31 दिसंबर 2010

मैं कैसे कहूँ कि तू ठहर जा

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अलविदा 2010 : समय मैं क्या कहूँ तेरे बारे में तू आता है और चला जाता है , या यूँ कहूँ तू अनवरत गाति से चलता रहता है और मेरी सांसों का सफ़र भी तेरे साथ लगातार चलता रहता है । पर अब तुझे जाना ही है तो मेरा कोई वश नहीं कि मैं तुझे कहूँ की तू ठहर जा और मैं कहूँगा भी नहीं ....बस जाते -जाते मुझे तेरे द्वारा किये गए उपकार याद आ रहे हैं । 365 1 /4 दिन के इस सफ़र में मैंने तेरे साथ 8,766 घंटे  और 5,25,960 मिनट 3,15,57,600 सेकण्ड बिताये । हम दोनों का साथ न जाने कितने वर्षों से इसी तरह है । आप इतने समय के लिए आते हो और चले जाते हो... मैं तुम्हारे जाने के बाद सोचता हूँ कि मैंने क्या किया तुम्हारे साथ रहकर : पर 2010 तुम मेरे लिए सबसे ख़ास रहे । जिन्दगी का सफ़र ...सफ़र में ही बीत गया । बहुत जगह जाना हुआ इस वर्ष भी .. बहुत सारे लोगों से मिलना हुआ । कल भी मैं सोच रहा था, पर सच कहूँ तो सिर्फ एक घटना ही ऐसी रही जिसने बहुत समय तक मुझे परेशान किया ...परन्तु अब छोड़ो ..सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि इस वर्ष मेरा " ब्लॉग जगत" में प्रवेश हुआ वो भी एक घटना थी ...और बहुत महत्वपूर्ण घटना ...यहाँ पर आकर मैं धन्य हो गया...इस नाचीज को बहुत सम्मान और स्नेह मिला है यहाँ ..रह - रह कर आपको याद करता हूँ, और यह याद अमिट बनी रहेगी, ऐसा मेरा वादा है ..जिन्दगी के इतिहास में आपका स्थान हमेशा रहेगा ...और अब मैं आपसे इजाजत चाहता हूँ ...जाते -जाते यह भी बता दूँ आपने मुझे हमेशा नसीहत दी है कि :-
जिन्दगी अनमोल है , इसे संभाल कर रखना
सांसों के सफर में , खुद के साथ, ओरों का भी ख्याल रखना ।
31 दिसम्बर रात्रि 11 : 59 :59 पर आप मेरे से सदा के लिए विदा हो जाओगे ...पर जुदा कभी भी नहीं ....शुक्रिया
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अब हम तुझे नव वर्ष 2011 के नाम से पुकारेंगे और "तेरे आने की जब खबर महके ..तेरी खुशबू से सारा घर चहके " और अगर घर में ख़ुशी का वातावरण है तो मैं सभी को शुभकामनायें देना चाहूँगा, कि आने वाले वर्ष में हर किसी के घर में खुशियों कि बरसात हो ...मैं पूरे विश्व में शन्ति और सद्भाव की कामना करता हूँ ...इंसानियत और भी बढे, हम एक दुसरे के करीब आ पायें ..मानवता भरा जीवन जी पायें ..किसी गिरते हुए को उठा पायें ..और हर संभव कोशिश रहे कि हम पूरी संवेदनशीलता से जीवन के इस सफ़र को तय कर पायें ...
मेरी और से शुभकामनायें :-
  • मेरी शुभकामना विश्व के हर उस व्यक्ति को है जो मानवीय मूल्यों पर आधारित जीवन जीते हुए हमेशा मानवता के लिए समर्पित है ।
  • देश के वो सेना नायक (जल ,थल,वायु ) जो सियाचिन जैसे न जाने कितने दुर्गम इलाकों में रहकर भारत माता की सीमाओं की दिन- रात रक्षा करते हैं .. उनके इस समर्पण भाव से ही आज हम सुरक्षित हैं ,हम चैन की नींद सो पाते हैं ...ऐसे नायकों को और उनके परिवारों को मेरी हार्दिक शुभकामनायें ।
  • अब ध्यान जाता है एक ऐसे बालक की तरफ जो तन पर कपडा न होते हुए भी कडकती ठण्ड में रेहड़ी पर पूरे कर्तव्य भाव से मूंगफली बेच रहा है ....ऐसे न जाने कितने पेशे हैं जहाँ पर ऐसे बालक काम करते हैं ..उन सबको मेरी हार्दिक शुभकामनायें ।
  • मेरी हार्दिक शुभकामना एक ऐसी बहन, भाई को भी है जो अपने जीवन में आभाव होते हुए भी अपने कर्तव्य के प्रति पूरी निष्ठा से समर्पित हैं ।
  • मेरी शुभकामना समाज के हर उस व्यक्ति को है जो हमारे समाज और देश में फैली अव्यवस्था को व्यवस्थित करने में ...और की सामाजिक कुरीतिओं को मिटाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।
सूची तो बहुत लम्बी है अब एक पंक्ति में कहना चाहूँगा ....पूरे विश्व के लोगों को मेरी तरफ से नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें .........!
और .................................विशिष्ट ....
"ब्लॉग जगत के तमाम ब्लॉगर साथियों को मेरी तरफ से नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें , आपका स्नेह और प्यार इसी तरह बरकरार रहे ...आपने जिस तरह से इस नाचीज पर अपनी इनायत भरी निगाह रखी है ..उसे यूँ ही बरकरार रखना ......मुझे अभी बहुत कुछ करना है ...आपके आशीर्वादों से ..........!
और अब मैं तैयार हूँ 2011 का हार्दिक स्वागत करने के लिए ....और 2010 को अलविदा कहने के लिए :-

      नव वर्ष 2011 की हार्दिक
      शुभकामनाओं के साथ
        .......आपका अपना......
       .......केवल राम ...!

26 दिसंबर 2010

था वाजिब

56 टिप्‍पणियां:
जब मुद्दत बाद अपने किसी खास दोस्त से मुलाकात होती है तो मन में कुछ इस तरह के भाव उठते हैं ........

मुद्दत बाद मिले तो कुछ बदला लगना था वाजिब
दो जान एक दिल तो अश्कों का बहना था वाजिब

गैरों के जहां में पनाह दी थी नाचीज को
अपनाया बाँहों में , गिलों का मिटना था वाजिब

सपनों का ताज टूटा था जब चंद रोज पहले
आज बस गयी बस्ती , चिड़ियों का चहकना था वाजिब


सहा जिसने हर गम को ख़ुशी का उपहार समझकर


सागर से दरिया मिला , लहरों का उठाना था वाजिब

मिलने की चाहत देखी रात के आगोश में
उतरा चाँद जमीं पर, चकोर का चहकना था वाजिब