18 फ़रवरी 2011

एक उम्र कम है

103 टिप्‍पणियां:
इधर 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे (प्यार का दिनमनाया गयाऔर मैं बेखबर होकर सोचता रहा अपनी मस्ती में इन पंक्तियों को:-
एक उम्र भी कम है मोहब्बत के लिए
लोग कहाँ से वक़्त निकालते हैं, नफरत के लिए।
काश उस शायर ने यह लिखा होताएक दिन कम है मोहब्बत के लिएतो हमारे किसी आशिक का वश चलता तो इसे दो दिन या फिर जयादा मेहरवान होकर सात दिन और अगर और सफलता मिलती तो वेलेंटाइन डे की जगह वेलेंटाइन पखवाड़ा मनाया जाता। पर खैर एक दिन भी काफी है...प्यार करने के लिए तो एक क्षण भी बहुत है, और यहाँ तो पूरा एक दिन है, और इससे पहले भी कोई रोज डेचोकलेट डे और भी बहुत से दिन मनाये जाते हैं। कुल मिलाकार सिलसिला चल पड़ता है 7 या 8 फरवरी से और इसका चरम रूप हमें 14 फरवरी को देखने को मिलता है।
पर यह आश्चर्यजनक है कि उसके बाद न तो इस प्यार की बात होती है और ना कोई प्यार जताने वाला मिलता है। फिर इन्तजार होता है अगली 14 फरवरी का और इसी तरह यह क्रम चल रहा है। मैंने सोचा क्या सच में प्यार को जाहिर किया जा सकता है। जिस संत ‘वेलेंटाइन’ के नाम से यह दिन मनाया जाता है उसका मंतव्य तो कुछ और था और हम क्या उस मंतव्य को पूरा कर रहे हैंहमें ज्यादा दूर जाने कि आवश्यकता नहीं है। हमारे देश में भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैंजिन्होंने अपने जीवन को प्यार (लौकिकके लिए समर्पित कर दिया जैसे, हीर-राँझा, लैलामजनू, सोहनी-महिवाल, कुंजू-चंचलो, सुन्नी-भुन्कू, रान्झूफुल्मु, लिल्लोचमन आदि -आदि। परजो समाज आज प्रेम दिवस मना रहा है उस समाज ने इन प्यार करने वालों की कितनी कदर की, यह सब आप जानते हैं। आज जो कुछ भी हमारे सामने घटित हो रहा हैक्या सच में प्यार करने वाले ऐसा कर सकते हैं। मेरी समझ में नहीं...अगर जिन्दगी में हम किसी एक इनसान से भी निस्वार्थ प्रेम कर पाए तो हमारी जिन्दगी की सफलता निश्चित हो जाती है...और यहाँ तो लोग प्रेम करने का दावा करते हैं। यह बात भी सच है कि लौकिक प्रेम से ही आलौकिक प्रेम का मार्ग प्रशस्त होता हैऔर हमें यह भी बताया जाता है कि इनसान से प्रेम करना ही भगवान से प्रेम करना है। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है...नहीं। अगर ऐसा होता तो आज दुनिया का यह स्वरूप यह नहीं होता।
आज जिस दिशा की तरफ हम बढ़ रहे हैं...क्या प्यार के कारण ऐसा हो सकता है...नहींदुनिया में सभी तरह की अधिकता तबाही मचा सकती है लेकिन प्यार की अधिकता तो सकूँ और चैन लाती है। पर यहाँ पर तो सब चीजें अस्त-व्यस्त हैं। सबको अपनी-अपनी पड़ी है। जो हमारी संकीर्णता की परिचायक है। जरा गहराई से सोचें क्या प्रेम करने के लिए एक दिन काफी है और बाकी के दिन सिर्फ नफरत के लिए तो जिन्दगी का मंतव्य क्या रह जायेगा। मैं व्यक्तिगत रूप से वेलेंटाइन डे का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन जिस तरह से और जिन मंतव्यों के लिए इस दिन को मनाया जाता है उस प्रक्रिया पर मुझे अफ़सोस जरुर होता है:-
दिल है कि धडकने का सबब भूल गया है
जीने का सलीका और अदब भूल गया है।
आज हम अपने चारों और के वातावरण को देखें। हमें क्या नजर आता है। आज दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी है और हम निरंतर आविष्कार कर रहे है घातक हथियारों कापर किसके लिए सिर्फ इनसान के लिए...आज इनसान को इनसान से ज्यादा डर है और उसका मंतव्य है किसी के हक को छीनकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना। जब ऐसे हालत हमारे सामने हैं तो हम किस दिशा की तरफ जा रहे हैं, यह हमें सोचना होगा। कम से कम प्यार की यह दिशा तो नहीं हैऔर यह भी सच है कि:-
इस दुनिया में ऐ जहाँ वालोबहुत मुश्किल है इन्साफ करना
बहुत आसां है सजाएं देनाबहुत मुश्किल है माफ़ करना।
हम माफ़ करने के बारे में कम सोचते हैं और सजाएँ देने के बारे में जयादा तो फिर हम क्या प्यार करते हैं और किस से। कम से कम मेरी समझ में तो नहीं आता।
आज वेलेंटाइन डे को मात्र मनाने की जरुरत नहीं बल्कि इस दिन के मूल मंतव्य को समझने की आवश्यकता है, और अगर हम समझ जाते हैं तो निश्चित रूप से हमारे लिए हर एक दिन वेलेंटाइन डे होता है। एक छोटी सी जिन्दगी में हम जितना इस खुदा की बनाई सृष्टि से प्यार कर पाते हैं उतना ही हम जिन्दगी के मकसद के करीब पहुँच पाते हैं। और जिन्दगी का मकसद है LIVE AND LET LIVE। हम जब भी इन बातों के बारे में सोचेंगे इनकी महता खुद ब खुद हमारे सामने आ जाएगीहम प्रेम के मूल मंतव्य को समझ जायेंगे और तब हमें सृष्टि प्रेममयी नजर आएगीजिन्दगी जीने का आनंद आ जायेगा। फिर हम सब रोज वेलेंटाइन डे मनाया करेंगे उसके लिए हमें किसी खास दिन का इन्तजार नहीं करना पड़ेगा। काश!! हम केवल इतना कर पाते कि अपने दिल और दिमाग को हर तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त रखकर इस दुनिया में आनंद लेते हुए इस जीवन के सफ़र को तय कर पातेऔर फिर हर दिन वेलेंटाइन डे मानते।
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12 फ़रवरी 2011

अहसास होता है

74 टिप्‍पणियां:
कभी-कभी हमारी जिन्दगी में हमारी सोच के अनुकूल कुछ नहीं होता तो हम हताश हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में अगर हमें कोई आशा की किरण दिखाई देती है तो वह है ‘ईश्वर’. लेकिन ईश्वर पर हमारा यकीन उस स्तर का नहीं होता, जिस स्तर का होना चाहिए. ऐसी स्थिति में मन में कुछ यूं हलचल मचती है....!!!      

क्योँ कभी-कभी यह मन उदास होता है
है तू कण-कण में, क्योँ नहीं अहसास होता है.

तेरी रहमत का सदका है जमीं आसमां में
क्यों नहीं मेरे मन को यह विश्वास होता है.

है हर तरफ जलवा तेरा, गर तेरे हैं सब
फिर कोई क्योँ पराया, कोई ख़ास होता है.

मुद्दत बाद मिली जिन्दगी, वो भी चंद साँसें
क्योँ तृष्णाओं-लालसाओं का लिवास होता है.

सब कुछ भुलाकर, तेरा अर्पण कर दिया तुझे
हर पल तुझे देखता हूँ, पल-पल अहसास होता है.

07 फ़रवरी 2011

कितना मुश्किल है

76 टिप्‍पणियां:
खुशी अपने लिए सोचते हैं सब
करते हैं कोशिश
दुसरे की भावनाओं को
ठेस लगाकर , खुद खुश होने की
पर....
किसी की भावनाओं को समझकर
खुद खुश होना ,कितना मुश्किल है

राह चलते , दिख जाते हैं, कई दृश्य ह्रदय विदारक
हर दृश्य पर सोच कर , कुछ करने की तमन्ना
और उस निस्वार्थ तमन्ना को
सोचकर ....
मूर्त रूप देना , कितना मुश्किल है

मुझे समझ ले अपना कोई
ह्रदय में बसाकर दे प्यार और सत्कार
किसी को अपना बनाने की सब सोचते हैं
पर .....
सहज भाव से किसी का हो जाना , कितना मुश्किल है

दुखी दुसरे को देखकर
उसके आंसू पोंछना , आसान है
लेकिन....
किसी के दुःख पर खुद रोना , कितना मुश्किल है .
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आप सबका ह्रदय से आभार ...आपने मेरी ब्लॉगरीय षटकर्म वाली पोस्ट पर इतनी अच्छी प्रतिक्रियाएं दी ...आपके स्नेह और मार्गदर्शन से यह संभव हो पाया है ...आशा है आप अपना सहयोग यूँ ही बनाये रखेंगे ....!
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01 फ़रवरी 2011

ब्लॉगरीय षटकर्म

110 टिप्‍पणियां:
अगर आप ब्लॉगिंग के प्रति समर्पित हैं तो ब्लॉगरीय षटकर्म से आपको जरुर वास्ता पड़ता होगा, इन बातों से हालाँकि जरुरी नहीं कि आप सभी सहमत हों, लेकिन ब्लॉगिंग के इस छोटे से सफर में मैंने जो अनुभव किया उसके निष्कर्ष कुछ इस तरह है, और आदरणीय ललित शर्मा जी यही मानते हैं, तो चलो बात करते हैं क्या है ब्लॉगरीय षटकर्म :-

लेखन : आपकी रचनात्मकता आपकी सोच का परिणाम है, और आपकी सोच आपके व्यक्तिव का परिचय। हम जब भी कोई शब्द लिखते या बोलते हैं तो वह शब्द हमारे व्यक्तिव का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। लेखन का जहाँ तक सम्बन्ध है, कालजयी और सार्थक लेखन उसे ही कहा जाता है, जिसमें किसी व्यक्ति के उदात भाव अभिव्यक्त हुए हों। यानि उस व्यक्ति ने भावों को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्त किया हो. यदि हम भारतीय वाऽ.मय पर दृष्टिपात करें तो वेदों का महत्व आज भी उतना ही है जितना की उस युग में था, यही बात पुराण, उपनिषद और परवर्ती ग्रंथों और रचनाकारों पर भी समान रूप से लागू होती है। आधुनिक युग में भी बहुत से विचारक, दार्शनिक और लेखक हुए हैं। लेकिन काल और समय की सीमा से परे वही लेखक हैं जिनके भावों में उदात्ता और मानवीय भावों समावेश है, और उनका लेखन आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मार्गदर्शन का काम कर रहा है, करता रहेगा उनकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी।

ब्लॉग की जहाँ तक बात है यह अपार संभावनाओं का द्वार है। हम तकनीकी रूप से बेशक उस काल के लोगों
से बहुत आगे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि चिंतन, सोच और संवेदना के स्तर पर हम उनका मुकाबला नहीं कर सकते. हमें अपने स्तर और लेखन के स्तर को बनाये रखने के लिए मौलिक चिंतन की तरफ ध्यान देना होगा। सकारात्मक सोच के साथ वैश्विक स्तर पर सोचना होगा आज भी हमारे सामने मानवीय सोच के वह पहलु हैं जिनके कारण हम एक दुसरे से जुदा हैं, कहीं भाषा के स्तर पर तो जाति के स्तर पर, कहीं धर्म के स्तर पर तो कहीं देशों की सीमा के स्तर पर। ऐसे और भी अनेक कारण हैं जो आज हमें एक दुसरे से जुदा करते हैं. ऐसे हालत में हमें खुद को समाज के जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में देखना होगा और जितना भी संभव हो सके हम सार्थक विचारों से खुद की छवि के साथ-साथ देश और समाज की छवि को भी सुधरने का प्रयास करें यही हमारे लेखन और ब्लॉगिंग की सार्थकता के साथ-साथ जीवन की सार्थकता भी है

पढना : हम किसी रचनाकार से चाहे किसी भी तरह से परिचित हैं। लेकिन उसकी सारी बातों से बढ़कर हमारे लिए उसका लेखन है। किसी लेखक के विचारों के जरिये हम उसके जीवन और सोच को विश्लेषित कर रहे होते हैं। हम किसी रचनाकार को तब रोचकता और जिज्ञासा से पढ़ते हैं, जब उसके विचार हमारे जीवन में उर्जा, सोच में सकारात्मकता, मन में पवित्रता ,विचार में दृढ़ता लाते हों। क्योँ हम बार-बार गीता, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों को पढ़ते हैं , सिर्फ इसलिए कि वह हमें एक नयी जीवन दृष्टि देते हैं, हमारे जीवन में आशा का संचार करते हैं, हमारे भावों में पवित्रता लाते हैं, या संक्षिप्त रूप से कहूँ तो वह हमें एक इंसान बनाते हैं। ब्लॉग में भी एक पाठक के तौर हमें इन संभावनाओं को तलाशना होगा। हमें सही मायने में पाठक बनना होगा। जब हम किसी का लेख पढ़ रहे होते हैं खुद हम लेखक होने की बजाए एक पाठक होते हैं। हम बेशक कम पढ़ें लेकिन जो पढ़ें उसे मनन करते हुए पढ़ें तभी हम एक सार्थक दिशा की तरफ बढ़ सकते हैं, वर्ना....आप समझदार हैं ...मैं तो नाचीज हूँ क्या कह सकता हूँ।

पढने के लिए लिंक देना : भामह ने अपने ग्रन्थ काव्यालंकार में काव्य प्रयोजन पर विचार करते हुए यश प्राप्ति को भी काव्य का एक प्रयोजन माना है, और यह मानवीय स्वभाव भी है कि उसके किसी कर्म का फल उसे अवश्य मिलना चाहिए। आज के तकनीकी युग में यह बात ज्यादा आसन हो गयी है। आज दृश्य और श्रव्य साधनों का विस्तार इतना हो चुका है कि पूरा विश्व हमें गाँव नजर आता है, और इस कारण हम किसी व्यक्ति से अपना संपर्क किसी भी तरीके से कर सकते हैं। उसे अपनी बात समझा सकते हें। ब्लॉग जगत में भी यह बात शत प्रतिशत लागू होती है, और यह आवशयक भी है कि हम जो भी लिखें किसी दुसरे को अवगत करवाएं लेकिन उसी सीमा तक जहाँ तक वह किसी की भावनाओं के साथ सही बैठता है। वर्ना ऐसा करना किसी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है

ब्लॉग लेखन के लिए प्रोत्साहित करना : यह एक नेक काम है कि हम किसी का उत्साहवर्धन कर उसे एक सकारात्मक काम के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। आप किसी ब्लॉगर की पोस्ट को पढ़कर एक टिप्पणी कर देते हैं तो लिखने वाले का मनोबल बढ़ जाता है और वह पूरी शिद्दत से अपने काम के प्रति समर्पित हो जाता है। किसी नए ब्लॉगर को लेखन के लिए प्रोत्साहन देना हमारा नेक कार्य है, और मैं जानता हूँ कि यह काम आप बहुत बखूबी करते हो। तभी तो हिंदी में ब्लॉगरों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है, और इससे दो लाभ प्रत्यक्ष रूप से हो रहें हैं एक तो हिंदी का प्रचार-प्रसार हो रहा है, और दूसरा हम एक दुसरे की रचनात्मकता को समझते हुए व्यक्तिगत संबंधों में भी बंध रहे हैं, जो कि ब्लॉगिंग का एक सुखद सकारात्मक पहलु है। निश्चित रूप से यह लेखन के इतिहास में एक नया अध्याय है। 

टिप्पणी करना : किसी रचना की महता पाठक के साथ समीक्षक पर निर्भर करती है, और हम जब किसी ब्लॉगर की पोस्ट पर टिप्पणी कर रहे होते हैं तो हम उसकी रचना की एक तरह से समीक्षा भी कर रहे होते हैं। यानि पढने के बाद एक समीक्षक के रूप में अपनी प्रतिक्रिया भी दर्ज करवा रहे होते हैं। आपकी टिप्पणी लेखक का मार्गदर्शन करती है, उसकी कमियां बताती हैं, और उसे और अच्छा लिखने को प्रेरित करती हैं। लेकिन इसी के उल्ट की गयी टिप्पणी किसी लेखक को निराश भी कर सकती है और उसके मनोबल को ठेस भी पहुंचा सकती है। इसलिए टिप्पणी करते वक़्त विवेक से काम लेन की आवश्यकता है.

टिप्पणी करने के लिए आमंत्रित करना : यह भी ब्लॉग की एक ख़ास बात है। जब हम किसी के ब्लॉग पर जाते हैं तो हमें लगता है कि इस पाठक या ब्लॉगर की उपस्थिति हमारे ब्लॉग पर आवश्यक है तो हम उसे आमंत्रित करते हैं कि इस रचना पर आपकी टिप्पणी अपेक्षित है, या इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे में सामने वाले को भी बल मिलता है और उत्सुकता बनी रहती है, किसी नए विषय को जानने की, कोई नया दृष्टिकोण प्राप्त करने की। यह भी एक तरीका है अपनी सोच और कर्म को किसी व्यक्ति तक पहुँचाने का, और यह बहुत सहज है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ब्लॉगिंग का संसार विविधता भरा, रोचक, ज्ञानवर्धक तथा अनन्त है। हमें अंतर्जाल के इस विशाल सागर में गोते लगाने चाहिए। लेकिन सब काम करते हुए संभल कर चलना चाहिए.....इतना ही "केवल"..! ब्लॉगरीय षटकर्म वाली मेरी यह पोस्ट आदरणीय राजीव जी के ब्लॉग  उफ़ ! ये ब्लॉगिंग  पर भी प्रकाशित हुई है ...मैं आदरणीय राजीव जी का आभारी हूँ ..!