द्वारा किये गए कार्य को हम क्या अनशन की कोटि में नहीं रखेंगे , अगर अनशन  इच्छा या उदेश्य पूर्ति का साधन है तो फिर हमें इन कार्यों को इसी कोटि में रखना चाहिए . लेकिन ऐसा नहीं है . रावण और हिरणकश्यप द्वारा किये गए कार्य व्यक्तिगत इच्छा पर आधारित थे , उस तपस्या में उनका व्यक्तिगत स्वार्थ छिपा था और उस स्वार्थ की सिद्धि के लिए वह जप तप करते रहे अंततः उनके हाथ क्या लगा यह कहने की बात नहीं है . इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन में एक नाम सबसे उभर कर सामने आया वह आया "महात्मा गाँधी जी" का और अन्ना जी को दुसरे गाँधी की संज्ञा से भी अभिहित किया गया . लेकिन यह बात भी दीगर है कि "अन्ना" जी और "गाँधी" जी दो अलग -अलग  बिन्दुओं की तरह हैं ,जो कभी एक दुसरे से नहीं मिल सकते . अन्ना जी के समय की परिस्थितियाँ अलग है , और गाँधी जी के समय की परिस्थितियां अलग . एक अपनी व्यवस्था  से लड़ रहा है तो दुसरे ने  विदेशी हुकूमत से लडाई लड़ी है . एक को आजादी के लिए याद किया जाता है तो दुसरे को ??? किस लिए याद किया जाएगा . लेकिन जो भी व्यवस्था से लड़ने का जो माहौल इस वर्ष बना इसके लिए अन्ना जी और बाबा रामदेव जी बधाई के पात्र  हैं और यह बात भी हमें नहीं भूलनी चाहिए कि इन दोनों आंदोलनों में आम जनता की भूमिका भी कम नहीं है ....!
बाकी फिर कभी ....फिलहाल इस विषय को विराम देते हैं ...आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाओं के लिए आपका धन्यवाद ....! एक तो समय का अभाव और दूसरा लेपटॉप ख़राब ....! सब चुका रहे हैं अनशन पर लिखने का हिसाब ....!.

15 सितंबर 2011

हमारी मानसिकता और अनशन की प्रासंगिकता...2

45 टिप्‍पणियां:
गत अंक से आगे...भ्रष्टाचार की लीला भी अजीब है. यह कभी मेज के नीचे आता है तो कभी मेज के उपरकभी पंच सितारा होटल में किसी उच्च स्तरीय बैठक में पहुँच जाता है तोकभी देश की संसद में प्रश्न पूछने के बहाने पहुँच जाता हैकभी यह नेता के पास जाता है तोकभी बड़े-बड़े प्रशासनिक  अधिकारियों के पासकभी यह चारा खाता है तोकभी तीसरी पीढ़ी के टेलीफ़ोन पर ढेर  सारी बातें करता हैकभी खेल के नाम पर अंधाधुंध धन बहाता है. इसकी खूबियों की क्या चर्चा करूँ और इसकी व्यापकता का अहसास करने के लिए मुझे भी साधना करनी पड़ेगीऔर इसको धारण करने के लिए किसी बड़े भ्रष्टाचारी गुरु के जीवन को जानना होगा. वर्ना इसकी लीला को समझना मेरे वश की बात नहींहाँ यह जरुर है कि यदा-कदा इसके दर्शन मुझे भी होते रहे हैंऔर यह जरुर है कि इसने अपनी लीला का आभास करवाया है.
लेकिन मैंने काफी हद तक उस लीला को नजरअंदाज भी किया है. यह भी एक विडंबना देखिये पिछले 10-15 सालों से में देख रहा हूँ कि हमारे देश या राज्यों की राजनितिक पार्टियाँ अपने चुनावी घोषणा पत्र में सत्ता में आने पर भ्रष्टाचार को समाप्त करने की बात करती रहीं हैलेकिन जैसे ही उन्हें सत्ता मिलती हैकानून व्यवस्था जैसे ही उनके हाथ में आती है वैसे ही भ्रष्टाचार के रंग में वह रंगना शुरू हो जाते हैंऔर फिर ऐसे लगता है कि यह भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए नहीं बल्कि उसे सरंक्षण देने के लिए सत्ता में आये होंसरंक्षण ही नहीं उसे बढाने के लिए भीमैंने देखा है कि जब कोई व्यक्ति राजनीति में आता है तो वह 5 वर्षों के शासन में एक अच्छा सा घरगाड़ी और भी बहुत सी सुविधाओं  का मालिक बन जाता हैजनता की सेवा तो कहाँजनता को खुद की सेवक समझता है. उसकी नियत बदल जाती है और अब नियत बदली है तो कर्म का बदलना स्वाभाविक हैऔर ऐसा कोई एक रात में नहीं हुआ इस पम्परा को स्थापित करने में भी बहुत से लोगों ने मेहनत की इस उक्ति को चरितार्थ किया बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा  उन्होंने सोचा काम चाहे हम जैसा भी करें लेकिन नाम होना चाहिए. फिर चाहे कुछ भी हो जाए देश के किसी भी व्यक्ति का हित दाव पर लग जाए कोई फर्क नहीं पड़ताबस यह सिलसिला चल पड़ा और आज यह अपनी चरम सीमा को लाँघ रहा है. जहाँ अमीर ओर अमीर  होता जा रहा है ओर गरीब ओर गरीब होता जा रहा है. एक व्यक्ति दो वक़्त की रोटी के लिए दिन रात मेहनत कर रहा है  फिर भी उसका पेट नहीं भरता है. ऐसी बहुत सी स्थितियां हैं जिनके बारे में सोचकर दिल दहल जाता हैदिमाग चकरा जाता है. लेकिन सबका आलम एक सा ही बना रहता है.
भ्रष्टाचार एक विषाणु की तरह है. दूसरे शब्दों में इसे एड्स कहना चाहिए. प्रारम्भ में व्यक्ति को इसका पता नहीं चल पाता लेकिन जब वह रोगी हो जाता है तो फिर इसका कोई इलाज नहींहमारे देश में  बड़े-बड़े रोगी पाए जाते हैं भ्रष्टाचार के ओर हमारे यहाँ कोई कानून व्यवस्था  ऐसी नहीं कि हम उसे नियन्त्रित कर सकें अगर होती तो फिर यह रोगी आवारा घूम नहीं रहे होते. हाँ अगर इन्हें कहीं किसी तरीके से जेल जाना पड़ता है तो भी अपने साथ उस आदत को ले जाते हैं जहाँ पर जेल के नियमों को ताक पर रख दिया जाता है ओर फिर कुछ दिन बाद यह बाहर. कईयों को तो वह भी नसीब नहीं होता व तो अपना काम इस तरीके से करते हैं कि रोग भी उन्हें होता है ओर उनके इलाज का कोई बंदोबस्त भी नहीं. खैर यह सब होता रहा है इस देश में ओर इसके समाप्त होने की सम्भावना अभी नजर नहीं आती?
लेकिन फिर भी इनसान को आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए और ऐसे प्रयास हर स्तर पर होते रहे हैं कि इन भ्रष्टाचारियों को समाप्त किया जाएएक प्रश्न सबसे पहले उभर कर आता है कि क्या भ्रष्टाचार सिर्फ एक ही तरफ से हो रहा है. हम ज्यादातर अपनी राजनितिक व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं नेताओं को दोषी मानते हैं. यह हो सकता है कि उनका दोष ज्यादा है वह अपना उतरदायित्व पूरी कर्तव्यनिष्ठा से नहीं निभा पाए. लेकिन किसी एक को तो दोषी नहीं माना जा सकता न. अगर हम किसी एक को ही दोषी मान रहे हैं तो हम सही विश्लेषण की अवस्था में नहीं पहुँच पाए हैं. हमें स्थितियों का पूर्वाग्रह रहित होकर विश्लेषण करना होगा और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है. किसी निष्कर्ष पर पहुँचने और उसे क्रियान्वित करने से पहले हमें वास्तविक स्थिति के सभी पहलुओं को जांचना और परखना होगा फिर कोई कार्य प्रारंभ किया जाना चाहिए और अगर हम ऐसा करते हैं तो निश्चित रूप से सफलता हमारे हाथ में होती है. अगले अंक में भी जारी...!!!

07 सितंबर 2011

हमारी मानसिकता और अनशन की प्रासंगिकता ..1 ..

53 टिप्‍पणियां:

भारत माता की जय !! वन्दे मातरम !!! ज़िंदाबाद - मुर्दाबाद !!! आदि नारे किसी भी जुलूस या प्रदर्शन का हिस्सा  होते हैं . आजकल देखता हूँ कि यह नारे आम हो गए हैं . हर गली मोहल्ले में इनकी गूंज सुनाई  देती है . जब हम कोई विरोध या प्रदर्शन करते हैं तो, हम अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने के लिए इन नारों का प्रयोग करते हैं . इनका प्रयोग करना भी चाहिए, आखिर हम स्वतन्त्र देश के नागरिक हैं . एक ऐसे  देश के नागरिक जहाँ का एक- एक वीर जवान विश्व को जीतने की क्षमता रखता है . मानवीय मूल्यों की रक्षा करना उसके जीवन का परम लक्ष्य है . उसने अपने जीवन का लक्ष्य यूँ निर्धारित किया है " अपने लिए जिया तो क्या जिया , है जिन्दगी का मकसद औरों के काम आना " और यही भावना उसे अपने प्राणों तक की आहुति तक देने के लिए प्रेरित करती है . इसी विशेषता के कारण भारत माँ को अपने हर सपूत पर गर्व  है और उसी सपूत ने उसे पूरी दुनिया में अलग पहचान दी है. भारत माता गौरवान्वित हुई है . उसके क़दमों में सारा जहाँ अपना मस्तक झुकाता  है और हर भारतीय अपनी जन्म भूमि का सम्मान  होते देख गर्व से फुले नहीं समाता  .

हमारे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले ज्यादातर व्यक्ति (आज के परिप्रेक्ष्य को छोड़ कर ) अहिंसावादी रहे हैं .उनके लिए मानव जीवन के मायने दूसरों की ख़ुशी के लिए जीना है . सबके हितों के लिए लड़ना है . अपना हित न चाहते हुए , दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना है . महर्षि  दधीचि को तो सभी जानते हैं . देवताओं की रक्षा के लिए अपने शरीर  की हडियाँ तक दान कर दीं, ऐसे और भी व्यक्ति  हैं जिन्होंने  मानव के अधिकारों के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगा दी , और हमारा समाज भी उन सबको  आज तक भुला नहीं पाया है जिन्होंने मानवता के लिए अपने आपको समर्पित किया है . हमारे देश के  ही नहीं बल्कि  विश्व के हर एक प्राणी को एक पथ प्रदर्शक की आवश्यकता होती है . जिस देश और समाज में पथ प्रदर्शक सही और उद्दात व्यक्तित्व का मालिक होता है उस देश में किसी तरह का कोई विरोध उत्पन्न नहीं होता . वहां का जन जीवन सुख और खुशहाली  से भरपूर होता है .
 
भारत को तो विश्व गुरु होने का गौरव प्राप्त है . यहाँ की माटी के हर कण में नैसर्गिक जीवन जीने की प्रेरणा भरी पड़ी है . लेकिन अफ़सोस इतना कुछ होने के बाबजूद भी आज हमारे देश में हाहाकार मचा है . चारों तरफ कुछ बातें नजर आती है जिनके बारे में सोचकर मन दुखी हो जाता है  और वह यह कि व्यवस्था पर अव्यवस्था हावी , सत्य पर झूठ हावी , ईमानदारी  पर बेईमानी हावी , सही पर गलत हावी , धर्म पर अधर्म हावी, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के जितने भी पहलु हैं हर जगह मानवीय मूल्यों का हनन हो रहा है और मानव पतन की तरफ तेजी से अग्रसर है . भौतिक चकाचौंध में वह इतना रम गया है कि उसे अपने मानव होने का अहसास भी नहीं रहा है , जीवन का कोई अंत भी है यह बात भी वह भूल चूका है . उसके जहन में बस एक ही बात है और वह है कि ज्यादा से ज्यादा भौतिक साधनों  का एकत्रण और उन भौतिक साधनों के एकत्रण में वह जीवन का सुख ढूंढ़ रहा है , उसे  आवश्यकता और इच्छा में अंतर नजर नहीं आ रहा है , आवश्यकता की पूर्ति करना सही प्रतीत होता है और हमारी आवश्यकता जब पूरी हो जाती है तब हम संतुष्ट हो जाते हैं लेकिन इच्छा के साथ ऐसा नहीं है . एक इच्छा पूरी हो जाती है तो दूसरी पनप पड़ती है , जब दूसरी पूरी हो जाती है तो फिर कई  इच्छाएं हमारे जहन में उभर कर आती है , फिर हम पूरा जीवन उन इच्छाओं की पूर्ति  के लिए लगाते हैं . आज का मानव यही कुछ कर रहा है . हमारे देश में ही नहीं बल्कि यह हर देश में हो रहा है . सूचना तकनीक के इस दौर में आज इंसान की भागदौड किसी एक दायरे में न बंधकर पूरी दुनिया में फैली है .  वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हर तरह के साधन अपना रहा है . जिनमें व्यवस्था  का हनन भी एक साधन है . वह अपनी व्यवस्था को दरकिनार कर अपना हित साधने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार  है . दुसरे शब्दों में हम उसे भ्रष्टाचार कहते हैं .
"भ्रष्टाचार"   शब्द को जब गहराई सोचता हूँ तो पाता हूँ कि यह शब्द अपने क्षेत्र में बहुत व्यापक अर्थ लिए है , और इसका दायरा भी बहुत बड़ा है . जैसे "सदाचार"   शब्द किसी व्यक्ति के पूरे जीवन और नैतिकता को अभिव्यक्त करने के लिए काफी है वैसे ही भ्रष्टाचार शब्द किसी व्यक्ति के अनैतिक होने परिचय देने के  लिए काफी है . एक ही शब्द से व्यक्ति का पूरा जीवन अभिव्यक्त होता है यह तो मानना ही पड़ेगा कि शब्द अपने अर्थ को पूरी तरह से प्रमाणित भी करता है . आज हर तरफ देखता हूँ कि सभी लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहे हैं . कोई भाषण बाजी कर रहा है , तो कोई मीडिया को अपना वयान दे रहा है . कहीं पर जुलुस निकला जा रहा है तो कहीं पर प्रदर्शन किया जा रहा है . कोई जेल जाने की तैयारी में है तो किसी की भड़ास कम्प्यूटर के कीबोर्ड से आग  उगल रही है , और किसी ने तो निर्वस्त्र होने तक का आह्वान कर दिया .......! फिर पाया वाह भ्रष्टाचार तेरी लीला भी है अपरम्पार .....!
शेष अगले अंक में .......!