29 अक्तूबर 2010

संसार पाया होता

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तमन्ना ही रही कि उनका पार पाया होता
जो था पलकों के करीब, उसका सार पाया होता ।

सागर है तो शांत है, ना कोई किनारा होगा
बनकर हंस मोती चुनने का किरदार निभाया होता ।

आज चेहरों पर चेहरे लगाये फिरते हैं लोग
जिस्म का नहीं, आत्मा का श्रंगार पाया होता । 


जो भी मिला सबसे है गम देने का गिला
अपना उसे बनाकर, एक मददगार पाया होता । 

जामा इंसानी मिला, पर गुण कितने हैं इसमें
देखकर ज्ञान का आईना, कुछ पारावार पाया होता ।

मिटाने पर तो मिट जाते हैं, निशां - ए - खूं
उसे समर्पित होकर एक नया संसार पाया होता ।

केवल जीने का नाम नहीं है जिन्दगी
मिटाकर हस्ती को गुल-ए-गुलजार पाया होता ।

19 अक्तूबर 2010

वो लहर

7 टिप्‍पणियां:
सागर के तट पर जाते ही
देखा
पानी की एक लहर
हो रही है, अलग प्रतीत


देखते ही नयनों का निशाना लग गया
मानो मैं उस लहर में खो गया
तलाश मोतियों की थी
पर कला अधूरी थी......।

सीखना चाहा उस लहर से
जो सागर से मोती उभार रही थी
नजर -नजर में, मैं निहार रहा था
अंग -अंग फड़क रहा था

चूम लूँ , छू लूँ , बना लूँ इसे अपना

ताकि सिखा दे मुझे
इस तरह लहरना
लहर कर फिर ठहरना
मोती उभारना
हंस को आकर्षित करना
पर कला अधूरी थी......।
पहुंचा वहां
जहाँ वो लहर थी बड़ी करीब
उसे पाने की सोच रहा था तरकीब
मन में लेकर विश्वास
उसे पाने का किया प्रयास
बढ़ाते ही कदम



उसमें उठने लगा अहम
लगी वो सागर से और उठने
तोड़ देना चाहती थी, सीमा.......।

हटना पड़ा पीछे
इसलिए
कहीं बहा न दे बहाब में
या मैं घिर न जाऊं ,उसके शबाब में
देखता रहा ,रहा सोचता
उसांस भरकर , किनारे पर लोटता
लेटकर घास नोचता
मानो.......
भाव की चढ़ रही हो बलि
कैसे बनाऊ उसे अलि।